नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142 – 144
उद्भूतविस्मयोऽपृच्छत्किमेतदिति किङ्करान् । ते च तत्सम्यगन्विष्य चक्रनाथं व्यजिज्ञपन् ॥ १४२ ॥श्रुत्वा तद्वचनं चक्री सावधानं वितर्कयन् । रागि चेतः कुमारस्य चिराचित्रमजायत ॥ १४३ ॥ अभूत्कल्याणयोग्योऽयमारूढनवयौवनः । बाधा खलेन कामेन कस्य न स्यात्सकर्मणः ॥ १४४ ॥
बड़े आश्चर्यके साथ उन्होंने किंकरोंसे पूछा कि ‘यह क्या है ?’ किंकरोंने भी अच्छी तरह पता लगा कर श्रीकृष्णसे सब बात ज्योंकी त्यों निवेदन कर दी। किंकरोंके वचन सुनकर चक्रवर्ती कृष्णसे बड़ी सावधानीके साथ विचार करते हुए कहा कि आश्चर्य है, बहुत समय बाद कुमार नेमिनाथका चित्त रागसे युक्त हुआ है। अब यह नवयौवनसे सम्पन्न हुए हैं अतः विवाहके योग्य हैं- इनका विवाह करना चाहिए। सो ठीक ही है ऐसा कौन सकर्मा प्राणी है जिसे दुष्ट कामके द्वारा बाधा नहीं होती हो ।। १४२-१४४ ॥
“With great astonishment, He asked the servants, ‘What is this?’ After thoroughly investigating the matter, the servants related everything exactly as it happened to Shri Krishna. Hearing the words of the servants, the Emperor (Chakravarti) Krishna pondered very carefully and said, ‘Astonishing! After a very long time, Prince Neminatha’s mind has been touched by passion (raga). He is now endowed with blooming youth, and is therefore fit for marriage; His wedding must be arranged.’ And that is quite true—for who is that worldly being (sakarma prani) bound by karma that is not troubled by the wicked God of Love (Kama)? || 142-144 ||”
श्लोक ( Shlok ) 145
इत्युग्र वंशवार्धीन्दो रुग्रसेनमहीभुजः । जयावत्याश्च सर्वाङ्ग शस्या राजीमतिः सुता ॥ १४५ ॥
यह कह कर उन्होंने विचार किया कि उग्रवंशरूपी समुद्रको बढ़ानेके लिए चन्द्रमाके समान, राजा उग्रसेनकी जयावती रानीसे उत्पन्न हुई राजीमति नामकी पुत्री है जो सर्वाङ्ग सुन्दर है ।। १४५ ।।
“Having said this, He reflected that just like the moon that causes the ocean to swell, there is a daughter named Rajimati born to Queen Jayavati and King Ugrasena. She belongs to the Ugra lineage (Ugravansha) and is flawlessly beautiful in every limb. || 145 ||”
श्लोक ( Shlok ) 146
तद्दृहं तां स्वयं गत्वा कन्यां मान्यामयाचत । त्रिलोकस्वामिनो नेमेः प्रियास्त्वेषेति सादरम् ॥ १४६ ॥
विचारके बाद ही उन्होंने राजा उग्रसेनके घर स्वयं जाकर बड़े आदरसे ‘आपकी पुत्री तीन लोकके नाथ भगवान् नेमिकुमारकी प्रिया हो’ इन शब्दोंमें उस माननीय कन्याकी याचना की ।। १४६ ॥
“Immediately after reflecting upon this, He personally went to the palace of King Ugrasena and, with great reverence, requested the hand of that venerable maiden with these words: ‘May your daughter become the beloved consort of Lord Nemikumara, the Lord of the three worlds.’ || 146 ||”
श्लोक ( Shlok ) 147 – 151
त्रिखण्डजातरनानां त्वं पतिर्नो विशेषतः । देव त्वमेव नाथोऽसि प्रस्तुतार्थस्य के वयम् ॥ १४७ ॥इश्युग्रसेनवाचोद्यत्संमदो यादवाधिपः । शुभेऽहनि समारभ्य विधातु स तदुत्सवम् ॥ १४८ ॥पञ्चरणमयं रम्यं समानयदनुरारम् । विवाहमण्डपं तस्य मध्यस्थे जगतीतले ॥ १४९ ॥नवमुक्ताफलालोलरङ्गवल्लीविराजिनि । मङ्गलामोदि १ पुष्पोपहारासारविलासिनि ॥ १५० ॥विस्तृताभिनवानर्व्यबस्ने सौवर्णपट्टके । वध्वा सह समापार्द्रतण्डुलारोपणं वरः ॥ १५१ ॥
इसके उत्तर में राजा उग्रसेनने कहा कि ‘हे देव ! तीन खण्डमें उत्पन्न हुए रत्नोंके आप ही स्वामी हैं, और खास हमारे स्वामी हैं, अतः यह कार्य आपको ही करना है- आप ही इसके नाथ हैं हम लोग कौन होते हैं?’ इस प्रकार राजा उग्रसेनके वचन सुन कर श्रीकृष्ण महाराज बहुत ही हर्षित हुए। तदनन्तर उन्होंने किसी शुभदिनमें वह विवाहका उत्सव करना प्रारम्भ किया और सबसे उत्तम तथा मनोहर पाँच प्रकारके रत्नोंका विवाहमण्डप बनवाया। उसके बीचमें एक वेदिका बनवाई गई थी जो नवीन मोतियोंकी सुन्दर रङ्गावलीसे सुशोभित थी, मङ्गलमय सुगन्धित फूलोंके उपहार तथा वृष्टिसे मनोहर थी, उस पर सुन्दर नवीन वस्त्र ताना गया था, और उसके बीचमें सुवर्णकी चौकी रखी हुई थी। उसी चौकी पर नेमिकुमारने वधू राजीमतीके साथ गीले चावलोंपर बैठनेका नेंग (दस्तूर) किया ॥१४७-१५१।।
“In response, King Ugrasena said, ‘O Lord! You alone are the master of all the treasures produced across the three realms (Khandas), and You are our personal sovereign. Therefore, it is You who must carry out this deed—You alone are its master, so who are we to object?’ Upon hearing these words of King Ugrasena, Emperor Shri Krishna was deeply delighted.
Subsequently, on an auspicious day, He initiated the wedding festivities and had a marriage canopy (mandapa) constructed out of the finest and most captivating five kinds of gems. In the center of it, an altar (vedika) was erected, which was beautifully adorned with splendid, fresh pearl-rangoli patterns. It was enchanting with offerings and showers of auspicious, fragrant flowers, shaded by a canopy of beautiful new textiles stretched across it, and a golden pedestal was placed right in its center. It was upon that very pedestal that Prince Neminatha, along with the bride Rajimati, performed the wedding ritual (neing) of sitting upon the wet rice grains. || 147-151 ||”
श्लोक 152 से 162
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497
नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141
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