मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 344 से 353 | श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390 | श्लोक 391 से 401
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 402 to 411
श्लोक ( Shlok ) 402
चेन्मत्स्यबन्धादिपापिनां परमा गतिः । सत्यधर्मतपोब्रह्मचारिणो यान्त्वधोगतिम् ॥ ४०२ ॥
हो जावें यदि यह आपका कहना है तो मछलियाँ पकड़नेवाले आदि पापी जीवोंकी शुभ गति होनी चाहिये और सत्य, धर्म, तपश्चरण तथा ब्रह्मचर्यका पालन करनेवालेको अधोगतिमें जाना चाहिए ॥ ४०२ ॥
“If that is what you say, then sinful creatures like fishermen should attain a auspicious state (heavenly realm/salvation), and those who practice truth, righteousness, penance, and celibacy should go to a lower state (hell/perdition). || 402 ||”
श्लोक ( Shlok ) 403 – 405
पशुवधाद्धर्मो नेतरत्रेति चेन्न तत् । वधस्य दुःखहेतुत्वे सादृश्यादुभयत्र वा ॥४०३॥ फलेनापि समानेन भाव्यं कस्तन्निषेधकः । अथ त्वमेवं मन्येथाः ‘पशुसृष्टेः स्वयम्भुवः ॥४०४॥यज्ञार्थत्वान्न तस्यातिविनियोक्तुरधागमः । इत्येवं चातिमुग्धाभिलाषः साधुविगर्हितः ॥४०५॥
कदाचित् आप यह कहें कि यज्ञमें पशु वध करनेसे धर्म होता है अन्यत्र नहीं होता ? तो यह कहना भी ठीक नहीं हैं क्योंकि वध दोनों ही स्थानोंमें एक समान दुःखका कारण है अतः उसका फल समान ही होना चाहिए इसे कौन रोक सकता है ? कदाचित् आप यह मानते हों कि पशुओंकी रचना विधाताने यज्ञके लिए ही की है, अतः यज्ञमें पशु हिंसा करनेवालेके लिए पाप-बन्ध नहीं होता तो यह मानना ठीक नहीं है क्योंकि यह मूर्ख जनकी अभिलाषा है तथा साधुजनोंके द्वारा निन्दित है ॥४०३-४०५।।
“If you argue that sacrificing animals in a ritual (Yajna) brings righteousness (Dharma), but doing it elsewhere does not, then this reasoning is also incorrect. Because in both instances, slaughter causes the exact same suffering; therefore, who can deny that its consequence must also be the same?
Furthermore, if you believe that the Creator made animals solely for the purpose of sacrifice, and thus, those who commit violence against animals in a Yajna do not bind themselves to sin—this belief is also invalid. For this is merely the wishful thinking of ignorant people and is condemned by the virtuous. || 403-405 ||”
श्लोक ( Shlok ) 406 – 409
तत्सर्गस्यैव साधुत्वादस्त्यन्यच्चात्र “दुर्घटम् । यदर्थं यद्धि तस्यान्यथोपयोगेऽर्थकृन्न तत् ॥४०६॥यथान्यथोपयुक्तं स श्लेष्मादिशमनौषधम् । यज्ञार्थपशुसर्गेण क्रयविक्रयणादिकम् ॥४०७॥ तथान्यथा प्रयुक्तं तन्महादोषाय कल्पते । दुर्बलं वादिनं दृष्ट्वा ब्रूमः त्वामभ्युपेत्य च ॥४०८॥यथा शस्त्रादिभिः प्राणिव्यापादी वध्यतेंऽहसा । मन्त्रैरपि पशून् हन्ता वध्यते निविशेषतः ॥४०९॥
यज्ञके लिए ही ब्रह्माने पशुओंकी सृष्टि की है यदि यह आप ठीक मानते हैं तो फिर उनका अन्यत्र उपयोग करना उचित नहीं है क्योंकि जो वस्तु जिस कार्यके लिए बनाई जाती है उसका अन्यथा उपयोग करना कार्यकारी नहीं होता। जैसे कि श्लेष्म आदिको शमन करनेवाली औषधिका यदि अन्यथा उपयोग किया जाता है तो वह विपरीतफलदायी होता है। ऐसे ही यज्ञके लिए बनाये गये पशुओंसे यदि क्रय-विक्रय आदि कार्य किया जाता है तो वह महान् दोष उत्पन्न करनेवाला होना चाहिए। तू बाद करना चाहता है परन्तु दुर्बल है- युक्ति बलसे रहित है अतः तेरे पास आकर हम कहते हैं कि जिस प्रकार शस्त्र आदिके द्वारा प्राणियोंका विघात करनेवाला मनुष्य पापसे बद्ध होता है उसी प्रकार मन्त्रोंके द्वारा प्राणियोंका विघात करनेवाला भी बिना किसी विशेषताके पापसे बद्ध होता है ।। ४०६-४०९ ॥
“Brahma created animals solely for the purpose of sacrifice (Yajna). If you accept this as correct, then it is inappropriate to use them for any other purpose, because using an object for something other than what it was created for does not yield the desired effect.
For instance, if a medicine meant to alleviate phlegm (Shleshma) and other humors is used in a different manner, it produces contrary (harmful) results. Similarly, if animals created for sacrifice are used for buying, selling, or other such commercial purposes, it must give rise to a great sin.
You wish to debate but you are weak—devoid of the strength of logic. Therefore, approaching you, we say that just as a person who destroys living beings using weapons and the like is bound by sin, in the exact same manner, one who destroys living beings through mantras is also bound by sin, without any distinction. || 406-409 ||”
श्लोक ( Shlok ) 410
पश्वादिलक्षणः सर्गो व्यज्यते क्रियतेऽथवा । क्रियते चेत्खपुष्पादि चासन्न क्रियते कुतः ॥४१०॥
दूसरी बात यह है कि ब्रह्मा जो पशु आदिको बनाता है वह प्रकट करता है अथवा नवीन बनाता है ? यदि नवीन बनाता है तो आकाशके फूल आदि असत् पदार्थ क्यों नहीं बना देता ? ॥ ४१० ॥
“Secondly, does Brahma, who creates animals and other beings, merely manifest them or does he create them entirely anew? If he creates them completely anew, then why does he not create non-existent entities, such as a flower in the sky? || 410 ||”
श्लोक ( Shlok ) 411
अथाभिव्यज्यते तस्य वाच्यं प्राप्रतिबन्धक्रम्’ । प्रदीपज्वलनात्पूर्व घटादेरन्धकारवत् ॥ ४११॥
यदि यह कहो कि ब्रह्मा पशु आदिको नवीन नहीं बनाता है किन्तु प्रकट करता है? तो फिर यह कहना चाहिए कि प्रकट होनेके पहले उनका प्रतिबन्धक क्या था ? उन्हें प्रकट होनेसे रोकनेवाला कौन था ? जिस प्रकार दीपक जलनेके पहले अन्धकार घटादिको रोकनेवाला है उसी प्रकार प्रकट होनेके पहले पशु आदिको रोकनेवाला भी कोई होना चाहिए ॥ ४११ ॥
“If you argue that Brahma does not create animals and other beings anew, but merely manifests them, then you must explain what the obstacle (pratibandhaka) was before their manifestation? Who or what was stopping them from being manifested?
Just as before a lamp is lit, darkness acts as the obstacle preventing jars and other objects from being seen, similarly, there must be something that was obstructing the animals and other beings before they were manifested. || 411 ||”
श्लोक 412 से 426
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343 | श्लोक 344 से 353 | श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390 | श्लोक 391 से 401
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