चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 202 to 212
श्लोक ( Shlok ) 202 – 206
अभिज्ञानमिदं तम्य सम्यक्च्कृणु वणिग्वर । कप्स्यमार्ग सुतं सद्यो मृतं त्यक्तुं वनं गतः ॥ २०२ ॥तन्त्र कश्चिशनूजं त्वं रूप्स्यसे पुण्यभाजनम् । स समस्तां महीं भुक्त्वा तृप्तो वैषयिकैः सुखैः ॥ २०३ ॥प्रान्ते विध्वस्य कर्माणि मोक्षलक्ष्मीमवाप्स्यति । इति तद्वचनं श्रुत्वा काचिशत्सजिधौ स्थिता ॥ २०४ ॥यक्षी भविष्यतो राजसूनोः पुण्यप्रचोदिता । तस्योत्पत्तौ स्वयं मातुरुपकारविजित्सया ॥ २०५ ॥गत्वा राजकुलं वैनतेययन्त्रगताभवत् । प्रायः ‘प्राक्कृतपुण्येन सनिधित्सम्ति देवताः ॥ २०६ ॥
हे वैश्य वर ! चिरजीव पुत्र प्राप्त होनेका चिह्न यह है, इसे तु अच्छी तरह सुन तथा जो पुत्र तुझे प्राप्त होगा वह भी सुन। तेरे एक मृत पुत्र होगा उसे छोड़नेके लिए तू वनमें जायगा। वहाँ तू किसी पुण्यात्मा पुत्रको पावेगा। वह पुत्र समस्त पृथिवी का उपभोगकर विषय सम्बन्धी सुखोंसे संतुष्ट होगा और अन्तमें समस्त कर्मोंको नष्टकर मोक्ष लक्ष्मी प्राप्त करेगा। जिस समय उक्त मुनिराज गन्धोत्कट सेठसे ऊपर लिखे वचन कह रहे थे उस समय वहाँ एक पक्षी भी बैठी थी। मुनिराजके बचन सुनकर पक्षीके मनमें होन हार राजपुत्रकी माताका उपकार करनेकी इच्छा हुई। निदान, जब राजपुत्रकी उत्पत्तिका समय आया तब वह यक्षी उसके पुण्यसे प्रेरित होकर राजकुलमें गई और एक गरुड यन्त्रका रूप बनाकर पहुँची। सो ठीक ही है क्योंकि पूर्वकृत पुण्यके प्रभावसे प्रायः देवता भी समीप आ जाते हैं ।। २०२-२०६ ॥
“O excellent Vaishya! Listen carefully to the sign by which you shall obtain a long-lived son, and also hear about the son you will receive. You will have a stillborn son, and you will go to the forest to discard him. There, you will find a highly meritorious son. That son, after enjoying the entire earth and satisfying himself with worldly pleasures, will ultimately destroy all his karmas and attain the goddess of liberation (Moksha-Lakshmi). At the very moment the Muniraj was speaking these words to the merchant Gandhotkata, a Yakshi happened to be sitting there. Upon hearing the sage’s words, a desire arose in the Yakshi’s heart to assist the mother of the future prince. Consequently, when the time for the prince’s birth arrived, that Yakshi, prompted by his merit, went to the royal palace, taking the form of a mechanical Garuda (Garuda Yantra). This is indeed fitting, for through the influence of past merits, even celestial beings usually draw near. || 202-206 ||”
श्लोक ( Shlok ) 207 – 208
अधागते मधौ मासे सर्वसत्त्वसुखावहे । पुरोहितोऽहितोऽन्येयुः प्रातरेव समागतः ॥ २०७ ॥महीपतिगृहं देवीं वीक्ष्य वीतविभूषणाम् । उपविष्टां क राजेति समपृच्छत्स सादरम् ॥ २०८ ॥
तदनन्तरसब जीवोंको सुख देने वाला बसन्तका महीना आ गया। किसी एक दिन अहित करने वाला रुद्रदत्त नामका पुरोहित प्रातःकालके समय राजाके घर गया। वहाँ रानीको आभूषणरहित बैठी देखकर उसने आदरके साथ पूछा कि राजा कहाँ हैं ? ।। २०७-२०८ ॥
“Thereafter, the spring season arrived, bringing delight to all living beings. One morning, the ill-willed priest named Rudradatta went to the king’s palace. Seeing the queen sitting there without any ornaments, he respectfully asked, ‘Where is the king?’ || 207-208 ||”
श्लोक ( Shlok ) 209 – 212
साप्याह सुप्तवान् राजा शक्यो नैव निरीक्षितुम् । इति तद्वचनं सोऽपि दुर्निमित्तं विभावयन् ॥ २०९ ॥ ततो निवृत्तः सम्प्राप्य काष्ठाङ्गारिकमन्त्रिणः । भास्करोदयवेलायां गेहं तन्त्रावलोक्य तम् ॥ २१० ॥ पापबुद्धिमिथोऽवादीद्राज्यं तव भविष्यति । महीपतिनिहन्तव्यस्त्वयेति तदुदीरितम् ॥ २११ ५ श्रुत्वा कर्मकरं मन्त्रिपदे मां विन्ययोजयत् । राजायमकृतज्ञो वा कथं वापकरोम्यहम् ॥ २१२॥
रानीने भी उत्तर दिया कि राजा सोये हुए हैं इस समय उनके दर्शन नहीं हो सकते। रानीके इन वचनोंको ही अपशकुन समझता हुआ वह वहाँसे लौट आया और सूर्योदयके समय काष्टाङ्गारिक मन्त्रीके घर जाकर उससे मिला। उस पापबुद्धि पुरोहितने एकान्तमें काष्ठाङ्गारिकसे कहा कि यह राज्य तेरा हो जावेगा तू राजाको मार डाल । पुरोहितकी बात सुनकर काष्ठागारिकने कहा कि मैं तो राजाका नौकर हूं, राजाने ही मुझे मन्त्रीके पदपर नियुक्त किया है। यद्यपि यह राजा अकृतज्ञ है-मेरा किया हुआ उपकार नहीं मानता है तो भी मैं यह अपकार वैसे कर सकता हूँ ? ।। २०९-२१२ ।।
“The queen also replied, ‘The king is asleep; you cannot see him at this moment.’ Taking these words of the queen as a bad omen, he returned from there and, at the time of sunrise, went to the house of the minister Kashtangarika to meet him. In private, that evil-minded priest said to Kashtangarika, ‘This kingdom will become yours; kill the king.’ Hearing the priest’s words, Kashtangarika said, ‘I am but the king’s servant, and it is the king himself who appointed me to the post of minister. Even though this king is ungrateful—failing to acknowledge the services I have rendered—how can I commit such a misdeed against him?’ || 209-212 ||”
श्लोक 213 से 222
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201
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