नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 364 से 375 | श्लोक 376 से 392 | श्लोक 393 से 402 | श्लोक 403 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 431
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 432 to 441
श्लोक ( Shlok ) 432 – 437
तत्र कृष्णं समालम्ब्य स्थितवन्तं महाबलम् । दर्पिणो वृषभेन्द्रस्य ग्रीवां भङ्क्त्वा तदैव तौ ॥४३२॥ विलोक्य गन्धमाल्यादिमाननानन्तरं पुनः । प्रीत्या भूषयतः स्मातः कुर्वत्या द्राक् प्रदक्षिणम् ॥४३३॥ देवक्याः स्तनयोः शातकुम्भकुम्भाभयोः पयः । निर्गलन्न्यपतन्मूर्धिन कृष्णस्येवाभिषेचनम् ॥४३४॥सीरपाणिस्तदन्वीक्ष्य मन्त्रभेदभयाद् द्रुतम् । उपवासपरिश्रान्ता मूर्छितेति वदन्सुधीः ॥४३५॥ कुम्भपूर्णपयोभिस्तामभ्यषिञ्चत्समन्ततः । ततो ब्रआधिपादीनामपि तद्योग्यपूजनम् ॥४३६॥ कृत्वा कृष्णं च गोपालकुमारैर्जातसम्मदौ । भोजयित्वा स्वयं चात्र भुक्त्वा पुरमविक्षताम् ॥४३७॥
जब ये सब वहाँ पहुँचे थे तब महाबलवान् कृष्ण किसी अभिमानी बैलकी गर्दन झुकाकर उससे लटक रहे थे। देवकी तथा बलदेवने उसी समय कृष्णको देखकर गन्ध माला आदिसे उसका सन्मान किया और स्नेहसे आभूषण पहिनाये । देवकीने उसकी प्रदक्षिणा दी। प्रदक्षिणाके समय देवकीके सुवर्ण कलशके समान दोनों स्तनोंसे दूध झरकर कृष्णके मस्तक पर इस प्रकार पड़ने लगा मानो उसका अभिषेक ही कर रही हो। बुद्धिमान् बलदेवने जब यह देखा तब उन्होंने मन्त्रभेदके भयसे शीघ्र ही ‘यह उपवाससे थककर मूच्छित हो रही है’ यह कहते हुए दूधसे भरे कलशोंसे उसका खूब अभिषेक कर दिया । तदनन्तर देवकी तथा वसुदेव आदिने व्रजके अन्य अन्य प्रधान लोगोंका भी उनके योग्य पूजा-सत्कार किया, हर्षित होकर गोपाल बालकोंके साथ श्रीकृष्णको भोजन कराया, स्वयं भी भोजन किया और तदनन्तर लौटकर मथुरापुरी में वापिस आ गये ।। ४३२-४३७ ॥
“When they all arrived there, the immensely powerful Krishna was holding down the neck of an arrogant bull and hanging from it. Seeing Krishna at that very moment, Devaki and Baladeva honored Him with fragrant garlands and the like, and affectionately adorned Him with ornaments. Devaki then performed a circumambulation (Pradakshina) around Him. During the circumambulation, milk began to stream from Devaki’s two breasts—which resembled golden pitchers—and fall upon Krishna’s head, as if she were performing His ritual anointment (Abhisheka).
When the wise Baladeva saw this, fearing that their secret might be leaked (Mantrabheda), he quickly exclaimed, ‘She is fainting due to the exhaustion of her fast!’ and thoroughly bathed Him using pitchers full of milk. Thereafter, Devaki, Vasudeva, and the others honored the other prominent leaders of Vraja in a manner befitting them. Overjoyed, they fed Shri Krishna along with the cowherd boys, partook of food themselves, and subsequently returned to the city of Mathurapuri. ॥ 432-437 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 438
स कदाचिन्महावर्षापाते गोवर्धनाह्वयम् । हरिः पर्वतमुद्धत्य चकारावरणं गवाम् ॥४३८॥
किसी एक दिन व्रजमें बहुत वर्षा हुई तब श्रीकृष्णने गोवर्धन नामका पर्वत उठाकर उसके नीचे गायोंकी रक्षा की थी ॥ ४३८ ॥
“One day, it rained heavily in Vraja; then, Shri Krishna lifted the mountain named Govardhana and protected the cows beneath it. ॥ 438 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 439
तेन ज्योत्स्नेव तत्कीर्तिर्व्याप्नोति स्माखिलं जगत् । अरातिवदनाम्भोजराजिसङ्कोचकारिणी ॥४३९॥
इस कामसे चाँदनीके समान उनकी कीर्ति समस्त संसारमें फैल गई और वह शत्रुओंके मुखरूपी कमलसमूहको सङ्कुचित करने लगी ॥ ४३९ ॥
“Through this deed, His fame spread throughout the entire world like moonlight, causing the lotus-like faces of His enemies to wither away (close up). ॥ 439 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 440 – 441
तत्पुरस्थापनाहेतुभूतजैनालयान्तिके । शक्रदिग्देवतागारे हरेः पुण्यातिरेकतः ॥४४०॥ सर्पशय्या धनुः शङ्खो रत्नत्रितयमुद्ययौ । देवतारक्षितं लक्ष्मीं भाविनीमस्य सूचयत् ॥४४१॥
तदनन्तर जो जैन-मन्दिर मथुरापुरीकी स्थापनाका कारण भूत था उसके समीप ही पूर्व दिशाके दिक्पालके मन्दिर में श्रीकृष्ण के पुण्यकी अधिकतासे नागशय्या, धनुष और शङ्ख ये तीन रत्न उत्पन्न हुए। देवता उनकी रक्षा करते थे और वे श्रीकृष्णकी होनहार लक्ष्मीको सूचित करते थे ॥ ४४०-४४१ ॥
“Thereafter, right near the Jain temple that was the very foundational cause behind the establishment of Mathurapuri, inside the temple of the guardian deity (Dikpala) of the eastern direction, three jewels appeared due to the abundance of Shri Krishna’s spiritual merit (Punya): the serpent-bed (Nagashayya), the bow, and the conch shell. The gods guarded them, and they signified the glorious future prosperity (Lakshmi) destined for Shri Krishna. ॥ 440-441 ॥”
श्लोक 442 से 455
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