चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन
पर्व 74 – श्लोक 486 से 502 | श्लोक 503 से 513 | श्लोक 514 से 521 | श्लोक 522 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 549
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 1 to 12
श्लोक ( Shlok ) 1 – 2
अथान्येद्युः समासीनं गणेन्द्रं विपुलाचले । श्रेणिकः प्रीणिताशेषभव्यं सुव्यक्ततेजसम् ॥ १ ॥गणिन्याश्चन्दनार्यायाः सम्बन्धमिह जन्मनः । अन्वयुक्त गणी चैवमाहाहितमहर्दिकः ॥ २ ॥
अथानन्तर- किसी दूसरे दिन समस्त भव्य जीवोंको प्रसन्न करनेवाले और प्रकट तेजके धारक गौतम गणधर विपुलाचंल पर विराजमान थे। उनके समीप जाकर राजा श्रेणिकने समस्त आर्यिकाओंकी स्वामिनी चन्दना नामकी आर्यिकाकी इस जन्मसम्बन्धी कथा पूछी सो अनेक बड़ी बड़ी ऋद्धियोंको धारण करने वाले गणधर देव इस प्रकार कहने लगे ॥ १-२ ।।
Thereafter, on another day, Gautama Gandhara—who delights all noble, liberated souls (bhavya jivas) and possesses manifest splendor—was seated on Mount Vipulachal. King Shrenika approached him and inquired about the present-life story of the Aryika named Chandana, who was the leader of all the female ascetics (aryikas).
Thereupon, the Gandhara Deva, endowed with numerous great supernatural powers (riddhis), began to speak as follows.1 – 2
श्लोक ( Shlok ) 3 – 5
सिन्ध्वाख्यविषये भूभृद्वैशाली नगरेऽभवत् । चेटकाख्योऽतिविख्यातो विनीतः परमाईतः ॥ ३ ॥तस्य देवी सुभद्राख्या तयोः पुत्रा दशाभवन् । धनाख्यौ दशभङ्गान्तावुपेन्द्रोऽन्यः सुदशवाक् ॥ ४॥सिंहभद्रः सुकम्भोजोऽकम्पनः सपतङ्गकः । प्रभञ्जनः प्रभासश्च धर्मा इव सुनिर्मलाः ॥ ५ ॥
सिन्धु नामक देशकी वैशाली नगरीमें चेटक नामका अतिशय प्रसिद्ध, विनीत और जिनेन्द्र देवका अतिशय भक्त राजा था। उसकी रानीका नाम सुभद्रा था। उन दोनोंके दश पुत्र हुए जो कि धनदत्त, धनभद्र, उपेन्द्र, सुदत्त, सिंहभद्र, सुकुम्भोज, अकम्पन, पतङ्गक, प्रभञ्जन और प्रभास नामसे प्रसिद्ध थे तथा उत्तम क्षमा आदि दश धर्मोंके समान जान पड़ते थे ।। ३-५ ।।
In the city of Vaishali within the country named Sindhu, there ruled a highly renowned, humble king named Chetak, who was a devout devotee of Jinendra Deva. His queen was named Subhadra.
To them were born ten sons—celebrated by the names Dhanadatta, Dhanabhadra, Upendra, Sudatta, Singhabhadra, Sukumbhoja, Akampana, Patangaka, Prabhanjana, and Prabhasa—who appeared personified like the ten virtues of supreme forgiveness (Uttam Kshama) and the rest.3 – 5
श्लोक ( Shlok ) 6 – 8
सप्तर्धयो वा पुष्यश्च ज्यायसी प्रियकारिणी । ततो मृगावती पश्चात्सुप्रभा च प्रभावती ॥६ ॥ चेलिनी पञ्चमी ज्येष्ठा षष्ठी चान्त्या च चन्दना । विदेहविषये कुण्डसम्शायां पुरि भूपतिः ॥ ७ ॥नाथो नाथकुलस्यैकः सिद्धार्थाख्यस्त्विसिद्धिभाक् । तस्य पुण्यानुभावेन ‘प्रियासीत्प्रियकारिणी ॥ ८ ॥
इन पुत्रोंके सिवाय सात ऋद्धियोंके समान सात पुत्रियां भी थीं। जिनमें सबसे बड़ी प्रियकारिणी थी, उससे छोटी मृगावती, उससे छोटी, सुप्रभा, उससे छोटी प्रभावती, उससे छोटी चेलिनी, उससे छोटी ज्येष्ठा और सबसे छोटी चन्दना थी। विदेह देशके कुण्डनगर में नाथ वंशके शिरोमणि एवं तीनों सिद्धियोंसे सम्पन्न राजा सिद्धार्थ राज्य करते थे। पुण्यके प्रभाव से प्रियकारिणी उन्हीं की स्त्री हुई थी ।। ६-८ ॥
In addition to these sons, they also had seven daughters who were like the personification of the seven supernatural powers (riddhis). Among them, the eldest was Priyakarini; younger to her was Mrigavati; younger still was Suprabha; below her was Prabhavati; younger to her was Chelini; younger still was Jyeshtha; and the youngest of all was Chandana.
Meanwhile, in Kundanagar of the Videha country, King Siddhartha—the crest-jewel of the Natha dynasty and endowed with the three regal achievements (siddhis)—held sway. By the influence of meritorious past deeds (punya), Priyakarini became his queen.6 – 8
श्लोक ( Shlok ) 9
विषये वत्सवासाख्ये कौशाम्बीनगराधिपः । सोमवंशे शतानीको देव्यस्यासीन्मृगावती ॥ ९ ॥
वत्सदेशकी कौशाम्बी नगरी में चन्द्रवंशी राजा शतानीक रहते थे। मृगावती नामकी दूसरी पुत्री उनकी स्त्री हुई थी। ॥ ९॥
In the city of Kaushambi of the Vatsa country lived King Shataneeka, who belonged to the Lunar dynasty (Chandravanshi). Mrigavati, the second daughter, became his queen.
श्लोक ( Shlok ) 10 – 12
दशार्णविषये राजा हेमकच्छपुराधिपः । सूर्यवंशाम्बरे राजसमो दशरथोऽभवत् ॥ १० ॥तस्याभूत्सुप्रभा देवी भास्वतो वा प्रभामला । कच्छाण्यविषये रोरुकाख्यायां पुरि भूपतिः ॥ ११ ॥महानुदयनस्तस्य प्रेमदाऽभूत्प्रभावती । प्राप शीलवतीख्यातिं सा सम्यक्छीलधारणात् ॥ १२ ॥
दशार्ण देशके हेमकच्छ नामक नगरके स्वामी राजा दशरथ थे जो कि सूर्यवंश रूपी आकाशके चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे। सूर्यकी निर्मलप्रभाके समान सुमना नामकी तीसरी पुत्री उनकी रानी हुई थी, कच्छदेशकी रोरुका नामक नगरीमें उदयन नामका एक बड़ा राजा था। प्रभावती नामकी चौथी पुत्री उसीकी हृदयवल्लभा हुई थी। अच्छी तरह शीलव्रत धारण करनेसे इसका दूसरा नाम शीलवती भी प्रसिद्ध हो गया था ।। १०-१२ ।।
In the country of Dasharna, the lord of the city named Hemakachha was King Dasharatha, who appeared like the moon in the sky of the Solar dynasty (Suryavansha). Suprabha (here mentioned as Sumana), the third daughter, who was like the pure radiance of the sun, became his queen.
Furthermore, in the city of Roruka in the Kachha country, there was a great king named Udayana. Prabhavati, the fourth daughter, became the beloved of his heart. On account of her flawless observance of the vows of chastity (sheela-vrata), she also became widely renowned by her second name, Sheelavati. 10 – 12
श्लोक 13 से 25
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413 | श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431 | श्लोक 432 से 440 | श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463 | श्लोक 464 से 475 | श्लोक 476 से 485 | श्लोक 486 से 502 | श्लोक 503 से 513 | श्लोक 514 से 521 | श्लोक 522 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 549
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