अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52 – 56
स्वपितामहसन्त्यागे स्वयञ्च गुरुभक्तितः । राजभिः सह कच्छाद्यैः परित्यक्तपरिग्रहः ॥ ५२ ॥चिरं सोदवा तपःमेशं क्षच्छीतादिपरीषहान् । दीर्घसंसारवासित्वात्पश्चात्सोढुमशक्नुवन् ॥ ५३ ॥स्वयं गृहीतुमारब्धः फलं प्रावरणादिकम् । दृष्ट्वा तं देवता नायं क्रमो नैर्मन्ध्यधारिणाम् ॥ ५४ ॥गृहाण वेषमन्यं त्वं यथेष्टमिति चाब्रुवन् । श्रुत्वा तद्वचनं सोऽपि गाढमिथ्यात्वचोदितः ॥ ५५ ॥”रिव्राजकदीक्षायाः प्राथम्यं प्रत्यपद्यत । दीर्घाजवञ्जवानां तत्कर्म दुर्मार्गदेशनम् ॥ ५६ ॥
अपने बाबा भगवान् वृषभदेवकी दीक्षाके समय स्वयं ही गुरु-भक्तिसे प्रेरित होकर मरीचिने कच्छ आदि राजाओंके साथ सब परिग्रहका त्यागकर दीक्षा धारण कर ली थी। उसने बहुत समय तक तो तपञ्चरणका क्लेश सहा और क्षुधा शीतआदि परीषह भी सहे परन्तु संसार-वासकी दीर्घताके कारण पीछे चलकर वह उन्हें सहनकरनेके लिए असमर्थ हो गया इसलिए स्वयं ही फल तथा वस्त्रादि ग्रहण करनेके लिए उद्यत हुआ ।यह देख वन-देवताओंने कहा कि निर्ग्रन्थ वेष धारण करनेवाले मुनियोंका यह क्रम नहीं है। यदितुम्हें ऐसी ही प्रवृत्ति करना है तो इच्छानुसार दूसरा वेष ग्रहण कर लो। वन-देवताओंके उक्त वचनसुनकर प्रबल मिथ्यात्वसे प्रेरित हुए मरीचिने भी सबसे पहले परिव्राजककी दीक्षा धारण कर ली सोठीक ही है क्योंकि जिनका संसार दीर्घ होता है उनके लिए वह मिध्यात्व कर्म मिथ्यामार्ग ही दिखलाता है ।। ५२-५६ ।।
“At the time of his grandfather Lord Vrishabhadeva’s initiation (Diksha), driven by his own deep devotion toward the Guru, Marici along with kings like Kaccha and others renounced all worldly possessions and accepted initiation. For a long time, he endured the hardships of severe austerities and withstood afflictions like hunger and biting cold. However, due to the lengthy duration of his remaining worldly cycle (Samsara), he later became unable to bear them and prepared himself to accept fruits, clothing, and other comforts.”
“Seeing this, the deities of the forest said, ‘This is not the proper conduct for monks who wear the unclad (Nirgrantha) attire. If you wish to behave in this manner, then adopt another attire according to your desire.’ Hearing these words of the forest deities, Marici, driven by intense delusion and false belief (Mithyatva), became the very first to accept the initiation of a wandering ascetic (Parivrajaka). This is indeed fitting, for the karma of delusion shows only a false path to those whose cycle of worldly existence is destined to be long.” 52 – 56
श्लोक ( Shlok ) 57
तच्छास्त्रचुञ्चताप्यस्य स्वयमेव किलाजनि । सतामिवासतां व स्याद्बोधः स्वविषये स्वयम् ॥ ५७ ॥
उस समय उसे परिव्राजकोंके शास्त्रका ज्ञान भी स्वयं ही प्रकट हो गया था सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंके समान दुर्जनोंको भी अपने विषयका ज्ञान स्वयं हो जाता है ।। ५७ ।।
“At that time, the knowledge of the scriptures of the wandering ascetics (Parivrajakas) manifested in him spontaneously. This is indeed fitting, because just like the virtuous, the wicked too naturally acquire knowledge pertaining to their own sphere.”57
श्लोक ( Shlok ) 58 – 60
श्रुत्वापि तीर्थकृद्वाचं सद्धर्म नाग्रहीदसौ । पुरुर्यथात्मनैवात्र सर्वसङ्गविमोचनात् ॥ ५८ ॥भुवनत्रयसंक्षोभ कारिसामर्थ्यमाप्तवान् । मदुपज्ञं तथा लोके व्यवस्थाप्य मतान्तरम् ॥ ५९ ॥अहश्च तन्निमित्तोरुप्रभावात्त्रिदिवप्रभोः । प्रतीक्षां प्राप्तुमिच्छामि तन्मेऽवश्यं भविष्यति ॥ ६० ॥
उसने तीर्थंकर भगवान्की दिव्यध्वनि सुनकर भी समीचीन धर्म ग्रहण नहीं किया था। वहसोचता रहता था कि जिस प्रकार भगवान् वृषभदेवने अपने आप समस्त परिग्रहोंका त्याग करतीनों लोकोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाली सामर्थ्य प्राप्त की है उसी प्रकार मैं भी संसारमें अपने द्वारा चलाये हुए दूसरे मतकी व्यवस्था करूँगा और उसके निमित्तसे होनेवाले बड़े भारी प्रभावके कारणइन्द्रकी प्रतीक्षा प्राप्त करूँगा- इन्द्र द्वारा की हुई पूजा प्राप्त करूँगा। मैं इच्छा करता हूं कि मेरे यह सब अवश्य होगा ।। ५८-६० ॥
“Even after listening to the divine sermon (Divyadhvani) of the Tirthankara Lord, he did not accept the true and right path of religion. Instead, he kept thinking: ‘Just as Lord Vrishabhadeva, by renouncing all worldly possessions, has attained a power that stirs all the three worlds, I too shall establish another doctrine of my own in this world. Through the immense influence generated by it, I shall gain the reverence and worship of Indra himself. I desire that all of this must surely come to pass for me.'”58 – 60
श्लोक ( Shlok ) 61
इति मानोदयात्पापी न व्यरंसीच्च दुर्मतात् । तमेव वेषमादाय तस्थिवान् दोषदूषितः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार मानकर्म के उदयसे वह पापी खोटे मतसे विरत नहीं हुआ और अनेक दोषोंसे दूषित होनेपर भी वही वेष धारण कर रहने लगा ॥ ६१ ॥
“In this manner, due to the rise of his pride-producing karma (Māna-karma), that sinful soul did not turn away from his false doctrine; even though he was defiled by numerous faults, he continued to live wearing that very same sectarian attire.”61
श्लोक 62 से 71
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