राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641 | श्लोक 642 से 651 | श्लोक 652 से 661 | श्लोक 662 से 672 | श्लोक 673 से 681
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 682 to 691
श्लोक ( Shlok ) 682 – 686
प्रमाणनयनिक्षेपानुयोगैर्ज्ञानहेतुभिः । गुणमुख्यनयादानविशेषबललाभतः ॥ ६८२ ॥स्याच्छब्दलान्छितास्तित्वनास्तित्वाद्यन्तसन्ततम् । जीवादीनां पदार्थानां तत्त्वमाप्तस्वलक्षणम् ॥ ६८३ ॥मार्गणा गुणजीवानां समासं संसृतिस्थितिम् । अन्यच्च धर्मसम्बद्धं व्यक्तं युक्तिसमाश्रितम् ॥ ६८४ ॥कर्मभेदान् फलं तेषां सुखदुःखादिभेदकम् । बन्धमोचनयोर्हेतुं स्वरूपं मुक्तिमुक्तयोः ॥ ६८५ ॥इति धर्मविशेषं तत् ततः श्रुत्वा मनीषिणः । सर्वे रामादयोऽभूवन् गृहीतोपासकव्रताः ॥ ६८६ ॥
कि इस संसारमें जीवादिक नौ पदार्थ हैं उनका प्रमाण नय निक्षेप तथा निर्देश आदि अनुयोगोंसे जो कि ज्ञान प्राप्तिके कारण हैं बोध होता है। गौण और मुख्य नयोंके स्वीकार करने रूप बलके मिल जानेसे ‘स्यादस्ति’, ‘स्यान्नास्ति’ आदि भङ्गों द्वारा प्रतिपादित धर्मोंसे वे जीवादि पदार्थ सदा युक्त रहते हैं। इनके सिवाय शिवगुप्त जिनराजने आप्त भगवान्का स्वरूप, मार्गणा, गुणस्थान, जीवसमास, संसारका स्वरूप, धर्मसे सम्बन्ध रखने-वाले अन्य युक्ति-युक्त पदार्थ, कर्मोंके भेद, सुख-दुःखादि अनेक भेद रूप कर्मोंके फल, बन्ध और मोक्षका कारण, मुक्ति और मुक्त जीवका स्वरूप आदि विविध पदार्थोंका विवेचन भी किया। इस प्रकार उनसे धर्मका विशेष स्वरूप सुनकर रामचन्द्रजी आदि समस्त बुद्धिमान् पुरुषोंने श्रावकके व्रत ग्रहण किये ।। ६८२-६८६ ।।
“In this world, there are nine substances (tattvas/padarthas), including soul (jiva) and others. Their true knowledge is comprehended through Pramana (instruments of knowledge), Naya (viewpoints), Nikshepa (methods of presentation), and Nirdesha (exposition), which are the actual causes of attaining true wisdom.”
“By drawing strength from the acceptance of both secondary (gauna) and primary (mukhya) viewpoints, these substances like soul and others are eternally endowed with attributes established through aspects (bhangas) like ‘Syadasti’ (in some respect, it is) and ‘Syadnasti’ (in some respect, it is not).”
“In addition to this, Shivagupta Jinraj also expounded upon various other subjects: the true nature of the Omniscient Lord (Apta), the spiritual search-places (Margana), the stages of spiritual development (Gunasthana), the classification of living beings (Jivasamasa), the nature of worldly existence (Samsara), and other logical matters related to Dharma. He further explained the classifications of karmas, the fruits of karma in the form of multiple variations of pleasure and pain, the causes of bondage (bandha) and liberation (moksha), and the nature of liberation and liberated souls.”
“Having thus heard the detailed nature of Dharma from him, Ramachandraji and all other wise men accepted the vows of a lay follower (Shravaka).”682 – 686
श्लोक ( Shlok ) 687
निदानशल्य दोषेण भोगासक्तः स केशवः । बध्वायुर्नारकं घोरं नागृहीद्दर्शनादिकम् ॥ ६८७ ॥
परन्तु भोगोंमें आसक्त रहनेवाले लक्ष्मणने निदान शल्य नामक दोषके कारण नरककी भयङ्कर आयुका बन्ध कर लिया था इसलिए उसने सम्यग्दर्शन आदि कुछ भी ग्रहण नहीं किया ।। ६८७ ।।
“However, Lakshmana, being deeply attached to worldly pleasures, bound himself to a dreadful lifespan in hell due to the spiritual blemish known as Nidana Shalya (the flaw of desiring future worldly rewards). Consequently, he did not adopt right belief (Samyagdarshana) or any other spiritual vows.” 687
श्लोक ( Shlok ) 688 – 689
एवं संवत्सरान्नीत्वा साकेते कतिचित्सुखम् । तदाधिपत्यं भरतशत्रुम्नाभ्यां प्रदाय तौ ॥ ६८८ ॥स्वयं स्वपरिवारेण गत्वा वाराणसीं पुरीम् । प्राविक्षतामधिक्षिप्य शक्रलीलां स्वसम्पदा ॥ ६८९ ॥
इस प्रकार राम और लक्ष्मणने कुछ वर्ष तो अयोध्यामें ही सुखसे बिताये तदनन्तर वहाँका राज्य भरत और शत्रुन्नके लिए देकर वे दोनों अपने परिवारके साथ बनारस चले गये और अपनी सम्पदासे इन्द्रकी लीलाको तिरस्कृत करते हुए नगरी में प्रविष्ट हुए ।। ६८८-६८९ ॥
“In this manner, Rama and Lakshmana spent a few years happily in Ayodhya itself. Thereafter, handing over the kingdom to Bharata and Shatrughna, they both departed for Banaras (Varanasi) along with their families, entering the city with a grandeur that eclipsed the celestial opulence of Indra.”688 – 689
श्लोक ( Shlok ) 690
सुतो विजयरामाख्यो रामस्यामरसन्निभः । पृथिवीचन्द्रनामाभूच्चन्द्राभः केशवस्य च ॥ ६९० ॥
रामचन्द्रके देवके समान विजयराम नामका पुत्र था और लक्ष्मणके चन्द्रमाके समान पृथिवीचन्द्र नामका पुत्र उत्पन्न हुआ था ।। ६९० ॥
“A god-like son named Vijayarama was born to Ramachandra, and a moon-like son named Prithivichandra was born to Lakshmana.”690
श्लोक ( Shlok ) 691
अन्यैश्च पुत्रपौत्राद्यैः परीतौ तौ धृतोदयौ । नयतःस्म सुखं कालं त्रिवर्णफलशालिनौ ॥ ६९१ ॥
जिनका अभ्युदय प्रसिद्ध है और जो धर्म, अर्थ, काम रूप त्रिवर्गके फलसे सुशोभित हैं ऐसे रामचन्द्र और लक्ष्मण अन्य पुत्र-पौत्रादिकसे युक्त होकर सुखसे समय बिताते थे ।। ६९१ ॥
“Ramachandra and Lakshmana—whose worldly prosperity was legendary and who were adorned with the fruits of Trivarga (the three worldly pursuits: Dharma, Artha, and Kama)—spent their time happily, surrounded by their sons, grandsons, and other family members.”691
श्लोक 692 से 701
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641 | श्लोक 642 से 651 | श्लोक 652 से 661 | श्लोक 662 से 672 | श्लोक 673 से 681
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