कुन्थुनाथ तीर्थकर तथा चक्रवर्ती का पुराण वर्णन पर्व 64 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 64- shlok 42 to 50
श्लोक ( Shlok ) 42 – 48
निजदीक्षावने षष्ठेनोपवासेन शुद्धिभाक् । तिलकद्रुममूलस्थश्चैत्रज्योत्स्नापराह्णके ॥ ४२ ॥कृत्तिकायां तृतीयायां कैवल्यमुदपादयत् । मुदा तत्कालसम्प्राप्तसर्वामरसमर्थितम् ॥ ४३ ॥ प्रार्थ्य चतुर्थकल्याणपूजाविधिमवाप सः । तस्य स्वयम्भूनामाद्याः पञ्चत्रिंशङ्गणेशिनः ॥ ४४ ॥ शतानि सप्त पूर्वाणां संविदो मुनिसत्तमाः । खपञ्चैकत्रिवार्युक्ताः शिक्षकाः लक्षिताशयाः ॥ ४५ ॥ खद्वयेन्द्रियपक्षोक्तास्तृतीयावगमामलाः । शून्यद्वयद्विवह्वयुक्ताः केवलज्ञानभास्वराः ३ ॥ ४६ ॥ खद्वयै केन्द्रियज्ञात विक्रियद्धिविभूषणाः । त्रिशतत्रिसहस्राणि चतुर्थज्ञानधारिणः ॥ ॥ ४७ ॥ पञ्चाशद्विसहस्त्राणि ख्यातानुत्तरवादिनः । सर्वे ते पिण्डिताः षष्टिसहस्त्राणि यमेश्वराः ॥ ४८ ॥
किसी एक दिन विशुद्धताको धारण करनेवाले भगवान् तेलाका नियम लेकर अपने दीक्षा लेनेके वनमें तिलकवृत्त के नीचे विराजमान हुए। वहीं चैत्रशुक्ला तृतीयाके दिन सायंकालके समय कृत्तिका नक्षत्रमें उन्हें केवल-ज्ञान उत्पन्न हो गया। उसी समय हर्षके साथ सब देव आये। सबने प्रार्थनाकर चतुर्थकल्याणककी पूजा की। उनके स्वयंभूको आदि लेकर पैंतीस गणधर थे, सात सौ मुनिराज पूर्वोके जानकार थे, तैंतालीस हजार एक सौ पचास मर्मवेदी शिक्षक थे, दो हजार पाँच सौ निर्मल अवधिज्ञानके धारक थे तीन हजार दो सौ केवलज्ञानसे देदीप्यमान थे, पाँच हजार एक सौ विक्रियाऋद्धिके धारक थे, तीन हजार तीन सौ मनःपर्ययज्ञानी थे, दो हजार पचास प्रसिद्ध एवं सर्वश्रेष्ठ वादी थे, इस तरह सब मिलाकर साठ हजार मुनिराज उनके साथ थे ॥४२-४८।।
“One day, maintaining absolute internal purity, the Lord undertook the strict vow of a three-day fast (Tela) and seated himself beneath a sacred Tilaka tree in the very forest where he had taken his ascetic vows. Right there, on the third day of the bright fortnight of the month of Chaitra (Chaitra Shukla Tritiya), at the hour of twilight under the Krittika lunar mansion (Nakshatra), supreme, infinite omniscience (Kevala-jnana) dawned upon him.
At that very moment, all the celestial deities arrived with boundless joy. Bowing in profound reverence, they performed the grand worship of the Kevali-Kalyanaka (the fourth auspicious life-event marking enlightenment).
Led by the chief disciple Svayambhu, the Lord’s assembly included thirty-five Ganadharas (chief disciples); seven hundred Munis (monks) who possessed deep knowledge of the ancient Purvas (scriptures); forty-three thousand one hundred and fifty profoundly insightful Shikshakas (teachers of the faith); two thousand five hundred who possessed flawless Avadhi-jnana (clairvoyant knowledge); three thousand two hundred who shone with absolute Kevala-jnana (omniscience); five thousand one hundred who possessed Vikriya-riddhi (the extraordinary yogic power of physical transformation); three thousand three hundred who possessed Manah-paryaya-jnana (telepathic knowledge); and two thousand fifty renowned, supreme Vadis (master logicians and debaters). In this manner, a grand total of sixty thousand monks formed his holy congregation.”42 – 48
श्लोक ( Shlok ) 49 – 50
भाविताद्यायिकाः शून्यपञ्चवह्निखषण्मिताः । त्रिलक्षाः श्राविका लक्षद्वयं सर्वेऽप्युपासकाः ॥ ४९ ॥ देवदेव्यस्त्वसङ्ख्यातास्तिर्यञ्चः सङ्ख्यया मिताः । दिव्यध्वनिनामीषां कुर्वन्धर्मोपदेशनाम् ॥ ५० ॥
भाविताको आदि लेकर साठ हजार तीन सौ पचास आर्यिकाएँ थीं, तीनलाख श्राविकाएँ थीं, दो लाख श्रावक थे, असंख्यात देव-देवियाँ थीं और संख्यात तिर्यञ्च थे। भगवान्, दिव्यध्वनिके द्वारा इन सबके लिए धर्मोपदेश देते हुए विहार करते थे ।। ४९-५० ।।
“Led by the revered chief nun Bhavita, there were sixty thousand three hundred and fifty Aryikas (nuns); three hundred thousand Shravikas (laywomen); and two hundred thousand Shravaks (laymen). In addition, there were countless (Asankhyata) celestial gods and goddesses, along with a vast, countable (Sankhyata) number of Tiryanchas (animals and birds). Moving gracefully from region to region (Vihara), the Lord delivered his divine sermons to all of them through his miraculous Divya-dhvani (divine sound).”49 – 50
श्लोक 51 से 55
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ तीर्थंकर पर्व 63 – श्लोक 1 से 510
कुन्थुनाथ तीर्थकर तथा चक्रवर्ती का पुराण वर्णन पर्व 64 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
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