अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 93 to 104
श्लोक ( Shlok ) 93
“प्रयात्येवं तयोः काले मुनिरन्येयुरागतः । अरिञ्जयोऽअजो गेहं रेणुक्यास्तद्दिदृक्षया ॥ ९३ ॥
इस प्रकार उन दोनोंका काल सुखसे बीत रहा था। एक दिन अरिश्ञ्जय नाम के मुनि जो रेणुकी के बड़े भाई थे उसे देखनकी इच्छासे उसके घर आये ॥ ९३ ॥
“In this manner, their time passed in great happiness. One day, a monk named Arishanjaya, who was the elder brother of Renuki, arrived at her home with the desire to see her.”93
श्लोक ( Shlok ) 94
‘दृष्ट्वा यथोपचारेण मुनिं भर्तृप्रचोदिता । पूज्य ! मद्दानकाले मे दत्तं किं भवता धनम् ॥ ९४ ॥
रेणुकीने विनयपूर्वक मुनिके दर्शन किये। तदनन्तर पतिसे प्रेरणा पाकर उसने मुनिसे पूछा कि हे पूज्य ! मेरे विवाहके समय आपने मेरे लिए क्या धन दिया था ? ॥ ९४ ॥
“Renuki reverently paid her respects to the monk (Muni). Thereafter, prompted by her husband, she asked the monk: ‘O venerable one! What wealth or dowry did you give me at the time of my marriage?'”94
श्लोक ( Shlok ) 95 – 98
बदेस्याह ततस्तेन मया दत्तं न किञ्चन । इदानीं दीयते भद्रे त्रिजगत्स्यपि दुर्लभम् ॥ ९५ ॥गृहाण येन प्राप्नोषि त्वं सुखानां परम्पराम् । सम्यक्त्वं व्रतसंयुक्तं शीलमालासमुज्ज्वलम् ॥ ९६ ॥इत्युक्त्या काललब्ध्येव तद्वाचा चोदिता सती । सम्यग्गृहीतमित्याख्यन्मुनीशश्चातितुष्टवान् ॥९७ ॥कामधेन्वभिर्धा विद्यामीप्सितार्थप्रदायिनीम् । तस्यै विश्राणयाञ्चक्रे समन्त्रं परशुं च सः ॥ ९८ ॥
सो कहो, रेणुकीके ऐसा कहने पर मुनिने कहा कि उस समय मैंने कुछ भी नहीं दिया था। हे भद्रे ! अब ऐसा धन देता हूँ जोकि तीनों लोकोंमें दुर्लभ है। तू उसे ग्रहण कर। उस धनके द्वारा तू सुखोंकी परम्परा प्राप्त करेगी। यह कहकर उन्होंने व्रतसे संयुक्त तथा शीलकी माला उज्ज्वल सम्यक्त्वरूपी धन प्रदान किया और काललब्धिके समान उनके वचनोंसे प्रेरित हुई रेणुकीने कहा कि मैंने आपका दिया सम्यग्दर्शन रूपी धन ग्रहण किया। मुनिराज इस बातसे बहुत ही संतुष्ट हुए । उन्होंने मनोवांछित पदार्थ देनेवाली कामधेनु नामकी विद्या और मन्त्र सहित एक फरशा भी उसके लिए प्रदान किया ॥ ९५-९८ ॥
“‘Please tell me.’ Upon Renuki saying this, the monk replied: ‘At that time, I did not give you anything. O blessed lady! Now I bestow upon you a wealth that is exceedingly rare across all the three worlds. Accept it. Through this wealth, you shall attain an unbroken lineage of supreme happiness.’ Saying this, he gifted her the wealth of Samyaktva (right faith)—which is bound by spiritual vows and shines brightly like a garland of pure chastity. Inspiring her like the arrival of the right spiritual maturity (Kala-labdhi), Renuki responded to his words, saying: ‘I have accepted this wealth of Samyag-darshana (right vision) given by you.’
The king of monks (Muniraj) was deeply satisfied by this. He then also bestowed upon her a powerful mystical science (Vidya) named Kamadhenu—which grants all desired objects—along with a mystical formula (Mantra) and a battle-axe (Farsha).” 95 – 98
श्लोक ( Shlok ) 99 – 104
अथान्यदा ययौ सार्द्धं कृतवीरेण तत्पिता । तपोवनं सनाभित्वाद् भुक्त्वा गन्तव्यमित्यमुम् ॥ ९९ ॥सहस्रबाहुं सम्भाष्य जमदग्निरभोजयत् । महाराजकुलेऽप्येषा सामग्री नास्ति भोजने ॥ १०० ॥तपोवननिविष्टानामागता भवतां कुतः । इति स्वमातुरनुजामप्राक्षीद्रेणुकीं मिथः ॥ १०१ ॥कृतवीरोऽब्रवीत्साऽपि तद्विद्यालम्भनादिकम् । सोऽपि मोहोदयाविष्टस्तां धेनुमकृतज्ञकः ॥ १०२ ॥होमधेनुरियं तात वर्णाश्रमगुरोस्तव । याचनैषा न युक्तेति तदुक्त्या कोपवेगतः ॥ १०३ ॥परार्द्धं यद्धनं लोके तद्योग्यं पृथिवीभुजाम् । न’ घेनुरीदृशी भोग्या कन्दमूलफलाशिभिः ॥ १०४ ॥
किसी दूसरे दिन पुत्र कृतवीरके साथ उसका पिता सहस्र-बाहु उस तपोवनमें आया। भाई होनेके कारण जमदग्निने सहस्त्रबाहुसे कहा कि भोजन करके जाना चाहिये। यह कह जमदग्निने उसे भोजन कराया। कृतवीरने अपनी माँकी छोटी बहिन रेणुकीसे पूछा कि भोजनमें ऐसी सामग्री तो राजाओंके घर भी नहीं होती फिर तपोवनमें रहनेवाले आप लोगोंके लिए यह सामग्री कैसे प्राप्त होती है ? उत्तर में रेणुकीने कामधेनु विद्याकी प्राप्ति आदिका सब समाचार सुना दिया। मोहके उदयसे आविष्ट हुए उस अकृतज्ञ कृतवीरने रेणुकीसे वह कामधेनु विद्या माँगी। रेणुकीने कहा कि हे तात ! यह कामधेनु तुम्हारे वर्णाश्रमोंके गुरु जमनिकी होम-धेनु है अतः तुम्हारी यह याचना उचित नहीं है। रेणुकीके इतना कहते ही उसे क्रोध आ गया । वह क्रोधके वेगसे कहने लगा कि संसारमें जो भी श्रेष्ठ धन होता है वह राजाओंके योग्य होता है। कन्द मूल तथा फल खानेवाले लोगोंके द्वारा ऐसी कामधेनु भोगने योग्य नहीं हो सक्ती ॥ ९९-१०४ ॥
“On another day, Sahasrabahu arrived in that ascetic forest accompanied by his son, Kritavira. Because they were brothers, Jamadagni said to Sahasrabahu, ‘You must leave only after having a meal.’ Having said this, Jamadagni served him food. Kritavira then asked Renuki, who was his mother’s younger sister, ‘Even in the palaces of kings, such exquisite delicacies and items are not found; how then do you people living in an ascetic forest obtain such provisions?’ In response, Renuki narrated the entire story of how she had acquired the Kamadhenu Vidya.
Overpowered by the rise of deep infatuation (Moha), the ungrateful Kritavira demanded that Kamadhenu Vidya from Renuki. Renuki replied, ‘O dear child! This Kamadhenu is the sacrificial heifer (Homa-dhenu) belonging to Jamadagni, who is the spiritual preceptor of your social order (Varnashrama); therefore, this request of yours is not appropriate.’ As soon as Renuki said this, he flew into a rage. Driven by the impulse of anger, he began to say, ‘Whatever supreme wealth exists in this world is fit only for kings. Such a Kamadhenu is not meant to be enjoyed by people who feed on wild roots and fruits!'”99 – 104
श्लोक 105 से 117
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ तीर्थंकर पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ तीर्थकर पर्व 64 – श्लोक 1 से 55
अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |