अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 132 to 143
श्लोक ( Shlok ) 132
ज्वलनादिजटी पाति तां स वा पाकशासनः । कुलसाधितसम्प्राप्तविद्याश्रयविभूषितः ॥ १३२ ॥
इन्द्रके समान ज्वलनजटी नामका विद्याधर उसका पालन करता था। वह ज्वलनजटी, कुल परम्परासे आई हुई, सिद्ध की हुई तथा किसीसे प्राप्त हुई इन तीन विद्याओंसे विभूषित था ॥ १३२ ॥
“A Vidyadhara named Jvalanajati, who was like Indra in majesty, ruled over that city. That Jvalanajati was adorned with three types of mystical sciences (Vidyas): those inherited through family tradition, those accomplished through personal spiritual practice, and those received as a boon from someone else. || 132 ||”
श्लोक ( Shlok ) 133
प्रतापोपनताशेषावाक्छ्रेणीखचरेशिनाम् । विनमन्मौलिमालाभिरलंकृतपदाम्बुजः ॥ १३३ ॥
उसने अपने प्रतापसे दक्षिण श्रेणीके समस्त विद्याधर राजाओंको वश कर लिया था इसलिए उनके नम्रीभूत मुकुटोंकी मालाओंसे उसके चरणकमल सदा सुशोभित रहते थे ॥ १३३ ॥
“By his extraordinary prowess, he had brought all the Vidyadhara kings of the southern range under his subjugation; consequently, his lotus feet were perpetually adorned by the garlands of their bowed crowns. || 133 ||”
श्लोक ( Shlok ) 134
वायुवेगा प्रिया तस्य चन्द्राभखचरेशिनः । सुभद्रायाश्च तनया पुरे द्युतिलकाह्वये ॥ १३४ ॥
उसकी रानीका नाम वायुवेगा था जो कि द्युतिलक नगरके राजा विद्याधर और सुभद्रा नामक रानीकी पुत्री थी ।। १३४ ॥
“His queen was named Vayuvega, who was the daughter of King Vidyadhara of the city of Dyutilaka and his queen named Subhadra. || 134 ||”
श्लोक ( Shlok ) 135
अर्ककीर्तिस्तयोः सूनुः प्रतापेनार्कजित्सुधीः । सुता स्वयम्प्रभाख्याभूत्प्रभयेव महामणिः ॥ १३५ ॥
उन दोनोंके अपने प्रतापसे सूर्यको जीतनेवाला अर्ककीर्ति नामका पुत्र हुआ था और स्वयंप्रभा नामकी पुत्री हुई थी जो कि अपनी कान्तिसे महामणिके समान सुशोभित थी ॥ १३५ ॥
“To them was born a son named Arkakirti, whose extraordinary prowess surpassed even the sun, and a daughter named Svayamprabha, who was beautifully adorned with her own radiant splendor like a great, precious gem. || 135 ||”
श्लोक ( Shlok ) 136
खीलक्षणानि सर्वाणि शस्यान्यापादमस्तकम् । उदाहरणतामापन्व्याप्य व्यक्तानि तत्तनुम् ॥ १३६ ॥
उस स्वयंप्रभाके शरीरमें शिरसे लेकर पैर तक स्त्रियोंके समस्त सुलक्षण विद्यमान थे जो कि उसके शरीरमें व्याप्त होकर उदाहरणताको प्राप्त हो रहे थे ।। १३६ ।।
“In the body of that Svayamprabha, all the auspicious marks of women were present from head to toe, which, pervading her entire form, served as the ultimate exemplars of beauty. || 136 ||”
श्लोक ( Shlok ) 137
सम्प्राप्य यौवनं तन्वी भूषणानाञ्च भूषणम् । योषित्सर्गे कृतार्थत्वं स्वयासावनयद्विधिम् ॥ १३७ ॥
आभूषणोंको भी सुशोभित करनेवाले यौवनको पाकर उस स्वयंप्रभाने अपने आपके द्वारा, विधाताको स्त्रियोंकी रचना करने के कार्यमें कृतकृत्य बना दिया था ॥ १३७ ॥
“Upon attaining youthfulness, which lent beauty even to ornaments themselves, that Svayamprabha—by her very existence—made the Creator feel completely fulfilled in his task of creating women. || 137 ||”
श्लोक ( Shlok ) 138
तां वीक्ष्यापूर्णसौन्दर्या समीपीकृतचित्तजाम् । पिता वितरितुं कस्य योग्येयमिति चिन्तयन् ॥ १३८ ॥
उसे पूर्ण सुन्दरी तथा कामको निकट बुलानेवाली देख पिता ज्वलनजटी विचार करने लगा कि यह किसे देनी चाहिये ? किसके देनेके योग्य है है ? ॥ १३८ ॥
“Seeing her transformed into a perfect beauty who beckoned the very presence of Love (Kama), her father, Jvalanajati, began to deliberate: ‘To whom should she be given? Who is truly worthy of being offered her hand?’ || 138 ||”
श्लोक ( Shlok ) 139 – 140
तदैवाहूय सम्भिन्नश्रोतारं तत्प्रयोजनम् । अपृच्छत्स निमिचेषु कुशलः समभाषत ॥ १३९ ॥केशवस्यादिमस्येयं महादेवी भविष्यति । त्वमप्याप्स्यसि तद्दत्तां खगानां चक्रवर्तिताम् ॥ १४० ॥
उसी समय उसने संभिन्नश्रोता नामक पुरोहितको बुलाकर उससे वह प्रयोजन पूछा। वह पुरोहित निमित्तशास्त्रमें बहुत ही कुशल था इसलिए कहने लगा कि यह स्वयंप्रभा पहले नारायणकी महा-देवी होगी और आप भी उसके द्वारा दिये हुए विद्याधरोंके चक्रवर्ती पदको प्राप्त होंगे ॥ १३९-१४० ॥
“At that very moment, he summoned the chief priest (Purohita) named Sambhinnashrota and inquired of him regarding the matter. That priest was highly proficient in the science of omens (Nimitta-shastra); therefore, he declared, ‘This Svayamprabha is destined to become the principal queen (Maha-devi) of the first Narayana, and through him, you too shall attain the supreme status of Emperor (Chakravarti) of the Vidyadharas.’ || 139-140 ||”
श्लोक ( Shlok ) 141 – 143
इति तद्वचनं चित्ते प्रत्येयमवधार्य सः । अमात्यमिन्द्रनामानं भाक्तिकं सुश्रुतं शुचिम् ॥ १४१ ॥सलेखं प्राभृतं दत्वा प्राहिणोत्योदनं प्रति । गत्वाऽविलम्बितं सोऽपि वने “पुष्पकरण्डके ॥ १४२ ॥पोदनाधिपतिं सप्रणाममालोक्य पत्रकम् । सप्राभृतं प्रदायास्मै यथास्थानमुपाविशत् ॥ १४३ ॥
उसके इस प्रकार विश्वास करने योग्य वचन चित्तमें धारणकर उसने पवित्र हृदयवाले, शास्त्रोंके जानकार और राजभक्त इन्द्र नामक मन्त्रीको लेख तथा भेंट देकर पोदनपुरकी ओर भेजा। वह शीघ्रतासे जाकर पोदनपुर जा पहुँचा। उस समय पोदनपुरके राजा पुष्पकरण्डक नामक वनमें विराजमान थे । मन्त्रीने उन्हें देखकर प्रणाम किया, पत्र दिया, भेंट समर्पित की और वह यथास्थान बैठ गया ॥ १४१-१४३ ।।
“Taking those trustworthy words deeply to heart, the King dispatched a minister named Indra—who was pure-hearted, well-versed in the scriptures, and deeply loyal—toward Podanapura, providing him with an official letter and ceremonial gifts. Journeying with great speed, the minister arrived at Podanapura. At that time, the King of Podanapura was staying in the park named Pushpakarandaka. Upon seeing him, the minister bowed respectfully, presented the letter, offered the gifts, and took his designated seat. || 141-143 ||”
श्लोक 144 से 151
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22
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