शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 245 to 254
श्लोक ( Shlok ) 245
इदमेव किमस्त्यन्यदनान्यत्रापि ‘नेत्यसौ । तयोक्तो नान्यदित्यस्य प्राग्जन्मेत्युपदिष्टवान् ॥ २४५॥
यही है कि और कुछ है ? इस जन्म सम्बन्धी या अन्य जन्म सम्बन्धी ? प्रियमित्राके ऐसा पूछनेपर मेघरथने कहा कि यही कारण है। अन्य नहीं है, इतना कहकर वह उसके पूर्वभव कहने लगा ।। २४५ ।।
“Is this the only reason, or is there something more? Does this enmity stem from this present life or from a previous birth?’ When Priyamitra asked this, Megharatha replied, ‘This present incident is the only immediate cause; there is no other past-life grudge.’ Saying this much, he nevertheless began to narrate the Vidyadhara’s past lives.” [245]
श्लोक ( Shlok ) 246 – 248
द्वीपे द्वितीये पूर्वस्मिनैरावतसमाह्वये । देशे शङ्खपुरे राजा राजगुप्तोऽस्य शक्ङ्घिका ॥२४६॥भार्या तौ शङ्खशैलस्थात्सर्वगुप्तमुनीश्वरात् । आप्तौ जिनगुणख्यातिमुपोषितविधिं समम् ॥२४७॥भिक्षाचरमथान्येधुधृतिषेणयतीश्वरम् । निरीक्ष्य भिक्षां दत्वाऽस्मै वसुधाराद्यवापताम् ॥२४८॥
दूसरे धातकीखण्डद्वीपके पूर्वार्धभागमें जो ऐरावत क्षेत्र है, उसके शङ्खपुर नगरमें राजा राज-गुप्त राज्य करता था । उसकी स्त्रीका नाम शङ्गिका था। एक दिन इन दोनों ही पति-पत्नियोंने शङ्ख-शैल नामक पर्वतपर स्थित सर्वगुप्त नामक मुनिराजसे जिनगुणख्याति नामक उपवास साथ-साथ ग्रहण किया। किसी दूसरे दिन धृतिषेण नामके मुनिराज भिक्षाके लिए घूम रहे थे। उन्हें देख दोनों दम्पतियोंने उनके लिए भिक्षा देकर रत्नवृष्टि आदि पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥ २४६-२४८ ।।
“In the eastern half of the second continent, known as Dhatakikhanda-dvipa, lies the region of Airavata-kshetra. In the city of Shankhapura within this realm, King Rajagupta used to rule. His queen was named Shankhika. One day, this husband and wife went together to the Shankha-shaila mountain, where they approached the venerable monk Sarvagupta and jointly took a sacred vow of fasting known as Jinagunakhyati. On another occasion, while a saintly monk named Dhritishena was wandering in search of alms, the royal couple spotted him and reverently offered him food (Aahara-dana). As a direct result of this pure charity, they were instantly blessed with the five celestial wonders, including a miraculous shower of gems (Ratna-vrishti).” [246-248]
श्लोक ( Shlok ) 249 – 251
समाधिगुप्तमासाद्य संन्यस्याभूत्स भूपतिः । ब्रह्मेन्द्रः स्वायुषोत्कृष्टः तस्मात् सिंहरथोऽजनि ॥२४९॥शद्धिका च परिभ्रम्य संसारे तपसाऽगमत् । देवलोकं ततश्च्युत्वा खगभूमुदपाक्तटे ॥२५०॥ वस्वालयपुरे सेन्द्रकेतोरासीदियं सुता । सती मदनवेगाख्या सुप्रभाया स तच्छूतेः ॥ २५१॥
तदनन्तर राजा राजगुप्तने समाधिगुप्त मुनिराजके पास संन्यास धारण किया जिससे उत्कृष्ट आयुका धारक ब्रह्मेन्द्र हुआ । वहाँसे चयकर सिंहरथ हुआ है। शङ्गिका भी संसारमें भ्रमणकर तपके द्वारा स्वर्णं गई। वहाँ से च्युत होकर विजयार्धपर्वतके दक्षिण तटपर वस्त्वालय नाम के नगर में राजा सेन्द्रकेतु और उसकी सुप्रभा नामकी स्त्रीसे मदनवेगा नामकी पुत्री उत्पन्न हुई है ।॥ २४९-२५१ ।।
“Thereafter, King Rajagupta embraced the vows of ultimate ascetic renunciation (Sannyasa) under the guidance of the venerable sage Samadhigupta. As a result of this deep spiritual practice, he was reborn as a Brahmendra (the supreme lord of the Brahma-loka heaven), endowed with an exceptionally long lifespan. Having completed his celestial life-span there, he descended to Earth to become this very Vidyadhara, Singharatha. Meanwhile, his queen Shankhika, after wandering through the cycle of worldly existences, purified herself through rigorous austerities and ascended to heaven. Having completed her divine term, she departed from heaven and was reborn on the southern ridge of Mount Vijayardha in the city of Vastuvalaya, as Madanavega—the beautiful daughter of King Sendraketu and his queen Suprabha.” [249-251]
श्लोक ( Shlok ) 252 – 254
परितुष्य नृपं श्रित्वा पूजयित्वा यथोचितम् । सुवर्णतिलके राज्यं नियोज्य बहुभिः सह ॥२५२॥ दीक्षां घनरथाभ्यर्णे जैनीं सिंहरथोऽग्रहीत् । प्रियमित्राभिधां प्राप्य गणिनीं गुणसन्निधिम् ॥ २५३॥ सुधीर्मदनवेगा च कृच्छ्रमुच्चाचरतपः । कोपोऽपि क्वाऽपि कोपोपलेपनापनुदे मतः ॥२५४॥
यह सुनकर राजा सिंहरथ बहुत ही सन्तुष्ट हुआ। उसने पास जाकर यथायोग्य रीतिसे राजा मेघरथकी पूजा की, सुवर्ण-तिलक नामक पुत्रके लिए राज्य दिया और बहुतसे राजाओंके साथ घनरथ तीर्थंकरके समीप जैनी दीक्षा ग्रहण कर ली। इधर बुद्धिमती मदनवेगा भी गुणोंकी भाण्डार स्वरूप प्रियमित्रा नामकी आर्यिकाके पास जाकर कठिन तपश्चरण करने लगी। सो ठीक ही है क्योंकि कहीँपर क्रोध भी क्रोधका उपलेप दूर करनेवाला माना गया है ।। २५२-२५४ ॥
“Upon hearing this revelation of his past lives, King Singharatha was filled with immense satisfaction and peace. Approaching King Megharatha, he worshiped him with deep reverence according to proper custom. He then abdicated his throne, handing over the kingdom to his son, Suvarna-tilaka, and alongside many other kings, embraced the sacred Jain ascetic vows (Deeksha) under the guidance of the Tirthankara Ghanaratha. Meanwhile, the wise Madanavega also approached the revered Nun (Aryika) Priyamitra—who was a veritable treasure house of virtuous qualities—and began to practice rigorous austerities. This transformation is indeed most fitting, for there are rare instances where even an outburst of anger ultimately serves to wash away the sticky residue of worldly passions.” [252-254]
श्लोक 255 से 271
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244
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