राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 543 to 551
श्लोक ( Shlok ) 543 – 547
दुर्निवारो रिपुं कोपपावकेनेव निर्दहन् । चक्षुःप्रान्तविनिर्गच्छत्ज्वलद्वीक्षाशिखावलीः ॥ ५४३ ॥उल्मुकालीरिवायोखुं विक्षिपन् दिक्षुमंक्षु सः । महाविद्यासमूहाप्तपञ्चमाङ्गबलान्वितः ॥ ५४४ ॥तालध्वजः समारुह्य गजमञ्जनपर्वतम् । लक्ष्मणो वलयालम्बिविषश्टङ्गरुडध्वजः ॥ ५४५ ॥उदयाद्रिमिवारुह्य गजं विजयपर्वतम् । जिनेशिनं प्रणम्येतौ विश्वविघ्नविनाशनम् ॥ ५४६ ॥सुग्रीवानिलपुत्रादिखगेशैः परिवेष्टितौ । सूर्याचन्द्रमसौ वैरितमो हन्तुं समुद्यतौ ॥ ५४७ ॥
वह उस समय अत्यन्त दुर्निवार थे और क्रोध रूपी अग्निके द्वारा मानो शत्रुको जला रहे थे। उनके नेत्रोंके समीपसे जो जलती हुई दृष्टि निकल रही थी वह वाणोंके समान जान पड़ती थी और उसे वे जलते हुए अंगारोंके समान युद्ध करनेके लिए दिशाओंमें बड़ी शीघ्रतासे फेंक रहे थे । महाविद्याओंके समूहसे जो उन्हें सेनाका पाँचवाँ अङ्ग प्राप्त हुआ था वे उससे सुहित थे । उनकी तालकी ध्वजा थी और वे अञ्जनपर्वत नामक हाथी पर सवार होकर निकले थे । साथ ही, जिसकी ध्वजामें वलयाकार साँपको पकड़े हुए गरुड़का चिह्न बना है ऐसा लक्ष्मण भी विजय-पर्वत नामक हाथी पर सवार होकर निकला। इन दोनोंने पहले तो समस्त विघ्न्न नष्ट करनेवाले श्री जिनेन्द्रदेवको नमस्कार किया और फिर दोनों ही सुग्रीव तथा अणुमान् आदि विद्याधरोंसे वेष्टित हो सूर्य-चन्द्रमाके समान शत्रु रूपी अन्धकारको नष्ट करनेके लिए चल पड़े ॥ ५४३-५४७ ।।
At that time, he [Rama] was completely irresistible, appearing to burn the enemy with the fire of his intense fury. The blazing glare emanating from his eyes resembled sharp arrows, which he cast rapidly in all directions like burning embers ready for combat. He was perfectly equipped with the “fifth wing” of the army, granted to him by a host of Mahavidyas (divine mystical powers). Bearing a palm-tree banner (Tala-dhvaja), he set forth mounted upon the mighty elephant named Anjanaparvata.
Alongside him, Lakshmana also marched out, mounted upon the elephant named Vijaya-parvata, bearing a banner emblazoned with the emblem of Garuda clutching a coiled serpent. First, both of them bowed down to Lord Jinendra, the destroyer of all obstacles. Then, surrounded by Sugriva, Hanuman, and other prominent Vidyadharas, they advanced like the sun and the moon to completely dispel the darkness that was their enemy. ॥ 543-547 ॥
श्लोक ( Shlok ) 548 – 550
भासमानौ नयौ वोभौ दृप्तदुर्मतिघातिनौ । रावणाभिमुखं योद्धं विभज्य ध्वजिनीं निजाम् ॥ ५४८ ॥युद्धभूमिमधिष्ठाय तस्थतुजासितद्विषौ । तत्र तूर्यमहाध्वानाः प्रतिसेनानकध्वनिम् ॥ ५४९ ॥निर्भर्त्सयन्तो वोद्दण्डनिष्टरप्रहतेर्भयाम् । गुहाग हरदेशादीन् विशन्तो वा समन्ततः ॥ ५५० ॥
वे दोनों भाई नयोंके समान सुशोभित थे और दृप्त तथा दुर्बुद्धियोंका घात करनेवाले थे। रावणके सामने युद्ध करनेके लिए उन्होंने अपनी सेनाका विभाग कर रक्खा था, इस प्रकार शत्रुओंको भयभीत करते हुए वे युद्ध-भूमिमें जाकर ठहर गये। वहाँ इनके नगाड़ोके बड़े भारी शब्द शत्रुओंके नगाड़ोंके शब्दोंको तिरस्कृत कर रहे थे सो ऐसा जान पड़ता था कि मानो वे शब्द ऊँचे उठते हुए दण्डोंके कठोर प्रहारसे भयभीत हो गुहा अथवा गढ़े आदि देशोंमें सब ओरसे प्रवेश कर रहे हों-छिप रहे हों ।। ५४८-५५० ।।
The two brothers shone brilliantly like the direct methods of valid logic (Nayas), ready to destroy the arrogant and the evil-minded. They had systematically organized their army to confront Ravana in battle, and thus, striking terror into the hearts of their enemies, they marched onto the battlefield and took their stand.
There, the thunderous roar of their war-drums utterly eclipsed the sound of the enemy’s drums; it appeared as though those rival sounds, terrified by the severe strikes of the raised drumsticks, were fleeing and hiding themselves everywhere inside caves and deep hollows. ॥ 548-550 ॥
श्लोक ( Shlok ) 551
गजबृंहितवाहो रुहेषाघोषाविशेषतः । वर्द्धयन्तो भटानां च सुतरां शौर्यसम्पदम् ॥ ५५१ ॥
हाथियोंकी चिंघाड़ें और घोड़ोंके हींसनेके शब्द विशेष रूपसे योद्धाओं की शूर-वीरता रूप सम्पत्तिको अच्छी तरह बढ़ा रहे थे ।। ५५१ ।।
“At that time, the trumpeting of the elephants and the neighing of the horses were brilliantly amplifying the wealth of valor possessed by the warriors.” ॥ 551 ॥
श्लोक 552 से 560
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542
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