श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61
English translation of Uttar Puran parv 58- shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
रूपिणी ‘सुभगानृत्यगीतवाद्यादिविश्रुता । सरस्वती द्वितीयेव सर्वभूपाभिवान्छिता ॥ ६२ ॥
वह नृत्यकारिणी रूपवती थी, सौभाग्यवती थी, गीत नृत्य तथा बाजे बजाने आदि कलाओंमें प्रसिद्ध थी, और दूसरी सरस्वतीके समान जान पड़ती थी, इसीलिए सब राजा उसे चाहते थे ॥ ६२ ॥
“That dancer was extraordinarily beautiful and possessed great charm; she was renowned for her mastery in the arts of singing, dancing, and playing musical instruments. Indeed, she appeared like a second Saraswati (the Goddess of Arts and Wisdom), and for this reason, all the kings desired her.”62
श्लोक ( Shlok ) 63
अस्ति तत्रैव देशोऽन्यो मलयाख्यो मनोहरः । विन्ध्यशक्तिः पतिस्तस्य नृपो विन्ध्यपुरे वसन् ॥ ६३ ॥
उसी भरतक्षेत्रमें एक मलय नामका मनोहर देश था, उसके विन्ध्य-पुर नगरमें विन्ध्यशक्ति नामका राजा रहता था ॥ ६३ ॥
“In that very Bharat-Kshetra, there was a charming country named Malaya. In its city, Vindhya-pur, lived a king named Vindhyashakti.”63
श्लोक ( Shlok ) 64
स रक्तो गुणमञ्जर्याः प्रेक्षायामिव षट्पदः । चूतप्रसवमञ्जर्या माधुर्यरसरञ्जितः ॥ ६४ ॥
जिस प्रकार मधुरताके रसते अनुरक्त हुआ भ्रमर आम्रमञ्जरीके देखनेमें आसक्त होता है उसी प्रकार वह राजा गुणमञ्जरीके देखनेमें आसक्त था ।। ६४ ।।
“Just as a honeybee, captivated by the essence of sweetness, becomes deeply attached to the sight of a blooming mango blossom (Amra-manjari)—so too was the King utterly enthralled and captivated by the sight of Gunamanjari.” 64
श्लोक ( Shlok ) 65
रत्नाद्युपायनोपेतं मितार्थ चित्तहारिणम् । सुषेणं प्रतिसम्मान्य प्राहिणोन्नर्तकीप्सया ॥ ६५ ॥
उसने नृत्यकारिणीको प्राप्त करनेकी इच्छासे सुषेण राजाका सन्मान कर उसके पास रत्न आदिकी भेंट लेकर चित्तको हरण करनेवाला एक दूत भेजा ॥ ६५ ॥
“Driven by the desire to obtain the dancer, King Vindhyashakti sent a captivating messenger to King Sushena. To win Sushena over, the messenger carried exquisite gifts, including precious jewels and other riches.”65
श्लोक ( Shlok ) 66
दूतोऽपि सत्वरं गत्वा स सुषेणमहीपतिम् । दृष्ट्वा यथोचितं तस्मै दत्त्वोपायनमब्रवीत् ॥ ६६ ॥
उस दूतने भी शीघ्र जाकर सुषेण महाराजके दर्शन किये, यथायोग्य भेंट दी और निम्न प्रकार समाचार कहा ।। ६६ ।।
“That messenger also went quickly, had an audience with King Sushena, presented the appropriate offerings, and delivered the news as follows.”66
श्लोक ( Shlok ) 67
युष्मद्गृहे महारत्नं नर्तकी किल विश्रुता । विन्ध्यशक्तिर्भवबन्धुस्तं द्रष्टुमभिलाषुकः ॥ ६७ ॥
उसने कहा कि आपके घरमें जो अत्यन्त प्रसिद्ध नर्तकीरूपी महारत्न है, उसे आपका भाई विन्ध्यशक्ति देखना चाहता है ।। ६७ ।।
“He said: Your brother Vindhyashakti wishes to see the ‘great jewel’ in the form of the highly renowned dancer who resides in your palace.”67
श्लोक ( Shlok ) 68
तत्प्रयोजनमुद्दिश्य प्रहितोऽहं महीपते । त्वयापि सा प्रहेतव्या प्रत्यानीय समर्पये ॥ ६८ ॥
हे राजन् ! इसी प्रयोजनको लेकर मैं यहाँ भेजा गया हूँ। आप भी उस नृत्य-कारिणीको भेज दीजिए। मैं उसे वापिस लाकर आपको सौंप दूँगा ॥ ६८ ॥
“O King! It is for this very purpose that I have been sent here. Please send that danseuse [with me]; I shall bring her back and hand her over to you safely.”68
श्लोक ( Shlok ) 69 – 70
इत्यतस्तद्वचः श्रुत्वा सुतरां कोपवेपिना । याहि याहि किमश्रव्यैर्वचोभिर्दर्पशालिभिः ॥ ६९ ॥इति निर्भत्सितो भूयः सुषेणेन दुरुक्तिभिः । दूत्तः प्रत्येत्य तत्सव विन्ध्यशक्ति २व्यजिज्ञपत् ॥ ७० ॥
दूतके ऐसे वचन सुन-कर सुषेण क्रोधसे अत्यन्त काँपने लगा और कहने लगा कि जा, जा, नहीं सुनने योग्य तथा अहंकार-से भरे हुए इन वचनोंसे क्या लाभ है ? इस प्रकार सुषेण राजाने खोटे शब्दों द्वारा दूतकी बहुत भारी भर्त्सना की । दूतने वापिस आकर यह सब समाचार राजा विन्ध्यशक्तिसे कह दिए ॥ ६९ -७० ।।
“Upon hearing these words from the messenger, Sushena began to tremble violently with rage. He exclaimed, ‘Begone! Get out! What is the use of such ego-filled words that are not even fit to be heard?’ In this manner, King Sushena severely rebuked the messenger with harsh words. The messenger then returned and reported all these events to King Vindhyashakti.”69 – 70
श्लोक ( Shlok ) 71
सोऽपि कोपग्रहाविष्टस्तद्वचः श्रवणाद् भृशम् । अस्तु को दोष इत्यात्मगतमालोच्य मन्त्रिभिः ॥ ७१ ॥
दूतके वचन सुननेसे वह भी बहुत भारी क्रोधरूपी ग्रहसे आविष्ट हो गया – अत्यन्त कुपित हो गया और कहने लगा कि रहने दो, क्या दोष है ? तदनन्तर मंत्रियोंके साथ उसने कुछ गुप्त विचार किया ।॥ ७१ ॥
“Upon hearing the messenger’s words, he too became possessed by the ‘planet’ of immense rage—becoming utterly infuriated. He said, ‘Let it be; what fault is there [in my demand]?’ Thereafter, he held a secret consultation with his ministers.”71
श्लोक 72 से 81
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ तीर्थंकर पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ भगवान् पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पुराण का वर्णन पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 96
श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 100
श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 | पर्व 55 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 | पर्व 55 |