शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41
वज्रायुध की कीर्ति और दार्शनिक परीक्षा
वज्रायुध की कीर्ति चारों दिशाओं में फैल गई। युवावस्था में वह राज्यलक्ष्मी और लक्ष्मीमती रानी से सुशोभित हुआ तथा उसके पुत्र सहस्त्रायुध और पौत्र कनकशान्त का जन्म हुआ। एक अवसर पर ऐशान स्वर्ग के इन्द्र ने उसकी सम्यग्दृष्टि की प्रशंसा की। इसे सुनकर विचित्रचूल देव ने उसकी परीक्षा लेने का निश्चय किया और सौत्रान्तिक बौद्ध मत का आश्रय लेकर सभा में उपस्थित हुआ। उसने द्रव्य और पर्याय के संबंध में जटिल दार्शनिक प्रश्न उठाया।
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
जनानुरागः प्रागेव तस्मिस्तस्योदयादभूत् । सन्ध्याराग इवार्कस्य महाभ्युदयसूचनः ॥ ४२ ॥
जिस प्रकार सूर्यके महाभ्युदयको सूचित करने वाली उषाकी लालिमा सूर्योदयके पहले ही प्रकट हो जाती है उसी प्रकार उस पुत्रके महाभ्युदयको सूचित करने वाला मनुष्योंका अनुराग उसके जन्मके पहले ही प्रकट हो गया था ॥ ४२ ॥
Just as the crimson glow of dawn, which signals the grand rising of the sun, manifests well before the sunrise itself, similarly, the deep affection of the people, which signaled the glorious future of that son, had already manifested well before his birth. || 42 ||
श्लोक ( Shlok ) 43
विश्वाशा व्यानशे तस्य यशो विशदयद् भृशम् । काशप्रसवसङ्काशमाश्वासितजनश्रुति ॥ ४३ ॥
सब लोगोंके कानोंको आश्वासन देने वाला और काशके फूलके समान फैला हुआ उसका उज्ज्वल यश समस्त दिशाओंमें फैल गया था ॥ ४३ ॥
His radiant fame, which brought solace and reassurance to the ears of all people and spread far and wide like blooming Kasha flowers, expanded across all directions. || 43 ||
श्लोक ( Shlok ) 44
राज्यलक्ष्म्या व्यभालक्ष्मीमत्या चाप्यनवं वयः। असौ पक्षान्तरं कान्त्या ज्योत्स्त्रयावाप्य वा विधुः ॥४४॥
जिस प्रकार चन्द्रमा शुक्लपक्ष को पाकर कान्ति तथा चन्द्रिकासे सुशोभित होता है उसी प्रकार वह वज्रायुध भी नूतन-तरुण अवस्था पाकर राज्यलक्ष्मी तथा लक्ष्मी-मती नामक स्त्रीसे सुशोभित हो रहा था ।॥ ४४ ॥
Just as the moon shines beautifully with radiance and moonlight upon entering the bright fortnight (Shukla-paksha), similarly, the youth Vajrayudha, upon attaining his new youthfulness, shone brilliantly alongside the fortune of the kingdom (Rajyalakshmi) and his wife named Lakshmimati. || 44 ||
श्लोक ( Shlok ) 45
सुनुस्तयोः प्रतीन्द्रोऽभूत्सहस्त्रायुधनामभाक् । ‘वासरादेः प्रतीच्यां वा धर्मदीप्तिः कनद्युतिः ॥४५॥
जिस प्रकार प्रातःकालके समय पूर्व दिशासे देदी-प्यमान सूर्यका उदय होता है उसी प्रकार उन दोनों- वज्रायुध और लक्ष्मीमतीके अनन्तवीर्य अथवा प्रतीन्द्रका जीव सहस्त्रायुध नामका पुत्र उत्पन्न हुआ ।॥ ४५ ॥
Just as the radiant sun rises from the eastern direction in the morning, similarly, from those two—Vajrayudha and Lakshmimati—a son named Sahastrayudha was born, who was the reincarnated soul of Anantavirya (the Pratindra). || 45 ||
श्लोक ( Shlok ) 46 – 47
श्रीषेणायां सुतस्तस्य शान्तान्तकनकोऽजनि । एवं क्षेमङ्करः पुत्रपौत्रादिपरिवारितः ॥ ४६ ॥अप्रतीपप्रतापोऽयं नतभूपकदम्बकः । कदाचिद्वीज्यमानोऽस्थाच्चामरैः सिंहविष्टरे ॥ ४७ ॥
सहस्त्रायुधके श्रीषेणा स्त्रीसे कनकशान्त नामका पुत्र हुआ। इस प्रकार राजा क्षेमंकर पुत्र पौत्र आदि परिवारसे परिवृत हो कर राज्य करते थे। उनका प्रताप प्रतिद्वन्द्वीसे रहित था, और अनेक राजाओंके समूह उन्हें नमस्कार करते थे। किसी एक दिन वे सिंहासन पर विराजमान थे, उनपर चमर ढोले जा रहे थे।॥ ४६-४७॥
A son named Kanakashanta was born to Sahastrayudha from his wife, Shrishena. In this manner, King Kshemankara ruled his kingdom, surrounded by his family of sons, grandsons, and relatives. His glory and power were completely unrivaled, and a multitude of kings bowed down to him in respect.
One day, while he was seated majestically on his throne, with ceremonial fans (Chamar) being gently waved over him… || 46-47 ||
श्लोक ( Shlok ) 48
तदामरसदस्यासीदीशानस्तुतिगोचरः । वज्रायुधो महासम्यग्दर्शनाधिक्यतः कृती ॥ ४८ ॥
ठीक उसी समय देवोंकी सभामें ऐशान स्वर्गके इन्द्रने वज्रायुधकी इस प्रकार स्तुति की – इस समय वज्रा-युध महासम्यग्दर्शनकी अधिकतासे अत्यन्त पुण्यवान् है ।। ४८ ।।
श्लोक ( Shlok ) 49
देवो विचित्रचूलाख्यस्तत् स्तवं सोढुमक्षमः । अभिवज्रायुधं प्रापत्खलो ह्यन्यस्तवासहः ॥ ४९ ॥
विचित्रचूल नामका देव इस स्तुति को नहीं सह सका अतः परीक्षा करनेके लिए वश्रायुधकी ओर चला सो ठीक ही है क्योंकि दुष्ट मनुष्य दूसरेकी स्तुतिको सहन नहीं कर सकता ॥ ४९ ॥
A celestial being (Deva) named Vichitrachula could not tolerate this praise. Therefore, he set out toward Vajrayudha to put him to the test. And this is only natural, for a wicked mind can never bear the praise of another. || 49 ||
श्लोक ( Shlok ) 50
दृष्ट्वा रूपपरावृत्त्या महीनाथं यथोचितम् । वादकण्डूययाऽवोचत्सौत्रान्तिकमते स्थितः ॥ ५० ॥
उसने रूप बदल कर राजाके यथायोग्य दर्शन किये और शास्त्रार्थ करनेकी खुजलीसे सौत्रान्तिक मतका आश्रय ले इस प्रकार कहा ।। ५० ।।
Changing his form, he presented himself appropriately before the king and, itching for a scriptural debate, took shelter under the tenets of the Sautrantika philosophy and spoke as follows: || 50 ||
श्लोक ( Shlok ) 51
त्वं जीवादिपदार्थानां विद्वान् किल विचारणे । वद पर्यायिणो भिन्नः पर्यायः किं विपर्ययः ॥ ५१ ॥
हे राजन् ! आप जीव आदि पदार्थोंके विचार करनेमें विद्वान् हैं इसलिए कहिये कि पर्याय पर्यायीसे भिन्न है कि अभिन्न १ ।। ५१ ।।
“O King! Since you are a scholar well-versed in analyzing matters concerning the soul (Jiva) and other entities, tell me: Is a mode (Paryaya) distinct from its underlying substance (Paryayi), or is it identical to it?” || 51 ||
श्लोक 52 से 61
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