राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 277 to 291
श्लोक ( Shlok ) 277 – 280
नभश्वरकुमाराणां समुदाये परस्परम् । कदाचिदात्मविद्यानामनुभावपरीक्षणे ॥ २७७ ॥ विजयार्द्धगिरेर्मूनि क्रमं विन्यस्य दक्षिणम् । वामपादेन भास्वन्तमपहाय पुनस्तदा ॥ २७८ ॥त्रसरेणुप्रमाणं स्वं शरीरमकृताद्भुतम् । ततः प्रभृति विद्यशैविस्मयाहितमानसैः ॥ २७९ ॥अणुमानिति हर्षेण निखिलैरभ्यधाय्ययम् । पीतव्याकरणाम्भोधिः सखा प्राणाधिको मम ॥ २८० ॥
किसी एक समय विद्याधर-कुमारोंके समूहमें परस्पर अपनी-अपनी विद्याओंके माहात्म्यकी परीक्षा देनेकी बात निश्चित हुई। उस समय इसने विजयार्ध पर्वतके शिखर पर दाहिना पैर रखकर बायें पैरसे सूर्यके विमानमें ठोकर लगाई । तदनन्तर उसी क्षण त्रसरेणुके प्रमाण अपना छोटा-सा शरीर बना लिया। यह देख, विद्याधरोंके चित्त आश्चर्यसे भर गये, उसी समय समस्त विद्याधरोंने बड़े हर्षसे इसका ‘अणुमान्’ यह नाम रक्खा । इसने विक्रियारूपी समुद्रका पान कर लिया है अर्थात् यह सब प्रकारकी विक्रिया करनेमें समर्थ है, यह मेरा प्राणोंसे भी अधिक प्यारा मित्र है ॥ २७७-२८० ॥
“On one occasion, a group of Vidyadhara princes decided to test the greatness of their respective mystical powers (vidyas). At that time, placing his right foot upon the peak of the Vijayardha mountain, he struck the chariot of the Sun with his left foot. Immediately thereafter, he transformed his body into a form as minuscule as a trasarenu (a floating dust mote).
Beholding this, the hearts of the Vidyadharas were filled with wonder; at that very moment, all the Vidyadharas joyfully bestowed upon him the name ‘Anuman‘. He has, as it were, drunk the ocean of Vikriya (the power of transformation)—meaning he is capable of performing all kinds of transformations. He is my friend, dearer to me than my own life. || 277-280 ||”
श्लोक ( Shlok ) 281 – 286
गत्वा कदाचिदेतेन सह सम्मेदपर्वतम् । सिद्धकूटाभिधे तीर्थक्षेत्रेऽर्हत्प्रतिमा बहूः ॥ २८१ ॥अभ्यर्च्य भक्त्या वन्दित्वा स्थितोऽस्मिन् शुभभावनः । जटामुकुटसन्धारी ‘मुक्तायज्ञोपवीतकः ॥२८२॥ काषायवस्त्रः कक्षावलम्बिरत्नकमण्डलुः । करोद्धृतातपत्राणो नैष्ठिकब्रह्मसद्द्वतः ॥ २८३ ॥नारदो अविशिखारूढो रौद्रध्यानपरायणः । अवतीर्य नभोभागात्परीत्य जिनमन्दिरम् ॥ २८४ ॥समुपाविक्षदेकत्र जिनस्तवनपूर्वकम् । समुपेत्य तमप्राक्षं किं मुने स्थानमात्मनः ॥ २८५ ॥ सम्पद्यते न वेत्येतद्वचनादब्रवीदसौ । रामलक्षणयोरर्द्धभरतस्वामिताचिरात् ॥ २८६ ॥
मैं किसी एक दिन इसके साथ सम्मेदशिखर पर्वतपर गया था वहाँ सिद्धकूट नामक तीर्थक्षेत्रमें अर्हन्त भगवान्की बहुत सी प्रतिमाओंकी भक्ति पूर्वक पूजा वन्दनाकर वहीं पर शुभ भावना करता हुआ बैठ गया। उसी समय वहाँपर विमानमें बैठे हुए नारदजी आ पहुँचे। वे जटाओंका मुकुट धारण कर रहे थे, मोतियोंका यज्ञोपवीत पहिने थे, गेरुवा वस्त्रोंसे सुशोभित थे, उनकी बगल में रत्नोंका कमण्डलु लटक रहा था, वे हाथमें छत्ता लिये हुए थे, नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे, और सदा रौद्रध्यानमें तत्पर रहते थे । उन्होंने आकाशसे उतरकर पहले तो जिन-मन्दिराँकी प्रदक्षिणा दी, फिर जिनेन्द्र भगवान्का स्तवन किया और तदनन्तर वे एकान्त स्थानमें बैठ गये। मैंने उनके पास जाकर पूछा कि हे मुने ! क्या कभी मुझे अपना पद भी प्राप्त हो सकेगा ? इसके उत्तरमें उन्होंने कहा कि राम और लक्ष्मणका बहुत ही शीघ्र आधे भरतका स्वामीपना प्रकट होनेवाला है ॥ २८१-२८६ ॥
“On a certain day, I went with him to Mount Sammed Shikhar. There, at the holy pilgrimage site named Siddhakuta, having devoutly worshipped and paid obeisance to many idols of the Arhant Bhagavan, I sat down in that very place immersed in auspicious thoughts. At that very moment, Naradaji, seated in his celestial chariot, arrived there. He was wearing a crown of matted locks, wore a sacred thread of pearls, was adorned in saffron garments, and a gemstone water-pot (kamandalu) hung by his side. Holding an umbrella in his hand, he was a lifelong celibate (naishthika brahmachari), yet was ever-intent on wrathful contemplation (raudradhyana).
Descending from the sky, he first circumambulated the Jina temples, then chanted praises to Jinendra Bhagavan, and thereafter sat down in a secluded spot. I approached him and asked, ‘O Sage! Will I ever be able to regain my own position?’ In reply to this, he said, ‘The lordship of half of Bharata-kshetra is very soon going to manifest for Rama and Lakshmana.’ || 281-286 ||”
श्लोक ( Shlok ) 287 – 289
भविष्यति कृतप्रेषणस्य ताभ्यां तवेप्सितम् । सम्पत्स्यते च तत्प्रेष्यं किञ्चिद्रामनोरमाम् ॥ २८७ ॥विहरन्ती वने वीक्ष्य रावणो माययाऽग्रहीत् । तद्रामलक्ष्मणावद्य लङ्काभिगमनोचितम् ॥ २८८ ॥अन्वेषितारौ पुरुषं तिष्ठतः स्वार्थसिद्धये । इति तद्वचनात्तोषाद्देवास्मि त्वां प्रतीयिव १ ॥ २८९ ॥
यदि तू उनके दूतका कार्य कर देगा तो उन दोनोंके द्वारा तेरा मनोरथ सिद्ध हो जावेगा। उन्हें दूत भेजने का कार्य यों आ पड़ा है कि रामकी स्त्री वनमें विहार कर रही थी उसे रावण छल पूर्वक हरकर ले गया है। इसलिए आज राम और लक्ष्मण अपना कार्य सिद्ध करनेके लिए लङ्का भेजने योग्य किसी पुरुष की खोज करते हुए बैठे हैं। इस प्रकार नारदके वचन सुनकर हे देव ! बड़े सन्तोषसे हम दोनों आपके पास आये हैं ।॥ २८७-२८९ ॥
“‘If you perform the duty of a messenger for them, your desire will be fulfilled through both of them. The need for them to send a messenger has arisen because Rama’s wife was strolling in the forest when Ravana deceitfully abducted and carried her away. Therefore, today, Rama and Lakshmana are seated together, searching for a suitable man who can be dispatched to Lanka to accomplish their task.’ Having heard these words of Narada, O Lord, we both have come to you with great contentment.’ || 287-289 ||”
श्लोक ( Shlok ) 290 – 291
तौ च तद्वचनात्पूजामुचितां चक्रतुस्तयोः । अथ विज्ञापयामास प्रभञ्जनतनूद्भवः ॥ २९० ॥तवादेशोऽस्ति चेद्देव्याः स्थानमन्वेषयाम्यहम् । तत्प्रत्ययार्थमाख्येयमभिज्ञानं महीपते ॥ २९१ ॥
दोनों विद्याधरोंके उक्त वचन सुनकर राम-लक्ष्मणने उनका उचित सत्कार किया । तदनन्तर प्रभञ्जनके पुत्र अणुमान् (हनुमान् ) ने प्रार्थना की कि यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं सीता देवीके स्थानकी खोज करूँ। हे राजन् ! देवीको विश्वास उत्पन्न करानेके लिए आप कोई चिह्न बतलाइये ।। २९०-२९१ ॥
“Upon hearing these words spoken by both the Vidyadharas, Rama and Lakshmana extended appropriate hospitality to them. Thereafter, Anuman (Hanuman), the son of Prabhanjana, requested, ‘If it be your command, I shall search for the whereabouts of Queen Sita. O King! Please provide some token of recognition so that the Queen may place her trust in me.’ || 290-291 ||”
श्लोक 292 से 302
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473
राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63