शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . english translation of Uttar Puran parv 63- shlok 133 to 141
श्लोक ( Shlok ) 133
तस्य पादौ समालम्ब्य वाल्मीकं बह्नवर्तत । वर्द्धयन्ति महात्मानः पादलग्नानपि द्विषः ॥१३३॥
उनके चरणोंका आश्रय पाकर बहुतसे बमीठे तैयार हो गये सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुष चरणोंमें लगे शत्रुओंको भी बढ़ाते हैं ।॥ १३३ ॥
Taking shelter at his feet, many anthills grew around them. This was indeed fitting, for great souls nurture and lift up even those adversaries who lie at their feet. || 133 ||
श्लोक ( Shlok ) 134
व्रतिनं तं व्रतत्योऽपि मादर्व वा समीप्सवः । गाढं रूढाः समासेदुराकण्ठमभितस्तनुम् ॥ १३४॥
उनके शरीरके चारों ओर सघन रूपसे जमी हुई लताएं भी मानो उनके परिणामोंकी कोमलता प्राप्त करनेके लिए ही उन मुनिराजके पास तक जा पहुँची थीं ॥ १३४ ॥
The creepers that had grown densely all around his body also reached up to that revered sage, as if seeking to imbibe the very tenderness and gentleness of his thoughts. || 134 ||
श्लोक ( Shlok ) 135 – 137
अश्वग्रीवसुतौ त्नकण्ठरत्नायुधाभिधौ । भ्रान्त्वा जन्मन्यतिबलमहाबलसमाख्यया ॥१३५॥भूत्वाऽसुरौ तमभ्येत्य तद्विघातं चिकीर्षुकौ । रम्भातिलोत्तमे दृष्ट्वा तर्जयित्वाऽतिभक्तितः ॥१३६॥गन्धादिभिर्यतिं दिव्यैरभ्यच्यं दिवमीयतुः । क वा ते काऽसुरौ पुण्ये सति किं न घटामटेत् ॥ १३७॥
अश्वग्रीवके रत्नकण्ठ और रत्नायुध नामके जो दो पुत्र थे वे चिरकाल तक संसारमें भ्रमण कर अतिबल और महाबल नामके असुर हुए। वे दोनों ही असुर उन मुनिराजका विघात करनेकी इच्छासे उनके सम्मुख गये परन्तु रम्भा और तिलोत्तमा नामकी देवियोंने देख लिया अतः डांटकर भगा दिया तथा दिव्य गन्ध आदिके द्वारा बड़ी भक्ति सेउनकी पूजा की। पूजाके बाद वे देवियां स्वर्ग चली गईं। देखो कहाँ दो स्त्रीयाँ और कहाँ दो असुर फिर भी उन स्त्रियोंने असुरोंको भगा दिया सो ठीक है क्योंकि पुण्यके रहते हुए कौनसा कार्य सिद्ध नहीं हो सकता ? ।। १३५-१३७ ॥
Ashvagriva’s two sons, named Ratnakantha and Ratnayudha, wandered through the cycle of worldly existence (Samsara) for a very long time and were reborn as the Asuras (demons) named Atibala and Mahabala. With the intent of harming that revered sage, both Asuras approached him. However, the celestial nymphs (Devis) named Rambha and Tilottama saw them, rebuked them severely, and chased them away. They then worshipped the sage with great devotion, offering divine fragrance and other sacred materials. After the worship, the goddesses returned to heaven.
Behold! On one hand, there were two women, and on the other, two powerful Asuras; yet, those women successfully drove the Asuras away. This is indeed fitting, for when one’s merit (Punya) is active, what task cannot be accomplished? || 135-137 ||
श्लोक ( Shlok ) 138 – 139
किञ्चित्कारणमुद्दिश्य वज्रायुधसुतोऽपि तत् । राज्यं शतबलिन्युच्चैनिधाय निहतस्पृहः ॥१३८॥संयमं सम्यगादाय मुनीन्द्रात् पिहिताश्रवात् । योगावसाने स प्रापद्वज्रायुधमुनीश्वरम् ॥१३९॥
इधर वज्रायुधके पुत्र सहस्रायुधको भी किसी कारणसे वैराग्य हो गया, उन्होंने अपना राज्य शतबलीके लिए दे दिया, सब प्रकारकी इच्छाएं छोड़ दीं और पिहितास्त्रव नामके मुनिराजसे उत्तम संयम प्राप्त कर लिया। जब एक वर्षका योग समाप्त हुआ तब वे अपने पिता-वश्रायुध मुनि-राजके समीप जा पहुँचे ॥ १३८-१३९ ॥
Meanwhile, for some reason, King Sahastrayudha, the son of Vajrayudha, also developed a spirit of detachment (Vairagya). He handed over his kingdom to Shatabali, renounced all forms of worldly desires, and attained supreme self-restraint (Sanyama) under the guidance of the revered sage Pihitasrava. When his one-year vow of meditation (Yoga) was complete, he went to the side of his father, the revered sage Vajrayudha. || 138-139 ||
श्लोक ( Shlok ) 140 – 141
तावुभौ सुचिरं कृत्वा प्रब्रज्यां सह दुःस्सहाम् । वैभारपर्वतस्याग्रे विग्रहेऽप्यकृताग्रहौ ॥१४०॥ऊर्ध्वग्रैवेयकस्याधोऽभूतां सौमनसाह्वये । एकान्नत्रिंशदब्ध्यायुषौ विमाने महद्धिकौ ॥१४१॥
पिता पुत्र दोनोंने चिरकाल तक दुःसह तपस्या की, अन्तमें वे वैभार पर्वतके अग्रभागपर पहुँचे। वहाँ उन्होंने शरीरमें भी अपना आग्रह छोड़ दिया अर्थात् शरीरसे स्नेहरहित हो कर संन्यासमरण किया और ऊर्ध्वग्रैवेयकके नीचेके सौमनस नामक विमान में बड़ी ऋद्धिके धारक अहमिन्द्र हुए, वहाँ उनतीस सागरकी उनकी आयु थी ।। १४०-१४१ ।।
Both the father and the son practiced unbearable penance for a very long time, and finally, they reached the summit of Mount Vaibhara. There, they abandoned all attachment even to their own bodies—meaning, becoming completely detached from the physical form, they embraced the vow of ritual death (Sanyasa-marana). As a result, they were reborn as Ahamindras (highest celestial beings) possessing immense mystical powers (Riddhi) in the celestial vehicle named Saumanasa, located just below the Upper Graiveyaka. There, their lifespan was twenty-nine Sagaras (cosmic oceans of time). || 140-141 ||
श्लोक 142 से 153
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
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