श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराणका वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 62
English translation of Uttar Puran parv 57- shlok 63 to 72
श्लोक ( Shlok ) 63
विफलानिमिषत्वा स्मो विनास्मादिति वा सुराः । कृतनिर्वाणकल्याणास्तदैव त्रिदिवं ययुः ॥ ६३ ॥
इसके बिना हमारा टिमकाररहित-पना व्यर्थ है ऐसा विचार कर देवोंने उसी समय उनका निर्वाण-कल्याणक किया और उत्सव कर सब स्वर्ग चले गये ॥ ६३ ॥
“Reflecting that ‘without honoring this event, our status as gods would be meaningless,’ the deities immediately performed the Lord’s Nirvana-Kalyanak (the auspicious ceremony of liberation). After concluding the grand festivities, they all returned to heaven.”63
श्लोक ( Shlok ) 64
निर्धूय यस्य निजजन्मनि सत्समस्त-मान्ध्यं चराचरमशेषमवेक्ष माणम् । ज्ञानं प्रतीपविरहान्नि जरूपसंस्थं श्रेयान् जिनः स दिशतादशिवच्युतिं वः ॥ ६४ ॥
जिनके ज्ञानने उत्पन्न होते ही समस्त अन्धकारको नष्ट कर सब चराचर विश्वको देख लिया था, और कोई प्रतिपक्षी न होनेसे जो अपने ही स्वरूपमें स्थित रहा था ऐसे श्री श्रेयांसनाथ जिनेन्द्र तुम सबका ‘अकल्याण दूर करें ।॥ ६४ ॥
“May the venerable Lord Shreyansunatha remove all your misfortunes—He whose Supreme Knowledge, upon its manifestation, annihilated all darkness to perceive the entire universe, both animate and inanimate, and who, having no adversary remaining, remained eternally established in His own true self.”64
श्लोक ( Shlok ) 65
सत्यं सार्वदयामयं तव वचः सर्वं सुहृद्भयो हितं चारित्रं च विभोस्तदेतदुभयं ब्रूते विशुद्धिं पराम् । तस्माद्देव समाश्रयन्ति विबुधास्त्वामेव शक्रादयो भक्त्येति स्तुतिगोचरो स विदुषां श्रेयान् स वः श्रेयसे ॥ ६५ ॥
‘हे प्रभो ! आपके वचन सत्य, सबका हित करने-वाले तथा दयामय हैं। इसी प्रकार आपका समस्त चारित्र सुहृत् जनोंके लिए हितकारी है। हे भगवन् ! आपकी ये दोनों वस्तुएँ आपकी परम विशुद्धिको प्रकट करती हैं। हे देव! इसीलिए इन्द्र आदि देव भक्ति-पूर्वक आपका ही आश्रय लेते हैं। इस प्रकार विद्वान् लोग जिनकी स्तुति किया करते हैं ऐसे श्रेयांसनाथ भगवान् तुम सबके कल्याणके लिए हों ।॥ ६५ ॥
“O Lord! Your words are truthful, beneficial to all, and filled with compassion. Likewise, your entire conduct is advantageous to those of noble heart. O Blessed One! Both your speech and your character reveal your supreme purity. O Divine Being! It is for this reason that Indra and the other gods take refuge in You with deep devotion. May Lord Shreyansunatha, whom the wise constantly praise in this manner, bestow auspiciousness and well-being upon you all.”65
श्लोक ( Shlok ) 66
राजाभून्नलिनप्रभः प्रभुतमः प्रध्वस्तपापप्रभः कल्पान्ते सकलामराधिपपतिः सङ्कल्पसौख्याकरः ।यस्तीर्थाधिपतिस्त्रिलोकमहितः श्रीमान् श्रियै श्रायसंस्याद्वादं प्रतिपाद्य सिद्धिमगमत् श्रेयान् जिनः सोऽस्तु वः ॥ ६६ ॥
जो पहले पापकी प्रभाको नष्ट करनेवाले श्रेष्ठतम नलिनप्रभ राजा हुए, तदनन्तर अन्तिम कल्पमें संकल्प मात्रसे प्राप्त होनेवाले
सुखोंकी खान स्वरूप, समस्त देवोंके अधिपति – अच्युतेन्द्र हुए और फिर त्रिलोकपूजित तीर्थंकर होकर कल्याणकारी स्याद्वादका उपदेश देते हुए मोक्षको प्राप्त हुए ऐसे श्रीमान् श्रेयान्सनाथ जिनेन्द्र तुम सबकी लक्ष्मीके लिए हों – तुम सबको लक्ष्मी प्रदान करें ।। ६६ ।।
“May the glorious Jinendra Shreyansunatha—who was first the illustrious King Nalinaprabha, the destroyer of the shadow of sin; who thereafter became Achyutendra, the sovereign of all gods and a treasury of comforts attained by mere thought in the final heaven; and who finally became the Tirthankara worshipped by the three worlds, attaining liberation after preaching the auspicious doctrine of Syadvada—bestow upon you all the wealth of spiritual and worldly prosperity.” 66
श्लोक ( Shlok ) 67
जिनसेनानुगायास्मै पुराणकवये नमः । गुणभद्रभदन्ताय लोकसेनार्चिताङ्घ्रये ॥ ६७ ॥
[ जो जिनसेनके अनुगामी हैं- शिष्य हैं तथा लोकसेन नामक शिष्यके द्वारा जिनके चरण-कमल पूजित हुए हैं और जो इस पुराणके बनानेवाले कवि हैं ऐसे भदन्त गुणभद्राचार्यको नमस्कार हो ॥ ६७ ॥ ]
“[Salutations to the venerable Acharya Gunabhadra, the author of this Purana, who is a devoted follower and disciple of Acharya Jinasena, and whose lotus-feet have been worshipped by his disciple named Lokasena. || 67 ||]”
श्लोक ( Shlok ) 68
तीर्थेऽस्मिन् केशवः श्रीमानभूदाद्यः समुद्यमी । भरतश्चक्रिणां वासौ त्रिखण्डपरिपालिनाम् ॥ ६८ ॥
जिस प्रकार चक्रवर्तियोंमें प्रथम चक्रवर्ती भरत हुआ उसी प्रकार श्रेयान्सनाथके तीर्थमें तीन खण्डको पालन करनेवाले नारायणोंमें उद्यमी प्रथम नारायण हुआ ॥ ६८ ॥
“Just as Bharata was the first of the Chakravartins (universal emperors), so too, during the era of Lord Shreyansunatha, the first and industrious Narayana appeared to rule over the three divisions (realms) of the world.”68
श्लोक ( Shlok ) 69
आतृतीयभवात्तस्य चरितं प्रणिगद्यते । उदितास्तगभूपानामुदाहरणमित्यदः ॥ ६९ ॥
उसीका चरित्र तीसरे भवसे लेकर कहता हूँ। यह उदय तथा अस्त होनेवाले राजाओंका एक अच्छा उदाहरण है ।॥ ६९ ॥
“I shall now narrate his life story, beginning from his third previous birth. This account serves as an excellent example of the rise and fall of kings.”69
श्लोक ( Shlok ) 70
द्वीपेऽस्मिन् भारते क्षेत्रे विषयो मगधाह्नयः । पुरं राजगृहं तस्मिन् पुरन्दरपुरोत्तमम् ॥ ७० ॥
इस जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्रमें एक मगधनामका देश है उसमें राजगृह नामका नगर है जो कि इन्द्रपुरी से भी उत्तम है ॥ ७० ॥
“In the Bharat Kshetra of this Jambudvipa, there lies a land named Magadha. Within it is the city of Rajgriha, which is even more magnificent than the city of Indra (Indrapuri).”70
श्लोक ( Shlok ) 71
स्वर्गादेत्यात्र भूष्णूनां राज्ञां यद्गृहमेव तत् । भोगोपभोगसम्पत्त्या नाम तस्यार्थवत्ततः ॥ ७१ ॥
स्वर्गसे आकर उत्पन्न होनेवाले राजाओंका यह घर है इसलिए भोगोपभोग-की सम्पत्तिकी अपेक्षा उसका ‘राजगृह’ यह नाम सार्थक है ॥ ७१ ॥
“Since this city is the residence of kings who have descended directly from the heavens to be born here, its name ‘Rajgriha’ (The Abode of Kings) is truly fitting in terms of the abundance of its luxuries and worldly pleasures.”71
श्लोक ( Shlok ) 72
विश्वभूतिः पतिस्तस्य जैनी देव्यनयोस्सुतः । विश्वनन्दनशीलत्वाद्विश्वनन्दीति विश्रुतः ॥ ७२ ॥
किसी समय विश्वभूति राजा उस राजगृह नगरका स्वामी था, उसकी रानीका नाम जैनी था। इन दोनोंके एक पुत्र था जो कि सबके लिए आनन्ददायी स्वभाव वाला होनेके कारण विश्वनन्दी नामसे प्रसिद्ध था ।। ७२ ।।
At one time, King Vishvabhuti was the ruler of the city of Rajagriha. The name of his queen was Jaini. They had a son who, because of his joyful and pleasant nature that delighted everyone, became famous by the name Vishvanandi. ॥72॥
श्लोक 73 से 81
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