राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 164 to 174
श्लोक ( Shlok ) 164 – 165
स्त्रीता मनुभवन्तीभिरत्रामुभिरनीप्सितम् । प्राप्तं प्राप्यं च दुर्बुद्धे महापापफलं शृणु ॥ १६४ ॥अनिष्टलक्षणादन्यैरग्राह्यत्वाच्छुचा गृहे । स्वे वासो मृत्युपर्यन्तं कुलरक्षणकारणात् ॥ १६५ ॥
स्त्रीपनेका अनुभव करती हुई ये सब रानियाँ इसलोकमें अनिष्ट फल प्राप्त कर रही हैं। हे दुर्बुद्धे ! यह स्त्रीपर्याय महापापका फल है। सुनो, यदि कन्याके लक्षण अच्छे नहीं हुए तो उसे कोई भी पुरुष ग्रहण नहीं करता इसलिए शोकसे उसे अपने घर ही रहना पड़ता है। इसके सिवाय कन्याको मरण पर्यन्त कुलकी रक्षा करनी पड़ती है ॥ १६४-१६५ ॥
“Trapped in the experience of worldly womanhood, all these queens are reaping undesirable consequences even in this world. O foolish one! This feminine existence (Stri-paryaya) is the fruit of grave sins. Listen, if a maiden does not possess virtuous qualities, no man accepts her, forcing her to remain in her father’s house in deep sorrow. Furthermore, a maiden must guard the honor of her lineage until her very death.” (164-165)
श्लोक ( Shlok ) 166
अपत्यजननाभावे प्रविष्टोत्पन्नगेहयोः । शोकोत्पादनबन्ध्यात्वं निर्भाग्यत्वादगौरवम् ॥ १६६ ॥
यदि किसीके पुत्र नहीं हुआ तो जिस घरमें प्रविष्ट हुई और जिस घरमें उत्पन्न हुई- उन दोनों ही घरोंमें शोक छाया रहता है। यदि भाग्यहीन होनेसे कोई वन्ध्या हुई तो उसका गौरव नहीं रहता ॥ १६६ ॥
“If a woman does not give birth to a son, grief casts a shadow over both houses—the house into which she married and the house in which she was born. And if, by misfortune, a woman is barren, she is stripped of all respect and status.” (166)
श्लोक ( Shlok ) 167 – 168
दुर्भगत्वेन कान्तानां परित्यागात्पराभवः । अस्पृश्यत्वं रजोदोषात् खण्डनात्कलहादिभिः ॥ १६७ ॥दुःखदावाग्निसन्तापो वन्यानामिव भूरुहाम् । चक्रवतिसुतानां च परपादोपसेवना ॥ १६८ ॥
यदि कोई स्त्री दुर्भगा अथवा कुरूपा हुई तो पति उसे छोड़ देता है जिससे सदा तिरस्कार उठाना पड़ता है। रजोदोषसे वह अस्पृश्य हो जाती है- उसे कोई छूता भी नहीं है। यदि कलह आदिके कारण पति उसे छोड़ देता है तो वनमें उत्पन्न हुए वृक्षोंके समान उसे दुःखरूपी दावानलमें सदा जलना पड़ता है। औरकी बात जाने दो चक्रवर्तीकी पुत्रीको भी दूसरेके चरणोंकी सेवा करनी पड़ती है ॥ १६७-१६८ ॥
“If a woman is unloved (Durbhaga) or physically unattractive, her husband abandons her, forcing her to endure constant humiliation and contempt. During her menstrual cycle (Rajo-dosha), she becomes untouchable, and no one even comes near her. If, due to quarrels or conflict, her husband deserts her, she is forced to burn endlessly in the raging forest fire of misery, just like wild trees in a woodland. Leave aside ordinary women—even the daughter of a sovereign emperor (Chakravarti) is ultimately forced to serve at the feet of another.” (167-168)
श्लोक ( Shlok ) 169
मानभङ्गः सपत्नीषु दृष्टोत्कर्षेण केनचित् । स्वभाववक्त्रवाक्कायमनोभिः कुटिलात्मता ॥ १६९ ॥
और सपत्नियोंमें यदि किसीकी उत्कृष्टता हुई तो सदा मानभङ्गका दुःख उठाना पड़ता है। स्वभाव, मुख, वचन, काय, और मनकी अपेक्षा उनमें सदा कुटिलता बनी रहती है ॥ १६९ ॥
“Furthermore, if any one of the co-wives rises to prominence and favor, the others must suffer the endless agony of shattered pride. In disposition, countenance, speech, body, and mind, co-wives harbor nothing but perpetual deceit and malice toward one another.” (169)
श्लोक ( Shlok ) 170
गर्भसूतिसमुत्पन्नरोगादिपरिपीडनम् । शोचनं स्त्रीसमुत्पत्तावपत्यमरणाऽ’ सुखम् ॥ १७० ॥
गर्भधारण तथा प्रसूतिके समय उत्पन्न होनेवाले अनेक रोगादिकी पीड़ा भोगनी पड़ती है। यदि किसीके कन्याकी उत्पत्ति होती है तो शोक छा जाता है, किसीकी सन्तान मर जाती है तो उसका दुःख भोगना पड़ता है ॥ १७० ॥
“A woman must endure the excruciating torment of numerous diseases and complications that arise during pregnancy and childbirth. If a daughter is born, grief casts a shadow over the household, and if a child dies, she is forced to bear the profound agony of that loss.” (170)
श्लोक ( Shlok ) 171 – 174
रहस्यकार्यबाह्यत्वं सर्वकार्येष्वतन्त्रता । विधवात्वे महादुःखपात्रत्वं दुष्टचेष्टया ॥ १७१ ॥ दानशीलोपवासादिपरलोकहितक्रिया । विधानेष्वप्रधानत्वं सन्तानार्थानवापनम् ॥ १७२ ॥कुलनाशोऽगतिर्मुक्त रित्याद्यन्यच्च दूषितम् । साधारणमिदं सर्वस्त्रीणां कस्मात्तवाभवत् ॥ १७३ ॥तस्मिन्सुखाभिलाषित्वं वयस्यस्मिन् गतत्रये । न चिन्तयसि ते भाविहितं मतिविपर्ययात् ॥ १७४ ॥
विचार करने योग्य खास कार्योंमें उन्हें बाहर रखा जाता है, समस्त कार्योंमें उन्हें परतन्त्र रहना पड़ता है, दुर्भाग्यवश यदि कोई विधवा हो गई तो उसे महान् दुःखोंका पात्र होना पड़ता है। दानशील उपवास आदि परलोकका हित करनेवाले कार्योंके करनेमें उसकी कोई प्रधानता नहीं रहती। यदि स्त्रीके सन्तान नहीं हुई तो कुलका नाश हो जाता है और मुक्ति तो उसे होती ही नहीं है। इनके सिवाय और भी अनेक दोष हैं जो कि सब स्त्रियोंमें साधारण रूप से पाये जाते हैं फिर क्यों तुझे इस निन्द्य स्त्रीपर्यायमें सुखकी इच्छा हो रही है। हे निर्लज्जे ! तू इस अवस्था में भी अपने भावी हितका विचार नहीं कर रही है इससे जान पड़ता है कि तेरी बुद्धि विपरीत हो गई है ॥ १७१-१७४ ॥
“Women are excluded from critical affairs that require deep deliberation, and they are forced to remain entirely dependent in all matters. If, by ill fate, a woman becomes a widow, she is made to suffer immense and terrible hardships. Even in performing acts of charity, keeping fasts, and other deeds that secure welfare in the afterlife, she holds no independent authority. If a woman bears no children, her lineage comes to an end, and as for spiritual liberation (Mukti), it is entirely unattainable for her. Apart from these, there are countless other flaws commonly found in all women; why then do you harbor a desire for happiness in this blameworthy feminine existence (Stri-paryaya)? O shameless one! Even in this advanced stage of your life, you do not reflect upon your future well-being; from this, it appears that your intellect has become completely warped.” (171-174)
श्लोक 175 से 184
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163
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