Summary of Uttar Puran Parv 54 by Acharya Gunabhadra
संक्षिप्त सारांश:
आचार्य गुणभद्राचार्य रचित ‘उत्तरपुराण’ के 54वें पर्व में भगवान चन्द्रप्रभ (आठवें तीर्थंकर) के सात भवों का विस्तृत और आध्यात्मिक वर्णन है। संपूर्ण पर्व का कथ्य सारांश निम्नलिखित प्रमुख शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत है:
1. पूर्व भवों की यात्रा (श्रीषेण से पद्मनाभ तक)
भगवान चन्द्रप्रभ का जीव अपने प्रारंभिक भवों में श्रीषेण नामक राजा था। धर्मानुराग और तप के प्रभाव से वह क्रमशः स्वर्गों में देव (श्रीधर) और पृथ्वी पर महान प्रतापी राजाओं (अजितसेन और पद्मनाभ) के रूप में जन्मा। प्रत्येक भव में उन्होंने राज्य वैभव का उपभोग करते हुए भी वैराग्य को प्रधानता दी। अंत में, पद्मनाभ के भव में ‘सोलहकारण भावनाओं’ का चिंतन कर उन्होंने ‘तीर्थंकर नामकर्म’ का बंध किया और स्वर्ग में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया।
2. चन्द्रप्रभ भगवान का अवतरण और वैभव
अहमिन्द्र की आयु पूर्ण कर भगवान का जीव चन्द्रपुर नगर के राजा महासेन और माता लक्ष्मणा के यहाँ पुत्र रूप में अवतरित हुआ। रानी द्वारा देखे गए 16 मंगलकारी स्वप्नों ने उनके तीर्थंकर होने की घोषणा की। पौष कृष्ण एकादशी को उनका जन्म हुआ। सौधर्म इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया और नीलकमलों के समान उनकी आभा देखकर उनका नाम ‘चन्द्रप्रभ’ रखा।
3. राजसी जीवन और वैराग्य उदय
भगवान का शरीर 150 धनुष ऊँचा और आयु 10 लाख पूर्व थी। उन्होंने 2.5 लाख पूर्व तक कुमार अवस्था और फिर 6.5 लाख पूर्व तक राज्य पद का संचालन किया। एक दिन दर्पण में अपना मुख देखते समय उन्हें शारीरिक नश्वरता का आभास हुआ और वैराग्य उत्पन्न हो गया। उन्होंने स्वीकार किया कि यह संसार अनित्य है और आत्म-कल्याण ही वास्तविक सुख है।
4. दीक्षा, तप और केवलज्ञान प्राप्ति
लौकान्तिक देवों द्वारा स्तुति किए जाने पर भगवान ने अपने पुत्र वरचन्द्र को राज्य सौंपा और 1,000 राजाओं के साथ निर्ग्रन्थ दीक्षा धारण की। तीन माह की कठोर तपस्या के उपरांत, फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इन्द्रों ने उनके समवशरण की रचना की, जहाँ उनकी दिव्यध्वनि से प्राणियों का आत्मिक मार्ग प्रशस्त हुआ।
5. इन्द्र द्वारा स्तुति और दार्शनिक सिद्धांत
ऐशानेन्द्र ने भगवान की भक्तिपूर्ण स्तुति करते हुए उनके ‘अनेकान्त’ और ‘स्याद्वाद’ सिद्धांतों की महत्ता बताई। इन्द्र ने स्पष्ट किया कि भगवान का मार्ग नास्तिकता और अकर्मण्यता दोनों का निषेध करता है। उन्होंने भगवान को समस्त जीवों का रक्षक और मोक्ष रूपी साम्राज्य का अधिपति स्वीकार किया।
6. सम्मेद शिखर से निर्वाण गमन
अंत में, भगवान चन्द्रप्रभ विहार करते हुए सम्मेद शिखर पर्वत पर पहुँचे। वहाँ एक माह का योग-निरोध कर फाल्गुन शुक्ल सप्तमी के दिन उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर सिद्ध पद प्राप्त किया। देवों ने उनके निर्वाण कल्याणक की पूजा की।
यह पर्व शिक्षा देता है कि उच्च कुल, वैभव और स्वर्ग के सुख भी नश्वर हैं। वास्तविक लक्ष्य केवलज्ञान के माध्यम से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाना है, जिसे भगवान चन्द्रप्रभ ने अपने कठिन पुरुषार्थ से सिद्ध किया।
श्लोक 1 से 11 मंगलाचरण एवं सुगन्धि देश का परिचय
इन श्लोकों में चन्द्रप्रभ स्वामी की स्तुति करते हुए पुराण श्रवण की महिमा बताई गई है कि यह सम्यग्ज्ञान का मूल कारण है। इसके पश्चात विदेहक्षेत्र के ‘सुगन्धि’ देश का वर्णन है, जो किलों, वनों और प्राकृतिक संपदा से सुशोभित था। यहाँ के निवासी स्नेहपूर्ण और सूक्ष्म तत्वों के ज्ञाता थे।
श्लोक 12 से 21 आदर्श समाज एवं कृषि की सम्पन्नता
सुगन्धि देश के किसान अत्यंत सरल और धार्मिक थे, जिनके श्रम का फल सदैव निश्चित और सफल होता था। यहाँ के सरोवर निर्मल और खेत राजा के भंडार के समान समृद्ध थे। समाज में दण्ड, कठोरता और अपवाद जैसे नकारात्मक शब्द केवल तराजू, स्त्रियों के यौवन या व्याकरण शास्त्रों तक ही सीमित थे; वास्तविक जीवन में प्रजा पूर्णतः सुखी, निर्दोष और भयमुक्त थी।
श्लोक 22 से 31 श्रीपुर नगर का वैभव और धार्मिक वातावरण
देश के मध्य में स्थित ‘श्रीपुर’ नगर देवलोक के समान सुंदर था। यहाँ के निवासियों में क्रूरता या स्वार्थ के स्थान पर सम्यग्दृष्टि और त्याग की भावना प्रबल थी। नगर के भव्य भवन और सरोवर इसकी शोभा बढ़ाते थे। यहाँ के लोग केवल स्वर्ग के सुखों के लिए नहीं, अपितु मोक्ष प्राप्ति के महान उद्देश्य से धर्म का पालन करते थे।
श्लोक 32 से 41 राजा श्रीषेण और रानी श्रीकान्ता का चरित्र
नगर के स्वामी राजा श्रीषेण इन्द्र के समान प्रतापी और साम-दान की नीति में निपुण थे। उनकी पत्नी श्रीकान्ता गुणों की खान और पतिव्रता थी। उनके गुण विद्वानों के मन को आनंदित करने वाले और सज्जनों द्वारा वंदनीय थे। यह दंपती निष्पाप होकर उत्कृष्ट सुखों का उपभोग कर रहा था।
श्लोक 42 से 51 पुत्र प्राप्ति हेतु अनुष्ठान एवं मंगल स्वप्न
पुत्र के अभाव में दुखी राजा ने पुरोहित के परामर्श पर स्वर्णमयी जिन-प्रतिमाओं का निर्माण कर ‘आष्टाह्निकी’ पूजा और महाभिषेक संपन्न किया। इसके फलस्वरूप रानी ने स्वप्न में हाथी, सिंह, चन्द्रमा और लक्ष्मी का अभिषेक देखा, जो एक पराक्रमी और भाग्यशाली पुत्र के आगमन का संकेत था।
श्लोक 52 से 61 रानी का गर्भाधान और राजा का हर्ष
रानी के गर्भ धारण करते ही उनके शरीर में तेज और स्वाभाविक लज्जा के चिह्न प्रकट होने लगे। जब दासियों ने राजा को यह सुखद समाचार सुनाया, तो राजा का मुख कमल के समान खिल उठा। राजा ने इसे अपने वंश की उन्नति का कारण मानकर अपार प्रसन्नता व्यक्त की और सेविकाओं को पुरस्कृत किया।
श्लोक 62 से 71 राजकुमार श्रीवर्मा का जन्म और शिक्षा
शुभ ग्रहों के योग में रानी ने ‘श्रीवर्मा’ नामक पुत्र को जन्म दिया, जिससे राजा को असीम संतोष प्राप्त हुआ। राजकुमार का शरीर अत्यंत तेजस्वी था और उनकी बुद्धि का विकास वैद्यक एवं व्याकरण आदि शास्त्रों के अनुसार अत्यंत प्रखर रूप में हुआ। वे जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत के समान सुशोभित होने लगे।
श्लोक 72 से 81 वैराग्य, राज्याभिषेक और मुनि दीक्षा
जिनेन्द्र श्रीपद्म के उपदेश से प्रभावित होकर राजा श्रीषेण ने पुत्र श्रीवर्मा को राज्य सौंपकर दीक्षा ग्रहण कर ली। कालान्तर में श्रीवर्मा ने भी आकाश में उल्कापात (टूटता तारा) देखकर संसार की नश्वरता को समझा और वैराग्य धारण कर लिया। उन्होंने अपने पुत्र श्रीकान्त को राज्य दिया और श्रीप्रभ जिनेन्द्र के समीप तपस्या करते हुए अंततः समाधिमरण प्राप्त किया।
श्लोक 82 से 91 श्रीधर देव एवं चक्रवर्ती अजितसेन का आगमन और राजा अजितंजय के स्वप्न
श्रीवर्मा का जीव स्वर्ग में ‘श्रीधर’ नामक देव हुआ, जिसकी आयु दो सागर थी।। वहाँ से च्युत होकर वह धातकीखण्ड द्वीप के अयोध्या नगर के राजा अजितंजय की रानी अजितसेना के गर्भ में आया। रानी ने आठ शुभ स्वप्न (हाथी, बैल, सिंह, चंद्रमा, सूर्य, सरोवर, शंख और पूर्ण कलश) देखे, जिनका फल राजा ने एक महाप्रतापी चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति के रूप में बताया।
श्लोक 92 से 101 चक्रवर्ती अजितसेन का साम्राज्य
रानी ने श्रीधर देव के जीव को अजितसेन के रूप में जन्म दिया। राजा अजितंजय ने पुत्र को राज्य सौंपकर स्वयं दीक्षा ले ली।। अजितसेन के पुण्य से ‘चक्ररत्न’ सहित चौदह रत्न और नौ निधियाँ प्रकट हुआ और उन्होंने सुगमता से छह खण्डों पर विजय प्राप्त की। वे एक ऐसे चक्रवर्ती थे जो अपार वैभव के स्वामी होकर भी मोह और परिग्रह से अछूते थे।
श्लोक 102 से 111 दिशापालों से तुलना और शासक की श्रेष्ठता
यहाँ कवि ने अलंकृत वर्णन करते हुए कहा कि अजितसेन वास्तविक रक्षक थे, जबकि पौराणिक दिशापाल (अग्नि, यम, वरुण आदि) अपनी प्रकृति के कारण रक्षा में असमर्थ थे। अजितसेन के पराक्रम और न्यायप्रियता की स्तुति देवों द्वारा भी की जाती थी।
श्लोक 112 से 121 दान-धर्म एवं मुनि-आहार
राजा अजितसेन की बुद्धि सदैव धर्म और परोपकार में लगी रहती थी। उन्होंने मुनि अरिन्दम को भक्तिपूर्वक आहार-दान दिया, जिससे आकाश से रत्नों की वर्षा जैसे ‘पञ्चाश्चर्य’ प्रकट हुए। उनका जीवन संयम और प्रजा-रक्षा का उत्कृष्ट उदाहरण था।
श्लोक 122 से 131 अच्युतेन्द्र पद और पद्मनाभ का जन्म
गुप्तप्रभ जिनेन्द्र के उपदेश से वैराग्य पाकर अजितसेन ने पुत्र जितशत्रु को राज्य दिया और दीक्षा लेकर 16वें स्वर्ग में ‘अच्युतेन्द्र’ हुए। वहाँ का सुख भोगकर उनका जीव राजा कनकप्रभ और रानी कनकमाला के यहाँ ‘पद्मनाभ’ नामक पुत्र के रूप में अवतरित हुआ।
श्लोक 132 से 141 पद्मनाभ की शिक्षा एवं विवाह
राजकुमार पद्मनाभ ने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया था और समस्त कलाओं एवं शास्त्रों में प्रवीणता प्राप्त की। यौवन प्राप्त करने पर उनका विवाह सोमप्रभा आदि अनेक कन्याओं से हुआ और उनके सुवर्णनाभ जैसे तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ।
श्लोक 142 से 151 संसार की नश्वरता एवं कर्म-दर्शन
मुनि श्रीधर के उपदेश से पद्मनाभ के पिता ने दीक्षा ली। पद्मनाभ ने स्वयं भी संसार के चक्र का चिंतन किया। उन्होंने समझा कि जब तक ‘मिथ्यात्व’ जैसे दोष विद्यमान हैं, आत्मा कर्मों के बंधन में फंसी रहती है। उन्होंने संसार को जन्म-मरण का दुःखद जाल माना।
श्लोक 152 से 162 तीर्थंकर नामकर्म का बंध एवं अहमिन्द्र पद
पद्मनाभ ने पुत्र सुवर्णनाभ को राज्य देकर कठिन तपस्या प्रारम्भ की। उन्होंने सोलहकारण भावनाओं का चिंतन किया और ग्यारह अंगों का ज्ञान प्राप्त कर ‘तीर्थंकर नामकर्म’ का उपार्जन किया। अंत में, समाधिमरण के उपरांत वे वैजयन्त विमान में ‘अहमिन्द्र’ हुए, जहाँ से वे आगे चलकर तीर्थंकर पद प्राप्त करेंगे।
श्लोक 163 से 173 चन्द्रपुर में भगवान का अवतरण और नामकरण
अहमिन्द्र की आयु पूर्ण कर भगवान का जीव जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र स्थित चन्द्रपुर नगर में राजा महासेन और रानी लक्ष्मणा के यहाँ अवतरित हुआ। रानी ने चैत्र कृष्ण पंचमी को सोलह मंगलकारी स्वप्न देखे। तत्पश्चात, पौष कृष्ण एकादशी के दिन तीन ज्ञान से सम्पन्न पुत्र का जन्म हुआ। इन्द्र ने नवजात बालक को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर क्षीरसागर के जल से अभिषेक किया। चूँकि उनके जन्म से पृथ्वी मण्डल नील-कमलों (कुवलय) के समान विकसित हो उठा था, इसलिए इन्द्र ने उनका सार्थक नाम ‘चन्द्रप्रभ’ रखा।
श्लोक 174 से 181 शैशव काल और शारीरिक वैशिष्ट्य
इन्द्र ने भगवान के समक्ष ‘आनन्द’ नामक नाटक किया और कुबेर को उनकी सेवा का निर्देश दिया। भगवान चन्द्रप्रभ, सुपार्श्वनाथ स्वामी के मोक्ष जाने के नौ सौ करोड़ सागर बाद उत्पन्न हुए थे। उनकी आयु दस लाख पूर्व और शरीर की ऊँचाई एक सौ पचास धनुष थी। उनका बाल्यकाल दिव्य चेष्टाओं और देवताओं के साथ कुतूहलपूर्ण क्रीड़ाओं में व्यतीत हुआ। उनके मुख की मन्द मुस्कान और लड़खड़ाते कदमों की शोभा देखते ही बनती थी।
श्लोक 182 से 193 अलौकिक कान्ति और युवावस्था
युवावस्था प्राप्त करने पर भगवान का शरीर अमृतमयी और चन्द्रमा के समान धवल कान्ति (शुक्ल लेश्या) से युक्त था। उनकी आभा के सामने ज्योतिषी देवों का प्रकाश भी फीका पड़ जाता था। वे वीणा वादन, संगीत, शास्त्रों की परीक्षा और भव्य जीवों को दर्शन देने में अपना समय व्यतीत करते थे। कवि कहते हैं कि उनके गुण चन्द्रमा की किरणों के समान निर्मल थे, जो भव्य जीवों के मन रूपी कमलों को विकसित करते थे।
श्लोक 194 से 201 राज्याभिषेक और सांसारिक ऐश्वर्य
दो लाख पचास हजार पूर्व वर्ष बीतने पर भगवान चन्द्रप्रभ का राज्याभिषेक हुआ। वे तीन लोक की रक्षा करने वाले अद्भुत तेज से सम्पन्न थे। यद्यपि वे सांसारिक सुखों और रानियों के बीच घिरे थे, किन्तु उनका ऐश्वर्य अलौकिक था। इन्द्र आदि देव भी उनकी सेवा में तत्पर रहते थे। उनका शासन काल न्याय और समृद्धि का प्रतीक था।
श्लोक 202 से 211 दर्पण दर्शन और वैराग्य का उदय
जब भगवान के साम्राज्य सुख का छह लाख पचास हजार पूर्व वर्ष व्यतीत हो गया, तब एक दिन दर्पण में अपना मुख देखते समय उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने चिन्तन किया कि यह शरीर नश्वर है और सांसारिक संयोग अंततः वियोग में परिणत होने वाले हैं। उन्होंने स्वयं को धिक्कारा कि जानते हुए भी वे मोह में फंसे रहे। अनित्य को नित्य समझना ही अज्ञान है और इसी कारण जीव संसार रूपी सागर के दुखों में भटकता है।
श्लोक 212 से 222 दीक्षा कल्याणक और कठोर तपश्चर्या
वैराग्य भाव प्रबल होते ही लौकान्तिक देवों ने आकर उनके विचारों की पुष्टि की। भगवान ने अपने पुत्र वरचन्द्र का राज्याभिषेक किया और ‘विमला’ पालकी में सवार होकर सर्वर्तुक वन पहुँचे। वहाँ पौष कृष्ण एकादशी को एक हजार राजाओं के साथ निर्ग्रन्थ दीक्षा धारण की, जिससे उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। दूसरे दिन नलिन नगर के राजा सोमदत्त ने उन्हें आहार दान दिया। इसके उपरांत भगवान कषायों को जीतकर, पंच महाव्रतों और तीन गुप्तियों का पालन करते हुए परम योग में लीन हो गए।
श्लोक 223 से 231 केवलज्ञान की प्राप्ति और दिव्य अतिशय
भगवान ने दीक्षा के पश्चात तीन माह तक नागवृक्ष के नीचे कठोर तप किया। फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ होकर उन्होंने मोह रूपी शत्रु का विनाश किया और चारों घातिया कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान (सर्वज्ञता) प्राप्त किया। वे शरीर सहित ‘सयोगकेवली’ हुए और चौंतीस अतिशयों एवं आठ प्रातिहार्यों के साथ तीन लोक के रक्षक और उपदेशक के रूप में सुशोभित हुए।
श्लोक 232 से 241 भगवान का अलौकिक वैभव और प्रतीकात्मकता
भगवान का सिंहासन और उनके शरीर की प्रभा केवलज्ञान की कान्ति के समान समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी। उनकी दिव्यध्वनि एक ही समय में सभी श्रोताओं के संशयों का निवारण करती थी। उनके मस्तक पर सुशोभित तीन छत्र रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र) के प्रतीक थे। आकाश से होने वाली पुष्प वर्षा और देवों के नगाड़े उनके द्वारा मोह रूपी शत्रु पर विजय की घोषणा कर रहे थे।
श्लोक 242 से 251 समवशरण की भव्यता और इन्द्र का आगमन
भगवान बारह सभाओं से घिरी ‘गन्धकुटी’ के मध्य में ऐसे सुशोभित थे जैसे नक्षत्रों के बीच चन्द्रमा। उनके संघ में 93 गणधर और ढाई लाख मुनिराजों सहित लाखों आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ उपस्थित थीं। इसी समय ऐशानेन्द्र (इन्द्र) ने आकर भक्तिपूर्वक भगवान के चरणों में वन्दना की और उनसे संसार के दुखों से मुक्ति दिलाने वाले रत्नत्रय की याचना की।
श्लोक 252 से 261 इन्द्र द्वारा दार्शनिक एवं भावपूर्ण स्तुति
इन्द्र ने स्तुति करते हुए कहा कि कल्पवृक्ष केवल दूसरों का हित करता है, किन्तु भगवान स्व और पर दोनों का कल्याण करने वाले हैं। जो मनुष्य भगवान के वचनों और धर्म को हृदय में धारण करता है, वह उन्हीं के समान आनन्द प्राप्त करता है। इन्द्र ने उन्हें कर्म रूपी शत्रुओं का विनाशक और संसार रूपी समुद्र से पार उतारने वाला ‘आधार’ बताया। भगवान सबको जानते हैं, किन्तु इन्द्रियों द्वारा पूर्णतः नहीं जाने जा सकते।
श्लोक 262 से 272 मत-मतांतर का खंडन और निर्वाण गमन
इन्द्र ने नास्तिकता और केवल भाग्यवादिता का खंडन करते हुए भगवान के ‘अनेकान्त’ मार्ग की सराहना की। उन्होंने सिद्ध किया कि द्रव्य और गुण परस्पर अभिन्न हैं। स्तुति के पश्चात, भगवान चन्द्रप्रभ ने विभिन्न देशों में विहार कर धर्म की प्रभावना की और अंततः सम्मेद शिखर पहुँचे। वहाँ एक माह का योग निरोध कर फाल्गुन शुक्ल सप्तमी के दिन उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर सिद्ध पद (निर्वाण) प्राप्त किया |
श्लोक 273 से 276मंगल कामना और उपसंहार
भगवान के निर्वाण के अवसर पर देवों ने आकर निर्वाण-कल्याणक की पूजा की। अंत में कवि मंगल कामना करते हुए कहते हैं कि जो चन्द्रमा के समान धवल लेश्या वाले हैं और जिन्होंने अष्ट कर्मों को नष्ट कर दिया है, वे भगवान चन्द्रप्रभ हमारी अज्ञानता को दूर कर मोक्ष-लक्ष्मी प्रदान करें। यहाँ श्रीवर्मा से लेकर तीर्थंकर बनने तक की उनकी सात भवों की यात्रा का पवित्र वर्णन समाप्त होता है।
पर्व 55
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