अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 –श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 452 to 462
श्लोक ( Shlok ) 452
विनश्रविश्व विधेशमुकुटाग्रमणित्विषा । स पादपीठपर्यन्ते विधत्ते धनुरामरम् ॥ ४५२ ॥
वह अपने चरणपीठके समीप नम्रीभूत हुए समस्त विद्याधरोंके मुकुटके अग्रभागमें मणियोंकी किरणोंसे इन्द्र-धनुष बनाया करता है ।। ४५२ ॥
“He creates an artificial rainbow with the rays of the gems glistening from the tips of the crowns of all the Vidyādharas, who bow down in complete submission near his footstool.”452
श्लोक ( Shlok ) 453
कुन्देन्दुनिर्भासि तस्यारातिजयार्जितम् । कन्या गायन्ति दिग्दन्तिदन्तपर्यन्तके कलम् ॥ ४५३ ॥
शत्रुओंको जीतनेसे उत्पन्न हुआ उसका यश कुन्द पुष्प तथा चन्द्रमाके समान शोभायमान है, उसके ऐसे मनोहर यशको कन्याएँ दिग्गजोंके दाँतों के समीप निर-न्तर गाती रहती हैं ।। ४५३ ।।
“His fame, born from conquering his enemies, shines as brilliantly as a white jasmine (kunda) flower or the luminous moon; young maidens continuously sing the praises of his captivating glory right beside the tusks of the directional elephants (diggajas).”453
श्लोक ( Shlok ) 454
दुर्दमा विद्विषस्तेन ‘दान्ता यन्त्रेव दन्तिनः । दमितारिति ख्यातिं सन्धरोऽन्वर्थपेशलम् ॥ ४५४ ॥
जिस प्रकार महावतोंके द्वारा बड़े-बड़े दुर्जेय हाथी वश कर लिये जाते हैं उसी प्रकार उसके द्वारा भी बड़े-बड़े दुर्जेय राजा वश कर लिये गये थे इसलिए उसका ‘दमितारि’ यह नाम सार्थक प्रसिद्धिको धारण करता है ॥ ४५४ ॥
“Just as massive, invincible elephants are brought under control by skilled mahouts, so too were great, unyielding kings completely subdued by him. Therefore, his name ‘Damitarī’ holds a truly meaningful and well-deserved renown.”454
श्लोक ( Shlok ) 455
तस्य शौर्यानलो भस्मिताखिलारातिरिन्धनः । जाज्वलीति तथाप्यग्निकुमारामरभीषणः ॥ ४५५ ॥
यद्यपि उसकी प्रतापरूपी अग्निने समस्त शत्रुरूपी इन्धनको जला डाला है तो भी अग्निकुमारदेवके समान भयंकर दिखनेवाली उसकी प्रताप-रूपी अग्नि निरन्तर जलती रहती है ।। ४५५ ।।
“Even though the fire of his majesty has completely consumed all his enemies—who were like fuel to it—that fire of his glory, looking as fearsome as an Agnikumāra deity, continues to blaze incessantly.”455
श्लोक ( Shlok ) 456
प्रेषितः श्रीमता तेन देवेनाहं युवां प्रति । प्रीतये याचितुं तस्माद्दातव्यं नर्तकीद्वयम् ॥ ४५६ ॥
उसी श्रीमान् दमितारि राजाने दोनों नृत्यकारिणियाँ माँगनेके लिए मुझे आपके पास भेजा है सो प्रीति बढ़ानेके लिए आपको अवश्य देना चाहिए ।। ४५६ ।।
“That very same glorious King Damitarī has dispatched me to your presence to request those two female dancers; therefore, to foster and increase mutual affection, you must certainly hand them over.”456
श्लोक ( Shlok ) 457 – 458
युष्मदीयं भुवि ख्यातं योग्यं तस्यैव तद्यतः । युवयोः स हि तद्दानात्सुप्रसन्नः फलिष्यति ॥ ४५७ ॥इत्यब्रवीददः श्रुत्वा तमावासं प्रहित्य तौ । किं कार्यमिति पृच्छन्तौ स्थितावाहूय मन्त्रिणः ॥४५८॥
आपकी नृत्यकारिणियाँ पृथिवीमें प्रसिद्ध हैं अतः उसीके योग्य हैं। नृत्यकारिणियोंके देने-से वह तुम दोनोंपर प्रसन्न होगा और अच्छा फल प्रदान करेगा। इस प्रकार उस दूतने कहा । राजाने उसे सुनकर दूतको तो विश्राम करनेके लिए भेजा और मन्त्रियोंको बुलाकर पूछा कि इस परिस्थितिमें क्या करना चाहिए ? ॥ ४५७-४५८ ॥
“‘Your female dancers are famous throughout the earth, and are therefore worthy of him alone. By surrendering these dancers, he will be pleased with both of you and will bestow a grand reward upon you.’ The messenger spoke in this manner. Upon hearing this, the king sent the messenger to rest, and summoning his ministers, he asked, ‘What should be done in this situation?'”457 – 458
श्लोक ( Shlok ) 459 – 460
तयोः पुण्योदयात्सद्यस्तृतीयभवदेवताः । सुनिरूप्य स्वरूपाणि ताः स्वयं समुपाश्रयन् ॥ ४५९ ॥वयं युवाभ्यां संयोज्या निजाभिप्रेतकर्मणि । अस्थाने माकुलीभूतामित्याहुश्चाहितादराः ॥ ४६० ॥
उनके पुण्य कर्मके उदयसे तीसरे भवकी विद्यादेवताएँ शीघ्र ही आ पहुँचीं और अपना स्वरूप दिखाकर स्वयं ही कहने लगीं कि हमलोग आपके द्वारा अपने इष्ट कार्यमें लगानेके योग्य हैं। आप लोग अस्थानमें व्यर्थ ही व्याकुल न हों -ऐसा उन्होंने बड़े आदरसे कहा ॥ ४५९ -४६० ।।
“Due to the rising of their past meritorious deeds (punya-karma), the Vidyādevatās (deities of knowledge and mystical powers) from their third previous birth quickly arrived. Revealing their divine forms, they themselves said, ‘We are ready to be employed by you for any desired task. Do not be anxious in this improper place in vain’—thus they spoke with great respect.”459 – 460
श्लोक ( Shlok ) 461 – 462
श्रुत्वैतद्राज्यभारं स्वं निधाय निजमन्त्रिषु । नर्तकीवेषमादाय राज्ञाऽऽवां प्रेषिते ततः ॥ ४६१ ॥यामेति ‘दूतेनालप्य सम्प्राप्य शिवमन्दिरम् । समालोचितगूढार्थों प्रविश्य नृपमन्दिरम् ॥४६२॥
देवताओंकी बात सुन दोनों भाइयोंने अपना राज्य-का भार अपने मन्त्रियोंपर रखकर नर्तकियोंका वेष धारण किया और दूतसे कहा कि चलो चलें, राजाने हम दोनोंको भेजा है। इस प्रकार दूतके साथ वार्तालाप कर वे दोनों शिवमन्दिरनगर पहुँचे और किसी गूढ़ अर्थकी आलोचना करते हुए राजभवनमें प्रविष्ट हुए ।। ४६१-४६२ ।।
“Due to the rising of their past meritorious deeds (punya-karma), the Vidyādevatās (deities of knowledge and mystical powers) from their third previous birth quickly arrived. Revealing their divine forms, they themselves said, ‘We are ready to be employed by you for any desired task. Do not be anxious in this improper place in vain’—thus they spoke with great respect.”461 – 462
श्लोक 463 से 472
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85
धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451
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