नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 234 | श्लोक 235 से 248
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 249 to 259
श्लोक ( Shlok ) 249 – 259
गृहीतानशनान्येधुरायिकाभिः सहागताम् । स्वगेहं सुव्रतां क्षान्तिमभिवन्द्य अवदायिके ॥ २४९ ॥इमे द्वे दीक्षिते केन हेतुनेत्यन्वयुक्त ताम् । अथ साप्यब्रवीदेवं क्षान्तिः कल्याणनामिके ॥ २५० ॥शृण्वेते जन्मनि प्राचि सौधर्माधिपतेः प्रिये । विमला सुप्रभा चेति देव्यौ सौधर्मसंयुते ॥ २५१ ॥गत्वा नन्दीश्वरद्वीपे जिनगेहार्चनाविधेः । तत्र संविग्नचित्तत्वात्सम्प्राप्यास्मान्मनुष्यताम् ॥ २५२ ॥आवां तपः करिष्याव इत्यन्योन्यं व्यवस्थितिम् । अकुर्वतां ततश्च्युत्वा साकेतनगरेशिनः ॥ २५३ ॥ श्रीषेणाख्यमहीशस्य श्रीकान्तायाश्च ते सुते । हरिश्रीपूर्वसेनाख्ये सम्भूय प्राप्तयौवने ॥ २५४ ॥ स्वयंवर विवाहोरुमण्डपाभ्यन्तरे स्थिते । निजपूर्वभवं स्मृत्वा संस्थाञ्च प्राक्तनी कृताम् ॥ २५५ ॥ विसर्ज्य बन्धुवर्गेण समं नृपकुमारकान् । इते दीक्षामिति क्षान्तिवचनाकर्णनेन सा ॥ २५६ ॥ सुकुमारी च निर्विण्णा सम्मता निजबान्धवैः । तत्समीपेऽगमद्दीक्षामन्येधुर्वनमागताम् ॥ २५७ ॥ वेश्यां वसन्तसेनाख्यामावृत्य बहुभिविटैः । सम्प्रार्थ्यमानामालोक्य ममाप्येवं भवेदिति ॥ २५८ ॥ निदानमकरोज्जीवितान्ते प्राक्तनजन्मनः । सोमभूतेरभूद्देवी प्रान्तकल्पनिवासिनः ॥ २५९ ॥
किसी दूसरे दिन उसने उपवास किया, उसी दिन उसकेघर अन्य अनेक आर्यिकाओंके साथ सुव्रता और क्षान्ति नामकी आर्यिकाएँ आईं उसने उन्हें वन्दना कर प्रधान आर्यिकासे पूछा कि इन दोनों आर्यिकाओंने किस कारण दीक्षा ली है ? यह बात आप मुझसे कहिए। सुकुमारीका प्रश्न सुनकर क्षान्ति नामकी आर्यिका कहने लगी कि हे शुभ नाम-वाली ! सुन, ये दोनों ही पूर्वजन्ममें सौधर्म स्वर्गके इन्द्रोंकी विमला और सुप्रभा नामकी प्रिय देवियां थीं। किसी एक दिन ये दोनों ही सौधर्म इन्द्रके साथ जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करनेके लिए नन्दीश्वर द्वीपमें गई थीं। वहां इनका चित्त विरक्त हुआ इसलिए इन दोनोंने परस्पर ऐसा विचार स्थिर किया कि हम दोनों इस पर्यायके बाद मनुष्य पर्याय पाकर तप करेंगी। आयुके अन्त में वहांसे च्युत होकर ये दोनों, साकेत नगरके स्वामी श्रीषेण राजाकी श्रीकान्ता रानीसे हरिषेणा और श्रीषेणा नामकी पुत्रियां हुई हैं। यौवन अवस्था प्राप्तकर ये दोनों विवाहके लिए स्वयम्बर-मंडपके भीतर खड़ी थीं कि इतनेमें ही इन्हें अपने पूर्वभव तथा पूर्वभवमें की हुई प्रतिज्ञाका स्मरण हो आया। उसी समय इन्होंने समस्त बन्धुवर्ग तथा राजकुमारोंका त्यागकर दीक्षा धारण कर ली। इस प्रकार क्षान्ति आर्यिकाके वचन सुनकर सुकुमारी बहुत विरक्त हुई और अपने कुटुम्बीजनोंकी संमति लेकर उसने उन्हीं आर्यिकाके पास दीक्षा धारण कर ली। किसी दूसरे दिन वनमें वसन्तसेना नामकी वेश्या आई थी, उसे बहुतसे व्यभिचारी मनुष्य घेरकर उससे प्रार्थना कर रहे थे। यह देखकर सुकुमारीने निदान किया कि मुझे भी ऐसा ही सौभाग्य प्राप्त हो । आयुके अन्त में मरकर वह, पूर्वजन्ममें जो सोमभूति नामका ब्राह्मण था और तपञ्चरणके प्रभावसे अच्युत स्वर्गमें देव हुआ था उसकी देवी हुई ॥ २४९-२५९ ॥
“On another day, she observed a fast. That very day, Aryikas (Jain nuns) named Suvrata and Kshanti, along with many other Aryikas, visited her house. She bowed to them and asked the chief Aryika, ‘For what reason did these two Aryikas accept initiation? Please tell me this.’
Hearing Sukumari’s question, the Aryika named Kshanti began to speak, ‘O lady of auspicious name, listen! In their previous birth, both of these were the beloved goddesses named Vimala and Suprabha of the Indras of the Saudharma heaven. One day, they both went to Nandishvara Island with Saudharma Indra to worship Lord Jinendra. There, their minds became detached from worldly pleasures, so they mutually resolved: “After this life-form, we shall attain human birth and practice penance.” At the end of their lifespan, falling from that realm, they were born as daughters named Harishena and Shrishena to Queen Shrikanta, the consort of King Shrishena, the ruler of Saket city.
Upon reaching youth, they were standing inside the Swayamvara pavilion for marriage, when suddenly they remembered their previous birth and the vow they had made. At that very moment, abandoning all their relatives and the assembled princes, they accepted initiation.
Hearing these words of Aryika Kshanti, Sukumari became deeply detached from worldly life. Taking the consent of her family members, she accepted initiation under the same Aryika.
On another day, a courtesan named Vasantasena came to the forest, and many profligate men surrounded her, making advances. Seeing this, Sukumari made a Nidana (a binding wish for future reward), desiring, “May I also attain such fortune and charm.” At the end of her lifespan, she passed away and became the celestial consort (Devi) of the deity in the Achyuta heaven—who, in a previous birth, had been the Brahmin named Somabhuti and had ascended there due to the power of his penances.” 249 – 259
श्लोक 260 से 271
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 234 | श्लोक 235 से 248
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