राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 318 to 332
श्लोक ( Shlok ) 318 – 319
दशाननोऽप्यतिक्रान्ते तत्रास्या दिनसप्तके । सीता कीरगवस्थेति चिन्तयन् दीपिकावृतः ॥ ३१८ ॥ दीव्यत्कल्पद्रुमोपेतनीलाद्रिरिव जङ्गमः । निरीक्षितु तथैवायात् सोत्कण्ठोऽन्तः पुरान्वितः ॥ ३१९ ॥
उसी समय ‘आज सीताको लाये हुए सात दिन बीत चुके हैं अतः देखना चाहिये कि उसकी क्या दशा है’ ऐसा विचार करता हुआ रावण वहाँ आया। वह अनेक दीपिकाओंसे आवृत था -उसके चारों ओर अनेक दीपक जल रहे थे इसलिए वह ऐसा जान पड़ता था मानो देदीप्यमान कल्पवृक्षोंसे सहित चलता फिरता नीलगिरि ही हो। वह उत्कण्ठासे सहित था तथा अन्तःपुरकी स्त्रियोंसे युक्त था ॥ ३१८-३१९ ॥
“At that very moment, reflecting to himself, ‘Today, seven days have passed since Sita was brought here, so I must see what her condition is,’ Ravana arrived there. He was surrounded by numerous lamps—since many torches were burning all around him, he appeared like a moving blue mountain (Nilagiri) accompanied by radiant, wish-fulfilling trees (kalpavrikshas). He was filled with eager longing and was accompanied by the women of his inner palace. || 318-319 ||”
श्लोक ( Shlok ) 320 – 324
मन्नत्तुः कुशलोदन्तं संश्रोष्यामि कदा न्विति । मत्वा तां स्तिमिताकारां चिरं वीक्ष्य सविस्मयः ॥३२०॥ न काचिच्चे दृशी स्त्रीषु पतिभक्त ति चिन्तयन् । अपसृत्य स्थितः किञ्चिद् दूतीं मञ्जरिकाभिधाम् ॥३२१॥ प्राहिणोशदभिप्रायं परिज्ञातु’ विवेकिनीम् । जानकीं विनयेनासौ प्रपद्य शृणु मद्वचः ॥ ३२२ ॥ भट्टारिके खगेन्द्रस्य खेचरेन्द्रप्रियात्मजाः । देव्यः पञ्चसहस्त्राणि त्वत्समाना मनोरमाः ॥ ३२३ ॥ तासां त्वं स्वामिनी भूत्वा महादेवीपदे स्थिता । त्रिखण्डाधिपतेर्भूयाः सश्रीर्वक्षःस्थले चिरम् ॥ ॥३२४॥
‘मैं अपने पतिका कुशल समाचार कब सुनूँगी’ ऐसा विचार करती हुई सीता चुपचाप स्थिर बैठी हुई थी। उसे रावण बड़ी देर तक आश्चर्यसे देखता रहा और त्रियोंके बीच ऐसी पतिव्रता स्त्री कोई दूसरी नहीं है ऐसा विचार कर वह कुछ पीछे हटकर दूर खड़ा रहा। वहींसे उसने सीताका अभिप्राय जाननेके लिए अपनी मञ्जरिका नामकी विवेकवती दूती उसके पास भेजी। वह दूती सीताके पास आकर विनयसे कहने लगी कि हे स्वामिनी, विद्याधरोंके राजा रावणकी पाँच हजार स्त्रियाँ हैं जो विद्याधर राजाओंकी पुत्रियाँ हैं और तुम्हारे ही समान मनोहर हैं। तुम उन सबकी स्वामिनी होकर महादेवीके पदपर स्थित होओ और तीन खण्डके स्वामी रावणके वक्षःस्थलपर चिरकाल तक लक्ष्मीके साथ साथ निवास करो ।। ३२०-३२४ ।।
“‘When will I hear the news of my husband’s well-being?’ immersed in this thought, Sita remained sitting silently and motionless. Ravana watched her in astonishment for a long time. Reflecting that there was no other faithful wife like her among women, he stepped back a little and stood at a distance. From there, in order to ascertain Sita’s mind, he sent his wise messenger named Manjarika to her side.
Approaching Sita, that messenger spoke with humility, ‘O Mistress! Ravana, the king of the Vidyadharas, possesses five thousand wives who are the daughters of Vidyadhara kings and are as charming as you. May you become the sovereign mistress over all of them, be established in the position of the Chief Queen (Mahadevi), and reside for a long time alongside Goddess Lakshmi upon the chest of Ravana, the lord of the three realms (Three Khandas).’ || 320-324 ||”
श्लोक ( Shlok ) 325 – 329
विफलं मा कृथा विद्युच्चपलं तव यौवनम् । हस्तात्पुलस्तिपुत्रस्य रामस्त्वा नेष्यतीत्यदः ॥ ३२५ ॥ वितर्कणं कदम्बोरुवनं वा विद्धि निष्फलम् । क्षुधार्तानेकपारातिवक्त्रान्तर्वार्तनं मृगम् ॥ ३२६ ॥ परित्याजयितुं ब्रूहि कः समर्थतमः पुमान् । इत्यभ्यधात्तदाकर्ण्य निश्चला वसुधासुता ।। ३२७ ॥वसुधेव स्थिता भेत्तुं के वा शक्ताः पतिव्रताम् । तां दृष्ट्वा खेचराधीशः स्वयमागत्य कातरः ॥ ३२८ ॥कुलं चेद्रक्षितुं तिष्ठेर्न विचारक्षमं हि तत् । लज्जा चेद्धीनसम्बन्धात्सा तस्याः प्रसवोऽत्र न ॥ ३२९ ॥
बिजलीके समान चञ्चल अपने इस यौवनको निष्फल न करो। ‘रावणके हाथसे राम तुम्हें वापिस ले जावेगा’ इस विचारको तुम कदम्बके विशाल वनके समान निष्फल समझो । भूखसे पीड़ित सिंहके मुखके भीतर वर्तमान मृगको छुड़ानेके लिए कौन मनुष्य समर्थ है ? इस प्रकार उस मञ्जरिका नामकी दूतीने कहा सही परन्तु सीता उसे सुनकर पृथिवीके समान ही निश्चल बैठी रही सो ठीक ही है क्योंकि पतिव्रता स्त्रीको भेदन करनेके लिए कौन समर्थ हो सकता है ? उसे निश्चल देख रावण स्वयं डरते डरते पास आकर कहने लगा कि यदि तू कुलकी रक्षा करनेके लिए बैठी है तो यह बात विचार करनेके योग्य नहीं है। यदि लज्जा आती है तो वह नीच मनुष्योंके संसर्गसेहोती है अतः यहाँ उसकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती ।। ३२५-३२९ ।।
“‘Do not waste this youth of yours, which is as fleeting as lightning. Consider the thought that “Rama will take you back from the hands of Ravana” to be as utterly futile as a vast forest of wild kadamba trees. What man is capable of rescuing a deer that is already inside the mouth of a lion tormented by hunger?’
Though the messenger named Manjarika spoke in this manner, Sita, upon hearing her, remained sitting as completely motionless as the Earth itself. And this is only fitting, for who could ever be capable of breaking the resolve of a deeply faithful wife?
Beholding her so completely unmoving, Ravana himself, filled with apprehension, approached her and began to say, ‘If you are sitting here out of a desire to protect the honor of your lineage, then this matter is not even worth debating. If it is shame that overcomes you, that only arises from the company of lowly men—therefore, there is no possibility of its origin here.’ || 325-329 ||”
श्लोक ( Shlok ) 330 – 332
रामे चेत्प्रेम तद्विद्धि जन्मान्तरितसन्निभम् । चिरं परिचितं कस्माद्विस्मराम्यधुनैव तम् ॥ ३३० ॥ इति चेत्संसृतौ जन्तौ केन कस्य न संस्तवः । परिखावारिधिदुर्गस्निकूटाद्रिः खगेश्वराः ॥ ३३.१. ॥ दुर्गपालाः पुरं लक्का मेघनादादयो भटाः । नायकोऽहं कथं तस्य तव भर्तुः प्रवेशनम् ॥ ३३२ ॥
यदि राममें तेरा प्रेम है तो तू उसे अब मरे हुएके समान समझ । जो चिरकालसे परिचित है उसे इस समय एकदम कैसे भूल जाऊँ ? यदि यह तेरा कहना है तो इस संसारमें किसका किसके साथ परिचय नहीं है? कदाचित् यह सोचती हो कि राम यहाँ आकर मुझे ले जावेंगे सो यह भी ठीक नहीं हैं क्योंकि समुद्र तो यहाँकी खाई है, त्रिकूटाचल किला है, विद्याधर लोकपाल हैं, लङ्का नगर है, मेघनाद आदि योद्धा हैं और मैं उनका स्वामी हूँ फिर तुम्हारे रामका यहाँ प्रवेश ही कैसे हो सकता है ? ॥ ३३०-३३२ ॥
“‘If your affection lies with Rama, you should now consider him as good as dead. If your argument is, “How can I suddenly forget someone with whom I have been familiar for so long?”, then who in this world is not familiar with someone else at some point? Perchance you think that Rama will come here and take you away—but that too is impossible. For the ocean is the moat of this place, Mount Trikutachal is its fortress, the Vidyadharas are its guardians, Lanka is the city, warriors like Meghanada are its defenders, and I am their lord. Under such circumstances, how can your Rama even gain entry here?’ || 330-332 ||”
श्लोक 333 से 353
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