नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 223 से 234 | श्लोक 235 से 248 | श्लोक 249 से 259 | श्लोक 260 से 271
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 272 to 281
श्लोक ( Shlok ) 272 – 274
नवरन्ध्रर्तुवर्षेषु चतुर्दिवससंयुतैः । युतेषु नवभिर्मासैर्विहारविधिविच्युतौ ॥ २७२ ॥ पश्चात्पञ्चशतैः सार्धं संयतैत्रिशता त्रिभिः । मासं योगं निरुध्यासौ हताघातिचतुष्ककः ॥ २७३ ॥ आषाढमासि ज्योत्स्नायाः पक्षे चित्रासमागमे । शीतांशोः सप्तमीपूर्वरात्रौ निर्वाणमाप्तवान् ॥ २७४ ॥
उन्होंने छह सौ निन्यानवे वर्ष नौ महीना और चार दिन विहार किया। फिर विहार छोड़कर पांच सौ तैंतीस मुनियोंके साथ एक महीने तक योग निरोधकर आषाढ शुक्ल सप्तमीके दिन चित्रा नक्षत्रमें रात्रिके प्रारम्भमें ही चार अघातिया कर्मोंका नाशकर मोक्ष प्राप्त किया ।। २७२-२७४ ॥
“They wandered (performed Vihara) for six hundred ninety-nine years, nine months, and four days. Then, leaving the Vihara, they practiced Yoga-Nirodha (restraint of all activities) for one month along with five hundred thirty-three sages (Munis). On the seventh day of the bright half of the month of Ashadha (Ashadha Shukla Saptami), under the Chitra constellation (Nakshatra) at the very beginning of the night, they destroyed the four Aghatiya Karmas (non-destructive karmas) and attained liberation (Moksha). || 272-274 ||”
श्लोक ( Shlok ) 275
तदा सुराधिपाः प्राप्य कल्याणं पञ्चमं परम् । विधाय विधिवद्भक्तया स्वं स्वमोकः पुनर्ययुः ॥ २७५॥
उसी समय इन्द्रादि देवोंने आकर बड़ी भक्तिसे विधिपूर्वक उनके पंचम कल्याणका उत्सव किया और तदनन्तर वे सब अपने-अपने स्थानको चले गये ।। २७५ ।।
“At that very moment, Indra and the other deities arrived and, with deep devotion, performatively celebrated their fifth Kalyanaka (auspicious event) according to the prescribed rituals. Thereafter, they all returned to their respective abodes. || 275 ||”
श्लोक ( Shlok ) 276
शक्राद्या व्योम्न्नि दूरादमरपरिवृढा वाहनेभ्योऽवतीर्णा-स्तूर्ण मूर्धावनम्राः स्तुतिमुखरमुखाः कुड्मलीभूतहस्ताः । ध्वस्तान्तर्ध्वान्तधान्नः प्रणिहितमनसो यस्य पादौ प्रणेमुः क्षेमं श्रीमान् स नेमिर्झटिति घटयतु प्रान्तबोधप्रसिद्धये ॥ २७६ ॥
जो दूरसे ही आकाशमें अपनी-अपनी सवारियोंसे नीचे उतर पड़े हैं, जिन्होंने शीघ्र ही अपने मस्तक झुका लिये हैं, जिनके मुख स्तुतियोंके पढ़नेसे शब्दायमान हो रहे हैं, जिन्होंने दोनों हाथ जोड़ लिये हैं और जिनका चित्त अत्यन्त स्थिर है ऐसे इन्द्र आदि श्रेष्ठदेव जिनके चरणों में नमस्कार करते हैं तथा जिन्होंने अपने तेजसे हृदयका समस्त अन्धकार नष्ट कर दिया है ऐसे श्रीमान् नेमिनाथ भगवान् केवलज्ञानकी प्राप्तिके लिए हम सबका शीघ्र ही कल्याण करें ।॥ २७६ ।।
“May the glorious Lord Neminath—at whose feet the supreme celestial beings, including Indra, bow down; who dismounted from their respective vehicles in the sky from afar, swiftly prostrated their heads, filled the air with the resonance of their chanted hymns, folded both their hands in reverence, and attained utter stillness of mind; and who has completely destroyed all darkness of the heart with His divine splendor—swiftly bless us all with well-being for the attainment of Kevalajnana (supreme omniscience). || 276 ||”
श्लोक ( Shlok ) 277
प्राक्चिन्तागतिराबभावनु ततः कल्पे चतुर्थेऽमरो जज्ञेऽस्मादपराजितः क्षितिपतिर्जातोऽच्युतेन्द्रस्तनः । तस्मात्सोऽजनि सुप्रतिष्ठनृपतिर्देवो जयन्तेऽन्वभू-दासीदत्र महोदयो हरिकुलव्योमामलेन्दुजिनः ॥ २७७ ॥
श्रीनेमिनाथ भगवान्का जीव पहले चिन्तागति विद्याधर हुआ, फिर चतुर्थ स्वर्गमें देव हुआ, वहाँ से आकर अपराजित राजा हुआ, फिर अच्युत स्वर्गका इन्द्र हुआ, वहाँ से आकर सुप्रतिष्ठ राजा हुआ, फिर जयन्त विमानमें अहमिन्द्र हुआ और उसके बाद इसी जम्बूद्वीपमें महान् वैभवको धारण करनेवाला, हरिवंशरूपी आकाशका निर्मल चन्द्रमास्वरूप नेमिनाथ तीर्थकर हुआ ।॥ २७७ ॥
“The soul of Lord Shri Neminath first became the Vidyadhara (celestial wizard) named Chintagati; then became a deity in the fourth heaven (Devaloka); returning from there, became King Aparajita; then became the Indra of the Achyuta heaven; returning from there, became King Supratishtha; then became an Ahamindra (supreme deity) in the Jayanta celestial vehicle (Vimana); and after that, was born in this very Jambudvipa as the Tirthankara Neminath—possessing magnificent glory and shining like the pure, spotless moon in the sky of the Harivamsa lineage. || 277 ||”
श्लोक ( Shlok ) 278
म्सा लक्ष्मीः सकलामराचितपदाम्भोजो ययायं विभु-स्तत्कौमारममेयरूपविभवं कन्या च सातिस्तुतिः धीमान्सर्वमिदं जरत्तृणसमं मत्वाग्रहीत्संयमं धशां केन न धर्मचक्रमभितो नेमीश्वरो नेमिताम् ॥ २७८ ॥
यद्यपि भगवान् नेमिनाथकी वह लक्ष्मी थी कि जिसके द्वारा उनके चरणकमलोंकी समस्त देव पूजा करते थे, उनकी वह कुमारावस्था थी कि जिसका सौन्दर्यरूपी ऐश्वर्य अपरिमित था, और वह कन्या राजीमति थी कि जिसकी अत्यन्त स्तुति हो रही थी तथापि इन बुद्धिमान् भगवान् ने इन सबको जीर्ण तृणके समान छोड़कर संयम धारण कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि ऐसा क्या कारण है कि जिससे भगवान् नेमिनाथ धर्मचक्रके चारों ओर नेमिपनाको चक्रधारापनाको धारण न करें ? ॥ २७८ ॥
“Although Lord Neminath possessed such grand opulence (Lakshmi) that all the deities worshipped His lotus feet; although He was in the prime of His youth, endowed with boundless, magnificent beauty; and although He was betrothed to the princess Rajimati, who was being highly praised by all—yet, the wise Lord abandoned all of this like a withered blade of grass and embraced self-restraint (Sanyama).
And this is truly fitting! For what reason is there that Lord Neminath would not embody the nature of a Nemi (the outer rim or wheel-hoop) that encompasses and drives the wheel of righteousness (Dharmachakra)? || 278 ||”
श्लोक ( Shlok ) 279
सुभानुरभवत्ततः प्रथमकल्पजोऽस्माच्च्युतः खगाधिपतिरन्वतोऽजनि चतुर्थकल्पेऽमरः ।वणीडजनि शङ्खवागनु सुरो महाशुक्रज-स्ततोऽपि नवमो बलोऽनु दिविजस्ततस्तीर्थकृत् ॥ २७९ ॥
बलदेवका जीव पहले सुभानु हुआ था, फिर पहले स्वर्गमें देव हुआ, वहाँ से च्युत होकर विद्याधरोंका राजा हुआ, फिर चतुर्थ स्वर्गमें देव हुआ, इसके बाद शङ्ख नामका सेठ हुआ, फिर महाशुक्र स्वर्गमें देव हुआ, फिर नौवाँ बलभद्र हुआ, उसके बाद देव हुआ, और फिर तीर्थकर होगा ॥ २७९ ॥
“The soul of Baladeva first became Subhanu; then became a deity in the first heaven; descending from there, became the king of the Vidyadharas (celestial wizards); then became a deity in the fourth heaven; after that, became a merchant prince named Shankha; then became a deity in the Mahashukra heaven; then became the ninth Balabhadra; after that, became a deity again; and eventually, will become a Tirthankara. || 279 ||”
श्लोक ( Shlok ) 280 – 281
प्रागासीदमृतरसायनस्तृतीये श्वभ्रेऽभूदनु भववारिधौ भ्रमित्वा ।भूयोऽभूद्रहपतिरत्र यक्षनामा निर्नामा नृपतिसुतस्ततोऽमृताशीः ॥ २८० ॥तस्मादभून्मुररिपुः कृतदुनिंदाना-चक्रेश्वरो हतविरुद्धजरादिसन्धः ।धर्मोद्भवादनुभवन् बहुदुःखमस्मा-निर्गत्य तीर्थकृदनर्थविघातकृत्सः ॥ २८१ ॥
कृष्णका जीव पहले अमृतरसायन हुआ, फिर तीसरे नरकमें गया, उसके बाद संसार-सागर में बहुत भारी भ्रमण कर यक्ष नामका गृहस्थ हुआ फिर निर्नामा नामका राजपुत्र हुआ, उसके बाद देव हुआ और उसके पश्चात् बुरा निदान करनेके कारण अपने शत्रु जरासन्धको मारनेवाला, चक्ररत्नका स्वामी कृष्ण नामका नारायण हुआ, इसके बाद प्रथम नरकमें उत्पन्न होनेके कारण बहुत दुःखोंका अनुभव कर रहा है और अन्त में वहाँ से निकलकर समस्त अनर्थोका विघात करनेवाला तीर्थंकर होगा ॥ २८०-२८१ ॥
“The soul of Krishna first became Amritarasayana; then it went to the third hell; after that, wandering extensively through the vast ocean of worldly existence (Samsara), it became a householder named Yaksha; then it became a nameless prince; after that, it became a deity; and subsequently, due to making a flawed/harmful resolution (Nidana), it became the Narayana named Krishna—the master of the divine discus (Chakraratna) and the slayer of his enemy Jarasandha. Following that, having been born in the first hell, it is currently experiencing immense suffering; and finally, emerging from there, it will become a Tirthankara who destroys all worldly afflictions. || 280-281 ||”
श्लोक 282 से 288
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 234 | श्लोक 235 से 248 | श्लोक 249 से 259 | श्लोक 260 से 271
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