शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 232 to 244
श्लोक ( Shlok ) 232
ततो मेघश्थो राज्यमभिषेकपुरस्सरम् । नियोज्याभिषवं देवैः स्वयं चाप्याप संयमम् ॥ २३२ ॥
तदनन्तर भगवान् घनरथने अभिषेक पूर्वक मेघरथके लिए राज्य दिया, देवोंने उनका अभिषेक किया और इस तरह उन्होंने स्वयं संयम धारण कर लिया।। २३२ ।।
“Thereafter, Lord Ghanaratha performed the coronation ritual and handed over the reins of the kingdom to Megharatha, a ceremony in which the deities themselves assisted with the royal anointment. Having done so, he instantly embraced absolute self-restraint (Samyama) and took the vows of a monk.” [232]
श्लोक ( Shlok ) 233 – 234
मनोवाक्कायसंशुद्धिं विदधद्विजितेन्द्रियः । कषायविषम ‘स्वन्तमव मोहं वमन् सुधीः ॥ २३३ ॥उभाद्यश्रेणीं समारुह्य क्रमात्कर्माणि निर्ममः । निर्मूल्य निर्मलं भावमवापावगमस्य सः ॥ २३४ ॥
उन्होंने मन-वचन कायको शुद्ध बना लिया था, इन्द्रियोंको जीत लिया था, जिसका फल अच्छा नहीं ऐसे नीच कहे जानेवाले कषाय रूपी विषको उगल दिया था, उत्तम बुद्धि प्राप्त की थी, सब ममता छोड़ दी थी, क्षपकश्रेणीपर चढ़कर क्रम-क्रमसे सब कर्मोंको उखाड़ कर दूर कर दिया था और केवलज्ञान प्राप्त करनेके योग्य निर्मल भाव प्राप्त किये थे ॥ २३३-२३४ ॥
“He had completely purified his mind, speech, and body (Tri-gupti), and had utterly conquered his senses. He had expelled the toxic poison of the passions (Kashayas)—which are deemed base due to their calamitous fruits—and had attained the highest, unshakeable wisdom. Having completely cast off all worldly attachments and possessiveness (Mamata), he ascended the ladder of spiritual annihilation (Kshapaka-shreni), systematically uprooting and destroying every single karma, thereby achieving that pristine, flawless state of consciousness worthy of attaining infinite, supreme omniscience (Kevalajnana).” [233-234]
श्लोक ( Shlok ) 235
तदा कैवल्यसम्प्राप्ति प्रभावात्कम्पितासनाः । निलिम्पाः सर्वसम्पत्त्या पत्युः पूजामकुर्वत ॥ २३५ ॥
उस समय भगवान्-को केवलज्ञान प्राप्त होनेसे देवोंके आसन कम्पित हो गये। उन्होंने आकर सर्व वैभवके साथ उनकी पूजा की ।। २३५ ।।
“At that very instant, as the Lord attained supreme omniscience (Kevalajnana), the thrones of the celestial deities shook across the heavens. Hurrying down to Earth, they worshiped Him with boundless splendor and unparalleled devotion.” [235]
श्लोक ( Shlok ) 236
स देवरमणोद्याने समं मेघरथोऽन्यदा । स्वदेवीभिविहृत्यास्थाच्चन्द्रकान्तशिलातले ॥ २३६॥
किसी एक समय राजा मेघरथ अपनी रानियोंके साथ विहारकर देवरमण नामक उद्यानमें चन्द्रकान्त मणिके शिलातलपर बैठ गया ।। २३६ ॥
“On one occasion, while strolling in the company of his queens, King Megharatha sat down upon a pristine slab of moonstone (Chandrakanta-mani) within the exquisite confines of the Devaramana garden.” [236]
श्लोक ( Shlok ) 237
निविष्टं तं समाक्रम्य गच्छन्कश्चिन्नभश्चरः । गण्डोपल इव व्योम्नि सरुद्धसुविमानकः ॥२३७॥
उसी समय उसके ऊपरसे कोई विद्याधर जा रहा था। उसका विमान आकाशमें ऐसा रुक गया जैसा कि मानो किसी बड़ी चट्टानमें अटक गया हो ।। २३७ ॥
“At that very moment, a Vidyadhara (a celestial being with mystical powers of flight) was traveling through the skies high above him. Suddenly, his aerial chariot (Vimana) came to a complete halt in mid-air, as if it had struck an invisible, massive rock.” [237]
श्लोक ( Shlok ) 238
शिलां रुष्ट्वा नृपारूढामुत्थापयितुमुद्यतः । नृपाङ्गुष्ठाग्रनिर्भुग्नशिलाभारप्रपीडितः ॥२३८॥
विमान रुक जानेसे वह बहुत ही कुपित हुआ। राजा मेघरथ जिस शिलापर बैठे थे वह उसे उठानेके लिए उद्यत हुआ परन्तु राजा मेघरथने अपने पैरके अंगूठासे उस शिलाको दबा दिया जिससे वह शिलाके भारसे बहुत ही पीड़ित हुआ ।। २३८ ॥
“Enraged by the sudden halting of his aerial chariot, the Vidyadhara prepared to lift and hurl the very stone slab upon which King Megharatha was seated. However, King Megharatha merely pressed down on the slab with the big toe of his foot, instantly crushing the Vidyadhara under its immense weight and causing him agonizing pain.” [238]
श्लोक ( Shlok ) 239 – 240
तत्सोढुमक्षमो गाढमाक्रन्दाकरुणस्वनम् । तदा तत्खचरी प्राप्य नाथानाथाऽस्मि नाथ्यसे ॥ २३९॥पतिभिक्षां ददस्वेति ‘प्राह प्रोत्थापितक्रमः । किमेतदिति भूनाथ संस्पृष्टः प्रियमित्रया ॥२४०॥
जब वह शिलाका भार सहन करनेमें असमर्थ हो गया तब करुण शब्द करता हुआ चिल्लाने लगा। यह देख, उसकी स्त्री विद्याधरी आई और कहने लगी कि हे नाथ! मैं अनाथ हुई जाती हूं, मैं याचना करती हूं, मुझे पति-भिक्षा दीजिये । ऐसी प्रार्थना की जानेपर मेघरथने अपना पैर ऊपर उठा लिया। यह सब देख प्रियमित्राने राजा मेघरथसे पूछा कि हे नाथ! यह सब क्या है ? ॥ २३९-२४० ॥
“When he found himself utterly unable to bear the crushing weight of the stone slab, the Vidyadhara began to wail and cry out in agonizing pain. Seeing his plight, his wife, the Vidyadhari, rushed to the scene and pleaded, ‘O Master! I am on the verge of being left unprotected and destitute. I beg of you—grant me the alms of my husband’s life!’ Upon hearing her desperate prayer, King Megharatha gently lifted his foot. Witnessing this entire astonishing sequence, Queen Priyamitra turned to King Megharatha and asked, ‘O My Lord! What is the meaning of all this?'” [239-240]
श्लोक ( Shlok ) 241 – 244
विजयालिकाख्येशो विद्युद्दष्ट्रखगाधिपः । प्राणेशाऽनिलवेगाऽस्य सुतः सिंहरथस्तयोः ॥२४१॥ अभिवन्द्य जिनाधीशमायन्नमितवाहनः । ममोपरि विमाने स्वे रुद्धे नायाति केनचित् ॥ २४२॥दिशो विलोक्य मां दृष्ट्वा स्वदर्पात् कोपवेपितः । अस्मान् शिलातलेनामा प्रोत्थापयितुमुद्यमी ॥ पीडितोऽयं मदङ्गुष्ठेनैषाप्यस्य मनोरमा । इत्यब्रवीत्तदाकर्ण्य किं कोपस्यास्य कारणम् ॥२४४॥
यह सुन राजा मेघरथ कहने लगा कि विजयार्धपर्वतपर अलका नगरीका राजा विद्युदंष्ट्र विद्याधर है। अनिलवेगा उसकी स्त्रीका नाम है। यह उन दोनोंका सिंहरथ नामका पुत्र है। यह जिनेन्द्र भगवान्की वन्दनाकर अमित नामक विमानमें बैठा हुआ आ रहा था कि इसका विमान किसी कारणसे मेरे ऊपर रुक गया, आगे नहीं जा सका। जब उसने सब दिशाओंकी ओर देखा तो मैं दिख पड़ा। मुझे देख अहंकारके कारण उनका शरीर क्रोधसे काँपने लगा। वह शिलातलके साथ हम सब लोगोंको उठानेके लिए उद्यम करने लगा। मैंने पैरका अँगूठा दबा दिया जिससे यह पीड़ित हो उठा। यह उसकी मनोरमा नामकी स्त्री है। राजा मेघरथने यह कहा। इसे सुनकर प्रियमित्रा रानीने फिर पूछा कि इसके इस क्रोधकाकारण क्या है ।। २४१-२४४ ॥
“Hearing her question, King Megharatha replied: ‘On the southern ridge of Mount Vijayardha lies the magnificent city of Alaka, ruled by the Vidyadhara king Vidyuddanshtra and his queen Anilavega. This is their son, named Singharatha. He was returning after offering his deepest adorations to Lord Jinendra, riding high in his aerial chariot named Amita, when for some cosmic reason, his craft came to an absolute halt directly above me and could move no further. Looking in all directions to find the obstacle, his eyes fell upon me. Upon seeing me, his body began to shake with violent rage, driven by pure arrogance. He desperately attempted to lift this entire stone slab along with all of us seated upon it. Consequently, I merely pressed down with my big toe, which left him utterly crushed and suffering. This woman pleading for him is his queen, Manorama.’ Thus explained King Megharatha. Hearing this entire account, Queen Priyamitra asked once more: ‘But my Lord, what is the root cause behind his sudden, intense fury toward you?'” [241-244]
श्लोक 245 से 254
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