शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 394 से 404 | श्लोक 405 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 442 to 451
श्लोक ( Shlok ) 442
कूर्मपृष्ठौ क्रमौ तस्य श्रित्वा तौ सुस्थिता धरा । टता कूर्मेण धात्रीति ध्रुवं रुढिस्ततोऽभवत् ॥४४२॥
उनके दोनों चरणोंका पृष्ठभाग कछुए के समान था और यह पृथिवी उन्हींका आश्रय पा कर निराकुल थी। जान पड़ता है कि ‘पृथिवी कछुए के द्वारा धारण की गई है, यह रूढि उसी समयसे प्रचलित हुई है ॥ ४४२ ॥
“The upper surface of both His feet resembled the back of a tortoise, and it was only by finding refuge in them that this Earth remained completely stable and untroubled. It appears as though the popular belief that ‘the Earth is supported by a tortoise’ became widespread from that very moment.”442
श्लोक ( Shlok ) 443
पीनावग्रोन्नतौ सुस्थौ तस्यांगुष्ठौ सुखाकरौ । रेजतुर्दर्शयन्तौ वा मार्ग स्वर्गापवर्गयोः ॥ ४४३ ॥
उनके दोनों अंगूठे स्थूल थे, आगेको उठे हुए थे, अच्छी तरह स्थित थे, सुखकी खान थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो स्वर्ग तथा मोक्षका मार्ग ही दिखला रहे हों ।॥ ४४३ ॥
“Both His big toes were stout, upraised at the front, perfectly positioned, and reservoirs of bliss. They appeared as if they were pointing out the direct path to heaven and liberation (Moksha).”443
श्लोक ( Shlok ) 444
अष्टावंगुलयस्तस्य बभुः श्लिष्टाः परस्परम् । कर्माण्यष्टावपह्नोतुं निर्गता एव शक्तयः ॥ ४४४ ॥
परस्परमें एक दूसरेसे सटी हुई उनकी आठों अँगुलियाँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो आठों कर्मोंका अपह्नव करनेके लिए आठ शक्तियाँ ही प्रकट हुई हों ।। ४४४ ॥
“His eight toes, closely set and aligned with one another, appeared as if they were eight divine energies (shaktis) manifested for the express purpose of destroying the eight types of karmas.”444
श्लोक ( Shlok ) 445
दशधर्माः पुरेवैनं तद्व्याजेनेव सेवितुम् । क्रमौ समाश्रितास्तस्य व्यराजन्त नखाः सुखाः ॥ ४४५ ॥
उनके चरणोंका आश्रय लेनेवाले सुखकारी दश नख ऐसे सुशोभित होते थे मानो उन नखोंके बहाने उत्तम क्षमा आदि दशधर्म उनकी सेवा करनेके लिए पहलेसे ही आ गये हों ।। ४४५ ।।
“His ten blissful toenails, finding refuge at His feet, looked exceedingly beautiful, appearing as if the ten virtues (Dashadharma)—such as supreme forgiveness (Uttama Kshama)—had already arrived beforehand under the guise of those nails to serve Him.”445
श्लोक ( Shlok ) 446
अस्यावयवभावात्ते वासवाद्या नमन्ति नौ । इतीव रागिणौ तस्य पादौ पल्लवसन्निभौ ॥ ४४६ ॥
हम भगवान्के शरीरके अवयव हैं इसीलिए इन्द्र आदि देव हम दोनोंको नमस्कारकरते हैं यह सोचकर ही मानो नवीन पत्तोंके समान उनके दोनों पैर रागी – रागसहित अथवा लालरंगके हो रहे थे ॥ ४४६ ॥
“Thinking, ‘We are the limbs of the Lord’s own body, and that is precisely why the Indras and other gods bow down to us,’ His two feet, resembling tender new leaves, had turned deeply crimson (ragi—possessing a red hue / filled with attachment).”446
श्लोक ( Shlok ) 447
नामृतांशोर्निशासङ्गादुष्णत्वाद्भास्करस्य च । तेजस्तस्योपमानं स्याद् ‘भूषणक्ष्माजतेजसः ॥४४७॥
चन्द्रमा के साथ रात्रिका समागम रहता है और सूर्य उष्ण है अतः ये दोनों ही उनके तेजकी उपमा नहीं हो सकते। हाँ, इतना कहा जा सकता है कि उनका तेज भूषणांग जातिके कल्पवृक्षके तेजके समान था ॥ ४४७ ॥
“The moon is coupled with the night, and the sun is fiercely hot; therefore, neither of the two can serve as an appropriate comparison for His brilliance. At most, it can be said that His splendor was like the radiance of the Bhushanamga celestial wish-fulfilling tree (Kalpavriksha).”447
श्लोक ( Shlok ) 448
कान्तेः का वर्णना तस्य यदि शक्रः सहस्त्रदृक् । शचीवदनपङ्केजविमुखस्तं निरीक्षते ॥ ४४८ ॥
जब कि हजार नेत्रवाला इन्द्र इन्द्राणीके मुखकमलसे विमुख होकर उनकी ओर देखता रहता है तब उनकी कान्तिका क्या वर्णन किया जावे ? ॥ ४४८ ॥
“When even the thousand-eyed Indra, turning his gaze away from the lotus-like face of Indrani, remains completely captivated looking at Him, how can the beauty of His radiance ever be fully described?” 448
श्लोक ( Shlok ) 449
भूषणानां कुलं लेभे शोभां तस्याङ्गसङ्गमात् । महामणिनिबद्धेद्धसुधौतकलधौतवत् ॥ ४४९ ॥
जिस प्रकार महामणियोंसे निबद्ध देदीप्यमान उज्वल सुवर्ण सुशोभित होता है उसी प्रकार उनके शरीरके समागमसे आभूषणोंका समूह सुशोभित होता था ।। ४४९ ॥
“Just as radiant and bright gold, embedded with magnificent precious gems, shines resplendently, in the same manner, the array of ornaments looked exceedingly beautiful by coming into contact with His body.”449
श्लोक ( Shlok ) 450
स्वनामश्रुतिसंशुष्यन्मदारिकरिसंहतेः । खोऽराजत राजेशो राजकण्ठीरवस्य वा ॥ ४५० ॥
अपने नामके सुनने मात्रसे ही जिन्होंने शत्रुरूपी हाथियोंके समूहका मद सुखा दिया है ऐसे राजाधिराज भगवान् शान्तिनाथका शब्द सिंहके शब्दके समान सुशोभित होता था ।॥ ४५० ॥
“The voice of the King of Kings, Lord Shantinath—who, by the mere utterance of His name, dried up the rut of the elephants in the form of His enemies—sounded as majestic and commanding as the roar of a lion.”450
श्लोक ( Shlok ) 451
कीर्तिवल्ली जगत्प्रान्तं प्राप्य प्रागेव जन्मनः । तदीयालम्बनाभावादिव तावति सुस्थिता ॥ ४५१ ॥
उनकी कीर्तिरूपी लता जन्मसे पहले ही लोकके अन्त तक पहुँच चुकी थी परन्तु उसके आगे आलम्बन न मिलने से वह वहीं पर स्थित रह गई ॥ ४५१ ॥
“The creeper of His fame had already reached the very edge of the universe even before His birth; however, finding no further support or realm to extend into beyond that point, it remained stationed right there.” 451
श्लोक 452 से 462
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 254 | श्लोक 255 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 361 | श्लोक 362 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 393 | श्लोक 394 से 404 | श्लोक 405 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |