पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 44 to 53
श्लोक ( Shlok ) 44 – 46
स्वस्य स्वामिहिताख्यस्य ‘महतो मन्त्रिणोऽन्यदा । “वाचा ३ वसन्तमासस्य नन्दीश्वरदिनाष्टके ॥४४॥पूजां निर्वर्त्तयन्द्रष्टुकामं तत्र समागतम् । विपुलादिमतिं दृष्ट्वा गणेशं प्रश्रयाश्रयः ॥ ४५ ॥ अभिवन्द्य समाकर्ण्य सद्धर्मं सर्वशर्मदम् । भगवन् किञ्चिदिच्छामि श्रोतुं मे संशयास्पदम् ॥ ४६ ॥
किसी एक दिन उसने अपने स्वामिहित नामक महामन्त्री के कहनेसे वसन्तऋतुकी अष्टाहिकाओंमें पूजा कराई । उसे देखनेके लिए वहाँ पर विपुलमति नामके मुनिराज पधारे। आनन्दने उनकी बड़ी विनयसे वन्दना की तथा उनसे सब जीवोंको सुख देनेवाला समीचीन धर्मका स्वरूप सुना और तदनन्तर कहा कि हे भगवन् ! मुझे कुछ संशय हो रहा है उसे आपसे सुनना चाहता हूँ ।। ४४-४६ ।।
“One day, at the request of his prime minister named Svāmihita, he had a special worship (Pūjā) performed during the Aṣṭānhikā festival of the spring season. To witness it, a sage named Vipulamati arrived there. Ānanda bowed to him with great reverence and devotion, and listened to the true nature of Dharma, which brings happiness to all living beings. Thereafter, he said, ‘O Lord! I have some doubts, and I wish to hear the answers from you.’ (44-46)”
श्लोक ( Shlok ) 47
अचेतने कथं पूजा निग्रहानुग्रहच्युते । जिनबिम्बे कृता भक्तिमतां पुण्यं फलत्यसौ ॥ ४७ ॥
उसने पूछा कि जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमा तो अचेतन है उसमें भला बुरा करनेकी शक्ति नहीं है फिर उसकी की हुई पूजा भक्तजनोंको पुण्य रूप फल किस प्रकार प्रदान करती है ॥ ४७ ॥
“He asked, ‘The idol of Lord Jinendra is inanimate (unconscious) and possesses no power to do good or harm. How then does the worship offered to it grant the fruit of merit (Punya) to the devotees?’ (47)”
श्लोक ( Shlok ) 48 – 53
इत्यपृच्छदसौ चाह सहेत्विति वचस्तदा । शृणु राजन् जिनेन्द्रस्य चैत्यं चैत्यालयादि४ च ॥ ४८ ॥’भवत्यचेतनं किन्तु भव्यानां पुण्यबन्धने । परिणामसमुत्पत्तिहेतुत्वात्कारणं भवेत् ॥ ४९ ॥रागादिदोषहीनत्वादायुधाभरणादिकात् । “विमुखस्य प्रसन्नेन्दुकान्तिहासिमुखश्रियः ॥ ५० ॥अवर्तिताक्षसूत्रस्य लोकालोकावलोकिनः । कृतार्थत्वात्परित्यक्तजटादेः परमात्मनः ॥ ५१ ॥जिनेन्द्रस्यालयाँस्तस्य प्रतिमाश्च प्रपश्यताम् । भवेच्छुभाभिसन्धानप्रकर्षो नान्यतस्तथा ॥ ५२ ॥कारणद्वयसान्निध्यात्सर्वकार्यसमुद्भवः । तस्मात्तत्साधु विज्ञेयं पुण्यकारणकारणम् ॥ ५३ ॥
इसके उत्तरमें मुनिराजने हेतु सहित निम्न प्रकार वचन कहे कि हे राजन् ! सुन, यद्यपि जिनेन्द्र भगवान् की प्रतिमा और जिनेन्द्र मन्दिर अचेतन हैं तथापि भव्य जीवोंके पुण्य-बन्धके ही कारण हैं। यथार्थमें पुण्य बन्ध परिणामोंसे होता है और उन परिणामोंकी उत्पत्तिमें जिनेन्द्रकी प्रतिमा तथा मन्दिर कारण पड़ते हैं। जिनेन्द्र भगवान् रागादि दोषोंसे रहित हैं, शास्त्र तथा आभूषण आदिसे विमुख हैं, उसके मुखकी शोभा प्रसन्न चन्द्रमाके समान निर्मल है, लोक अलोकके जाननेवाले हैं, कृतकृत्य हैं, जटा आदिसे रहित हैं तथा परमात्मा हैं इसलिए उनके मन्दिरों और उनकी प्रतिमाओंका दर्शन करने-वाले लोगोंके शुभ परिणामोंमें जैसी प्रकर्षता होती है वैसी अन्य कारणोंसे नहीं हो सकती क्योंकि समस्त कार्योंकी उत्पत्ति अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग दोनों कारणोंसे होती है इसलिए जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमा पुण्यबन्धके कारणभूत शुभ परिणामोंका कारण है यह बात अच्छी तरह जान लेनेके योग्य है ॥ ४८-५३ ।।
In response, the Sage spoke the following words with logical reasoning: “O King, listen! Although the idol of Lord Jinendra and the Jinendra temple are inanimate, they are still the direct cause of binding meritorious karma (Punya-bandha) for capable souls (Bhavya Jivas).
In reality, the binding of merit happens through one’s inner thoughts and intentions (Parinamas), and the idol and temple of Jinendra serve as the catalyst for generating those pure intentions.
Lord Jinendra is completely free from attachments, aversion, and other flaws; He is detached from worldly scriptures and ornaments; the grace of His face is as pure and serene as the pleasing moon; He is the knower of both the universe and the beyond (Loka and Aloka); He has accomplished all that was to be achieved; He is free from matted hair or external ascetical displays, and He is the Supreme Soul (Paramatma). Therefore, the intense purity and excellence that arises in the auspicious thoughts of people who behold His temples and His idols cannot be produced by any other means.
Because the manifestation of any effect requires both internal (the soul’s disposition) and external (the idol/temple) causes, it is well worth understanding that the idol of Lord Jinendra is the fundamental cause of the auspicious intentions that lead to the accumulation of merit.” (48-53)
श्लोक 54 से 66
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पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43
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