राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 463 to 472
श्लोक ( Shlok ) 463
पुनस्तयोरभूद् युद्धं बलयोः काललीलयोः । प्रलये वान्तकस्तत्र प्रायस्तृप्तिमुपेयिवान् ॥ ४६३ ॥
कालके समान लीला करनेवाली दोनों सेनाओंमें फिरसे भयंकर युद्ध होने लगा और काल उस युद्धमें प्रलयके समान प्रायः तृप्त हो गया ॥ ४६३ ॥
“A fierce battle broke out once again between the two armies, both dealing actions like Death itself, and Time (Kala) was well-nigh satiated in that conflict, just as it is during the cosmic dissolution (Pralaya).” [463]
श्लोक ( Shlok ) 464
आकर्णाकृष्टनिर्मुक्तनिशातसितपत्रिणा । लक्ष्मणेन शिरोऽग्राहि तालं वा बालिनः फलम् ॥ ४६४ ॥
अन्तमें लक्ष्मणने कान तक खींच कर छोड़े हुए तीक्ष्ण सफेद वाणसे ताल वृक्षके फलके समान बालि का शिर काट डाला ॥ ४६४ ॥
“In the end, drawing his sharp, white arrow all the way back to his ear, Lakshmana released it and severed Bali’s head, which fell like the fruit of a palmyra (Tal) tree.” [464]
श्लोक ( Shlok ) 465
सदा स्वस्थानमापन्नौ सुग्रीवानिलनन्दनौ । सद्यः फलति संसेवा प्रायेण प्रभुमाश्रिता ॥ ४६५॥
उसी समय सुग्रीव और अणुमान्को अपना स्थान मिल गया सो ठीक ही है क्योंकि अच्छी तरह की हुई प्रभुकी सेवा प्रायः शीघ्र ही फल देती है ।। ४६५ ।।
“At that very moment, Sugriva and Anuman (Hanuman) regained their rightful positions, which is only fitting; for service rendered to one’s lord with utter devotion almost always yields its fruit swiftly.” [465]
श्लोक ( Shlok ) 466 – 467
ततः सर्वेऽगमन् रामस्वामिनं सोऽप्यनीयत । स्वस्थानं सबलो भक्त्या सुग्रीवेण सहानुजः ॥ ४६६ ॥ विभोर्मनाहेरोद्याने किष्किन्धे शरदागमे । बलं चतुर्दशाक्षौहिणीप्रमं भूभृतामभूत् ॥ ४६७ ॥
तदनन्तर सब लोग राजा रामचन्द्रके पास गये । सुग्रीव, रामचन्द्रको लक्ष्मण और सब सेनाके साथ-साथ बड़ी भक्तिसे अपने नगरमें ले आया और किष्किन्धा नगरके मनोहर उद्यानमें उन्हें ठहरा दिया। उस समय शरद् ऋतु आ गई थी और रामचन्द्र के साथ राजाओंकी चौदह अक्षौहिणी प्रमाण सेना इकट्ठी हो गई थी ।। ४६६-४६७ ।।
“Thereafter, everyone approached King Ramachandra. With deep devotion, Sugriva escorted Ramachandra, along with Lakshmana and the entire army, into his city and lodged them in the charming garden of Kishkindha city. By that time, the autumn season (Sharad Ritu) had arrived, and an army of kings measuring fourteen Akshauhinis had assembled alongside Ramachandra.” [466-467]
श्लोक ( Shlok ) 468 – 472
लक्ष्मणश्च जगत्पादगिरौ निरशनस्तदा । सप्ताहं शिवघोषाख्यमोक्षस्थाने कृतार्चनः ॥ ४६८ ॥ प्रज्ञप्तिं साधयामास भटाष्टशतरक्षितः । सुग्रीवोऽपि महाविद्याः पूजयामास ‘सुव्रतः ॥ ४६९ ॥ सोपवासो गिरौ सम्मेदाख्ये सिद्धशिलातले । तथान्येऽपि स्वविद्यानां खगाः पूजामकुर्वत ॥ ४७० ॥ एवं भूखेश्वराधीशं बलं चलितकेतनम् । रामलक्ष्मणसुग्रीवमरुन्नन्दननायकम् ॥ ४७१ ॥ करीन्द्रमकराकीर्णं तुरङ्गमतरङ्गकम् । प्रलयाम्भोधिसङ्काशं लङ्कां प्रति चचाल तत् ॥ ४७२ ॥
जहाँ से शिवघोष मुनिने मोक्ष प्राप्त किया था ऐसे जगत्पाद नामक पर्वत पर जाकर लक्ष्मणने सात दिन तक निराहार रहकर पूजा की और प्रज्ञप्ति नामकी विद्या सिद्ध की। विद्या सिद्ध करते समय एक सौ आठ योद्धाओंने उसकी रक्षा की थी। इसी प्रकार सुग्रीवने भी उस समय उत्तम व्रत और उपवास धारण कर सम्मेदाचल पर सिद्धशिलाके ऊपर महाविद्याओंकी पूजा की। इनके सिवाय अन्य विद्याधरोंने भी अपनी अपनी विद्याओंकी पूजा की। इस प्रकार जिसमें ध्वजाएँ फहरा रही हैं, राम, लक्ष्मण, सुग्रीव और अणुमान् जिसमें प्रधान हैं, जो बड़े बड़े हाथीरूपी मगरमच्छोंसे व्याप्त है, और घोड़े ही जिसमें बड़ी-बड़ी तरंगे हैं ऐसे प्रलयकालके समुद्रके समान वह भूमिगोचरी तथा विद्याधर राजाओंकी सेना लङ्काके लिए रवाना हुई ।। ४६८-४७२ ॥
“Going to the mountain named Jagatpada, from where the sage Shivaghosh had attained salvation (Moksha), Lakshmana fasted for seven days without food and, performing worship, mastered the mystical knowledge known as Prajnapti. While he was mastering this knowledge, one hundred and eight warriors guarded him.
Similarly, at that time, Sugriva also observed excellent vows and fasts, and worshipped the great mystical lores upon the Siddhashila of Mount Sammedachal. Aside from them, the other Vidyadharas also worshipped their respective mystical sciences.
In this manner, with flags fluttering high, and with Rama, Lakshmana, Sugriva, and Anuman (Hanuman) at its forefront, that army of earth-dwelling (Bhumigochari) and Vidyadhara kings—teeming with grand elephants that resembled crocodiles, and horses that surged like massive waves—departed for Lanka like the ocean at the time of cosmic dissolution.” [468-472]
श्लोक 473 से 484
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462
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