पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 25 to 32
श्लोक ( Shlok ) 25 – 28
तत्र भोगान्यथायोग्यं भुक्त्वा प्रान्ते ततश्च्युतः । द्वीपेऽस्मिन् प्राग्विदेहेऽस्ति विषयः पुष्कलावती ॥ २५॥॥तत्खेचराचले राजा त्रिलोकोत्तमननामनि । पुरे विद्युङ्गतिविद्याधरेशस्तस्य वल्लभा ॥ २६ ॥विद्यन्माला तयोः सूनू रश्मिवेगाख्यया’ जनि । सम्पूर्णयौवनो धीमान्प्रत्यासन्नभवावधिः ॥ २७ ॥समाधिगुप्तमासाद्य मुनिं सम्प्राप्य संयमम् । गृहीतसर्वतोभद्रप्रभृत्युप्रोपवासकः ॥ २८ ॥
यथायोग्य रीतिसे वहाँ के भोग भोग कर वह आयुके अन्तमें वहाँ से च्युत हुआ और इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें जो पुष्कलावती देश है उसकेविजयार्ध पर्वत पर विद्यमान त्रिलोकोत्तम नामक नगर में वहाँ के राजा विद्युद्ङ्गति और रानी विद्य न्माला के रश्मिवेग नामका पुत्र हुआ। जिसके संसारकी अवधि अध्यन्त निकट रह गई है ऐसे उस बुद्धिमान् रश्मिवेगने सम्पूर्ण यौवन पाकर समाधिगुप्त मुनिराजके समीप दीक्षा धारण कर ली तथा सेर्वतोभद्र आदि श्रेष्ठ उपवास धारण किये ।। २५-२८ ॥
After experiencing the celestial pleasures of that realm in a highly righteous and balanced manner, he descended from heaven at the completion of his lifespan. He was then reborn in this very Jambudvipa, within the Pushkalavati country of the eastern Videha Kshetra (region). On the Vijayardha mountain of that land, in a magnificent city named Trilokottama, he was born as a prince named Rashmiveg to King Vidyudgati and Queen Vidyunmala.
As a highly intelligent youth whose cycle of worldly wanderings (Samsara) was drawing very close to its final end, Rashmiveg, upon reaching full maturity, renounced the world. He embraced ascetic initiation (Deeksha) under the holy sage Samadhigupta and undertook supreme ritual fasts, such as the Sarvatobhadra. || 25-28 ||
श्लोक ( Shlok ) 29 – 32
परेद्युहिंमगिर्यद्विगुहायां योगमादधत् । प्राप्तधूमप्र भादुः खकुक्कुटोरगपापिना ॥ २९ ॥ततश्च्युतेन भूत्वाजगरेणालोक्य कोपिना । निगीर्णोऽच्युतकल्पस्थे विमाने पुष्करेऽभवत् ॥ ३० ॥द्वाविंशत्यब्धिमानायुस्तदन्ते पुण्यसारथिः । द्वीपेऽपरे विदेहेऽस्मिन् विषये पद्मसञ्ज्ञके ॥ ३१ ॥महीशोऽश्वपुराधीशो वज्रवीर्यस्य भूपतेः । विजयायाश्च तद्देव्या वज्रनाभिः सुतोऽभवत् ॥ ३२ ॥
किसी एक दिन वह हिमगिरि पर्वतकी गुहा में योग धारण कर विराजमान था कि इतनेमें जिस कुक्कुट सर्पने वज्रधोष हाथी को काटा था वही पापी धूमप्रभा नरकके दुःख भोग कर निकला और वहीं पर अजगर हुआ था। उन मुनिराजको देखते ही अजगर क्रोधित हुआ और उन्हें निगल गया जिससे उनका जीव अच्युत स्वर्ग के पुष्कर विमानमें बाईस सागरकी आयुवाला देव हुआ। वहाँकी आयु समाप्त होने पर वह पुण्यात्मा, जम्बूद्वीप के पश्चिम विदेह क्षेत्रमें पद्मनामक देश सम्बन्धी अश्वपुर नगर में वहाँ के राजा वज्रवीर्य और रानी विजयाके वज्रनाभि नामका पुत्र हुआ ॥ २९-३२ ।।
One day, while the holy sage [Rashmiveg] sat in deep meditation inside a cave of the Himgiri mountain, the very same sinful soul that had previously bitten the elephant Vajraghosh—having endured the excruciating agonies of the Dhumaprabha hell—emerged and was reborn in that very place as a colossal python. The moment the python caught sight of the Muni, it was consumed by blind rage and swallowed him whole. Consequently, the Muni’s soul ascended to the Achyuta Heaven (the twelfth heaven), becoming a celestial being (Deva) in the Pushkara divine aircraft with a lifespan of twenty-two Sagaras.
Upon the completion of his heavenly lifespan, that highly meritorious soul (Punyatma) descended and was reborn in the Ashvapur city of the Padma country, located in the western Videha Kshetra of Jambudvipa. There, he was born as a prince named Vajranabhi to King Vajraverya and Queen Vijaya. || 29-32 ||
श्लोक 33 से 43
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 234 | श्लोक 235 से 248 | श्लोक 249 से 259 | श्लोक 260 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 288
पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |