शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . english translation of Uttar Puran parv 63- shlok 122 to 132
श्लोक ( Shlok ) 122
तं त्रिः परीत्य वन्दित्वा ततस्तत्त्वं प्रबुद्धवान् । मनोरजः समुद्भूय शुद्धिं बुद्धेरुपासदत् ॥ १२२॥
उसने उनकी तीन प्रदक्षिणाएं दीं, वन्दना की, उनसे तत्त्वज्ञान प्राप्त किया और अपने मनकी धूलि उड़ाकर बुद्धिको शुद्ध किया ।। १२२ ।।
He circumambulated the sage three times, offered his respectful salutations, and received the knowledge of ultimate truth (Tattvajnana) from him; thus, blowing away the dust of his mind, he purified his intellect. || 122 ||
श्लोक ( Shlok ) 123
तदानीमेव तं दीक्षालक्ष्मीश्च स्ववशं व्यधात् । शम्फलीव वसन्तश्रीरजायत तपःश्रियः ॥ १२३॥
उसी समय दीक्षा-लक्ष्मीने उसे अपने वश कर लिया अर्थात उसने दीक्षा धारण कर ली इसलिए कहना पड़ता है कि वसन्त-लक्ष्मी मानो तपोलक्ष्मीकी दूती ही थी। भावार्थ – जिसप्रकार दूती, पुरुषका स्त्रीके साथ समागमकरा देती है उसी प्रकार वसन्तलक्ष्मीने राजा कनकशान्तिका तपोलक्ष्मीके साथ समागम करा दिया था ।। १२३ ।।
At that very moment, the Goddess of Initiation (Diksha-Lakshmi) won him over—meaning he accepted the vows of ascetic life; therefore, it must be said that the Goddess of Spring (Vasanta-Lakshmi) acted, as it were, as a messenger for the Goddess of Penance (Tapo-Lakshmi).
Purport: Just as a female messenger brings about the union of a man and a woman, in the same manner, the beauty of the spring season (Vasanta-Lakshmi) brought about the union of King Kanakashanti with the spirit of penance (Tapo-Lakshmi). || 123 ||
श्लोक ( Shlok ) 124
देव्यौ विमलमत्याख्यगणिनीं ते समाश्रिते । अदीक्षेतां सहैतेन युक्तं तत्कुरूयोषिताम् ॥ १२४॥
इसीके साथ इसकी दोनों स्त्रियोंने भी विमलमती आर्यिका के पास जाकर दीक्षा धारण कर ली सो ठीक ही है क्योंकि कुलीन स्त्रियोंको ऐसा करना उचित ही है ।। १२४ ॥
Along with him, his two wives also went to the revered Aryika (Jain nun) Vimalamati and accepted the vows of initiation. This was indeed appropriate, for such conduct is only fitting for women of noble birth. || 124 ||
श्लोक ( Shlok ) 125 – 126
सिद्धाचले कदाचित्तं प्रतिमायोगधारिणम् । खगो वसन्तसेनाया बद्धवैरेण मैथुनः ॥१२५॥विलोक्य चित्रचूलाख्यः कोपारुणितवीक्षणः । प्रारिप्सुरुपसर्गाय तर्जितः खेचरेश्वरैः ॥१२६॥
किसी समय कनकशान्ति मुनिराज सिद्धाचलपर प्रतिमायोगसे विराजमान थे वहीं पर उनकी स्त्री वसन्त-सेनाका भाई चित्रचूल नामका विद्याधर आया। पूर्वजन्मके बंधे हुए बैरके कारण उसकी आँखे क्रोधसे लाल हो गई। वह उपसर्ग प्रारम्भ करना ही चाहता था कि विद्याधरोंके अधिपतिने ललकार कर उसे भगा दिया ।। १२५-१२६ ।।
Once, while the revered sage Kanakashanti was seated on Mount Siddhachala in the Pratima-yoga (a meditative posture of absolute stillness), a Vidyadhara named Chitrachula, who was the brother of his wife Vasantasena, arrived there. Due to the deep-seated enmity from a past life, his eyes turned red with rage. He was just about to initiate an assault (upasarga—inflicting hardships on a meditating ascetic) when the lord of the Vidyadharas challenged him with a roar and chased him away. || 125-126 ||
श्लोक ( Shlok ) 127
अन्यदा रत्नसेनाख्यो नृपो रत्नपुराधिपः । दत्त्वाऽऽप पञ्चकाश्चर्य भिक्षां कनकशान्तये ॥१२७॥
किसी एक दिन रत्नपुरके राजा रत्नसेनने मुनिराज कनकशान्तिके लिए आहार देकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥ १२७ ॥
One day, King Ratnasena of Ratnapura offered ritual food (Aahara) to the revered sage Kanakashanti and, as a result, attained the five celestial wonders (Panchashcharya). || 127 ||
श्लोक ( Shlok ) 128
चित्रचूलः पुनश्चास्य प्रतिमायोगधारिणः । वने सुरनिपाताख्ये विघातं कर्तुमुद्यतः ॥ १२८॥
किसी दूसरे दिन वही मुनिराज सुरनिपात नामके वनमें प्रतिमायोग धारणकर विराजमान थे। वह चित्रचूल नामका विद्याधर फिरसे उपसर्ग करनेके लिए तत्पर हुआ ।॥ १२८ ॥
On another day, while the same revered sage was seated in the Suranipata forest, absorbed in Pratima-yoga meditation, that Vidyadhara named Chitrachula once again readied himself to inflict an assault (upasarga). || 128 ||
श्लोक ( Shlok ) 129
तस्मिन् कोपं परित्यज्य घातिघाता यतीश्वरः । केवलावगमं प्रापत्वाऽपि कोपो न धीमताम् ॥१२९॥
परन्तु उन मुनिराजने उसपर रंचमात्र भी क्रोध नहीं किया बल्कि घातिया कर्मोंका नाशकर केवलज्ञान प्राप्त कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिमानोंको किसी-पर क्रोध करना उचित नहीं है ॥ १२९ ॥
However, that revered sage did not harbor even the slightest bit of anger toward him; instead, destroying his destructive karmas (Ghatiya Karmas), he attained supreme, infinite knowledge (Kevalajnana). This was indeed fitting, for it is never proper for the wise to direct anger toward anyone. || 129 ||
श्लोक ( Shlok ) 130
देवागमनमालोक्य भीत्वा स खगपापकः । तमेव शरणं यातो नीचायां वृत्तिरीदृशी ॥ १३०॥
केवलज्ञानका उत्सव मनानेके लिए देवोंका आगमन हुआ । उसे देख वह पापी विद्याधर डरकर उन्हीं केवली भगवान्की शरणमें पहुंचा सो ठीक ही है क्योंकि नीच मनुष्योंकी प्रवृत्ति ऐसी ही होती है ॥ १३० ॥
The celestial beings (Devas) arrived to celebrate the festival of his attainment of supreme knowledge (Kevalajnana). Upon witnessing this, the sinful Vidyadhara grew terrified and sought refuge under the protection of that very same Kevali Lord. This was indeed fitting, for such is the nature and behavior of base individuals. || 130 ||
श्लोक ( Shlok ) 131 – 132
अथ वज्रायुधाधीशो ४नप्तृकैवल्यदर्शनात् । लब्धबोधिः सहस्त्रायुधाय राज्यं प्रदाय तत् ॥१३१॥दीक्षां क्षेमङ्कराख्यान ” तीर्थकर्तुरुपान्तगः । प्राप्य सिद्धिगिरौ वर्षप्रतिमायोगमास्थितः ॥१३२॥
अथानन्तर नातीके केवलज्ञानका उत्सव देखनेसे वज्रायुध महाराजको भी आत्मज्ञान हो गया जिससे उन्होंने सहस्त्रायुधके लिए राज्य दे दिया और क्षेमंकर तीर्थकरके पास पहुँचकर दीक्षा धारण कर ली। दीक्षा लेनेके बाद ही उन्होंने सिद्धिगिरि नामक पर्वतपर एक वर्षके लिए प्रतिमा-योग धारण कर लिया ।। १३१-१३२ ।।
Thereafter, upon witnessing the grand festival celebrating his grandson’s attainment of supreme knowledge (Kevalajnana), King Vajrayudha also realized the true nature of the self (Atmajnana). Consequently, he handed over the kingdom to Sahastrayudha, approached the Tirthankara Kshemankara, and accepted the vows of initiation (Diksha). Immediately after taking initiation, he entered into Pratima-yoga meditation for a duration of one year on Mount Siddhigiri. || 131-132 ||
श्लोक 133 से 141
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
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