नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162 – 165
मेषरूपेण सम्पातात्पातयन् स्वपितामहम् । हलिनञ्च हरिर्भूत्वा निगीर्य त्वमदृश्यताम् ॥ १६२ ॥गत्वात्र सुखमास्वाम्बेत्यभिधाय स्वविद्यया । रुक्मिणीरूपमापाद्य निर्विशेषं मनोहरम् ॥ १६३ ॥विमाने स्थापयित्वाशु गच्छन्स सबलं हरिम् । प्राप्तवन्तं ‘समाहर्तुमाकालिकयमोपमम् ॥ १६४ । जित्वा नरेन्द्रजालाख्यविद्याविहितमायया । तस्थौ निष्प्रतिपक्षः सन्वीक्षणाभीलविग्रहः ॥ १६५ ॥
फिर मेषका रूप बनाकर बाबा वासुदेवको टक्कर द्वारा गिरा दिया और सिंह बनकर बलभद्रको निगलकर अदृश्य कर दिया। तदनन्तर-माताके पास आकर बोला कि ‘हे माता ! तू यहीं पर सुखसे रह’ यह कहकर उसने अपनी विद्यासे ठीक रुक्मिणी के ही समान मनोहर रूप बनाया और उसे विमानमें बैठाकर शीघ्रतासे बलभद्र तथा कृष्णके पास ले जाकर बोला कि मैं रुक्मिणीको हरकर ले जा रहा हूं, यदि सामर्थ्य हो तो छुड़ा लो ! यह सुनकर असमयमें आये हुए यमराजको उपमा धारण करनेवाले श्रीकृष्ण भी उसे छुड़ानेके लिए सामने जा पहुँचे परन्तु भीलका रूप धारण करनेवाले प्रद्युम्न्नने नरेन्द्रजाल नामक विद्याकी मायासे उन्हें जीत लिया और इस तरह वह शत्रु रहित होकर खड़ा रहा ।। १६२-१६५ ॥
“Then, assuming the form of a ram, he struck Baba Vasudeva with a blow, knocking him down, and then turning into a lion, he swallowed Balabhadra and vanished.
Thereafter, coming to his mother, he said, ‘O Mother! Live here happily.’ Saying this, he used his mystical knowledge (vidya) to create a beautiful form exactly like Rukmini. Placing her in a chariot (vimana), he quickly took her near Balabhadra and Krishna and challenged them, saying, ‘I am abducting Rukmini; rescue her if you have the strength!’
Hearing this, Shri Krishna, who resembled Yama (the God of Death) arriving before his time, also came forward to rescue her. However, Pradyumna, who had assumed the form of a Bhil (tribal hunter), defeated them using the illusion of a mystical lore called Narendrajal. In this manner, he stood there completely free of any enemies.” [162-165]
श्लोक ( Shlok ) 166
नारदः स तदागत्य तनूजस्याद्य वीक्षणम् । युवयोरीदृशं लब्धविद्यस्येत्यभ्यधाद्धसन् ॥ १६६ ॥
उसी समय नारदने आकर हँसते हुए, बलभद्र तथा श्रीकृष्णसे कहा कि जिसे अनेक विद्याएँ प्राप्त हैं ऐसे पुत्रका आज आप दोनोंको दर्शन हो रहा है ।। १६६ ।।
“At that very moment, Narada arrived and, smiling, said to Balabhadra and Shri Krishna, ‘Today, both of you are beholding a son who is endowed with numerous mystical lores (vidyas).'” [166]
श्लोक ( Shlok ) 167
सोपि प्रकटितात्मीयरूपः पञ्चशरो बलम् । हरिञ्च स्वशिरोन्यस्ततत्क्रमाब्जोऽत्यमानयत् ॥ १६७ ॥
उसी समय प्रद्युम्नने भी अपना असली रूप प्रकट कर दिया तथा बलभद्र और श्रीकृष्णको उनके चरण-कमलोंमें अपना शिर झुकाकर नमस्कार किया ।। १६७ ॥
“At that very moment, Pradyumna also revealed his true form, and bowing his head at the lotus feet of Balabhadra and Shri Krishna, he paid them his respectful obeisances.” [167]
श्लोक ( Shlok ) 168
ततश्चक्रधरोऽनङ्ग प्रेमालिङ्गितविग्रहः । आरोप्य स्वगजस्कन्धं प्रहृष्टः प्राविशत्पुरम् ॥ १६८ ॥
तदनन्तर चक्रवर्ती श्रीकृष्ण महाराजने बड़े प्रेमसे प्रद्युम्नका आलिंगन किया, उसे अपने हाथीके स्कन्धपर बैठाया और फिर बड़े प्रेमसे नगर में प्रवेश किया ॥ १६८ ॥
“Thereafter, the Emperor (Chakravarti) Shri Krishna Maharaja embraced Pradyumna with great affection, seated him upon the shoulder (back) of his elephant, and then entered the city with immense love.” [168]
श्लोक ( Shlok ) 169
सत्यभामासुतोद्दिष्टकन्यकाभिः सह स्मरः । कल्याणाभिषवं दिष्ट्या सम्प्रापत्सर्वसम्मतः ॥ १६९ ॥
वहाँ जाकर प्रद्युम्नने अपने पुण्योदयसे, सत्यभामाके पुत्र भानुकुमारके लिए जो कन्याएँ आई थी उनके साथ सर्वकी सम्मतिसे विवाह किया ॥ १६९ ॥
“Upon arriving there, through the rise of his own meritorious karma (punyodaya), Pradyumna married the maidens who had originally arrived for Satyabhama’s son, Bhanukumar, doing so with the consent of everyone.” [169]
श्लोक ( Shlok ) 170 – 171
एवं प्रयाति कालेऽस्य स्वर्गादागत्य कश्चन । तनूजः कामसोदर्यो हरेः प्राच्यो भविष्यति ॥ १७० ॥इत्यादेशं समाकर्ण्य सत्यभामात्मनः पतिम् । यथा स्यात्तत्समुत्पत्तिः स्वस्यास्तादृगयाचत ॥ १७१ ॥
इस प्रकार काल सुखसे बीतने लगा। किसी एक दिन सबने सुना कि प्रद्युम्नका पूर्वजन्मका भाई स्वर्गसे आकर श्रीकृष्णका पुत्र होगा। यह सुनकर सत्यभामाने अपने पतिसे याचना की कि जिस प्रकार वह पुत्र मेरे ही उत्पन्न हो ऐसा प्रयत्न कीजिये ।। १७०-१७१ ।।
“In this manner, time began to pass happily. One day, everyone heard that Pradyumna’s brother from his previous birth would descend from heaven to be born as a son to Shri Krishna. Hearing this, Satyabhama pleaded with her husband, saying, ‘Please make such an effort that this son is born only unto me.'” [170-171]
श्लोक 172 से 183
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161
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