Summary of Uttar Puran Parv 69 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 69 (श्लोक 1–92) : संक्षिप्त सारांश
भगवान नमिनाथ की स्तुति से पर्व का आरम्भ होता है। उनके पूर्वभव में कौशाम्बी के राजा पार्थिव ने धर्मोपदेश सुनकर वैराग्य धारण किया और पुत्र सिद्धार्थ को राज्य सौंपकर दीक्षा ग्रहण कर ली। सिद्धार्थ ने भी सम्यग्दर्शन प्राप्त कर धर्मपूर्वक राज्य किया तथा पिता के समाधिमरण से प्रेरित होकर स्वयं संयम धारण किया। सोलह कारण भावनाओं के प्रभाव से उन्होंने तीर्थंकर-नामकर्म का बंध किया और समाधिमरण के बाद अपराजित अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव हुए।
देवलोक से च्युत होकर वही जीव वंगदेश की मिथिला नगरी में राजा विजय और रानी वप्पिला के यहाँ अवतरित हुआ। रानी ने तीर्थंकर गर्भ के सूचक शुभ स्वप्न देखे और देवों ने गर्भकल्याणक मनाया। आषाढ़ कृष्ण दशमी को भगवान नमिनाथ का जन्म हुआ। युवावस्था में उन्होंने राज्य संभाला और दीर्घकाल तक प्रजा का कल्याण करते हुए शासन किया।
एक अवसर पर देवकुमारों से अपने भावी तीर्थंकरत्व का संकेत प्राप्त कर भगवान नमिनाथ के मन में संसार की अनित्यता का गहन चिंतन उत्पन्न हुआ। उन्होंने आत्मा के कर्मबंधन, विषयासक्ति और संसार के दुःखों पर विचार कर वैराग्य धारण किया। पुत्र सुप्रभ को राज्य सौंपकर उन्होंने दीक्षा ग्रहण की, कठोर तप किया और नौ वर्ष की साधना के पश्चात केवलज्ञान प्राप्त किया। विशाल धर्मसंघ की स्थापना कर उन्होंने असंख्य जीवों को सम्यक् धर्म का उपदेश दिया। आयु पूर्ण होने पर सम्मेदशिखर पर एक हजार मुनियों सहित प्रतिमायोग धारण कर उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया और देवों ने निर्वाणकल्याणक मनाया।
इसके पश्चात जयसेन चक्रवर्ती का चरित्र वर्णित है। पूर्व जन्म में वे वसुन्धर नामक राजा थे जिन्होंने वैराग्य लेकर संयम धारण किया, तप किया और महाशुक्र स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से च्युत होकर वे कौशाम्बी में जयसेन चक्रवर्ती के रूप में जन्मे। एक दिन उल्कापात देखकर उन्हें वैभव की क्षणभंगुरता का बोध हुआ। उन्होंने राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण की, तप और आराधना द्वारा अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त कीं तथा अंत में सम्मेदशिखर पर साधना करते हुए जयन्त अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव के रूप में उत्पन्न हुए।
इस प्रकार पर्व 69 में भगवान नमिनाथ के पूर्वभव, गर्भ, जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान, मोक्ष तथा जयसेन चक्रवर्ती के वैराग्य और आध्यात्मिक उत्कर्ष का प्रेरणादायक एवं धर्मोपदेशात्मक वर्णन किया गया है।
पर्व 69 हिन्दी-भाषानुवाद
श्लोक 1 से 11 : राजा पार्थिव का वैराग्य और सिद्धार्थ का राज्यारोहण
वत्स देश की कौशाम्बी नगरी में राजा पार्थिव राज्य करते थे। मुनिवर मुनि से धर्म का यथार्थ स्वरूप सुनकर उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ और वैराग्य उत्पन्न हो गया। उन्होंने समझा कि रत्नत्रय ही मृत्यु और दुःखों से मुक्ति का साधन है। इसलिए उन्होंने पुत्र सिद्धार्थ को राज्य सौंपकर जिनदीक्षा ग्रहण कर ली। सिद्धार्थ ने सम्यग्दर्शन और अणुव्रतों को धारण कर धर्मपूर्वक राज्य का संचालन किया।
श्लोक 12 से 21 : सिद्धार्थ का संयम और तीर्थंकर-नामकर्म का बंध
पिता पार्थिव मुनि के समाधिमरण का समाचार सुनकर सिद्धार्थ के मन में भी वैराग्य जागृत हुआ। उन्होंने महाबल केवली से तत्त्वज्ञान प्राप्त किया, पुत्र श्रीदत्त को राज्य देकर संयम धारण किया और क्षायिक सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। सोलह कारण भावनाओं के प्रभाव से उन्होंने तीर्थंकर-नामकर्म का बंध किया। समाधिमरण के पश्चात वे अपराजित अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव हुए।
श्लोक 22 से 31 : विजय राजा के यहाँ भगवान नमिनाथ का गर्भ और जन्म कल्याणक
अपराजित विमान से च्युत होकर वह जीव वंगदेश की मिथिला नगरी में राजा विजय और रानी वप्पिला के यहाँ अवतरित हुआ। विजय के राज्य में धर्म, सुख और समृद्धि का साम्राज्य था। रानी वप्पिला ने तीर्थंकर गर्भ के सूचक सोलह स्वप्न देखे और राजा ने उनके गर्भ में भावी तीर्थंकर के आगमन की घोषणा की। देवों ने गर्भकल्याणक मनाया। आषाढ़ कृष्ण दशमी को भगवान नमिनाथ का जन्म हुआ और देवों ने जन्मकल्याणक उत्सव संपन्न किया।
श्लोक 32 से 41: नमिनाथ का राज्यकाल और देवों द्वारा भविष्यवाणी
भगवान नमिनाथ का जन्म मुनिसुव्रतनाथ की तीर्थपरम्परा में हुआ। उन्होंने युवावस्था में राज्य प्राप्त कर दीर्घकाल तक शासन किया। वन-विहार के समय दो देवकुमारों ने आकर उन्हें पूर्व विदेह क्षेत्र के तीर्थंकर अपराजित भगवान के समवसरण में हुई चर्चा सुनाई, जिसमें उन्हें भरतक्षेत्र के भावी तीर्थंकर के रूप में घोषित किया गया था। यह सुनकर भगवान के अंतःकरण में वैराग्य की भावना और प्रबल हुई।
श्लोक 42 से 51: संसार की नश्वरता का चिंतन और वैराग्य
देवकुमारों की बात सुनकर नमिनाथ ने अपने पूर्वभवों और संसार के दुःखों का गंभीर चिंतन किया। उन्होंने अनुभव किया कि आत्मा कर्मबंधनों से बंधकर शरीररूपी कारागार में दुःख भोग रही है और मोहवश विषयों में आसक्त बनी रहती है। जीव दुःखों से बचना चाहता है, पर उन्हीं के कारणों का संचय करता है। इस प्रकार गहन आत्मचिंतन से उनके भीतर प्रबल वैराग्य उत्पन्न हुआ और लौकान्तिक देवों ने उनकी पूजा की।
श्लोक 52 से 65 : दीक्षा, केवलज्ञान और धर्मसंघ की स्थापना
रत्नत्रय की प्राप्ति के बाद भगवान ने पुत्र सुप्रभ को राज्य सौंप दिया। आषाढ़ कृष्ण दशमी को एक हजार राजाओं के साथ उन्होंने दीक्षा ग्रहण की और मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। वीरपुर में राजा दत्त ने उन्हें प्रथम आहार दिया। नौ वर्ष की साधना के बाद बकुल वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। उनके तीर्थ में सत्रह गणधर, बीस हजार मुनि, पैंतालीस हजार आर्यिकाएँ, एक लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ थीं। इस प्रकार उनका विशाल धर्मसंघ स्थापित हुआ।
श्लोक 66 से 82 : मोक्ष, स्तुति और जयसेन चक्रवर्ती का पूर्वचरित
भगवान नमिनाथ ने धर्मोपदेश देते हुए विहार किया और आयु के अंतिम माह में सम्मेदशिखर पर पहुँचकर एक हजार मुनियों सहित प्रतिमायोग धारण किया। वैशाख कृष्ण चतुर्दशी को उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया और देवों ने निर्वाणकल्याणक मनाया। इसके बाद जयसेन चक्रवर्ती के पूर्वभव का वर्णन आरम्भ होता है। पूर्व जन्म में वसुन्धर राजा ने वैराग्य ग्रहण कर संयम धारण किया, तप किया और महाशुक्र स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से च्युत होकर वे कौशाम्बी के राजा विजय के पुत्र जयसेन बने, जो ग्यारहवें चक्रवर्ती हुए।
श्लोक 83 से 92: जयसेन का वैराग्य, संयम और अहमिन्द्र पद
एक दिन जयसेन ने आकाश में उल्कापात देखा। उससे उन्हें संसार की अनित्यता और वैभव की क्षणभंगुरता का बोध हुआ। उन्होंने विचार किया कि जो मनुष्य परलोक-साधना छोड़कर विषयों में आसक्त रहता है, वह अंततः पतन को प्राप्त होता है। अतः उन्होंने साम्राज्य त्यागकर छोटे पुत्र को राज्य सौंपा और वरदत्त केवली से दीक्षा ग्रहण कर ली। तप और साधना से अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त कर उन्होंने सम्मेदशिखर पर संन्यासपूर्वक आराधना की तथा अंत में जयन्त अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव के रूप में उत्पन्न हुए। इस प्रकार जयसेन चक्रवर्ती के चार भवों का वर्णन पूर्ण होता है।
पर्व 70
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