राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 194 to 203
श्लोक ( Shlok ) 194
‘ध्वजदण्डाग्रनिभिन्नवारिदच्युतवार्लवैः । मन्दगन्धवहानीतैर्विनीताध्वपरिश्रमः ॥ १९४ ॥
उस पुष्पक विमान पर जो ध्वजा-दण्ड लगा हुआ था उसके अग्रभागसे मेघ खण्डित हो जाते थे, उन खण्डित मेघोंसे पानीकी छोटी-छोटी बूँदे झड़ने लगती थीं, मन्द-मन्द वायु उन्हें उड़ा कर ले आती थी जिससे रावणका मार्गसम्बन्धी सब परिश्रम दूर होता जाता था ।। १९४ ।।
“The front section of the towering banner-staff fixed upon that Pushpaka chariot would slice through the passing clouds into fragments. From those severed clouds, fine droplets of water began to spray and shower down, which the gentle, cool breezes would carry directly toward the chariot; in this manner, all the physical exhaustion and weariness of Ravana’s journey was continually washed away.” (194)
श्लोक ( Shlok ) 195
सीतोत्सुकस्तथा गच्छन् ददृशे पुष्पकस्थितः । शरद्वलाहकान्तःस्थो वासौ नीलवलाहकः ॥ १९५ ॥
सीतामें उत्सुक हो पुष्पक विमानमें बैठकर जाता हुआ रावण ऐसा दिखाई देता था मानो शरद् ऋतुके मेघोंके बीचमें स्थित नीलमेघ ही हो ॥ १९५ ॥
“Deeply infatuated and burning with intense longing for Sita, Ravana—as he traveled seated within the gleaming Pushpaka chariot—looked just like a dark raincloud (Nila-megha) suspended right in the midst of the brilliant, stark white clouds of the autumn season (Sharad Ritu).” (195)
श्लोक ( Shlok ) 196
सम्प्राप्य चित्रकूटाख्यं प्रधानं नन्दनं वनम् । प्रविष्ट इव सीतायाश्चित्तं तुष्टिमगादलम् ॥ १९६ ॥
जब वह चित्रकूट नामक आनन्ददायी प्रधान वनमें प्रविष्ट हुआ तब ऐसा सन्तुष्ट हुआ मानो सीताके मनमें ही प्रवेश पा चुकाहो ।। १९६ ।।
“As he entered that delightful and preeminent forest known as Chitrakoot, he felt such a surge of profound satisfaction—as if he had already gained entry into the very heart of Sita.” (196)
श्लोक ( Shlok ) 197
सदाशयाथ मारीचः परार्ध्यमणिनिर्मितः । भूत्वा हरिणपोतोऽसौ सीतायाः स्वमदर्शयत् ॥ १९७ ॥
तदनन्तर रावणकी आज्ञासे मारीचने श्रेष्ठ मणियोंसे निर्मित हरिणके बच्चेका रूप बनाकर अपने आपको सीताके सामने प्रकट किया ॥ १९७ ॥
“Thereafter, at the command of Ravana, Maricha assumed the form of a fawn crafted entirely from the finest, most radiant gemstones, and manifested himself directly before the eyes of Sita.” (197)
श्लोक ( Shlok ) 198
तं मनोहारिणं दृष्ट्वा पश्य नाथातिकौतुकम् । हरिणश्चित्रवर्णोऽयं रञ्जयत्यअसा मनः ॥ १९८ ॥
उस मनोहारी हरिणको देखकर सीता रामचन्द्रजी से कहने लगी कि हे नाथ ! यह बहुत भारी कौतुक देखिये, यह अनेक वर्णोंवाला हरिण हमारे मनको अनुरञ्जित कर रहा है ।॥ १९८ ॥
“Gazing upon that captivating deer, Sita spoke to Ramachandra, saying, ‘O Lord! Behold this extraordinary wonder! This multi-hued deer is truly delighting my heart and filling my mind with wonder.'” (198)
श्लोक ( Shlok ) 199
इति सीतावचः श्रुत्वा विनेतु’ तत्कुतूहलम् । तदानिनीषया गत्वा रामो वामे विधौ विधीः ॥ १९९ ॥
इस प्रकार भाग्यके प्रतिकूल होने पर बुद्धि रहित रामचन्द्र सीताके वचन सुन उसका कुतूहल दूर करनेके लिए उस हरिणको लानेके इच्छासे चल पड़े ॥ १९९ ॥
“In this manner, when destiny (Bhagya) turns adverse, the intellect is stripped of its clarity; thus, hearing Sita’s words and wishing to satisfy her innocent curiosity, Ramachandra set forth with the intent of capturing that deer.” (199)
श्लोक ( Shlok ) 200
ग्रीवाभङ्गेन वा पश्यन् कुर्वन् दूरं पुनः प्ठतिम् । वल्गन्धावन् क्षणं खादन् विभयो वा तृणाङ्करम् ॥२००॥
वह हरिण कभी तो गरदन मोड़ कर पीछेकी ओर देखता था, कभी दूर तक लम्बी छलाङ्ग भरता था, कभी धीरे-धीरे चलता था, कभी दौड़ता था, और कभी निर्भय हो घासके अङ्कुर खाने लगता था ।। २०० ।।
“Turning its neck, that deer would sometimes look back at its pursuer; sometimes it would bound away in long, sweeping leaps; sometimes it would walk at a slow, leisurely pace; sometimes it would bolt into a swift run; and at other times, completely devoid of fear, it would calmly begin grazing on tender blades of grass.” (200)
श्लोक ( Shlok ) 201 – 202
हस्तग्राह्यमिवात्मानं कृत्वोड्डीयातिदूरगः । बृथा कर्षति मां मायामृगो वैषोऽतिदुर्ग्रहः ॥ २०१ ॥बदन्नित्यन्वगात्सोऽपि मृगोऽगाद्गनाङ्गणम् । कुतः कृत्यपरामर्शः स्त्रीवशीकृतचेतसाम् ॥ २०२ ॥
कभी अपने आपको इतने पास ले आता था कि हाथसे पकड़ लिया जावे और कभी उछल कर बहुत दूर चला जाता था। उसकी ऐसी चेष्टा देख रामचन्द्रजी कहने लगे कि यह कोई मायामय मृग है मुझे व्यर्थ ही खींच रहा है और कठिनाईसे पकड़नेके योग्य है। ऐसा कहने हुए रामचन्द्रजी उसके पीछे-पीछे चले गये परन्तु कुछ समय बाद ही वह उछल कर आकाशगंगा में चला गया सो ठीक ही है क्योंकि जिनका चित्त स्त्रीके वश है उन्हें करने योग्य कार्यका बिचार कहाँ होता है ? ।। २०१-२०२ ॥
“Sometimes it would draw itself so incredibly close that it seemed within arm’s reach of being captured, and at other times it would leap boundlessly far away. Witnessing these deceptive antics, Ramachandra said to himself, ‘This is surely an illusory, magical deer (Mayamaya Mriga); it is teasingly drawing me away in vain and proves exceedingly difficult to capture.’ Even as he uttered this realization, Ramachandra continued to pursue it, but only a short while later, the deer leaped high into the air and vanished into the heavenly stream (Akashaganga). And it is only fitting—for where is the room to analyze proper, discerning action for those whose hearts are completely subjugated by a woman?” (201-202)
श्लोक ( Shlok ) 203
लोकमानो नभो रामस्तनुतामतिरूपयन् । तस्थौ तथैव विश्रान्तो घटान्तरगताहिवन् ॥ २०३ ॥
जिस प्रकार घड़ेके भीतर रखा हुआ साँप दुखी होता है उसी प्रकार रामचन्द्रजी आकाशकी ओर देखते तथा अपनी हीनताका वर्णन करते हुए वहीं पर आश्चर्यसे चकित होकर ठहर गये ।। २०३ ।।
“Just as a serpent feels suffocated and distressed when trapped inside a narrow earthen pot, Ramachandra felt a similar profound unease. Gazing up toward the sky and lamenting his own lapse in judgment, he stood there for a moment, frozen in stunned bewilderment.” (203)
श्लोक 204 से 211
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