पूजा
अडिल्ल छन्द
स्ववर्गों से प्राप्त सदा पिंडाक्षर । अग्नि बिन्दु से युक्त सकल षड अक्षर ।।
हम पूजे हं बीज सहित जिन देव को । शांतिनाथ प्रभु कर्म हरि सुख देव को ||1||
ॐ ह्रीं श्री शाँतिनाथाय अशोक तरु सत्प्रातिहार्य मंडिताय शोभनपद प्रदाय हम्ल्व्य्रू बीजाय सर्वोपद्रवशांतिकराय जलादि अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||1||
स्ववर्गों से प्राप्त सदा पिंडाक्षर । अग्नि बिन्दु से युक्त सकल षड अक्षर ॥
हम पूजे भं बीज सहित जिन देव को । शाँतिनाथ प्रभु कर्म हरि सुखदेव को ||2||
ॐ ह्रीं श्री शाँतिनाथाय सुरपुष्पवृष्टिं सत्प्रातिहार्यं मंडिताय सुरपुष्पवृष्टि शोभनपद प्रदाय भम्ल्व्य्रू बीजाय सर्वोपद्रव शाँतिकराय जलादि अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||2||
स्वर्वगों से प्राप्त सदा पिंडाक्षर । अग्नि बिन्दु से युक्त सकल पर अक्षर ॥
हम पूजे मं बीज सहित जिनदेव को । शांतिनाथ प्रभु कर्म हरि सुखदेव को ॥3॥
ॐ ही श्री शाँतिनाथाय दिव्यध्वनि सत्प्रातिहार्य मंडिताय दिव्यध्वनि शोभनपद प्रदाय मम्ल्व्य्रू बीजाय सर्वोपद्रव शाँतिकराय जलादि अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||3||
स्ववर्गों से प्राप्त सदा पिंडाक्षर । अग्नि बिन्दु से युक्त सकल षड अक्षर ।।
हम पूजे रं बीज सहित जिन देव को । शाँतिनाथ प्रभु कर्म हरि सुख देव को || 4 ||
ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथाय चामरोज्वल सत्प्रातिहार्य मंडिताय चामरोज्वल शोमनपद प्रदाय रम्ल्व्य्रू-बीजाय सर्वोपद्रव शाँतिकराय जलादि अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||4||
स्ववर्गों से प्राप्त सदा पिंडाक्षर । अग्नि बिन्दु से युक्त सकल षड अक्षर ।।
हम पूजे घं बीज सहित जिन देव को । शाँतिनाथ प्रभु कर्म हरि सुख देव को ||5||
ॐ ह्रीं श्री शाँतिनाथाय सिंहासन सत्प्रातिहार्य मंडिताय सिंहासन प्रातिहार्य शोभनपद प्रदाय घम्ल्व्य्रू बीजाय सर्वोपद्रव शाँतिकराय जलादि अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||5||
स्ववर्गों से प्राप्त सदा पिंडाक्षर । अग्नि बिन्दु से युक्त सकल षड अक्षर ॥
हम पूजे झं बीज सहित जिन देव को । शाँतिनाथ प्रभु कर्म हरि सुख देव को ||6||
ॐ ह्रीं श्री शाँतिनाथाय भामंडलसत्प्रातिहार्य मंडिताय भामंडल प्रातिहार्य शोभनपद प्रदाय झम्ल्व्य्रू बीजाय सर्वोपद्रव शाँतिकराय जलादि अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||6||
स्ववर्गों से प्राप्त सदा पिंडाक्षर । अग्नि बिन्दु से युक्त सकल षड अक्षर ॥
हम पूजे सं बीज सहित जिन देव को । शाँतिनाथ प्रभु कर्म हरि सुख देव को ||7||
ॐ ह्रीं श्री शाँतिनाथाय दुंदुभि सत्प्रातिहार्य मंडिताय दुंदुभिप्रातिहार्य शोमनपद प्रदाय सम्ल्व्य्रू बीजाय सर्वोपद्रव शांतिकराय जलादि अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||7||
स्ववर्गों से प्राप्त सदा पिंडाक्षर । अग्नि बिन्दु से युक्त सकल षड अक्षर |
हम पूजे खं बीज सहित जिन देव को । शांतिनाथ प्रभु कर्म हरि सुख देव को ||8||
ॐ ह्रीं श्री शाँतिनाथाय छत्रत्रय सत्प्रातिहार्यमंडिताय छत्रत्रयशोमन पदप्रदाय सर्वविघ्नहराय खम्ल्व्य्रू बीजाय सर्वोपद्रव शांतिकराय जलादि अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥ 8॥
दोहा — ह भ म र घ झ स ख है सही, बीज वर्णये जान ।
पूजूं अर्घ्यं संजोय के नशे विघ्न दुखदान ||9||
ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथाय प्रातिहार्यष्ट सहिताय बीजाष्ट मंडल मंडिताय सर्वविघ्र शांति कराय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ||9||
दोहा— शान्तिनाथ प्रभु के चरण पूजे चरण पूजे भक्ति प्रसार कर्म कटे सब जन्म के पावे शिवपद सार | पुष्पांजलिं क्षिपेत्।
॥ अथ द्वितीय वलय षोडश कोष्ठों परि पुष्पांजलिं क्षिपेत् ॥
द्वितीय वलय
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प्रथम वलय | द्वितीय वलय | तृतीय वलय 1 से 16 अर्घ्य | तृतीय वलय-17 से 32 अर्घ्य | चतुर्थ वलय -1 से 16 अर्घ्य | चतुर्थ वलय -17 से 32 अर्घ्य | चतुर्थ वलय -33 से 48 अर्घ्य | चतुर्थ वलय – 49 से 64 अर्घ्य | जाप & जयमाला
English Translation of First Ring
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