राजा श्रेणिक ने गौतम गणधर से ध्यान का स्वरूप पूछा। उन्होंने ध्यान के लक्षण, भेद, स्वामी, समय, हेतु, और फल के बारे में जानना चाहा। गौतम ने कहा कि ध्यान कर्मों का क्षय करता है। चित्त का निरोध ध्यान है। यह अंतर्मुहूर्त तक रहता है। स्थिर चित्त ध्यान है, चंचल चित्त अनुप्रेक्षा है। यह बारहवें गुणस्थान तक होता है। बुद्धि के अधीन वृत्ति ही ध्यान है।
ध्यान के पर्याय शब्द योग, समाधि आदि हैं। आत्मा का परिणाम ध्यान है। करण, कर्तृ, और भाव से इसकी निरुक्ति होती है। ध्यान ज्ञान की पर्याय है। यह दर्शन, सुख, वीर्य को धारण करता है। चैतन्य से भिन्न होकर प्रकाशमान होता है। समस्त तत्त्व इसके आलंबन हैं। आत्मतत्त्व का चिंतवन विशुद्धि के लिए है। यह बंध नष्ट कर मुक्ति देता है। सभी पदार्थ ध्येय हैं।
शुभ चिंतवन ही ध्यान है। अशुभ चिंतवन असद्ध्यान है। तत्त्व न जानने वाला संक्लेश करता है। संकल्प से राग-द्वेष और बंध होता है। तृष्णा संकल्प है। तत्त्वार्थ भावना से ध्यान शुद्ध होता है। ध्यान प्रशस्त और अप्रशस्त दो प्रकार का है। यह आर्त, रौद्र, धर्म्य, शुक्ल चार भेदों में है। आर्त और रौद्र छोड़ने योग्य हैं। धर्म्य और शुक्ल ग्रहण करने योग्य हैं।
आर्तध्यान चार प्रकार का है। इष्ट वियोग, अनिष्ट संयोग, निदान, और वेदना से यह होता है। इष्ट के लिए चिंतवन पहला आर्तध्यान है। अनिष्ट वियोग के लिए चिंतवन दूसरा है। भोगाकांक्षा तीसरा है। वेदना दूर करने का चिंतवन चौथा है। यह कषाय से छठवें गुणस्थान तक होता है। यह अशुभ लेश्या से उत्पन्न होता है। इसका फल तिर्यंच गति है। परिग्रह, कृपणता इसके चिह्न हैं।
रौद्रध्यान क्रूर पुरुष का होता है। यह चार प्रकार का है। हिंसानंद, मृषानंद, स्तेयानंद, और संरक्षणानंद इसके भेद हैं। यह पाँचवें गुणस्थान तक होता है। अशुभ लेश्या से उत्पन्न होता है। हिंसा, झूठ, चोरी, परिग्रह रक्षा इसके लक्षण हैं। हिंसक अपने आत्मा का घात करता है। क्रूरता, कठोर वचन इसके चिह्न हैं।
रौद्रध्यान का फल नरकगति है। आर्त और रौद्र का त्याग करना चाहिए। धर्म्य और शुक्ल उत्तम हैं। मुनि एकांत, श्मशान, नदी किनारे पर ध्यान करते हैं। पर्यंक आसन से शरीर सम रखते हैं। हाथ ऊपर, आँखें संतुलित रखते हैं। धीरे श्वास लेते हैं। मन को हृदय आदि में स्थिर कर तत्त्वों का चिंतवन करते हैं।
तीव्र प्राणायाम से चित्त व्याकुल होता है। मंद श्वास से ध्यान सिद्ध होता है। सम शरीर से समाधान रहता है। विषम शरीर से बुद्धि आकुल होती है। पर्यंक और कायोत्सर्ग आसन सुखकर हैं। विषम आसन से पीड़ा होती है। ये दोनों आसन ध्यान के लिए उत्तम हैं।
पर्यंक आसन अधिक सुखकर है। बलवान सभी आसनों से ध्यान करते हैं। कायोत्सर्ग और पर्यंक अशक्तों के लिए हैं। शक्तिशाली को सभी आसन ठीक हैं। शरीर की अवस्था ध्यान के विरोधी न हो। एकांत स्थान निवास के योग्य है। शहर में चित्त व्याकुल होता है। वन में रहना उचित है। सभी काल ध्यान के लिए ठीक हैं।
ध्यान करने वाला मुनि अपनी अवस्था से सिद्ध होता है। वह बलवान, तपस्वी, शास्त्रज्ञ होता है। आर्त-रौद्र से दूर रहता है। प्रमादरहित, बुद्धिमान, धीर-वीर होता है। वैरागी, सम्यग्ज्ञानी, व्रती होता है। कषायों से मुक्त, अनित्य का चिंतवन करता है। ज्ञान, दर्शन, चारित्र से मोह से बचता है।
ज्ञान की पाँच भावनाएँ शास्त्र पठन आदि हैं। सम्यग्दर्शन की सात भावनाएँ भय, शांति आदि हैं। चारित्र की भावनाएँ समिति, गुप्ति, और परीषह हैं। वैराग्य की भावनाएँ विषय त्याग आदि हैं। इनसे मुनि की बुद्धि स्थिर होती है। चौदह पूर्व जानने वाला ध्याता उत्तम है। अल्पश्रुत भी ध्याता हो सकता है। यह मुनि शुक्लध्यान को प्राप्त करता है। तत्त्व, सात तत्त्व, और शास्त्र ध्येय हैं। शब्द, अर्थ, ज्ञान ध्येय हैं।
सिद्ध परमेष्ठी ध्यान करने योग्य हैं। वे कर्ममल से मुक्त और विशुद्ध हैं। अनंत गुणों से युक्त हैं। सूक्ष्म पर प्रकट हैं। वे कल्याणकारी और सर्वज्ञ हैं। साकार और निराकार हैं। रत्नमय दर्पण जैसे स्पष्ट हैं। वे संसार नष्ट करते हैं। अर्हंत जिनेंद्र भी ध्येय हैं।
अर्हंत राग-विद्या को जीतते हैं। वे सिद्ध, बुद्ध, विश्वदर्शी हैं। केवलज्ञान उनका नेत्र है। समवसरण में विराजते हैं। अष्ट प्रातिहार्य उनकी प्रभुता दिखाते हैं। वे विश्वरूप और विश्वव्यापी हैं। निःस्पृह, नित्य, और अविनाशी हैं। ये गुण धर्म्य और शुक्लध्यान के ध्येय हैं। विशुद्धि में भेद है।
ध्यान मुक्ति का कारण है। यह धर्म्य और शुक्ल दो प्रकार का है। वस्तु का स्वरूप धर्म है। धर्म्यध्यान चार भेदों का है। आज्ञाविचय आगम का ध्यान है। आगम सूक्ष्म पदार्थों को प्रकाशित करता है। मुनि आगम का ध्यान करता है। अपायविचय संसार के दुःखों का चिंतवन है।
अपायविचय में उपायों का चिंतवन है। विपाकविचय कर्मों के उदय का ध्यान है। कर्म स्वयं और तप से फल देते हैं। संस्थानविचय लोक के आकार का चिंतवन है। मुनि लोक की रचना और जीवों का ध्यान करता है। संसार दुस्तर और गंभीर है।
आगम का विस्तार ध्येय है। धर्म्यध्यान अप्रमत्त अवस्था में होता है। यह शुभ लेश्या से चौथे से छठे गुणस्थान में होता है। इसका फल उत्तम है। प्रसन्नता इसके चिह्न हैं। अनुप्रेक्षाएँ इसके अंतरंग चिह्न हैं।
धर्म्यध्यान से अशुभ कर्मों की निर्जरा होती है। यह स्वर्ग और मोक्ष देता है। ध्यान छूटने पर भावनाओं का चिंतवन करना चाहिए। गौतम ने श्रेणिक को धर्म्यध्यान समझाया। शुक्लध्यान मोक्ष का कारण है। यह शुक्ल और परम शुक्ल दो भेदों का है। पहले शुक्लध्यान के दो भेद हैं।
पृथक्त्ववितर्क में शास्त्र का संक्रमण होता है। एकत्ववितर्क में संक्रमण नहीं होता। मुनि शब्द और योग बदलता है। चौदह पूर्व जानने वाला इसे धारण करता है। श्रुतस्कंध इसका ध्येय है। मोह का क्षय इसका फल है। यह आठवें से बारहवें गुणस्थान में होता है।
एकत्ववितर्क कषायमुक्त मुनि का है। यह केवलज्ञान देता है। यह बारहवें गुणस्थान में होता है। परम शुक्ल केवलियों का है। वे योग निरोध से समुद्घात करते हैं। आत्मा लोक को व्याप्त करती है। वे पूरक और रेचक अवस्था में पूज्य हैं।
केवली भगवान लोक को पूर्ण कर संकोच करते हैं। वे अघातिया कर्मों को नष्ट करते हैं। योग का निरोध कर तीसरा शुक्लध्यान करते हैं। फिर चौथा शुक्लध्यान प्राप्त करते हैं। इसमें कर्म नष्ट कर निर्वाण पाते हैं। चौदहवें गुणस्थान में कर्मप्रकृतियाँ नष्ट होती हैं। वे शुद्ध और मुक्त होकर लोकांत में निवास करते हैं। सिद्ध अनंत सुख में रहते हैं।
सिद्धों के पर्याय शब्द कृतार्थ आदि हैं। उनका सुख अतींद्रिय है। वेदनाओं का अभाव होता है। शुद्ध आत्मा का सुख नित्य है। स्वास्थ्य ही सुख है। वे क्लेशरहित होने से अबाध्य हैं।
ध्यान से कर्म नष्ट होते हैं। यह कर्मरूपी विष को हरता है। ग्यारह तप इसके सहायक हैं। श्रेणिक संतुष्ट हुए। ऋषियों ने गौतम से अन्य ध्यान पूछे। वे विप्रतिपत्तियाँ दूर करना चाहते थे। गौतम को ऋषि, यति कहा। वे योग का निराकरण चाहते थे। गौतम ने तत्त्व स्पष्ट करने का वचन दिया।
योगवादी से योग, समाधि आदि पूछना चाहिए। योग काय, वचन, मन की क्रिया है। समाधि चित्त का स्थिर होना है। प्राणायाम योग का निग्रह है। धारणा बीजाक्षरों का अवधारण है। आध्यान भावनाओं का चिंतवन है। ध्येय शुद्ध आत्मतत्त्व है। स्मृति तत्त्वों का स्मरण है। ‘अर्हं’ बीज का ध्यान दुःख हरता है।
‘अर्हद्भ्यो नमः’ से अर्हंत अवस्था मिलती है। ‘नमः सिद्धेभ्यः’ मनोरथ पूर्ण करता है। ‘नमोऽर्हत्परमेष्ठिने’ दुःख हरता है। पंच परमेष्ठियों का बीज मोक्ष देता है। यह ब्रह्मतत्त्व को जानने में सहायक है। ध्यान से आनंद और ऋद्धियाँ मिलती हैं। बीज न जानने वाला बंधन में रहता है। अन्य मतों में जीव नित्य हो तो ध्यान असंभव है।
अनित्य जीव में ध्यान सिद्ध नहीं होता। क्षणिक वृत्ति स्मरण नहीं कर सकती। पुद्गलवाद में ध्याता सिद्ध नहीं होता। विज्ञानाद्वैत में विषय के अभाव से ध्यान नहीं होता। शून्यवाद में कोई ध्यान नहीं कर सकता। सांख्य में चैतन्यरहित आत्मा ध्येय नहीं बनती।
द्वैत-अद्वैत में ध्यान सिद्ध नहीं होता। स्याद्वाद में ही ध्यान संभव है। जीव द्रव्य से नित्य, पर्याय से अनित्य है। स्याद्वादी ही ध्यान सिद्ध करते हैं। अर्हंत मोह पर विजयी हैं। वे आप्त, सर्वज्ञ, और कल्याणकारी हैं। उनके अनेक नाम हैं।
अर्हंत का रूप प्रकाशमान है। उनका मुख शासकपना सिखाता है। गौतम ने ध्यानतत्त्व का निरूपण किया। मुनि संतुष्ट हुए। वे गौतम और वृषभदेव की स्तुति कर उनकी लक्ष्मी सुनने को तैयार हुए।
English translation of Ādi purāṇa parv 21 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथातः श्रेणिको नम्रो मुनि पप्रच्छ गौतमम् । भगवन् बोद् धुमिच्छामि त्वत्तो ध्यानस्य विस्तरम् ॥१॥
अथानंतर―श्रेणिक राजा ने नम्र होकर महामुनि गौतम गणधर से पूछा कि हे भगवन् मैं आपसे ध्यान का विस्तार जानना चाहता हूँ ।।1।।
Thereafter, King Shrenik, with humility and reverence, bowed before the great ascetic Gautama Ganadhara and asked:
“O Blessed One! I wish to understand the detailed exposition of Dhyana (meditation) from you.” ||1||
श्लोक ( Shlok ) 2
किमस्य लक्षणं योगिन् के भेदाः किं च निर्वचः। किं स्वामिकं कियत्कालं किं हेतु फलमप्यदः ॥२॥
हे योगिराज, इस ध्यान का लक्षण क्या है ? इसके कितने भेद हैं, इसकी निरुक्ति (शब्दार्थ) क्या है, इसके स्वामी कौन हैं, इसका समय कितना है, इसका हेतु क्या है और इसका फल क्या है ? ।।2।।
“O Lord of Yogis! What is the definition of Dhyana (meditation)? How many types does it have? What is its etymology (word meaning)? Who are its true practitioners? What is its proper duration? What is its cause, and what are its results?” ||2||
श्लोक ( Shlok ) 3
कोऽस्य भावो भवेत् किं वा स्यादधिष्ठानमीशितः । भेदानां कानि नामानि कश्चै षामर्थनिश्चयः ॥३॥
हे स्वामिन् इसका भाव क्या है ? इसका आधार क्या है ? इसके भेदों के क्या-क्या नाम हैं ? और उन सबका क्या-क्या अभिप्राय है ? ।।3।।
“O Lord! What is the essence (Bhava) of Dhyana (meditation)? What is its foundation (Adhara)? What are the names of its various types, and what are their respective meanings and significance?” ||3||
श्लोक ( Shlok ) 4
किमालम्बनमेतस्य बलाधानं च किं भवेत्। तदिदं सर्वमेवाहं बुभुत्से वदतां वर ॥४॥
इसका आलंबन क्या है और इसमें बल पहुँचाने वाला क्या है ? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, यह सब मैं जानना चाहता हूँ ।।4।।
“What is the Alambana (object of focus) in Dhyana (meditation), and what strengthens or enhances it?
O best among speakers, I wish to understand all of this in detail.” ||4||
श्लोक ( Shlok ) 5
परं साधनमाम्नातं ध्यानं मोक्षस्य साधने। ततोऽस्य” भगवन् ब्रूहि तत्वं गोप्यं यतीशिनाम् ॥५॥
मोक्ष के साधनों में ध्यान ही सबसे उत्तम साधन माना गया है इसलिए हे भगवन्, इसका यथार्थ स्वरूप कहिए जो कि बड़े-बड़े मुनियों के लिए भी गोप्य है ।।5।।
“Dhyana (meditation) is considered the supreme means among all the paths to liberation.
Therefore, O Blessed One, please reveal its true nature, which remains a profound mystery even to great ascetics.” ||5||
श्लोक ( Shlok ) 6
इति पृष्टवते तस्मै भगवान् गौतमोऽब्रवीत् । प्रसरद्दशनाभीषु जलस्नपितततनुः ॥६॥
इस प्रकार पूछने वाले राजा श्रेणिक से भगवान् गौतमगणधर अपने दाँतों की फैलती हुई किरणोंरूपी जल से उसके शरीर का अभिषेक करते हुए कहने लगे ।।6।।
Thus, as King Shrenik humbly inquired, Lord Gautama Ganadhara, with a radiant smile, as if performing an ablution of the king’s body with the spreading rays of his shining teeth, began to speak. ||6||
श्लोक ( Shlok ) 7
यत्कर्मक्षपणे साध्ये साधनं परमं तपः । तत्ते ध्यानाह्वयं सम्यगनुशास्मि यथाश्रुतम् ॥७॥
कि हे राजन् जो कर्मों के क्षय करनेरूप कार्य का मुख्य साधन है ऐसे ध्यान नाम के उत्कृष्ट तप का मैं तुम्हारे लिए आगम के अनुसार अच्छी तरह उपदेश देता हूँ ।।7।।
“O King! I shall now impart to you the true teachings of Dhyana (meditation), the supreme form of austerity, according to the Agamas, for it is the foremost means of destroying Karma.” ||7||
श्लोक ( Shlok ) 8
ऐकाग्रयेण निरोधो यश्चित्तस्यैकत्र वस्तुनि । तद्धयानं वज्रकं यस्य सवेदान्तर्मु हूर्ततः ॥८॥
तन्मय होकर किसी एक ही वस्तु में जो चित्त का निरोध कर लिया जाता है उसे ध्यान कहते हैं । वह ध्यान वज्रवृषभनाराचसंहनन वालों के अधिक-से-अधिक अंतर्मुहूर्त तक ही रहता है ।।8।।
“When the mind becomes completely absorbed and focused on a single object, it is called Dhyana (meditation).
For those possessing the Vajra-Vrishabha-Naracha Sanhanana (the strongest bodily structure), this state of meditation can last for a maximum of Antarmuhurta (less than 48 minutes).” ||8||
श्लोक ( Shlok ) 9
स्थिरमध्यव सानं यत्तद्ध्यानं यच्चलाचलम्। सानुप्रेक्षाथवा चिन्ता भावना चित्तमेव वा ॥९॥
जो चित्त का परिणाम स्थिर होता है उसे ध्यान कहते हैं और जो चंचल रहता है उसे अनुप्रेक्षा, चिंता, भावना अथवा चित्त कहते हैं ।।9।
“When the mind remains steady and unwavering, it is called Dhyana (meditation).
However, when it is restless, it is referred to as Anupreksha (contemplation), Chinta (thought), Bhavana (reflection), or simply Chitta (mind).” ||9||
श्लोक ( Shlok ) 10
छद्मस्थेषु भवेदेतल्लक्षणं विश्वदृश्वनाम् । योगास्त्रवस्य संरोधे ध्यानत्वमुपचर्यते ॥१०॥
यह ध्यान छद्मस्थ अर्थात् बारहवें गुणस्थानवर्ती जीवों तक के होता है और तेरहवें गुणस्थानवर्ती सर्वज्ञ देव के भी योग के बल से होने वाले आस्रव का निरोध करने के लिए उपचार से माना जाता है ।।10।।
“Dhyana (meditation) is practiced by beings up to the twelfth Gunasthana (spiritual stage of purification).
For an omniscient being in the thirteenth Gunasthana, it is only figuratively considered as a means to restrain the influx of Karma through the force of their Yoga (vibrations of body, speech, and mind).” ||10||
श्लोक ( Shlok ) 11
धीब लायत्तबृत्तित्वाद् ध्यानं तज्ञैर्निरुच्यते । यथार्थमभिसंधानादपध्या नमतो ऽन्यथा ॥११॥
ध्यान के स्वरूप को जाननेवाले बुद्धिमान् पुरुष ध्यान उसी को कहते हैं जिसकी वृत्ति अपने बुद्धि-बल के अधीन होती है क्योंकि ऐसा ध्यान ही यथार्थ में ध्यान कहा जा सकता है इससे विपरीत ध्यान अपध्यान कहलाता है ।।11।।
“Wise beings who understand the true nature of Dhyana (meditation) define it as that state in which the mind remains under the control of one’s intellect and wisdom.
Only such meditation is considered true Dhyana. Any deviation from this focused state is termed Apadhyana (improper or distracted meditation).” ||11||
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