दूसरे दिन, तैयार सेनापति चक्रवर्ती भरत के प्रस्थान की प्रतीक्षा करने लगे। हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकों से विजयार्थ पर्वत के वन भर गए। भरत, विजयी हाथी पर सवार, इंद्र सा शोभित होकर निकले। सेना संकुचित मार्ग से गुफा की ओर बढ़ी, जो तमिस्त्रा नामक थी। यह गुफा आठ योजन ऊँची, बारह योजन चौड़ी, वज्र किवाड़ों और रत्न चौखट से सुशोभित थी। सिन्धु नदी का प्रवाह इसे और शोभित करता था। सेनापति द्वारा पहले शांत की गई यह गुफा अनादि, गंभीर और प्रसूति गृह सा प्रतीत होती थी।
गुफा के गाढ़ अंधकार से सेना भयभीत हुई। सेनापति ने पुरोहित के साथ अंधकार दूर करने के लिए दीवारों पर काकिणी और चूड़ामणि रत्नों से सूर्य-चंद्र मंडल बनवाए। इनके प्रकाश से सेना गुफा के मध्य में प्रवेश कर गई। चक्ररत्न दीपक सा मार्ग प्रशस्त करता था। सेना दो भागों में सिन्धु नदी के जल का उपयोग कर चलती थी, पर दिशा संशय के कारण भ्रमित थी। कई पड़ाव पार कर भरत ने गुफा की आधी भूमि तय की और उन्मग्नजला-निमग्नजला नदियों के संगम पर पहुँचे।
भरत ने निमग्नजला (नीचे ले जाने वाली) और उन्मग्नजला (ऊपर उछालने वाली) नदियों की विषमता देखी। स्थपति (सिलावट) रत्न ने इनके प्रवाह को वायु प्रभाव से समझा और पुल बाँधने का निर्णय लिया। उसने वनों से बड़े वृक्ष मँगवाए और मजबूत खंभों पर क्षणभर में पुल तैयार किया। सेना ने आनंद के साथ कोलाहल किया और नदियों को पार कर दूसरी ओर पहुँची।
भरत ने हाथियों के साथ जलमय मार्ग से कठिन रास्ता तय किया और गुफा के उत्तर द्वार पर पहुँचे। हाथी सेना ने द्वार खोला, और भरत विजयार्थ पर्वत के वन में प्रवेश किए। गुफा से बाहर निकलते सैनिकों को दूसरा जन्म सा अनुभव हुआ। गुफा मानो सेना को उगल रही थी। वन की शाखाएँ और वायु सेना को आश्वासन दे रहे थे। सेनापति ने पश्चिम म्लेच्छ खंड जीता, और भरत मध्यम म्लेच्छ खंड की ओर बढ़े।
भरत की सेनाएँ व्यूह रचना के साथ शत्रु देशों को घेरती थीं, पर सूर्य की तरह लोगों को पीड़ित नहीं करती थीं। उन्होंने किलों और राजाओं को वश किया। चिलात और आवर्त नामक म्लेच्छ राजाओं ने अपनी सेना का पराभव सुना और युद्ध की तैयारी की। उनके मंत्रियों ने युद्ध से रोका, सुझाव दिया कि विजयार्थ पर्वत को पार करने वाला कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि देव या दिव्य प्रभाव वाला है।
मंत्रियों ने किले का आश्रय लेने और नागमुख-मेघमुख देवों की सहायता लेने की सलाह दी। चिलात और आवर्त ने देवों का स्मरण किया। नागमुख देव ने बादल बनकर जलवृष्टि की, जो भरत की सेना को डुबाने लगी। पर छत्ररत्न और चर्मरत्न ने सेना को सुरक्षित रखा। चक्ररत्न के प्रकाश से तंबू में ठहरी सेना सात दिन तक पीड़ा रहित रही।
सेना के तंबू में चार दरवाजे और रक्षा व्यवस्था थी। सिलावट रत्न ने तंबू, झोपड़ियाँ और रथ बनाए। कोलाहल सुन राजा क्रुद्ध हुए, पर चक्रवर्ती के आदेश पर गणबद्ध देवों और जयकुमार ने नागमुख-मेघमुख देवों को परास्त किया। जयकुमार बाण वर्षा करता बादल सा शोभित हुआ और मेधेश्वर नाम पाया।
जयकुमार की गर्जना से मेघमुख देव परास्त हुए, और देवों ने उसका जयजयकार किया। भरत ने जयकुमार को मुख्य शूरवीर नियुक्त किया। नागमुख देवों के भागने से चिलात और आवर्त भयभीत होकर भरत के चरणों में प्रणाम कर दासता स्वीकार की। भरत ने सिन्धुप्रपात पर सिन्धु देवी से अभिषेक प्राप्त किया, जो सुवर्ण कलशों से जल अर्पित कर उनकी सेवा की।
सिन्धु देवी ने भरत को भद्रासन भेंट किया और विदा ली। भरत हिमवान् पर्वत के किनारों को जीतते हुए हिमवत् कूट पर पहुँचे। वहाँ उपवास, अस्त्र पूजा और डाभ शय्या पर शयन किया। भरत ने वजूकाण्ड धनुष पर वैशाख आसन लगाकर अमोघ बाण छोड़ा, जो हिमवत् कूट पर देव भवन को हिलाता हुआ पहुँचा। वहाँ का देव मस्तक झुकाकर भरत के समक्ष आया।
हिमवान् का देव भरत से बोला कि यह पर्वत साधारण पुरुषों से अजेय है, और उनका बाण ने देवों को कम्पित किया। उसने भरत के दिग्विजय की प्रशंसा की, उनका अभिषेक किया, गोशीर्ष चंदन भेंट किया, और अन्य देवों की ओर से नमस्कार अर्पित किया। देव ने भरत की प्रसन्नता और आज्ञा की याचना की, क्योंकि स्वामी की प्रसन्नता सेवकों की आजीविका है।
चक्रवर्ती भरत ने हिमवान् देव के वचनों की प्रशंसा कर सभी देवों का सत्कार किया और उन्हें विदा किया। किन्नर देव हिमवान् की विजय के मंगलगीत गा रहे थे। हिमवान् के वनों का शीतल वायु और स्थल कमलिनियों का रज भरत की सेवा कर रहा था। उनकी कीर्ति हिमवान् के लतागृहों में फैली। भरत ने पर्वत की ऊँचाई, विस्तार, और रत्नों की समानता को स्वयं से तुलनीय माना। पुरोहित ने हिमवान् की शोभा और भरत की उदारता की तुलना की, जिससे भरत संतुष्ट हुए।
हिमवान् की सुवर्णमयी श्रेणी रत्नों से सुशोभित थी, जो सौ योजन ऊँची थी। यह पर्वत लवण समुद्र में प्रवेश करता हुआ पृथिवी का दंड सा प्रतीत होता था। सिद्ध, विद्याधर, और नागकुमार इसके शिखरों पर निवास करते थे। लतागृहों में विद्याधर अपनी स्त्रियों के साथ टहलते थे। मणियों और देवांगनाओं के प्रतिबिंबों से किनारे चित्रमय थे। फूलों से हँसते वन देवों के बगीचों सा शोभित थे।
हिमवान् पर्वत पद्म सरोवर से निकलने वाली गंगा, सिन्धु, और रोहितास्या नदियों को धारण करता था, जो उत्साह, मंत्र, और प्रभुत्व का प्रतीक थीं। इसके शिखर आकाश को कीलों से रोकते प्रतीत होते थे। देवों के आवास स्वर्ग सा शोभित थे। पर्वत का दोष यह था कि यह छोटे अगुरु वृक्षों को धारण करता था। यह भगवान् वृषभदेव की महिमा और विश्व-विस्तार से तुलनीय था। भरत ने इसकी प्रशंसा की और वृषभाचल देखने लौटे।
वृषभाचल सौ योजन ऊँचा, स्फटिक मणियों से सुशोभित, और देवों-विद्याधरों का निवास था। भरत ने इसे अपने यश का प्रतिबिंब माना। वन का वायु उनका स्वागत करता था। उन्होंने विद्याधरों और किन्नरों के यश-गीत सुने। वृषभाचल की स्फटिक दीवारें विजयलक्ष्मी का दर्पण सी थीं। भरत ने वहाँ असंख्य चक्रवर्तियों के नाम देखे, जिससे उनका अभिमान नष्ट हुआ और संसार को स्वार्थपरायण समझा।
भरत ने एक चक्रवर्ती की प्रशस्ति मिटाकर वृषभाचल पर अपनी प्रशस्ति लिखी, जिसमें वे स्वयं को इक्ष्वाकु वंश का चंद्रमा, वृषभदेव का पुत्र, छह खंडों का शासक, और अठारह करोड़ घोड़ों व चौरासी लाख हाथियों का स्वामी बताया। उन्होंने अपनी कीर्ति को पर्वत पर स्थापित किया। देवों ने फूलों की वर्षा की, और नगाड़ों के शब्द गूँजे। उनकी प्रशस्ति में लेख, साक्षी (देव), और उपभोग क्षेत्र शामिल थे।
भरत की प्रशस्ति चंद्रमा के चिह्नों सा मानी गई। देव और विद्याधर उनकी स्तुति और आशीर्वाद दे रहे थे। भरत गंगापात पहुँचे, जहाँ गंगा का जल हाथियों के मद से मिलकर फाग सा प्रतीत हुआ। गंगा देवी ने अर्घ देकर उनका सत्कार किया, सिंहासन पर बिठाकर गंगा जल से अभिषेक किया, और वस्त्राभूषण भेंट किए। उन्होंने रत्नमय सिंहासन देकर आशीर्वाद दिया और तिरोहित हो गई। भरत ने गंगा किनारे सेवा प्राप्त की।
गंगा किनारे के वनों का वायु, भीलों की स्त्रियों के केश, और मयूरों की पूँछ हिलाता हुआ भरत को सुख दे रहा था। पराजित देशों के राजा उनकी आराधना करते थे। भरत उत्तर भरत क्षेत्र को वश कर विजयार्थ पर्वत की तराई लौटे। उन्होंने सेनापति को पूर्व खंड जीतने की आज्ञा दी। छह माह तक वे वहाँ रहे। विद्याधर राजा नमि और विनमि धन-सामग्री लेकर दर्शन हेतु आए।
नमि और विनमि की भेंट से भरत की इच्छाएँ पूर्ण हुईं। उन्होंने नमि की बहन सुभद्रा से मंगलाचारपूर्वक विवाह किया, जिससे उनका जन्म सफल हुआ। सेनापति ने म्लेच्छ राजाओं को जीतकर जयलक्ष्मी के साथ दर्शन किए। भरत ने उनका सत्कार किया, म्लेच्छ राजाओं को विदा किया, और दक्षिण पृथिवी की ओर प्रस्थान किया। सेना ने काण्डकप्रपात गुफा पार की, और नाट्यमाल देव ने मंगलद्रव्यों से उनकी अगवानी की।
भरत ने नाट्यमाल देव का सत्कार कर विदा किया। विद्याधर आकाशमार्ग से उनकी परिचर्या करते थे। विजयार्थ पर्वत की गुफा से निकलकर भरत सूर्य सा उदित हुए। वायु उनकी सेवा करता था। सेनापति ने म्लेच्छ खंड जीता। भरत ने चिलात, आवर्त, हिमवान् देव, और गंगा-सिन्धु देवियों को जीता, दो भद्रासन प्राप्त किए, और छह खंडों की पृथिवी को पुण्य से वश किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 1 to 12
श्लोक ( Shlok ) 1
अथान्येद्युरुपारूढ संभ्रमैर्बलनायकैः । प्रत्यपाल्यत’ सन्नद्धः प्रयाणसमयः प्रभोः ॥१॥
अथानन्तर- दूसरे दिन जिन्हें जल्दी हो रही है और जो हरएक प्रकारसे तैयार हैं ऐसे सेनापति लोग चक्रवर्तीके चलनेके समयकी प्रतीक्षा करने लगे ॥१॥
“Then, on the following day, the generals—fully prepared and eager to depart—began to await the moment of the Emperor’s march.” (1)
श्लोक ( Shlok ) 2
गजताश्वीयरथ्यानां पादातानां च सङ्कुलैः । न नृपांजिरमेवासीद् रुद्धमद्रेर्वनान्यपि ॥२॥
हाथियोंके समूह की सेना, घोड़ोंके समूह की सेना और पैदल चलनेवाले सैनिक, इन सबकी भीड़से केवल महाराज का आंगन ही नहीं भर गया था किन्तु विजयार्थ पर्वतके वन भी भर गये थे ।।२।।
“The royal courtyard was not alone in being filled by the throngs of elephants, cavalry, and foot soldiers—for even the forests of the Vijayārtha mountain stood crowded with their vast array.” (2)
श्लोक ( Shlok ) 3
जयकुञ्जरमारूढः परीतो नृपकुञ्जरैः। रेजे “निर्वन्प्रयाणाय सम्राट् शक्र इवामरैः ॥३॥
विजयी हाथीपर चढ़ा हुआ और अनेक श्रेष्ठ राजाओंसे घिरा हुआ चक्रवर्ती जब विजयके लिये निकला तब ऐसा सुशोभित हो रहा था जैसा कि ऐरावत हाथीपर चढ़ा हुआ और देवोंसे घिरा हुआ इन्द्र सुशोभित होता है ।।३।।
“Mounted upon a victorious elephant and surrounded by many illustrious kings, the Emperor set forth for conquest, resplendent as Indra himself—seated upon Airāvata and encircled by the gods.” (3)
श्लोक ( Shlok ) 4
किञ्चित् पश्चान्मुखं गत्वा सेनान्या शोधिते पथि । ध्वजिनी सङ्कुचन्त्यासीदीर्याशुद्धि श्रितेव सा ॥४।॥
भरतकी वह सेना कुछ पश्चिमकी ओर जाकर सेनापति के द्वारा शुद्ध किये हुए मार्ग में संकुचित होकर चल रही थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो वह ईर्यापथ शुद्धिको ही प्राप्त हुई हो ।।४।।
“Advancing westward, the army of Bharata, now compressed into the purified path prepared by the general, appeared as though it had attained the sanctity of the īryāpatha itself.” (4)
श्लोक ( Shlok ) 5
प्रगुणस्थानसोपानां रूप्याद्रेः श्रेणिमश्रमात् । मुनेः शुद्धिरिव श्रेणीमा रूढ़ा सा पताकिनी ॥५॥
जिस प्रकार मुनियोंकी विशुद्धता उत्तम गुणस्थान (आठवें, नौवें दशवें रूपी सीढियोंसे युक्त श्रेणी (उपशम श्रेणी अथवा क्षपकश्रेणी) पर चढ़ती है उसी प्रकार चक्रवर्तीकी सेना, जिसपर उत्तम सीधी सीढ़ियां बनी हुई हैं ऐसी विजयार्ध पर्वत की श्रेणीपर जा चढ़ी थी ।।५।।
“Even as the purity of the sages ascends the sublime ladder of spiritual states—those lofty steps of the Upaśama or Kṣapaka progression—so too did the Emperor’s army ascend the terraced heights of the Vijayārtha mountain, where noble and even steps lay carved into its slopes.” (5)
श्लोक ( Shlok ) 6 – 12
तमिस्त्रेति गुहा यासौ गिरिव्याससमायतिः । उच्छ्रिता योजनान्यष्टौ ततोऽर्द्धाधिक विस्तृतिः ॥६॥वाज्रं कपाटयोर्युग्मं या स्वोच्छ्रायमितोच्छ्रिति । दध्र पृथक् स्वविष्कम्भसाधिकद्व्यंशविस्तृतिः ॥७llपरार्ध्य मणिनिर्माणरुचिमद्वारबन्धना । “तदधस्तलनिस्सर्पत्सिन्धुस्रोतोविराजिता ॥८॥ अशक्यीद्धाटनाऽन्येषां मुक्त्वा चक्रिचमूपतिम् । तन्निरर्गलितत्वाज्ञ प्रागेव कृतनिवतिः ॥ ९॥जगत्स्थितिरिवानाद्या घटितेव च केनचित्। जैनी श्रुतिरिवोपात्तगाम्भीर्या मुनिभिर्मता ॥१०॥व्यायता जीविताशेव मूर्च्छेव च तमोमयी। गतेवोल्लाघतां कृच्छ्रान्मुक्तोष्सा शोधितोदरा ॥११॥ कुटीव च प्रसूताया निषिद्धान्यप्रवेशना । कृतरक्षाविधिर्द्वारे धृतमङ्गलसंविधिः ॥१२॥
वहां तमिस्त्रा नामकी वह गुफा थी जो कि पर्वतकी चौड़ाई के बराबर लम्बी थी, आठ योजन ऊंची थी और उससे डेवढ़ी अर्थात् बारह योजन चौड़ी थी जो अपनी ऊँचाईके बराबर ऊंचे और कुछ अधिक छह छह योजन चौड़े वज्रमयी किवाड़ोंके युगल धारण कर रही थी जिसके दरवाजेकी चौखट महामूल्य रत्नोंसे बनी हुई होनेसे अत्यन्त देदीप्यमान थी, जो अपने नीचेसे निकलते हुए सिन्धु नदीके प्रवाहसे सुशोभित थी, चक्रवर्तीके सेनापतिको छोड़कर जिसे और कोई उघाड़ नहीं सकता था, जो सेनापतिके द्वारा पहले ही उघाड़ दी जानेसे शान्त पड़ गई थी-भीतरकी गरमी निकल जानेसे ठण्डी पड़ गई थी। जो यद्यपि जगत्की सृष्टिके समान अनादि थी तथापि किसीके द्वारा बनाई हुईके समान मालूम प्राप्त होती थी, अत्यन्त गम्भीर (गहरी) होनेके कारण जिसे मुनि लोग जिनवाणीके समान मानते थे क्योंकि जिनवाणी भी अन्त्यन्त गम्भीर (गूढ़ अर्थोसे भरी हुई) होती है। जो जीवित रहने की आशाके समान लम्बी थी, मूर्छाके समान अन्धकारमयी थी, गरमी निकल जाने तथा भीतरका प्रदेश शुद्ध हो जानेसे जो नीरोग अवस्थाको प्राप्त हुईके समान जान पड़ती थी, जिसमें चक्रवर्तीकी सेनाको छोड़कर अन्य किसीका प्रवेश करना मना था, जिसके द्वारपर रक्षाकी सब विधि की गई थी, जिसके समीप मंगलद्रव्य रक्खे हुए थे और इसलिये जो प्रसूता (बच्चा उत्पन्न करनेवाली) स्त्रीकी कुटी (प्रसूति गृह) के समान जान पड़ती थी ॥६-१२॥
“There stood the cavern named Tamistrā—as long as the mountain was wide, rising eight yojanas in height and measuring a stately twelve yojanas across. It bore twin doors wrought of adamantine stone, each six yojanas wide and matching or surpassing the height of the cave itself. The threshold, aglow with inlaid jewels of inestimable worth, gleamed with radiant splendor. Beneath it flowed the sacred river Sindhu, enhancing its majesty. No one but the Emperor’s general could unseal its gates, and having been opened beforehand by him, the cave had grown calm—its inner heat released, its atmosphere cooled.
Though beginningless as the cosmos itself, it bore the appearance of having been masterfully wrought by a divine hand. So profound was its depth that sages likened it to the voice of the Jina—dense with layered meaning, silent yet resonant. It was as long as the hope of life itself, as dark as the stupor of unconsciousness, and now, its fevered heat dispelled and its recesses purified, it seemed restored to health. None but the Emperor’s army was permitted entry, for its thresholds were strictly guarded, sanctified with auspicious offerings, and thus did it resemble the birthing chamber of a mother—sacred, secluded, and filled with solemn expectancy.”* (6–12)
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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