आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 |
श्लोक 102 से 111 भगवान की तपस्थिति और धरणेंद्र का आगमन
भगवान वृषभदेव सुमेरु पर्वत से अकंपायमान और दृढ़ थे। उनके शरीर की शांति क्रूर जीवों और इंद्रों से उपासित थी। उनका अंतःकरण ध्यान में निश्चल था। वे समुद्र से गंभीर और दोषरहित थे। धरणेंद्र उनके पास पहुँचा। उसने प्रदक्षिणा, प्रणाम, और स्तुति की। उसने नमि-विनमि से कहा कि वे भयंकर हैं, तपोवन शांत है। उसने भोगों की निंदा की। उसने कहा कि भगवान भोगरहित हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
अकम्प्रस्थितिमुतुङ्गमहासत्वैरुपासितम् । महाद्रिमिव विभ्राणं क्षमाभरसहं वपुः ॥१०२॥
वे भगवान सुमेरु पर्वत के समान उत्तम शरीर धारण कर रहे थे क्योंकि जिस प्रकार सुमेरु पर्वत अकंपायमान रूप से खड़ा है उसी प्रकार उनका शरीर भी अकंपायमान रूप से (निश्चल) खड़ा था, मेरु पर्वत जिस प्रकार ऊँचा होता है उसी प्रकार उनका शरीर भी ऊंचा था, सिंह, व्याघ्र आदि बड़े-बड़े क्रूर जीव जिस प्रकार सुमेरु पर्वत की उपासना करते हैं अर्थात् वहाँ रहते हैं उसी प्रकार बड़े-बड़े क्रूर जीव शांत होकर भगवान् के शरीर की भी उपासना करते थे अर्थात् उनके समीप में रहते थे, अथवा सुमेरु पर्वत जिस प्रकार इंद्र आदि महासत्त्व अर्थात् महाप्राणियों से उपासित होता है उसी प्रकार भगवान् का शरीर भी इंद्र आदि महासत्त्वों से उपासित था अथवा सुमेरु पर्वत जिस प्रकार महासत्त्व अर्थात् बड़ी भारी दृढ़ता से उपासित होता है उसी प्रकार भगवान् का शरीर भी महासत्त्व अर्थात् बड़ी भारी दृढ़ता (धीर-वीरता) से उपासित था, और सुमेरु पर्वत जिस प्रकार क्षमा अर्थात् पृथ्वी के भार को धारण करने में समर्थ होता है उसी प्रकार भगवान् का शरीर भी क्षमा अर्थात् शांति के भार को धारण करने में समर्थ था ।।102।।
The Lord possessed a magnificent body, akin to Mount Sumeru. Just as Sumeru stands firm and unshakable, so too was His body steadfast and motionless. Just as Sumeru is tall and towering, so was His form lofty and grand. Just as fierce creatures like lions and tigers dwell upon Sumeru, appearing as if they revere it, similarly, even the most ferocious beings, pacified, remained near the Lord as if in worship.
Moreover, just as Indra and other mighty celestial beings revere Mount Sumeru, the Lord too was worshiped by such divine beings. Just as Sumeru is worshiped with great steadfastness and unwavering devotion, the Lord was venerated with supreme firmness and heroic resolve. And just as Sumeru supports the weight of the earth with its immense stability, the Lord bore the immense burden of peace and forgiveness with absolute grace. ॥102॥
श्लोक ( Shlok ) 103
योगान्त र्निभृतात्मानमतिगम्भीर चेष्टितम् । निवातस्तिमितस्याब्धेर्न्यक्कुर्वाणं गभीरताम् ॥१०३॥
उस समय भगवान ने अपने अंत:करण को ध्यान के भीतर निश्चल कर लिया था तथा उनकी चेष्टाएँ अत्यंत गंभीर थीं । इसलिए वे वायु के न चलने से निश्चल हुए समुद्र की गंभीरता को भी तिरस्कृत कर रहे थे ।।103।।
At that time, the Lord had completely stilled His inner being in deep meditation, and His demeanor was profoundly serene. Thus, He even surpassed the depth of an unmoving ocean, undisturbed by the wind, in His tranquility. ॥103॥
श्लोक ( Shlok ) 104
परीषहमहावातेरक्षोभ्यमजलाशयम् । दोषयादोभिरस्पृष्टमपूर्वमिव वारिधिम् ॥१०४॥
अथवा भगवान् किसी अनोखे समुद्र के समान जान पड़ते थे क्योंकि उपलब्ध समुद्र तो वायु से क्षुभित हो जाता है परंतु वे परीषहरूपी महावायु से कभी भी क्षुभित नहीं होते थे, उपलब्ध समुद्र तो जलाशय अर्थात् जल है आशय में (मध्य में) जिसके ऐसा होता है परंतु भगवान् जडाशय अर्थात् जड (अविवेक युक्त) है आशय (अभिप्राय) जिनका ऐसे नहीं थे, उपलब्ध समुद्र तो अनेक मगर-मच्छ आदि जल-जंतुओं से भरा रहता है परंतु भगवान् दोषरूपी जल-जंतुओं से छुए भी नहीं गये थे ।।104।।
Or, the Lord appeared like a unique and unparalleled ocean. The ordinary ocean is agitated by the wind, but He remained undisturbed even by the mighty storm of hardships (Parishaha). The common ocean is a vast reservoir of water, but the Lord was not a reservoir of ignorance or delusion (Jadāśaya). While the ocean is filled with countless aquatic creatures like crocodiles, the Lord remained untouched by the creatures of defects and vices. ॥104॥
श्लोक ( Shlok ) 105
सादरं च समासाद्य पश्यन् भगवतो वपुः । विसिष्मिये तपोलक्ष्म्या परिरब्धमधीद्धया ॥१०५॥
इस प्रकार भगवान् वृषभदेव के समीप वह धरणेंद्र बड़े ही आदर के साथ पहुँचा और अतिशय बड़ी हुई तपरूपी लक्ष्मी से आलिंगित हुए भगवान् के शरीर को देखता हुआ आश्चर्य करने लगा ।।105।।
In this way, Dharanendra approached Lord Rishabhadeva with great reverence. Seeing the Lord embraced by the immense wealth of His austerities, he gazed upon His divine form in awe and wonder. ॥105॥
श्लोक ( Shlok ) 106
परीत्य प्रणतोभक्त्या स्तुत्वा च स जगद्गुरुम् । कुमाराविति सोपायमवदत् संवृताकृतिः ॥१०६॥
प्रथम ही उस धरणेंद्र ने जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव की प्रदक्षिणा दी, उन्हें प्रणाम किया, उनकी स्तुति की और फिर अपना वेश छिपाकर वह उन दोनों कुमारों से इस प्रकार सयुक्तिक वचन कहने लगा ।।106।।
First, Dharanendra circumambulated Lord Rishabhadeva, the Supreme Teacher of the world, offered his salutations, and praised Him with devotion. Then, concealing his divine form, he addressed the two young princes with words of wisdom and reason. ॥106॥
श्लोक ( Shlok ) 107
युवां युवानौ दृश्येथे सायुधौ विकृताकृती । तपोवनं च पश्यामि प्रशान्तमिदमूर्जितम् ॥१०७॥
हे तरुण पुरुषों, ये हथियार धारण किये हुए तुम दोनों मुझे विकृत आकार वाले दिखलाई दे रहे हो और इस उत्कृष्ट तपोवन को अत्यंत शांत देख रहा हूँ ।।107।।
“O young men, you both appear to me in a distorted form, armed with weapons, while this supreme forest of austerities remains utterly serene and tranquil.” ॥107॥
श्लोक ( Shlok ) 108
क्वेदं तपोवनं शान्तं क्व युवां भीषणांकृती । प्रकाशतमसोरेष संगमो नन्वसंगतः ॥१०८॥
कहाँ तो यह शांत तपोवन, और कहाँ भयंकर आकार वाले तुम दोनों ? प्रकाश और अंधकार के समान तुम्हारा समागम क्या अनुचित नहीं है ? ।।108।।
“On one hand, there is this peaceful forest of austerities, and on the other, you both with your fierce appearances. Is your presence here not as improper as the union of light and darkness?” ॥108॥
श्लोक ( Shlok ) 109
अहो निन्द्यतरा भोगा यैरस्थानेऽपि योजयेत् । प्रार्थनामर्थिनां का वा युक्तायुक्तविचारणा ॥१०९॥
अहो, यह भोग बड़े ही निंदनीय हैं जो कि अयोग्य स्थान में भी प्रार्थना कराते हैं अर्थात् जहाँ याचना नहीं करनी चाहिए वहाँं भी याचना कराते हैं, सो ठीक ही है क्योंकि याचना करने वालों को योग्य अयोग्य का विचार ही कहाँ रहता है ।।109।।
“Alas! Desires for worldly pleasures are truly condemnable, for they compel one to beg even in the most unsuitable places—where seeking is entirely improper. But indeed, it is no surprise, for those who plead for indulgence lose all sense of what is appropriate and what is not.” ॥109॥
श्लोक ( Shlok ) 110
प्रवाञ्छथो युवां भोगान् देवोऽयंभोगनिःस्पृहः । तद्वा शिलातलेऽम्भोजवाञ्छा चित्रीयतेऽद्य नः ॥११०॥
यह भगवान् तो भोगों से निःस्पृह हैं और तुम दोनों उनसे भोगों की इच्छा कर रहे हो सो तुम्हारी यह शिलातल से कमल की इच्छा आज हम लोगों को आश्चर्ययुक्त कर रही है । भावार्थ―जिस प्रकार पत्थर की शिला से कमलों की इच्छा करना व्यर्थ है उसी प्रकार भोग की इच्छा से रहित भगवान् से भोगों की इच्छा करना व्यर्थ है ।।110।।
“This Lord is completely detached from worldly pleasures, yet you both seek indulgences from Him. Your desire is as astonishing to us as expecting a lotus to bloom from a solid rock.
(Meaning: Just as it is futile to seek lotuses from a stone, it is equally futile to seek pleasures from a Lord who is beyond all desires.)” ॥110॥
श्लोक ( Shlok ) 111
सस्पृहः स्वयमन्यांश्च सस्पृहानेव मन्यते । को नाम स्पृहयेद्धीमान भोगान् पर्यन्ततापिनः ॥१११॥
जो मनुष्य स्वयं भोगों की इच्छा से युक्त होता है वह दूसरों को भी वैसा ही मानता है, अरे, ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो अंत में संताप देने वाले इन भोगों की इच्छा करता हो ।।111।।
“A person who is himself filled with desires assumes that others are the same. But tell me, who among the truly wise would desire these pleasures, which ultimately lead only to suffering?” ॥111॥
श्लोक 112 से 121
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