आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 तप और ज्ञान का अध्ययन
राजकुमार तपरूपी लक्ष्मी के प्रति समर्पित होकर राज्यलक्ष्मी को भूल जाते हैं। उन्होंने द्वादशांग श्रुतस्कंध का अध्ययन कर आत्मा को तप से अलंकृत किया। स्वाध्याय से मन और इंद्रियों का निरोध कर वे आचारांग से मुनि आचरण, सूत्रकृतांग से धर्मक्रियाएं, स्थानाध्ययन से तत्त्वरत्न, समवाय से द्रव्य ज्ञान, व्याख्याप्रज्ञप्ति से प्रश्न-उत्तर, धर्मकथानास से कथाएं, और उपासकाध्ययन से श्रावकाचार का ज्ञान प्राप्त किया। इस प्रकार, वे विशुद्ध चारित्र और ज्ञान से युक्त होकर धर्म का प्रचार करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
तपोलक्ष्म्या परिष्वक्ता मुक्तिलक्ष्म्यां कृतस्पृहाः । ज्ञानसंपत्प्रसक्तास्ते राजलक्ष्मी विसस्मरुः ॥१३२॥
वे राजकुमार तप रूपी लक्ष्मी के द्वारा आलिङ्गित हो रहे थे, मुक्तिरूपी लक्ष्मीमें उनकी इच्छा लग रही थी और ज्ञानरूपी संपदामें आसक्त हो रहे थे। इस प्रकार वे राज्यलक्ष्मीको बिलकुल ही भूल गये थेः ।।१३२।।
Embraced by the Goddess of Austerity, drawn in longing toward the Goddess of Liberation, and absorbed in the wealth of true knowledge, those princes utterly forgot the allure of worldly sovereignty.132
श्लोक ( Shlok ) 133
द्वादशाङ्गश्रुतस्कन्धमधीत्येते महाधियः । तपो भावनयात्मानमलञ्चक्रुः प्रकृष्टया ॥१३३॥
उन महाबुद्धिमानोंने द्वादशाङ्गरूप श्रुतस्कन्धका अध्ययन कर तपकी उत्कृष्ट भावनासे अपने आत्माको अलंकृत किया था ।।१३३।।
Those great sages, endowed with supreme intellect, adorned their souls with the exalted spirit of austerity, having mastered the Dvādaśāṅga—the twelvefold canon of sacred knowledge.133
श्लोक ( Shlok ) 134
स्वाध्यायेन मनोरोधस्ततोऽक्षाणां विनिर्जयः । इत्याकलय्य ते धीराः स्वाध्यायधियमादधुः ॥१३४॥
स्वाध्याय करनेसे मन का निरोध होता है और मनका निरोध होनेसे इन्द्रियोंका निग्रह होता है यही समझकर उन धीरवीर मुनियोंने स्वाध्यायमें अपनी बुद्धि लगाई थी ॥१३४।।
Knowing that through svādhyāya the mind is restrained, and with the restraint of mind the senses are brought under control, those steadfast and heroic sages devoted their intellect wholly to the study of the scriptures.134
श्लोक ( Shlok ) 135
आचाराङ्गेन निःशेषं साध्वाचारमवेदिषुः । चर्याशुद्धि मतो रेजुः रतिक्रम “विवर्जिताम् ॥१३५॥
उन्होंने आचारांगके द्वारा मुनियोंका समस्त आचरण जान लिया था इसीलिये वे अतिचाररहित चर्याकी विशुद्धता को प्राप्त हुए थे ।।१३५।।
Through the Ācārāṅga, they came to know the complete conduct befitting ascetics, and thus attained the purity of discipline, free from all transgressions.135
श्लोक ( Shlok ) 136
ज्ञात्वा सूत्रकृतं सूक्तं निखिलं सूत्रतोऽर्थतः । धर्मक्रियासमाधाने ते दधुः सूत्रधारताम् ॥१३६॥
वे शब्द और अर्थसहित समस्त सूत्रकृतांगको जानकर धर्मक्रियाओं के धारण करनेमें सूत्रधारपना अर्थात् मुख्यताको धारण कर रहे थे ।।१३६॥
Having mastered the entire Sūtrakṛtāṅga—both in word and meaning—they became leaders among the bearers of dharma, upholding its practices with profound authority and insight.136
श्लोक ( Shlok ) 137
स्थानाध्ययन मध्यायशतैर्गम्भीरमब्धिवत् । विगाह्य तत्त्वरत्नानामयुस्ते भेदमञ्जसा ॥१३७॥
जो सैकड़ों अध्यायोंसे समुद्र के समान गम्भीर है ऐसे स्थानाध्ययन नामके तीसरे अंगका अध्ययन कर उन्होंने तत्त्वरूपी रत्नोंके भेद शीघ्र ही जान लिये थे ॥ १३७॥
By studying the third limb, Sthānādhyayana, which is as profound as the ocean with its hundreds of chapters, they swiftly discerned the distinctions of the jewels of truth.137
श्लोक ( Shlok ) 138
समवायाख्यमङ्गं ते समधीत्य सुमेधसः । द्रव्यादिविषयं सम्यक् समवाय मभुत्सत ॥१३८॥
समीचीन वुद्धिको धारण करनेवाले उन राजकुमारोंने समवाय नामके चौथे अंगका अच्छी तरह अध्ययन कर द्रव्य आदिके समूह को जान लिया था ।।१३८ ।।
Those royal princes, possessing sound wisdom, thoroughly studied the fourth limb, Samavāya, and thus came to know the full nature of substances and their various categories.138
श्लोक ( Shlok ) 139
स्वभ्यस्तात्पञ्चमादङ्गाद् व्याख्याप्रज्ञप्ति संज्ञितात् । साध्ववादीधरन् धीराः प्रश्नार्थान् विविधानमी ll१३९ll
अच्छी तरह अभ्यास किये हुए व्याख्याप्रज्ञप्ति नामके पाँचवें अङ्गसे उन धीर-वीर राजकुमारोंने अनेक प्रकारके प्रश्न-उत्तर जान लिये थे ।।१३९॥
Through the well-practiced study of the fifth limb, Vyākhyāpratyakṣa, those steadfast and valiant princes came to know the various forms of questions and answers with clarity and precision.139
श्लोक ( Shlok ) 140
ज्ञातृ धर्मकथां सम्यक् बुद्ध्वा बोद्धृनबोधयन् । धर्म्या कथामसंमोहात्ते यथोक्तं महर्षिणा ॥१४०।।
वे धर्म-कथा नासके छठवें अंगको जानकर और उसका अच्छी तरह अवगम कर महर्षि भगवान् वृषभदेवके द्वारा कही हुई धर्मकथाएं अज्ञानी लोगोंको बिना किसी त्रुटिके ठीक-ठीक बतलाते थे ।।१४०।।
Having understood and thoroughly grasped the sixth limb, Dharmakathānāśa, those wise princes, with perfect clarity, imparted the divine discourses of the great sage, Lord Ṛṣabhadeva, to the ignorant, without error or distortion.140
श्लोक ( Shlok ) 141
तेऽधीत्योपासकाध्यायमङ्गं सप्तममूर्जितम् । निखिलं श्रावकाचारं श्रोतृभ्यः समुपादिशन् ।॥१४१॥
अतिशय श्रेष्ठ उपासकाध्ययन नामके सातवें अङ्गका अध्ययन कर श्रोताओंके लिये समस्त श्रावकाचारका उपदेश दिया था ।। १४१।।
Having studied the seventh limb, Atiśaya-śreṣṭha-Upāsakādhyayana, those exalted sages imparted the complete teachings of the Śrāvakācāra to the listeners, guiding them on the path of supreme devotion 141
श्लोक 142 से 151
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
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