आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161
हथिनियों और बच्चों की क्रीड़ा
हथिनियाँ और उनके बच्चे तालाबों में जल पीकर वन में भोजन के लिए जाते, लताएँ और पत्ते खाते। बच्चे लतागृहों में क्रीड़ा करते। कुछ बच्चे ऊँटों के दूषित जल को नहीं पीते, पर हाथियों के मद युक्त जल को प्रेम से पीते। डरे हुए घोड़े और खच्चरों से सेना में क्षोभ उत्पन्न होता, और सैनिकों के शब्दों से हलचल मचती।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
उत्तारिताखिलपरिच्छदलाघवेन प्रव्यञ्जितद्रुतगतिक्रमलक्ष्यवेगाः । आपातुमम्बुसरसां परितः प्रसस्त्रु रुच्छृङ्खलैरनुगताः कलभैः करिण्यः ॥१५२।।
पलान आदि सब सामान उतार लेनेसे हलकी होकर जिन्होंने जल्दी जल्दी चलकर अपनी शीघ्र गति प्रकट की है, तथा चंचल बच्चे जिनके पीछे पीछे आ रहे हैं ऐसी हथिनियाँ तालाबोंका पानी पीने के लिये चारों ओर से जा रही थीं ।। १५२॥
Relieved of their burdens — howdahs and all — the she-elephants moved swiftly, revealing the swiftness of their natural gait.
From all directions, they made their way toward the ponds to drink, their restless calves playfully trailing behind them. (152)
श्लोक ( Shlok ) 153
प्राक्पीतमम्बु सरसां ‘कृतमौष्ट्रकेण’ स्वोद्गाल’ दूषितमुपात्ततदङ्ग गन्धम् । नापातुमैच्छदुदिदन्य षितोऽपि वर्कः सर्वो हि वाञ्छति जनो विषयं मनोज्ञम् ॥१५३॥
तालाबोंके जिस पानीको पहले ऊँटोंके समूह पी चुके थे, जो ऊंटोंके उगाल से दूषित हो गया था और जिसमें ऊँटोंके शरीरकी गंध आने लगी थी ऐसे पानीको हाथी का बच्चा प्यासा होनेपर भी नहीं पीना चाहता था, सो ठीक ही है क्योंकि सभी कोई अपने मनके विषयभूत पदार्थके अच्छे होनेकी चाह रखते हैं ।। १५३।।
The pond water, already drunk by a herd of camels, had been sullied by their spittle and carried the odor of their bodies. Even though parched with thirst, the young elephant refused to drink it — and rightly so,for all beings naturally desire that the objects of their longing be pure and pleasing to the mind. (153)
श्लोक ( Shlok ) 154
पीतं पुरा गजतया सलिलं मदाम्बु संवासितं सरसिजाकरमेत्य तूर्णम् । प्रीत्या पपुः कलभकाश्च करेणवश्च सम्भोगहेतुरुदितो” हि सगन्ध भावः ॥१५४।।
जिसे पहले हाथियोंके समूह पी चुके थे और जिसमें उनके मद जलकी गंध आ रही है ऐसे पानीको हथिनियाँ तथा उनके बच्चे बहुत शीघ्र तालाबपर जाकर बड़े प्रेमसे पी रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि समानता ही साथ साथ खाने पीने आदि संभोग का कारण होता है ॥ १५४॥
The water that had already been drunk by the herd of elephants, and now carried the scent of their mada-jala — the fragrant ichor of rut — was eagerly and lovingly drunk by the she-elephants and their calves as they hastened to the pond.And rightly so, for it is similarity that gives rise to companionship — in eating, drinking, and even in union. (154)
श्लोक ( Shlok ) 155
पीत्वाऽम्भो व्यपगमितान्तरङ्गतापाः सन्तापं बहिरुदितं सरोवगाहैः ।नीत्वान्तं गजकलभै समं करिण्यः सम्भोक्तुं सपदि वनद्रुमान् विचेरुः ॥१५५।।
जिन्होंने जल पीकर अन्तरङ्गका संताप दूर किया है और तालाबमें घुसकर बाहिरी संताप नष्ट किया है ऐसी हथिनियां अपने बच्चों के साथ खाने के लिये शीघ्र ही वनके वृक्षोंकी ओर चली गई ।। १५५।।
Having quenched their inner heat by drinking the cool waters, and dispelled their outer discomfort by bathing in the pond, the she-elephants, along with their calves, turned swiftly toward the forest trees in search of food. (155)
श्लोक ( Shlok ) 156
वल्लीनां सकुसुमपल्लवाग्रभङ्गान् गुल्मौघानपि सरसां कडङ्गरांश्च । सुस्वादून् मृदुविटपान् वनद्रुमाणां तद्यूथं कवलयति स्म धेनुकानाम् ॥ १५६।।
वह हथिनियोंका समूह लताओंके पुष्पसहित नवीन पत्तोंके अग्रभागोंको, छोटे छोटे पौधोंको, रसीले कड़ंगरि वृक्षोंको और वनके वृक्षोंकी स्वादिष्ट तथा कोमल शाखाओंको खा रहा था ।। १५६।।
The herd of she-elephants feasted upon the tender tips of fresh leaves adorned with climbing vines, small plants, the juicy bark of kaṭaṅgari trees, and the delectable, soft branches of the forest trees. (156)
श्लोक ( Shlok ) 157
कुञ्जषु प्रतनुतृणाङ्कुरान् प्रमृद् नन् वप्रान्तानपि रदनैः शनैर्विनिघ्नन् । वल्ल्यग्रसनचणः फलेग्रहिः सन् व्यालोलः कलभगणश्चिरं विजहे ॥१५७।।
लता-गृहोंमें पतली घासके अंकुरोंको खूंदता हुआ खेतोंकी मेड़को अपने दाँतोंसे धीरे धीरे तोड़ता हुआ, लताओंके अग्रभागके खाने में चतुर तथा फलोंको तोड़ता हुआ वह चंचल हाथियोंके बच्चों का समूह चिरकाल तक क्रीड़ा करता रहा था ।। १५७।।
The playful calves of the elephants, skillfully nibbling at the tender shoots of grass in the vine-dwellings, slowly breaking the borders of the fields with their teeth, and deftly plucking the fruits from the vines, continued to play in this manner for a long time. (157)
श्लोक ( Shlok ) 158
प्रत्यग्राः किसलयिनीर्गृहाण शाखा-भङ्ग्ध्युच्चैर्वनगहनं निषीद कुञ्जे ।सम्भोग्यानु पसरसल्लकीवनान्तानित्येवं व्यहृत” वने करेणुवर्गः ॥१५८॥
पत्तेवाली नवीन लताओंको ग्रहण कर, ऊँची ऊँची शाखाओंसे युक्त सघन वनमें जा, लतागृहमें बैठ और खानेके योग्य सल्लकी वनोंके समीप जा इस प्रकार महावतोंकी आज्ञासे वह हथिनियोंका समूह वनमें इधर-उधर विहार कर रहा था ।।१५८।।
Following the mahouts’ command, the herd of she-elephants, having taken the tender leaves of fresh vines, made their way into the dense forest with tall branches. There, they sat in the vine-dwellings and roamed here and there near the lush, edible sallaki forests. (158)
श्लोक ( Shlok ) 159
सम्भोगैर्वनमिति निर्विशन् यथेष्टं स्वातन्त्र्यांन्मुहुरपि धूर्गतैर्निबद्धः । बद्धव्यः सहकलभः करेणुवर्गः सम्प्रापत् समुचितमात्मनो निवेशम् ॥१५९॥
इस प्रकार जो अनेक प्रकारकी क्रीड़ाओंके द्वारा वनका अपने इच्छा-नुसार उपभोग कर रहा है, स्वतन्त्रतापूर्वक आगे चलनेसे महावत लोग जिसे रोक रहे हैं और जो बाँधनेके योग्य हैं ऐसा वह हथिनियोंका समूह बच्चोंके साथ अपने ठहरने योग्य स्थानपर जा पहुंचा ।।१५९।।
Thus, the herd of she-elephants, indulging in various playful activities and consuming the forest at will, was being restrained by the mahouts from advancing freely. However, being bound by necessity, they made their way with their calves to a place suitable for rest. (159)
श्लोक ( Shlok ) 160
वित्रस्तैरपथमुपाहृतस्तुरङ्गैः पर्यस्तो रथ इह भग्नधू र्निरक्षः । एतास्ता द्रुतमपयान्त्यपेत्य मार्गाद् वारस्त्रीवहनपराश्च वेगसर्यः ॥१६०॥
इधर हाथियोंसे डरे हुए इन घोड़ोंने यह रथ कुमार्गमें ले जाकर पटक दिया है, इसका धुरा और भौंरा टूट गया है तथा वेश्याओंको ले जाने में तत्पर ये खच्चरियाँ अपना मार्ग छोड़कर बहुत शीघ्र भागी जा रही हैं ।॥ १६०॥
Here, frightened by the elephants, the horses have thrown the chariot onto a rough path, its axle and wheel broken. Meanwhile, the mules, eager to carry the courtesans, have abandoned their route and are fleeing swiftly in panic. (160)
श्लोक ( Shlok ) 161
वित्रस्तः” करभनिरीक्षणाद् गजोऽयं भीरुत्वं प्रकटयति प्रधावमानः । उत्त्रस्तात्पतति च बेसरादमुष्माद् विस्त्रस्तस्तनजघनांशुका पुरन्ध्री ॥१६१।।
इधर यह ऊंट देखनेसे डरा हुआ हाथी दौड़ा जा रहा है और उससे अपना डरपोक पना प्रकट कर रहा है तथा इधर जिसके स्तन और जधन परका वस्त्र खिसक गया है ऐसी यह स्त्री डरे हुए खच्चर से गिर रही है ।। १६१।।
Meanwhile, the elephant, terrified by the sight of the camel, is running in fear, revealing its cowardice. On the other side, the woman, whose garment has shifted from her breasts and waist, is falling from the frightened mule in distress. (161)
श्लोक 162 से 169
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151