आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 : नर्मदा नदी और विन्ध्याचल की विजय
भरत ने विन्ध्याचल के मध्य में समुद्र तक फैली नर्मदा नदी देखी, जो पृथ्वी की चोटी या विन्ध्य की विजय-पताका सी लगती थी। सेना के क्षोभ से पक्षियों की पंक्तियाँ उड़ती थीं, मानो तोरण बाँधे गए हों। नर्मदा ने रानियों को क्रीड़ा प्रदान की। सेना ने नर्मदा पार कर विन्ध्याचल के उत्तर में आक्रमण किया। पर्वत दोनों दिशाओं में फैला, मानो स्वयं को अर्पित कर रहा हो। सेना का पड़ाव नर्मदा के किनारों पर विन्ध्याचल सा शोभित था। सेना और पर्वत में समानता थी—हाथियों और गंडोपलों, घोड़ों और किन्नरों के कारण। सेना ने विन्ध्याचल के फल-पत्तों का उपभोग कर इसे वन्ध्याचल बना दिया। सैनिकों ने मोतियों और वाँसी चावलों से जिनेन्द्र की पूजा की।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 30 – Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
मध्येविन्ध्यमथैक्षिष्ट’ नर्मदां सरिदुत्तमाम् । प्रततामिव तत्कीर्तिम् श्रसमुद्रमपारिकाम् ॥८२॥
तदनन्तर उन्होंने विन्ध्याचलके मध्य भागमें समुद्र तक फैली हुई और किसी से न रुकनेवाली उसकी कीर्तिके समान नर्मदा नामकी उत्तम नदी देखी ॥८२॥
Thereafter, he beheld the splendid Narmadā, flowing unceasingly through the heart of the Vindhya, stretching all the way to the sea—her glory unparalleled, like the very emblem of fame itself.82
श्लोक ( Shlok ) 83
तङ्गगितपयोवेगां भुवो वेणीमिवायताम् । पताकामिव विन्ध्याद्रेः शेषाद्रिजयशंसिनीम् ॥८३॥
जिसके जल-का प्रवाह अनेक लहरोंसे भरा हुआ है ऐसी वह नर्मदा नदी पृथिवीरूपी स्त्रीकी लम्बी चोटी-के समान जान पड़ती थी अथवा शेष सब पर्वतोंको जीत लेनेकी सूचना करनेवाली विन्ध्याचल की विजय-पताकाके समान मालूम होती थी ॥८३॥
The Narmadā, whose waters were filled with countless waves, appeared as though she were the long braid of the Earth herself, or like the victory-banner of Vindhya—proclaiming the conquest of all other mountains.83
श्लोक ( Shlok ) 84
सा धुनी बलसंक्षोभादुड्डीनविहगावलिः । विभोरुपागमे बद्धतोरणेव क्षणं व्यभात् ॥८४॥
सेनाके क्षोभसे जिसके ऊपर पक्षियोंकी पंक्तियां उड़ रही हैं ऐसी वह नदी क्षण भरके लिये ऐसी जान पड़ती थी मानो उसने चक्रवर्ती के आनेपर तोरण ही बांधे हों ।॥८४।।
That river, disturbed by the turmoil of the army, seemed for a brief moment as though she had adorned herself with festoons of victory, as if to welcome the arrival of the emperor, like a triumphal arch awaiting the entry of a sovereign.84
श्लोक ( Shlok ) 85
नर्मदा सत्यमेवासीन्नर्मदा नृपयोषिताम् । “यदुपोरूत्तरन्तीस्ताः शफरीभिरघट्टयत् ॥८५॥
चूंकि वह नर्मदा नदी जलको पार करनेवाली रानियों के लिये मछलियों के द्वारा धक्का देती थी इसलिये वह सचमुच ही उन्हें नर्मदा अर्थात् क्रीड़ा प्रदान करनेवाली हुई थी ।।८५।।
Since the Narmadā river, by the force of its waters, would push the queens who sought to cross it, she truly became the one who bestowed narmadā—the gift of play, as though offering them a sportive challenge.85
श्लोक ( Shlok ) 86
तामुत्तीर्य जनक्षोभादु त्पतत्पतगावलिम् । बलं विन्ध्योत्तरप्रस्थाना क्रामत् कुतुपास्थया ॥८६॥
मनुष्योंके क्षोभसे जिसके पक्षियोंकी पंक्ति ऊपरको उड़ रही है ऐसी उस नर्मदा नदीको पार कर उस सेनाने देहली समझकर विन्ध्याचल के उत्तरकी ओर, आक्रमण किया ॥८६॥
Crossing the Narmadā, whose flocks of birds rose in flight, disturbed by the commotion of men, the army, treating the northern slopes of Vindhya as its gateway, proceeded to mount its assault.86
श्लोक ( Shlok ) 87
तस्या ‘दक्षिणतोऽपश्यद् विन्ध्य मुत्तरतोऽप्यसौ । ‘द्विधाकृतमिवात्मानमपर्यन्तं दिशोर्द्वयोः ॥८७॥
वहां भरतने दक्षिण और उत्तर दोनों ही ओर विन्ध्याचलको देखा, उस समय दोनों ओर दिखाई देनेवाला वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानों अपने दो भाग कर दोनों दिशाओंको ही अर्पण कर रहा हो ॥८७॥।
There, Bharata beheld the Vindhya stretching both to the south and to the north. At that moment, the mountain appeared as though it were dividing itself, offering both its halves to the directions on either side.87
श्लोक ( Shlok ) 88
स्कन्धावारनिवेशोऽस्य नर्मदामभितोऽद्युतत् । प्रथिम्ना विन्ध्यमावेष्टय स्थितो विन्ध्य इवापरः ॥८८॥
भरतकी सेनाका पड़ाव नर्मदा नदी के दोनों किनारोंपर था और वह ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो अपने विस्तारसे विन्ध्याचल को घेरकर कोई दूसरा विन्ध्याचल ही ठहरा हो ।।८८।।
The camp of Bharata’s army was set upon both banks of the Narmadā, and it shone with such splendor that it seemed as though, by its vastness, it had encircled the Vindhya itself, becoming, in its own right, another Vindhya standing in the midst.88
श्लोक ( Shlok ) 89
गजैर्गण्डोपलेरश्वैःरश्ववक्त्रैश्च विद्रुतैः । स्कन्धावारः स विन्ध्यश्च भिदां” नावापतुर्मिथः ॥८९॥
उस समय सेनाका पड़ाव और विन्ध्या-चल दोनों ही परस्परमें किसी भेद (विशेषता) को प्राप्त नहीं हो रहे थे क्योंकि जिस प्रकार सेनाके पड़ाव में हाथी थे उसी प्रकार विन्ध्याचलमें भी हाथियों के समान ही गंडोपल अर्थात् बड़ी बड़ी काली चट्टानें थी और सेनाके पड़ावमें जिस प्रकार अनेक घोड़े इधर उधर फिर रहे थे उसी प्रकार उस विन्ध्याचलमें भी अनेक अश्ववक्त्र अर्थात् घोड़ोंके मुखके समान मुखबाले किन्नर जातिके देव इधर-उधर फिर रहे थे (कवि-सम्प्रदायनें किन्नरोंके मुखोंका वर्णन घोड़ों के मुखोंके समान किया जाता है) ।॥८९॥
At that time, there seemed to be no distinction between the camp of the army and the Vindhya itself, for just as the camp was filled with elephants, so too did the Vindhya harbor great black boulders, resembling mighty elephants. And just as many horses wandered hither and thither in the camp, so did numerous Aśvavaktras—deities of the Kinnara race, whose faces were like those of horses—move about in the Vindhya, their forms drifting like a celestial procession. (The poetic tradition often likens the faces of Kinnaras to the faces of horses.)89
श्लोक ( Shlok ) 90
बलोपभुक्तनिःशेष फलपल्लवपादपः । अप्रसूनलतावीरुद्विन्ध्यो वन्ध्यस्तदाभवत् ॥९०॥
सेनाने उस विन्ध्याचलके समस्त फल पत्ते और वृक्षोंका उपभोग कर लिया था और लताओं तथा छोटे छोटे पौधोंको पुष्परहित कर दिया था इसलिये वह विन्ध्याचल उस समय वन्ध्याचल अर्थात् फल-पुष्प आदिसे रहित हो गया था ।॥९०॥
The army consumed all the fruits, leaves, and trees of the Vindhya, stripping the vines and tender plants of their blossoms; and thus, at that time, the Vindhya became a Vandhyāchal—a barren mountain, bereft of its natural bounty.90
श्लोक ( Shlok ) 91
वैणवैस्तण्डुलैर्मुक्ताफलमिश्रै कृतार्चनाः । अध्यूषु सैनिकाः स्वरं रम्या विन्ध्याचलस्थलीः ॥९१।।
मोतियोंसे मिले हुए वांसी चावलों से जिनेन्द्रदेवकी पूजा करते हुए सैनिक लोगोंने वहाँ इच्छानुसार निवास किया था सो ठीक ही है क्योंकि विन्ध्याचलपर रहना बहुत ही रमणीय होता है ॥९१।।
There, the soldiers dwelt at their ease, worshipping the blessed Lord Jina with offerings of fragrant rice mingled with pearls—and rightly so, for to dwell upon the Vindhya is in itself a most delightful experience.91
श्लोक 92 से 101
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81