आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 21 बाहुबली के अहंकार का विश्लेषण और दूत प्रेषण
भरत विचार करते हैं कि बाहुबली को शांतिपूर्ण साधनों से भी वश करना कठिन है, क्योंकि वह प्रेम से और अधिक क्रोधित होता है। अन्य राजकुमारों ने वन में जाने की इच्छा जताई, पर बाहुबली का अहंकार कुल को भस्म करने वाली अग्नि-सा है। पहले कोमल वचनों से उसकी परीक्षा लेंगे, और यदि वह न माने तो आगे की कार्रवाई पर विचार करेंगे। इसके लिए वे एक कुशल दूत को बाहुबली के पास भेजते हैं, जो निःसृष्टार्थ और मंत्र में निपुण है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
सोऽभेद्यो नीतिचुञ्चत्वाद् दण्डसाध्यो न विक्रयी। नैष सामप्रयोगस्य विषयो विकृताशयः ॥१२॥
वह नीतिमें चतुर होने-से अभेद्य है, अर्थात् फोड़ा नहीं जा सकता, पराक्रमी है इसलिये युद्धमें भी वश नहीं किया जा सकता और उसका आशय अत्यन्त विकारयुक्त हो रहा है इसलिये उसके साथ शान्तिका भी प्रयोग नहीं किया जा सकता। भावार्थ उसके साथ भेद, दण्ड और साम तीनों ही उपायों-से काम लेना व्यर्थ है ।।१२।।
He is invulnerable through his cunning in statecraft—he cannot be pierced. He is valiant in battle—thus, he cannot be subdued by force. And his intentions are thoroughly corrupted—hence, conciliation is futile.
In essence, the means of dissension (bheda), punishment (daṇḍa), and alliance (sāma) are all rendered ineffective against him.12
श्लोक ( Shlok ) 13
ज्वलत्येव स तेजस्वी स्नेहेनोपकृतोऽपि सन् । वृताहुति प्रसेकेन यथेद्धार्चिर्मखानिलः ॥१३॥
जिस प्रकार यज्ञकी अग्नि घीकी आहुति पड़नेसे और भी अधिक प्रज्वलित हो उठती है उसी प्रकार वह तेजस्वी बाहुबली स्नेह अर्थात् प्रेमसे उपकृत होकर और भी अधिक प्रज्वलित हो रहा है क्रोधित हो रहा है ।।१३।।
Just as the sacred fire of a sacrifice flares ever higher when offered oblations of ghee, even so does that radiant warrior, endowed with might, blaze all the more fiercely when met with affection—he grows yet more inflamed, yet more wrathful.13
श्लोक ( Shlok ) 14
स्वभावपरुषे चास्मिन् प्रयुक्तं साम नार्थकृत् । वपुषि द्विरदस्येव योजितं ‘त्वच्यमौषधम् ।।१४।।
जिस प्रकार हाथीके शरीरपर लगाई हुई चमड़ा को कोमल करनेवाली औषधि कुछ काम नहीं करती उसी प्रकार स्वभावसे ही कठोर रहनेवाले इस बाहुबली के विषयमें साम उपायका प्रयोग करना भी कुछ काम नहीं देगा ।।१४।।
Just as the unguent meant to soften the hide proves of no effect upon the rugged skin of an elephant, even so does the gentle means of conciliation avail nothing when applied to this mighty one, whose very nature is stern and unyielding.14
श्लोक ( Shlok ) 15
प्रायो व्याख्यात एवास्य भावः शेषैः कुमारकैः । “मदाज्ञाविमुखैस्त्यक्त राज्यभोगैर्वनोन्मुखैः ॥१५॥
जो मेरी आज्ञासे विमुख हैं, जिन्होंने राज्यभोग छोड़ दिये हैं और जो वनमें जाने के लिये उन्मुख हैं ऐसे बाकी समस्त राजकुमारोंने इसका अभिप्राय प्रायः प्रकट ही कर दिया है ।।१५।।
Those princes who have turned away from my command, who have renounced the pleasures of royal dominion, and who now incline toward the forest path—they have, in truth, all but declared their intent openly.15
श्लोक ( Shlok ) 16
भूयोऽप्यनुनयैरस्य परीक्षिष्यामहे मतम् । तथाप्यप्रणते तस्मिन् विधेयं चिन्त्यमुत्तरम् ॥१६॥
यद्यपि यह सब है तथापि फिर भी कोमल वचनोंके द्वारा उसकी परीक्षा करेंगे। यदि ऐसा करनेपर भी नम्रीभूत नहीं हुआ तो फिर आगे क्या करना चाहिये इसका विचार करना चाहिये ।।१६।।
Though all this be so, still, we shall first test him with gentle words.
And if even then he yields not to humility, then must we deliberate upon what course is to be taken thereafter.16
श्लोक ( Shlok ) 17
ज्ञातिव्याज निगूढान्तर्विक्रियो निष्प्रतिक्रियः । सोऽन्तर्ग्रहोत्थितो वह्निरिवाशेषं दहेत् कुलम् ॥१७॥
भाईपने के कपट से जिसके अन्तरङ्ग में विकार छिपा हुआ है और जिसका कोई प्रतिकार नहीं है ऐसा यह बाहुबली घरके भीतर उठी हुई अग्नि के समान समस्त कुल को भस्म कर देगा ।।१७।।
Harboring deceit beneath the guise of brotherhood, with corruption lurking deep within and no force capable of restraining him—this mighty-armed one is like a fire kindled within the house, destined to consume the entire lineage to ashes.17
श्लोक ( Shlok ) 18
अन्तः प्रकृतिजः कोपो विघाताय प्रभोर्मतः । तरुशाखाग्रसंघट्टजन्मा वह्निर्यथा गिरेः ॥१८॥
जिस प्रकार वृक्षोंकी शाखाओंके अग्रभाग की रगड़से उत्पन्न हुई अग्नि पर्वतका विघात करनेवाली होती है उसी प्रकार भाई आदि अन्त रङ्ग प्रकृतिसे उत्पन्न हुआ प्रकोप राजाका विघात करनेवाला होता है ।।१८।।
Just as fire kindled by the friction of branches can bring ruin even to the mighty mountain,so too does wrath born of close kin—brothers and kindred by nature—become the very force that brings about the downfall of a king.18
श्लोक ( Shlok ) 19
तदाशु प्रतिकर्तव्यं स बली वक्रतां श्रितः । क्रूरे ग्रह इवामुष्मिन् प्रशान्ते शान्तिरेव नः ॥१९॥
यह बलवान् बाहुबली इस समय प्रतिकूलताको प्राप्त हो रहा है इसलिये इसका शीघ्र ही प्रतिकार करना चाहिये क्योंकि क्रूर ग्रहके समान इसके शान्त हो जानेपर ही मुझे शान्ति हो सकती है ॥ १९।।
This mighty-armed one now turns adversarial, and thus must he be swiftly countered;for, like a fierce and malevolent planet, only upon his pacification shall peace return to me.19
श्लोक ( Shlok ) 20
इति निश्चित्य कार्यज्ञं दूतं मन्त्रविशारदम् । तत्प्रान्तं प्राहिणोच्चक्री निसृष्टार्थतयाऽन्वितम् ॥२०॥
ऐसा निश्चय कर चक्रवर्तीने कार्यको जाननेवाले मन्त्र करनेमें चतुर तथा निःसृष्टार्थतासे सहितदूतको बाहुबली के समीप भेजा। भावार्थ-जिस दूतके ऊपर कार्य सिद्ध करनेका सब भार सौंप दिया जाता है वह निःसृष्टार्थ दूत कहलाता है। यह दूत स्वामीके उद्देश्यकी रक्षा करता हुआ प्रसङ्गानुसार कार्य करता है। चक्रवर्ती भरतने ऐसा ही दूत बाहुबलीके पास भेजा था ॥२०॥
Having thus resolved, the Emperor dispatched to Bāhubalī a messenger—wise in the ways of diplomacy, skilled in discerning the heart of affairs, and endowed with niḥsṛṣṭārthatā—the rare quality of bearing full responsibility for the mission’s success.
Such a messenger, entrusted wholly with the king’s purpose, acts with discretion, upholding his master’s intent through word and deed alike. It was such an envoy that Emperor Bharata sent to Bāhubalī.20
श्लोक ( Shlok ) 21
उचितं’ युग्यमारूढो वयसा नातिकर्कशः । अनुद्धतेन वेषेण प्रतस्थे स तदन्तिकम् ॥२१॥
जो उमरमें न तो बहुत छोटा था और न बहुत बड़ा ही था ऐसा वह दूत अपने योग्य रथ पर सवार होकर नम्रताके वेष से बाहुबली के समीप चला ॥२१॥
Neither too young nor yet advanced in years, the messenger, poised in the prime of life, ascended his worthy chariot and set forth—adorned in the garb of humility, he journeyed to the presence of Bāhubalī.21
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11
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