आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
श्लोक 112 से 121 स्वाभिमान और यश की रक्षा
बाहुबली कहते हैं कि स्वयं की भुजाओं से अर्जित फल ही प्रशंसनीय है, न कि दूसरों की कृपा से प्राप्त ऐश्वर्य। जो राजा दूसरों की आज्ञा से लक्ष्मी धारण करता है, वह “राजा” शब्द को व्यर्थ करता है। अपमानित विभूति धारण करना पशु के समान है। अभिमान की रक्षा यश को सुशोभित करती है। बाहुबली दूत की स्तुति को निंदा का रूप मानते हैं, जो पंडितों द्वारा नीरस वस्तु को भी पुष्ट करने जैसा है। वे भरत की दिग्विजय को वचनाडंबर और कुम्हार की चाल बताते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
स्वदोर्द्रु मफलं श्लाध्यं यत्किञ्चन मनस्विनाम । न चातुरन्तमप्यैश्यं परभ्रू लतिकाफलम् ॥ ११२॥
तेजस्वी मनुष्योंके लिये जो कुछ थोड़ा-बहुत अपनी भुजारूपी वृक्षका फल प्राप्त होता है वही प्रशंसनीय है, उनके लिये दूसरेकी भौंह-रूपी लताका फल अर्थात् भौंहके इशारेसे प्राप्त हुआ चार समुद्रपर्यन्त पृथिवीका ऐश्वर्य भी प्रशंसनीय नहीं है ।।११२।।
For the valiant, even the modest fruit borne of their own arm-like tree is worthy of praise;but the wealth of an empire stretching to the four seas, gained by the mere beckoning of another’s brow—such a gift is unworthy of honor in their eyes.112
श्लोक ( Shlok ) 113
पराज्ञोपहतां लक्ष्मी यो वाञ्छेत् पार्थिवोऽपि सन् । सोऽपार्थयति’ तामुक्तिं सर्पोक्तिमिव डुण्डुभः ॥११३॥
जिस प्रकार पनया साँप ‘सर्प’ इस शब्दको व्यर्थ ही धारण करता है उसी प्रकार जो मनुष्य राजा होकर भी दूसरेकी आज्ञासे उपहृत हुई लक्ष्मीको धारण करता है वह ‘राजा’ इस शब्दको व्यर्थ ही धारण करता है ।। ११३।।
Just as the water-snake bears the name serpent in vain,
so too doth that man who, though called a king, holds stolen fortune at another’s command—he bears the title Rājā without merit or meaning.113
श्लोक ( Shlok ) 114
परावमानमलिनां भूर्ति धत्ते नृपोऽपि यः । नृपशोस्तस्य नन्वेष भारो राज्यपरिच्छदः ॥११४।।
जो पुरुष राजा होकर भी दूसरे के अपमानसे मलिन हुई विभूतिको धारण करता है निश्चयसे उस मनुष्यरूपी पशुके लिये यह राज्यकी समस्त सामग्री भारके समान है ॥११४॥
The man who, though a king, accepts glory tarnished by another’s insult—verily, for such a man-beast, all the riches and splendour of the kingdom are but a grievous burden.114
श्लोक ( Shlok ) 115
मानभङगार्जितैर्भोगैर्यः प्राणान्धर्तुमीहते । तस्य भग्नरदस्येव द्विरदस्य कुतो भिदा ॥११५॥
जिसके दाँत टूट गये हैं ऐसे हाथीके समान जो पुरुष मानभंग होनेपर प्राप्त हुए भोगोपभोगोंसे प्राण धारण करना चाहता है उस पुरुषमें और पशुमें भेद कैसे हो सकता है ? ॥११५॥
What difference remains between man and beast, if a man—his honour shattered—still seeks to sustain his life through pleasures and luxuries,like an elephant whose tusks are broken, yet clings to existence through mere indulgence?115
श्लोक ( Shlok ) 116
छत्रभङगाद्विनाप्यस्य छायाभङगोऽभिलक्ष्यते । यो मानभङ्गाभारेण बिभर्त्यवनतं शिरः ॥११६॥
जो राजा मानभंगके भारसे झुके हुए शिरको धारण करता है उसकी छायाका नाश छत्रभंग होनेके बिना ही हो जाता है। भावार्थ-यहाँ छाया शब्दके दो अर्थ हैं अनातप और कान्ति । जब छत्रभंग होता है तभी छाया अर्थात् अनातप का नाश होता है परन्तु यहांपर छत्रभंगके बिना ही छायाके नाशका वर्णन किया गया है इसलिये विरोध मालूम होता है परन्तु छत्र भंगके बिना ही उनकी छाया अर्थात् कान्तिका नाश हो जाता है, ऐसा अर्थ करनेसे उसका परिहार हो जाता है ।। ११६ ।।
The king who bears a head bowed under the weight of dishonour—his shadow withers away even without the breaking of his royal parasol.For here, “shadow” means not merely shelter from the sun, but also his radiant glory, which fades not from loss of crown alone, but from the fall of dignity itself.116
श्लोक ( Shlok ) 117
मुनयोऽपि ‘समानाश्चेत् त्यक्तभोगपरिच्छदाः । को नाम राज्यभोगार्थी पुमानुज्झेत् समानताम् ।।११७॥
जिन्होंने भोगोपभोग की सब सामग्री छोड़ दी है ऐसे मुनि भी जब अभिमान (आत्मगौरव) से सहित होते हैं तब फिर राज्य भोगनेकी इच्छा करनेवाला ऐसा कौन पुरुष होगा जो अभिमानको छोड़ देगा ? ॥११७॥
Even sages, who have renounced all pleasures and possessions, remain adorned with pride and self-regard;then who, having the desire to rule a kingdom, would ever cast aside pride?117
श्लोक ( Shlok ) 118
वरं वनाधिवासोऽपि वरं प्राणविसर्जनम् । कुलाभिमानिनः पुंसो न पराज्ञाविधेयता ॥ ११८ ॥
वनमें निवास करना अच्छा है और प्राणोंको छोड़ देना भी अच्छा है किन्तु अपने कुलका अभिमान रखनेवाले पुरुषको दूसरेकी आज्ञाके आधीन रहना अच्छा नहीं है ।॥ ११८ ॥
To dwell in the forest is noble, and to lay down one’s very life is also commendable—but for a man who upholds the honour of his lineage, to live under the command of another is never worthy nor acceptable.118
श्लोक ( Shlok ) 119
मानभेवाभिरक्षन्तु धीराः प्राणैः प्रणश्वरैः । नन्वलंकुरुते विश्वं शश्वन्मानार्जितं यशः ॥११९॥
धीर वीर पुरुषोंको चाहिये कि वे इन नश्वर प्राणोंके द्वारा अभिमानकी ही रक्षा करें क्योंकि अभिमान के साथ कमाया हुआ यश इस संसारको सदा सुशोभित करता रहता है ॥ ११९॥
The steadfast and the brave must guard their honour even at the cost of these perishable lives,for the glory earned through pride and self-respect adorns this world forever.119
श्लोक ( Shlok ) 120
“चारु चक्रधरस्यायं त्वयाऽत्युक्तः पराक्रमः । कुतो यतोऽर्थवादोऽयं स्तुतिनिन्दापरायणः ॥१२०॥
तूने जो बहुत कुछ बढ़ाकर चक्रवर्ती के पराक्रमका वर्णन किया है सो ठीक है क्योंकि तेरा यह सब कहना स्तुति निन्दा में तत्पर है अर्थात् स्तुतिरूप होकर भी निन्दाको सूचित करनेवाला है ।।१२०।।
Thou hast indeed greatly magnified the prowess of the Emperor—and rightly so,for all thy words, though garbed in praise, are swift to reveal censure; they are praise in form, yet mockery in essence. 120
श्लोक ( Shlok ) 121
वचोभिः पोषयन्त्येव पण्डिताः परिफल्ग्वपि। प्रक्रान्तायां स्तुताविष्टः सिंहो ग्राममृगो ननु ॥ १२१॥
पण्डित लोग निःसार वस्तुको भी अपने वचनोंसे पुष्ट किया ही करते हैं सो ठीक ही है क्योंकि स्तुति प्रारम्भ करनेपर कुत्तेको भी सिंह कहना पड़ता है ॥ १२१ ॥
The learned often lend weight even to the worthless through their words—and rightly so,for once the work of praise begins, even a dog must be hailed as a lion.121
श्लोक 122 से 131
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
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