आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231
श्लोक 232 से 241 चंद्रमा का अस्त और जिनेन्द्र की स्तुति
चंद्रमा अंधकाररूपी हाथियों को भेदकर अस्ताचल में छिपता है, मानो सिंह-सा गुहा में प्रवेश करता हो। सूर्योदय के साथ हंस, सारस, और चकवियां सरोवरों में लौटते हैं। प्रभात की हवा वृक्षों को हिलाती और कमलों के पराग को फैलाती है। बंदीजन बाहुबली को जिनेन्द्र की स्तुति से प्रेरित करते हैं। वे वृषभदेव की जय-जयकार करते हैं, जिन्होंने कामदेव को जीता, पाप धोया, और जिनके चरण इंद्रों द्वारा पूजित हैं। उनकी आत्मा मुक्तिरूपी सुख देती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 232 to 241
श्लोक ( Shlok ) 232
तिमिरकरिणां यूथ भित्वा तदस्रपरिप्लुता-मिव तनुमयं बिभुच्छोणां निशाकरकेसरी ।वनमिव नभः क्रान्त्वाऽस्ताद्रेर्गु हागहनान्यतः श्रयति नियतं ‘निद्रासङ्गाद् विजिह्मिततारकः ॥२३२॥
जो अन्धकाररूपी हाथियोंके समूहको भेदन कर उनके रक्तसे ही तर हुएके समान लाल लाल दिखनेवाले शरीर (मण्डल) को धारण कर रहा है तथा नींद आ जानेसे जिसकी नक्षत्ररूपी आंखोंकी पुतलियां तिरोहित अथवा कुटिल हो रही हैं ऐसा यह चन्द्रमारूपी सिंह वनके समान आकाशको उल्लंघन कर अब अस्ताचलकी गुहारूप एकान्त स्थानका निश्चित रूपसे आश्रय ले रहा है ।॥ २३२।।
Clad in a form crimsoned as though stained by the blood of a herd of darkness-elephants it has pierced,
its star-like eyes now dimmed or turned askew by the onset of slumber —thus does this lion-like Moon, having leapt across the forest-like sky,now surely seek refuge in the cave-like seclusion of the western mount.232
श्लोक ( Shlok ) 233
सरति सरसीतीरं हंसः ससारसकूजितं झटिति घटते कोकद्वन्द्वं विशापमिवाधुना ।पतति पततां वृन्दं विष्वक् द्रुमेषु कृतारुतं गतमिव जगत्प्रत्यापत्तिं समुद्यति भास्वति ॥ २३३॥
सूर्य उदय होते ही हंस, सारस पक्षियोंकी बोलीसे सहित सरोवरके किनारे पर जा रहे हैं, चकवा चकवियों के जोड़े परस्परमें इस प्रकार मिल रहे हैं मानो अब उनका शाप ही दूर हो गया हो, पक्षियोंके समूह चारों ओर शब्द करते हुए वृक्षोंपर पड़ रहे हैं और यह जगत् फिरसे अपने पहले रूपको प्राप्त हुआ सा जान पड़ता है ॥ २३३॥
With the rising of the Sun, the swans and cranes, accompanied by their melodious cries, make their way to the lake’s edge;
the pairs of chakravāka birds unite once more, as though the curse that parted them has now been lifted;flocks of birds alight upon the trees, filling the air with vibrant sounds—and the world appears as though it has returned to its primal, harmonious form once again.233
श्लोक ( Shlok ) 234
उदयशिखरिग्रावश्रेणीसरोरुहरागिणी गगनजलधेरातन्वाना’ प्रवालवनश्रियम् ।दिगिभवदने सिन्दूर श्रीरलक्तकपाटला प्रसरतितरां सन्ध्यादीप्तिर्दिगाननमण्डनी ॥२३४।।
उदयाचलकी चट्टानोंपर पैदा होनेवाले कमलोंके समान लाल तथा आकाशरूपी समुद्रमें मूंगाके वनकी शोभा फैलाती हुई, दिशारूपी हाथियों के मुखपर सिन्दूरके समान दिखने वाली, महावरके समान गुलाबी और दिशाओंके मुखोंको अलंकृत करनेवाली यह प्रभात-संध्याकी कान्ति चारों ओर बड़ी तेजीसे फैल रही है ॥ २३४।।
Crimson like lotuses blooming upon the rocky slopes of the eastern mount,casting the splendour of coral forests across the ocean-like sky,appearing as vermilion upon the faces of the elephant-like quarters,rosy as lac-dye, adorning the countenances of the directions—this radiant glow of dawn’s twilight now swiftly spreads on every side. 234
श्लोक ( Shlok ) 235
कमलमलिनी नालं वेष्टुं बत प्रविकस्वरं गतमरुणतां बालार्कस्य प्रसारिभिरंशुभिः । परिगतमिव प्रादुप्यद्भि कणैरनिलार्चिषां नियतविपदं धिग् व्यामूर्ढि विवेकपराङ्मु खीम् ।।२३५॥
हे नाथ, यह खिला हुआ कमल काल सूर्यकी फैलने-वाली किरणोंसे लाल लाल हो रहा है और ऐसा मालूम होता है मानो अग्निके फैलते हाए, फुलिगों-से व्याप्त ही हो रहा हो तथा इसी भयसे यह भूमरी उसमें प्रवेश करनेके लिये समर्थ नहीं हो रही है। आचार्य कहते हैं कि जिसमें आपत्ति सदा निश्चित रहती है और जो विवेकसे पराङ्मुख है ऐसी मूर्खताको धिक्कार है ॥ २३५॥
O Lord, this blooming lotus grows crimson beneath the spreading rays of the fierce Sun,as though it were being consumed by flames swelling with tufts of fire;and perchance for fear of this, the black bee dares not enter its heart.The preceptor declares: Fie upon that folly which turns its face from discernmentand ever rushes toward that wherein peril is assured!235
श्लोक ( Shlok ) 236
उपनततरूनाधुन्वाना विलोलितषट्पदाः कृतपरिचया वीचीचक्रैः सरस्सु सरोरुहाम् । ‘रतिपरिमलानाकर्षन्तः सरोजरजो जडाः” प्रतिदिशममी मन्दं वान्ति प्रगेतनमारुताः ॥२३६।।
हे राजन्, जो उपवनके वृक्षोंको हिला रहा है, भ्रमरोंको चंचल कर रहा है, जिसने कमलों के तालाबमें लहरोंके साथ परिचय प्राप्त किया है, जो स्त्री-पुरुषोंके संभोगकी सुगन्धिको खींच रहां है और जो कमलों के परागसे भारी हो रहा है ऐसा यह प्रातःकालका वायु सब दिशाओंमें धीरे धीरे बह रहा है ॥ २३६॥
O King, this morning breeze—which stirs the trees of the pleasure-garden,sets the bees to restless motion,has grown familiar with the ripples in the lotus-laden ponds,draws in the fragrance of lovers’ unions,and carries the weight of lotus-pollen—now gently drifts across all quarters of the sky.236
श्लोक ( Shlok ) 237
नृपवर जिनभर्तुर्मङगलैरेभिरिष्टै प्रकटितजयघोषैस्त्वं विबुध्यस्व भूयः । भवति निखिलविघ्नप्रप्रशान्तिर्यतस्ते रणशिरसि जयश्रीकामिनी कामुकस्य ॥ २३७।।
हे राजाओंमें श्रेष्ठ, जिनमें जय जयकी घोषणा प्रकट रूपसे की गई है ऐसे जिनेन्द्र भगवान्के इन इष्ट मंगलोंसे आप फिरसे जग जाइये क्योंकि इन्हीं मंगलोंके द्वारा रणके अग्रभागमें विजयलक्ष्मी रूपी स्त्रीको चाहनेवाले आपके समस्त विघ्नोंकी अच्छी तरह शान्ति होगी ।।२३७।।
O foremost among kings, arise once more, awakened by these auspicious and sacred signs of the Blessed Jina—he to whom the resounding cries of “Victory! Victory!” are rightfully offered.
For it is through these very omens that all obstacles shall be pacified,and the goddess of victory, sought by warriors at the vanguard of battle,shall graciously favour you.237
श्लोक ( Shlok ) 238
जयति दिदिजनाथैः प्राप्तपूजर्द्धरर्हन् धुतदुरितपरागो वीतरागोऽपरागः । कृतनतिशतयज्व प्रज्वलन्मौलिरत्न-“च्छुरितरुचिररोचिर्मञ्जरीपिञ्जराङघ्रिः ॥ २३८॥
अनेक इन्द्रोंके द्वारा जिन्हें पूजाकी ऋद्धि प्राप्त हुई है, जिन्होंने पापरूपी धूल नष्ट कर डाली है, जो वीतराग हैं-जिन्होंने रागद्वेष नष्ट कर दिये हैं और नमस्कार करते हुए इन्द्रों के देदीप्य-मान मुकुटके रत्नोंसे मिली हुई सुन्दर किरणोंकी मंजरीसे जिनके चरण कुछ कुछ पीले हो रहे हैं ऐसे श्री अर्हन्तदेव सदा जयवन्त रहें ।॥ २३८ ॥
Ever-victorious be the Blessed Arhant,worshipped with splendid opulence by hosts of Indras,who has dispelled the dust of sin,
who is free from all attachment, having vanquished both passion and aversion—whose feet, bowed to in reverence, are faintly tinged with goldby the clustered rays of radiant jewelsadorning the resplendent crowns of the gods.238
श्लोक ( Shlok ) 239
जयति जविलासः सूच्यते यस्य पौष्पैःरलिकुलत रुगर्भैर्निर्जितानङ्गमुक्तैः ।अनुवदयुगमस्त्रैर्भङगशोकादिवावि-ष्कृतकरुणनिनादैः सोऽयमाद्यो जिनेन्द्रः ॥२३९॥
जिनके भीतर भ्रमरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं और उनसे जो ऐसे मालूम होते हैं मानो अपनी पराजयके शोकसे रोते हुए कामदेव-के करुण कन्दनको ही प्रकट कर रहे हों तथा उसी हारे हुए कामदेवने अपने पुष्परूपी शस्त्र भगवान के चरण-युगलके सामने डाल रक्खे हों ऐसे पुष्पोंके समूहसे जिनके विजयकी लीला सूचित होती है वे प्रथम जिनेन्द्र श्री वृषभदेव जयवन्त हों ।॥ २३९॥
Victorious ever be the first Jina, the venerable Lord Ṛṣabhadeva,
whose triumph is proclaimed by the flowers laid at His twin lotus-feet—flowers around which swarms of bees hum aloud,as though echoing the mournful lament of Love himself,defeated and eeping in sorrow;it is as if that vanquished god of desire has cast down his flower-weaponsbefore the Lord in a gesture of humbled surrender.239
श्लोक ( Shlok ) 240
जयति जितमनोभूर्भूरिधामा स्वयम्भूः र्जिनपतिरपरागः क्षालितागः परागः ।सुरमुकुट विटङ्कोदूढ पादाम्बुजश्रीः-जगद जगदगारप्रान्तविश्रान्तबोधः ॥२४०।।
जिन्होंने कामदेवको जीत लिया है, जिनका तेज अपार है, जो स्वयंभू हैं, जिनपति हैं, वीतराग हैं, जिन्होंने पाप रूपी धूलि धो डाली है, जिनके चरणकमलोंकी शोभा देव लोगोंने अपने मुकुटके अग्रभागपर धारण कर रक्खी है और जिनका ज्ञान लोक अलोक रूपी घरके अन्त तक फैला हुआ है ऐसे श्री प्रथम जिनेन्द्र सदा जयवन्त रहें ।॥ २४०॥
Ever-victorious be the First Jina, the venerable Lord Ṛṣabhadeva—
conqueror of the god of desire,of boundless splendour, self-born, Lord of sages, free from all attachment,who has washed away the dust of sin,whose lotus-feet are so resplendent that the gods have adorned the crests of their diadems with their radiance,and whose omniscience extends to the farthest reaches of both the worldly and the transcendental realms.240
श्लोक ( Shlok ) 241
जयति मदनबाण रक्षतात्मापि योऽधात् त्रिभुवनजयलक्ष्मीकामिनीं वक्षसि स्वे ।स्वयमवृत च मुक्तिप्रेयसी यं विरूपा प्यनवम सुखताति तन्वती सोऽयमर्हन् ।॥२४१॥
जिनकी आत्मा कामदेवके बाणोंसे घायल नहीं हुई है तथापि जिन्होंने तीनों लोकोंकी जयलक्ष्मीरूपी स्त्रीको अपने वक्षःस्थलपर धारण किया है और मुक्तिरूपी स्त्रीने जिन्हें स्वयं वर बनाया इसके सिवाय वह मुक्तिरूपी स्त्री विरूपा अर्थात् कुरूपा (पक्षमें आकाररहित) होकर भी जिनके लिये उत्कृष्ट सुख-समूहको बढ़ा रही है वे अर्हन्तदेव सदा जयवन्त हों ।। २४१।।
Ever victorious be the Arhant Lord,
whose soul remains untouched by the arrows of Kāma,yet who embraces the goddess of victory over the three worlds close to his heart,and whom the goddess of liberation herself has chosen as her consort;though she appears formless and shapeless,she onetheless bestows upon him the highest felicities.241
श्लोक 242 से 249
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231
Download PDF