आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171
मागधदेव की भेंट और समुद्र का वर्णन
मागधदेव ने भरत को अमूल्य रत्न, दिव्य मोतियों का हार, और कुण्डल भेंट किए, जो उनके वक्ष और कानों को शोभित करने योग्य थे। प्रसन्न मागधदेव ने रत्नों से भरत की पूजा की और उनकी अनुमति से अपने स्थान को लौट गए। भरत ने समुद्र और उसके अन्तर्वीपों को देखकर आश्चर्य अनुभव किया। सारथि ने समुद्र की शोभा का वर्णन किया, जिसमें लहरें मणियों से पूजा करती प्रतीत होती थीं, शंखों का शब्द गूंजता था, और जल दिशाओं में यश बांटता प्रतीत होता था। समुद्र का जल आकाश और राजकुलों से तुलनीय था।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
रत्नान्यमून्यनर्घाणि स्वर्गेऽप्यसुलभानि च। अधो निधीनामाधातुं सोपयोगानि सन्तु ते ॥ १६२॥
हे प्रभो, यद्यपि ये रत्न अमूल्य हैं और स्वर्गमें भी दुर्लभ हैं तथापि आपकी निधियोंके नीचे रखनेके काम आवें ।॥ १६२।।
“O Lord, although these jewels are priceless and even rare in heaven, they are fit only to be placed beneath your treasures.” (162)
श्लोक ( Shlok ) 163 –164
हारोऽयमतिरोचिप्णुरवाराहैरशुक्तिजैः। अवेणुद्विपसम्भूतैः दृब्धो मुक्ताफलैर्द्युजैः ।।१६३॥
तव वक्षःस्थलाश्लेषादुपेया दुपहारताम्। स्फुरन्ती” कुण्डले चामू कर्णासङ्गात्पवित्रताम् ।।१६४।।
यह अतिशय देदीप्यमान तथा सूअर, सीप, बांस और हाथी में उत्पन्न न होनेवाले दिव्य मोतियों से गुथा हुआ हार आपके वक्षःस्थल के आलिंगन से पूज्यताको प्राप्त हो तथा ये देदीप्यमान चमकते हुए दोनों कुण्डल आपके कानों की संगति से पवित्रता को प्राप्त हों ।।१६३-१६४।।
“This extraordinarily radiant necklace, strung with divine pearls that are not found in pigs, oysters, bamboo, or elephants, may attain reverence by adorning your chest. And may these bright, shining earrings, through their association with your ears, attain purity.” (163-164)
श्लोक ( Shlok ) 165
इत्यस्मै कुण्डले दिव्ये हारं च विततार सः । त्रैलोक्यसारसन्दोहमिवेैकध्यमुपागतम् ।।१६५।।
इस प्रकार उस मागध देव ने एकरूपता को प्राप्त हुए तीनों लोकों की सार वस्तुओंके समुदाय के समान सुशोभित होने वाला हार और दोनों दिव्य कुण्डल भरत के लिये सर्पित किये ॥१६५॥
“Thus, the Magadha deity, having attained unity, offered the necklace — which shone brilliantly like the collective essence of the three worlds — and the two divine earrings to Bharata.” (165)
श्लोक ( Shlok ) 166
रत्नैश्चाभ्यर्च्य रत्नेशं मागधः प्रीतमानसः । प्रभोरवाप्तसत्कारः तन्मतात् स्वमगात् पदम् ॥१६६।।
तदनन्तर जिसका चित्त अत्यन्त प्रसन्न हो रहा है ऐसे मागध देव ने अनेक प्रकार के रत्नों से रत्नों के स्वामी भरत चक्रवर्ती की पूजा की और फिर उनसे आदर-सत्कार पाकर उन्हीं की संमति से वह अपने स्थानपर चला गया ।।१६६।।
“Thereafter, the Magadha deity, whose mind was filled with great joy, worshiped the Lord of jewels, Bharata Chakravarti, with various types of precious gems. After receiving respect and hospitality from him, he departed, with Bharata’s consent, and returned to his place.” (166)
श्लोक ( Shlok ) 167
अथ तत्रस्थ एवाब्धिं सान्तर्द्वीपं विलोकयन्। प्रभुर्विसिस्मय किञ्चिद् बह्वाश्चर्यो हि वारिधिः ॥१६७।।
अथानन्तर-वहां खड़े रहकर ही अन्तर्द्वीपों सहित समुद्र को देखते हुए महाराज भरत को कुछ आश्चर्य हुआ सो ठीक ही है क्योंकि वह लवणसमुद्र अनेक आश्चर्योंसे सहित था ।।१६७।।
“Then, standing there, as he gazed at the ocean, along with the inner islands, King Bharata was filled with wonder. This was indeed appropriate, for the saltwater ocean was full of marvels.” (167)
श्लोक ( Shlok ) 168
ततः कुतूहलाद् वार्धिं पश्यन्तं धूर्गतः पतिम् । तमित्युवाच दन्तांशुसुमनोमञ्जरीः किरन् ॥१६८॥
तदनन्तर दांतों की किरणें रूपी पुष्पमंजरी को बिखेरता हुआ सारथि कौतूहल से समुद्र को देखने वाले भरत से इस प्रकार कहने लगा ।।१६८।।
“Then, scattering beams of light like a bouquet of flowers from his teeth, the charioteer, filled with curiosity, began to speak to Bharata, who was gazing at the ocean.” (168)
श्लोक ( Shlok ) 169
अयं जलधिरुच्चलत्तरलवीचिबाहूद्धतस्फुरन्मणिगणार्चनो ध्वनदसङ्खयशङ्खाकुलः । तवार्घमिव संविधित्सुरनुवेलमुच्चैर्नदन् मरुद्धतजलानको दिशतु शश्वदानन्दथुम् ॥१६९।॥
कि, उछलती हुई चंचल लहरें रूपी भुजाओं के द्वारा धारण किये हुए देदीप्यमान मणियों के समूह ही जिसकी पूजाकी सामग्री है, जो शब्द करते हुए असंख्यात शंखों से आकुल है, जो प्रत्येक बेला के साथ जोर से शब्द कर रहा है, वायु के द्वारा कंपित हुआ जल ही जिसके नगाड़े हैं और जो इन सबसे ऐसा जान पड़ता है मानो आपके लिये अर्घ ही देना चाहता हो ऐसा यह समुद्र सदा आपके लिये आनन्द देवे ।। १६९।।
“The ocean, whose playful, restless waves, resembling arms, hold clusters of radiant jewels, whose reverberations echo from countless conch shells, whose waters thunder with every moment, shaken by the wind, and whose very movement seems to offer you an offering — may this ocean always bring you joy.” (169)
श्लोक ( Shlok ) 170
अमुष्य जलमुत्पतद्गगनमेतदालक्ष्यते शशाङ्ककरकोमलच्छविभिराततं शीकरैः ।प्रहासमिव दिग्वधूपरिचयाय विश्वग्दधत् तितांस’दिव चात्मनः प्रतिदिशं यशो भागशः ॥१७०।।
आकाशकी ओर उछलता हुआ और चन्द्रमा की किरणों के समान कोमल कान्तिवाले जलके छोटे छोटे छींटोंसे व्याप्त हुआ इस समुद्रका यह जल ऐसा जान पड़ता है मानो दिशारूपी स्त्रियों के साथ परिचय करनेके लिये चारों ओरसे हास्य ही कर रहा हो अथवा अपना यश बांटकर प्रत्येक दिशामें फैलाना ही चाहता हो ॥१७०॥
“The water of this ocean, rising toward the sky and scattered with small droplets radiating a soft, moon-like glow, seems as if it is laughing from all directions, either to introduce itself to the directional women or to spread its glory, sharing its fame in every direction.” (170)
श्लोक ( Shlok ) 171
क्वचित्स्फुटितशुक्तिमौक्तिकततं सतारं नभो जयत्यलिमलीमसं मकरमीनराशिश्रितम् । क्वचित्सलिलमस्य भोगिकुल सङकुलं सून्नतं नरेन्द्रकुलमुत्तमस्थितिजिगीषतीवोद्भटम् ॥१७१॥
खुली हुई सीपोंके मोतियों से व्याप्त हुआ, भ्रमर के समान काला और मकर मीन, मगरमच्छ आदि जल-जन्तुओंकी राशि समूहसे भरा हुआ यह समुद्र का जल कहीं ताराओं सहित, भ्रमरके समान श्याम और मकर मीन आदि राशियों से भरे हुए आकाश को जीतता है तो कहीं राजाओं के कुल को जीतना चाहता है क्योंकि जिस प्रकार राजाओंका कुल भोगी अर्थात् राजाओंके समूहसे व्याप्त रहता है उसी प्रकार यह जल भी भोगी अर्थात् सर्पोंके समूहसे व्याप्त है, जिस प्रकार राजाओंका कुल सून्नत अर्थात् अत्यन्त उत्कृष्ट होता है उसी प्रकार यह जल भी सून्नत अर्थात् अत्यन्त ऊंचा है, जिस प्रकार राजाओंका कुल उत्तम स्थिति अर्थात् मर्यादासे सहित होता है उसी प्रकार यह जल भी उत्तम स्थिति अर्थात् अवधि (हद्द) से सहित है, और राजाओंका कुल जिस प्रकार उद्भट अर्थात् उत्कृष्ट योद्धाओंसे सहित होता है उसी प्रकार यह जल भी उद्भट अर्थात् प्रबल है ।।१७१।।
“The water of this ocean, filled with open shells and pearls, is dark like a bumblebee and teeming with creatures like crocodiles, makaras, and fish. At times, it seems to conquer the sky, filled with stars and constellations like the bumblebee and makara. At other times, it seems to seek to conquer the lineage of kings, for just as the lineage of kings is full of the royal clan, this water is full of serpents. Just as the lineage of kings is exalted, this water too is elevated. Just as the lineage of kings holds an eminent status, this water holds an eminent limit, and just as the lineage of kings is filled with great warriors, this water is also mighty and powerful.” (171)
श्लोक 172 से 181
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161