आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41
वन और देव क्रीड़ा
गंगा का पवन जल की बूंदों से अतिथि सत्कार करता प्रतीत होता है। वन दुर्गम और देवों द्वारा अधिष्ठित है, जहां लतागृह फूलों की शय्याओं से सुशोभित हैं। देव और देवांगनाएं मंदार वृक्षों की छाया में चंद्रकांत शिलाओं पर क्रीड़ा करते हैं। किन्नर, सिद्ध, और विद्याधरियां संगीत, नृत्य, और विलास से वन की शोभा बढ़ाते हैं। ऋतुओं का समूह वन में एकत्र होकर उत्सव जैसा प्रतीत होता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32 – 36
भन्याकर्षश्रमोद्भूतस्वेदबिन्दुचिताननाः । मथ्नतीः सकुचोत्कम्पं सलील ‘त्रिकनर्तनैः ॥३२॥
मन्थरज्जुसमाकृष्टिक्लान्तबाहूः” श्लयांशुकाः । स्रस्तस्तनांशुका लक्ष्यत्रिवलीभङ्गु रोदराः ॥३३॥
क्षुब्धाभिघातोच्चलितस्थल गोरसबिन्दुभिः । विरलैरङ्गसंलग्नैः शोभां कामपि पुष्णतीः ॥३४॥
मन्यारवानुसारेण किञ्चिदारब्धमूर्छनाः । विस्रस्तकबरीबन्धाः कामस्येव पताकिकाः ॥३५।।
“गोष्ठाङ्गणेषु सल्लापैः स्वैरमारब्धमन्थनाः । प्रभुर्गोपवधूः पश्यन् किमप्यासीत् समुत्सुकः ॥३६॥
कढ़नियोंके खींचने के परिश्रम से उत्पन्न हुए पसीने की बूंदोंसे जिनके मुख व्याप्त हो रहे हैं, जो लीलापूर्वक नितम्बोंको नचा नचा कर स्तनोंको हिलाती हुई दही मथ रही हैं, कढ़नियोंके खींचनेसे जिनकी भुजाएं थक गई हैं, जिनके सब वस्त्र ढीले पड़ गये हैं, जिनके स्तनोंपरका वस्त्र भी नीचे की ओर खिसक गया है, जिनके कृश उदरमें त्रिवली की रेखाएं साफ साफ दिख रही हैं, रई (फूल) के आघातसे उछल उछलकर शरीरमें जहाँ तहाँ लगी हुई दहीकी बड़ी बड़ी बूंदोंसे जो एक प्रकारकी विचित्र शोभाको पुष्ट कर रही हैं, मन्थन से होनेवाले शब्दोंके साथ साथ ही जिन्होंने कुछ गाना भी प्रारम्भ किया है, जिनके केशपाश का बन्धन खुल गया है और इसीलिये जो कामदेवकी पताकाओंके समान जान पड़ती हैं, तथा गोशाला के आंगनों में अपने इच्छानुसार वार्तालाप करती हुई जिन्होंने दहीका मथना प्रारम्भ किया है ऐसी ग्वालाओं की स्त्रियोंको देखते हुए महाराज भरतेश्वर कुछ उत्कण्ठित हो उठे थे ॥३२-३६।।
“King Bharteshwar saw the cowherd women churning curd in the courtyards of the cowsheds. Their faces were moistened with drops of sweat born of the effort in pulling the churn ropes. Playfully swaying their hips and causing their breasts to move, they churned the curd with rhythmic grace. Their arms had grown weary from the motion, their garments loosened, with the cloth over their chests slipping downward. Upon their slender waists, the triple lines were clearly visible. Splashes of curd, flung from the churn like scattered flowers, landed here and there on their bodies, enhancing their unique beauty.
As the sound of the churning mingled with their soft songs, their hair, once tied, had come undone—making them appear like living banners of the god of love. Freely conversing amongst themselves as they worked, these cowherd women, full of natural charm and grace, stirred within Bharteshwar a sense of longing.” ॥32–36॥
श्लोक ( Shlok ) 37
वने वनगजैर्जुष्टे प्रभुमेनं वनेचराः । दन्तैर्वनकरीन्द्राणामद्राक्षुः सह मौक्तिकैः ॥३७॥
जंगली हाथियों से भरे हुए वन में रहने वाले भील लोगों ने जंगली हाथियों के दांत और मोती भेंट कर महाराजके दर्शन किये थे ॥ ३७॥
The Bhils who lived in a forest infested with wild elephants had darshan of the Maharaja by offering him the tusks and pearls of wild elephants.॥ 37॥
श्लोक ( Shlok ) 38 – 41
श्यामाङ्गीरनभिव्यक्तरोगराजीस्तनूदरीः । परिधानीकृतालोलपल्लवव्यक्तसंवृतीः ॥३८॥
चमरीबालकाविद्धकबरीबन्धबन्धुराः । फलिनी फलसन्दृब्धमालारचितकण्ठिकाः ॥३९॥
कस्तूरिका मृगाध्यासवासिताः सुरभीर्मुदः । सञ्चिन्वतीर्वनाभोगे प्रसाधनजिवृक्षया ॥४०॥
पुलिन्दकन्यकाः सैन्यसमालोकनविस्मिताः । अव्याजसुन्दराकारा दूरादालोकयत् प्रभुः ॥४१॥
जिनका शरीर श्याम है जिनके शरीर पर अभी रोमराजी प्रकट नहीं हुईं है, उदर भी जिनका कृश है, वस्त्रके समान धारण किये हुए चंचल पत्तोंसे जिनके शरीरका संवरण प्रकट हो रहा है, चमरी गायके बालोंसे बंधे हुए केशपाशोंसे जो बहुत ही सन्दर जान पड़ती हैं, गुंजाफ्लोंसे बनी हुई मालाओंको जिन्होंने अपना कण्ठहार बनाया है, कस्तूरी मृग के बैठनेसे सुगन्धित हुई मिट्टी को आभूषण बनाने की इच्छासे जो वनके किसी एक प्रदेशमें इकट्ठी कर रही हैं, जिनका आकार वास्तवमें सुन्दर है और जो सेना के देखने से विस्मित हो रही हैं ऐसी भीलों की कन्याओंको भरत ने दूर से ही देखा था ।।३८-४१।।
“Bharata saw from a distance the daughters of the Bhils, whose bodies were dark like Shyam, upon whose skin the tender down of youth had not yet appeared, whose stomachs were slender, and whose bodies were clothed in fluttering leaves like garments. Their hair was tied with the coarse hairs of the chamari (yak), making them appear exceedingly beautiful. Around their necks they wore garlands made of gunja berries. They were gathering the fragrant soil scented by the resting of musk deer, wishing to use it as ornamentation. Their forms were naturally graceful, and they looked astonished upon seeing the army.” (Verses 38–41)
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31