आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51
रत्नों की प्राप्ति और नदियों का भ्रमण
भरत को विभिन्न क्षेत्रों से रत्न भेंट मिलते हैं, मानो पृथिवी उनकी सेना के बोझ से रत्न उत्पन्न करती हो। उनके हाथी हिमवत् से गोरथ पर्वत तक विचरण करते हैं। सेनापति बंग, मगध, काशी आदि देशों में विजय प्राप्त करता है। सेना गंगा, यमुना, गोदावरी जैसी नदियों को पार करती है और लौहित्य समुद्र तक पहुंचती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
दशार्णान् कामरूपांश्च काश्मीरानप्युशीनरान् । मध्यमानपि भूपालान् सोऽचिराद् वशमानयत् ॥४२॥
उसने दशार्ण, कामरूप, काश्मीर, उशीनर और मध्यदेशके समस्त राजाओंको बहुत शीघ्र वश कर लिया था ॥४२॥
“He swiftly brought under his sway all the kings of Dasharna, Kamarupa, Kashmir, Ushinara, and the entire region of Madhyadesha.” (Verse 42)
श्लोक ( Shlok ) 43
ददुरस्मै नृपाः प्राच्यकलिङ्गाङ्गारजान् गजान्। गिरीनिव महोच्छ्रायान् “प्रश्चोतन्मदनिर्झरान् ॥४३॥
वहां के राजाओं ने जिन से मद के निर्भरने झर रहे है ऐसे, पूर्व देशमें उत्पन्न होने वाले तथा कलिंग और अंगार देशमें उत्पन्न होने वाले, पर्वतोंके समान ऊंचे ऊंचे हाथी महाराज भरतके लिये भेंटमें दिये थे ।।४३।।
“The kings of that land offered to Emperor Bharata, as tribute, mighty elephants — towering like mountains — born in the eastern regions, as well as in the lands of Kalinga and Anga, from whose temples the streams of ichor flowed profusely.” (Verse 43)
श्लोक ( Shlok ) 44
दशार्णकवनोद्भूतानपि चेदिक कूशजान्। दिङ् नागस्पर्धिनो नागाआदुर्नाग वनाधिपाः ।॥४४॥
जिनमें हाथी उत्पन्न होते हैं ऐसे वनों के स्वामियों ने दिग्गजोंके साथ स्पर्द्धा करनेवाले, दशार्णक वनमें उत्पन्न हुए तथा चेदि और कसेरु देश में उत्पन्न हुए हाथी महाराजके लिये प्रदान किये थे ।।४४।।
“The lords of the forests, where elephants are born, presented to the Emperor elephants that rivaled the great Diggajas — born in the Dasharna forests as well as in the lands of the Chedis and Kaseru.” (Verse 44)
श्लोक ( Shlok ) 45
विभोर्बलभरक्षोभमासहन्तीव दुःसहम् । सुषुवेऽनन्तरत्नानि गर्भिणीव वसुन्धरा ॥४५॥
उस समय भरतेश्वर को पृथिवी पर जहां तहां अनेक रत्न भेंटम मिल रहे थे इसलिये ऐसा जान पड़ता था मानो गर्भिणी के समान पृथिवी ने चक्रवर्ती की सेना के बोझसे उत्पन्न हुए दुःसह क्षोभको न सह सकनेके कारण ही अनन्त रत्न उत्पन्न किये हुए हों ।॥४५।।
“At that time, Emperor Bharata was receiving countless treasures from every quarter of the earth, so much so that it seemed as if the earth herself, like a woman heavy with child, had brought forth endless jewels — unable to bear the intolerable burden and agitation caused by the weight of the Chakravartin’s mighty army.” (Verse 45)
श्लोक ( Shlok ) 46
आपाण्डरगिरिप्रस्थादा च बंभारपर्वतात् । आशैलाद् गोरथादस्य विचे रुर्जयकुञ्जराः ॥४६॥
हिमवात् पर्वतके निचले भाग से लेकर वैभार तथा गोरथ पर्वत तक सब जगह भरत महाराज के विजयी हाथी घूम रहे थे ।।४६ ।।
“From the lower slopes of the Himalayas to the ranges of Vaibhara and Goratha, the victorious elephants of Emperor Bharata roamed everywhere in triumph.” (Verse 46)
श्लोक ( Shlok ) 47
वङ्गाङ्गपुण्ड्रमगधान् मलदान् काशिकौसलान् । सेनानीः परिबभ्राम जिगीषुर्जयसाधनैः ॥४७॥
सबको जीतनेकी इच्छा करनेवाला भरत का सेनापति अपनी विजयी सेनाके साथ साथ बंग, अंग, पुंड्र, मगध, मालव, काशी और कोशल देशों में सब जगह घूमा था ॥४७॥
“The commander of Bharata, intent on conquering all, traversed every region of Banga, Anga, Pundra, Magadha, Malava, Kashi, and Kosala, accompanied by his triumphant army.” (Verse 47)
श्लोक ( Shlok ) 48
कालिन्दकालकूटौ च किरातविषयं तथा । मल्लदेशं च सम्प्रापन्म तादस्य चमूपतिः ॥४८॥
भरत की संमति से वह सेनापति कालिद, कालकूट, भीलोंका देश, और मल्ल देशमें भी पहुंचा था ॥४८।।
“With the consent of Bharata, the commander also advanced into the lands of the Kalidas, Kalakutas, the Bhilas, and the Mallas.” (Verse 48)
श्लोक ( Shlok ) 49
धुनीं सुमागधी गङ्गां गोमती च कपीवतीम् । रथास्फां च नदीं तोर्त्वा भ्रेमुरस्य चमूगजाः ॥४९।
उनकी सेना के हाथी सुमागधी, गंगा, गोमती, कपीवती और रेवस्या नदीको तैरकर जहां-तहां घूम रहे थे ॥४९॥
“The elephants of their army swam across the Sumagadhi, Ganga, Gomati, Kapivati, and Revasya rivers, roaming freely in all directions.” (Verse 49)
श्लोक ( Shlok ) 50 – 51
गम्भीरामतिगम्भीरां कालतोयां च कौशिकीम् । नदीं कालमहीं ताम्रामरुणां निचुरामपि ॥५०॥
तं लौहित्य समुद्रं च कम्बुकं च महत्सरः । चमूमतङ्गजास्तस्य भेजुः प्राच्य वनोपगाः ॥५१॥
पूर्व दिशाके पास पास जानेवाले उनकी सेनाके हाथी अत्यन्त गहरी गंभीरा, कालतोया, कौशिकी, कालमही, ताम्रा, अरुणा और निधुरा आदि नदियों तथा लौहित्य समुद्र और कंबुक नामके बड़े बड़े सरोवरोंमें घूमे थे ॥५०-५१॥
“The elephants of their army, advancing towards the eastern regions, roamed through the deep, solemn waters of the Gambiira, Kalatoya, Kaushiki, Kalmhi, Tamra, Aruna, and Nidhura rivers, as well as the great lakes of Lauhitya and Kambuka, and even traversed the vast expanse of the Lohitya sea.” (Verses 50-51)
श्लोक 52 से 66
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41