आदिपुराण भाग – 2 पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128
श्लोक 129 से 147
गंगा नदी का वर्णन
गंगा नदी भरत की कीर्ति, जिनवाणी, विजयलक्ष्मी, और राज्यलक्ष्मी के समान थी। इसके किनारे वन, लहरें, हंस, और भंवर इसे स्त्री, गाय, और सेना के समान शोभायमान करते थे। किन्नरों के गीत और हरिणों की उपस्थिति इसकी शोभा बढ़ाते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 26 – Shlok 129 to 147
श्लोक ( Shlok ) 129 –147
हिमवद्विधृतां पूज्यां “सतामा सिन्धुगामिनीन् । शुचिप्रवाहामा कल्पवृत्तिं कीर्तिमिवात्मनः ॥ १२९॥
शफरीप्रेक्षणामुद्यत्तरङ्गभ्रू विनर्तनाम् ।वनराजीबृहच्छाटी परिधानां वधूमिव ॥१३०।।
विस्तीर्णेंर्जनसम्भोग्यैः कूजर्द्धसालिमेखलैः। तरङ्गवसनैः कान्तां पुलिनैर्जघनैरिव ॥१३१॥ ‘लोलोर्मिहस्तनिर्धूतपक्षिमालाकलस्वनैः । किमप्यालपितुं यत्न तन्वन्ती वा तटद्रुमै ॥१३२॥
क्षतीर्वन्येभदन्तानां “रोधोजघनवर्तनीः । रुन्धतीमब्धिभीत्येव लसदूर्भिदुकूलकै ।। १३३॥ रोमराजीमिवानीलां वनराजीं विवृण्वतीम् । ‘तिष्ठमानामिवावर्तव्यक्तना भिमुदन्वते ॥ १३४॥ विलोलवीचिसंघट्टादुत्थितां पतगावलिम्। पताकामिव बिभ्राणां लब्धां सर्वापगाजयात् ॥१३५।।
समांसमीनां पर्याप्तपयसं धीरनिःस्वनाम् । जगतां पावनीं मान्यां हसन्तीं गोमतल्लिकाम् ॥१३६॥ गुरुप्रवाहप्रसृतां तीर्थकामैरुपासिताम् । गम्भीरशब्दसम्भूति जैनीं श्रुतिमिवामलाम् ।।१३७।।
राजहंसेः कृतो पास्यामलङ्घ्यां विधृतायतिम्। जयलक्ष्मीमिव स्फीतामा त्मीयामब्धिगामिनीम्। ।१३८।। विलसत्पद्यसम्भूतां जनतानन्ददायिनीम्। जगद्भोग्याभिवात्मीयां श्रियमायतिशालिनीम् ॥१३९॥ विजयार्थतटाक्रान्ति कृतश्लाघां सुरंहसम्। अभग्नप्रसरां दिव्यां निजामिव पताकिनीम् ॥१४०।। व्यालोलोमिकरास्पृष्टै स्वतीरवनपादपैः। दधद् भिरङ्कुरोदभेद माश्रितां कामुकैरिव ॥१४१॥ रोधोलतालयासीनान् स्वेच्छ्या सुरदम्पतीन् । हसन्तीमिव सुध्वानै शीकरोत्थै विसारिभिः ॥१४२।।
किन्नराणां कलक्वाणैः सगानैरुपविणितैः। सेव्यपर्यन्तभूभागलतामण्डपमण्डनाम् ।।१४३॥
हारिभिः किन्नरोद्गीतैराहूता हरिणाङ्गनाः । दधतीं तीरकच्छेषु प्रसारितगलद्गलाः ।।१४४।।
हृद्यैः ससारसारावैः पुलिनैर्दिव्ययोषिताम् । नितम्बानि सकाञ्चीनि हसन्तीमिव विस्तृतैः ॥१४५।।
चतुर्वशभिरन्वितां सहस्रैरब्धियोषिताम् । सद् ध्रीचीनामिवोद्वीचि बाहूनां परिरम्भणे ॥१४६॥
इत्याविष्कृतसंशोभां जाह्ववीमेक्षत प्रभुः । हिमवगिरिणाम्भोधेः प्रहितामिव कण्ठिकाम् ।।१४७।।
वहां जाकर उन्होंने गङ्गा नदीको देखा, जोकि उनकी कीतिके समान सुशोभित हो रही थी क्योंकि जिस प्रकार उनकी कीति हिमवान् पर्वतसे धारण की गई थी उसी प्रकार गङ्गा नदी भी हिमवान् पर्वतसे धारण की गई थी, जिस प्रकार उनकी कीति पूज्य और उत्तम थी उसी प्रकार गङ्गा नदी भी पूज्य तथा उत्तम थी कीर्ति समुद्र तक गमन करनेवाली थी उसी प्रकार गङ्गा नदी भी समुद्र तक गमन करनेवाली थी, जिस प्रकार उनकी कीतिका प्रवाह पवित्र था उसी प्रकार गङ्गा नदीका प्रवाह भी पवित्र था और जिस प्रकार उनकी कीर्ति कल्पान्त काल तक टिकनेवाली थी उसी प्रकार गङ्गा नदी भी कल्पान्त काल तक टिकनेवाली थी। अथवा जो गङ्गा किसी स्त्रीके समान जान पड़ती थी, क्योंकि मछलियां ही उसके नेत्र थे, उठती हुई तरंगें ही भौहोंका नचाना था और दोनों किनारों के बतकी पंक्ति ही उसकी साड़ी थी। जो स्त्रियों के जवन भाग के समान सुन्दर किनारोंसे सहित थी, उसके वे किनारे बहुत ही बड़े थे। शब्द करती हुई हंसोंकी माला ही उनकी करधनी थी और लहरें ही उनके वस्त्र थे। चञ्चल लहरों रूपी हाथोंके द्वारा उड़ाये हुए पक्षि-समूहों के मनोहर शब्दोंसे जो ऐसी जान पड़ती थी मानो किनारे के वृक्षोंके साथ कुछ वार्तालाप करनेके लिये प्रयत्न ही कर रही हो । जो अपनी छलकती हुई लहरोंसे ऐसी जान पड़ती थी मानो तटरूरी नितम्ब प्रदेशपर जंगली हाथियोंके द्वारा किये हुए दातोंके घावोंको समुद्ररूप पतिके डरसे शोभायमान लहरोंरूपी वस्त्रसे ढक ही रही हो। जो दोनों ओर लगी हुई हरी भरी वनश्रेणियों के प्रकट करने तथा साफ साफ दिखाई देनेवाली भंवरोंसे ऐसी जान पडती थीं मानों किसी स्त्रीकी तरह अपने समुद्ररूप पतिके लिये रोमराजि और नाभि ही दिखला रही हो। जो चंचल लहरोंके संघटनसे उड़ी हुई पक्षियोंकी पंक्तिको धारण कर रही थी और उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो सब नदियोंको जीत लेनेसे प्राप्त हुई विजय पताकाको ही धारण कर रही हो। जो किसी उत्तम गायकी हँसी करती हुई सी जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार उत्तम गाय समांसमीना अर्थात् प्रति वर्ष प्रसव करनेवाली होती है उसी प्रकार वह नदी भी समांस-मीना अर्थात् परिपुष्ट मछलियोंसे सहित थी, जिस प्रकार उत्तम गायमें पर्याप्त पय अर्थात् दूध होता है उसी प्रकार उस नदीमें भी पर्याप्त पय अर्थात् जल था, जिस प्रकार उत्तम गाय गम्भीर शब्द करती है उसी प्रकार वह भी गम्भीर कल-कल शब्द कर रही थी, उत्तम गाय जिस प्रकार जगत्को पवित्र करनेवाली है उसी प्रकार यह भी जगत्को पवित्र करनेवाली थी और उत्तम गाय जिस प्रकार पूज्य होती है उसी प्रकार वह भी पूज्य थी। अथवा जो जिनवाणीके समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार जिनवाणी गुरु-प्रवाह अर्थात् आचार्य परम्परासे प्रसूत हुई है उसी प्रकार वह भी गुरुप्रवाह अर्थात् बड़े भारी जलप्रवाहसे प्रसूत हुई थी-प्रवाहित हुई थी। जिस प्रकार जिन वाणी तीर्थ अर्थात् धर्मकी इच्छा करनेवाले पुरुषों के द्वारा उपासित होती है उसी प्रकार वह भी तीर्थ अर्थात् पवित्र तीर्थ स्थानकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंके द्वारा उपासित होती अथवा किनारेपर रहनेवाले मनुष्य उसमें स्नान आदि किया करते थे, जिस प्रकार जिनवाणीसे गंभीर शब्दोंकी उत्पत्ति होती है उसी प्रकार उससे भी गंभीर अर्थात् बड़े जोरके शब्दों की उत्पत्ति होती थी, और जिस प्रकार जिनवाणी मल अर्थात् पूर्वापर विरोध आदि दोवोंसे रहित होती है उसी प्रकार वह भी मल अर्थात् कीचड़ आदि गंदले पदार्थों से रहित थी। अथवा जो अपनी (भरतकी) विजयलक्ष्मी के समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार विजयलक्ष्मीकी उपासना राजहंस अर्थात् बड़े बड़े राजा लोग करते थे उसी प्रकार उस नदीकी भी उपासना राजहंस अर्थात् एक प्रकारके हंस विशेष करते थे, जिस प्रकार जय-लक्ष्मीका कोई उल्लंघन अनादर नहीं कर सकता था उसी प्रकार उस नदीका भी कोई उल्लंघन नहीं कर सकता था, जयलक्ष्मीका आयति अर्थात् भविष्यत्काल जिस प्रकार स्पष्ट प्रकट था इसी प्रकार उसकी आयति अर्थात् लम्बाई भी प्रकट थी, जयलक्ष्मी जिस प्रकार स्फीत अर्थात् विस्तृत थी उसी प्रकार वह भी विस्तृत थी और जयलक्ष्मी जिस प्रकार समुद्र तक गई थी उसी प्रकार वह गंगा भी समुद्र तक गई हुई थी। अथवा जो भरतकी राज्यलक्ष्मीके समान मालूम होती थी क्योंकि जिस प्रकार भरतकी राज्यलक्ष्मी शोभायमान पद्म अर्थात् पद्म नामकी निविसे उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार वह नदी भी पद्म अर्थात् पद्म नामके सरोवरसे उत्पन्न हुई थी, भरतकी राज्य-लक्ष्मी जिस प्रकार जनसमूहको आनन्द देनेवाली थी उसी प्रकार वह भी जनसमूहको आनन्द देनेवाली थी, भरतकी राज्यलक्ष्मी जिस प्रकार जगत्के भोगने योग्य थी उसी प्रकार वह भी जगत्के भोगने योग्य थी, और भरतकी लक्ष्मी जिस प्रकार आयति अर्थात् उत्तरकालसे सुशोभित थी उसी प्रकार वह आयति अर्थात् लम्बाईसे सुशोभित थी। अथवा जो भरतकी सेनाके समान थी, क्योंकि जिस प्रकार भरतकी सेना विजयार्थ पर्वतके तटपर आक्रमण करनेसे प्रशंसाको प्राप्त हुई थी उसी प्रकार वह नदी भी विजयार्थ पर्वतके तटपर आक्रमण करनेसे प्रशंसाको प्राप्त हुई थी (गङ्गा नदी विजयार्थ पर्वतके तटको आक्रान्त करती हुई बही है), जिस प्रकार भरतकी सेनाका वेग तेज था उसी प्रकार उस नदीका वेग भी तेज था। जिस प्रकार भरत की सेनाके फैलावको कोई नहीं रोक सकता था उसी प्रकार उसके फैलावको भी कोई नहीं रोक सकता था और भरतकी सेना जिस प्रकार दिव्य अर्थात् सुन्दर थी उसी प्रकार वह नदी भी सुन्दर थी। जो चंचल लहरों रूपी हाथोंसे स्पर्श किये गये और अंकुररूपी रोमांचोंको धारण किये हुए अपने किनारेके वनके वृक्षोंसे आश्रित थी और उससे ऐसी मालूम होती थी मानो कामी जनोंसे आश्रित कोई स्त्री ही हो। जो जलकणोंसे उत्पन्न हुए तथा चारों ओर फैलते हुए मनोहर शब्दोंसे अपनी इच्छानुसार किनारे परके लतागृहोंमें बैठे हुए देव देवांगनाओंकी हँसी करती हुई सी जान पड़ती थी। किन्नरोंके मधुर शब्दवाले गायन तथा वीणाकी भनकारसे सेवनीय किनारेकी पृथिवीपर बने हुए लतागृहोंसे जो बहुत ही अधिक सुशोभित हो रही थी।-किन्नर देवोंके मनोहर गानोंसे बुलाई हुई और सुखसे ग्रीवाको लम्बा कर बैठी हुई हरिणयों को जो अपने किनारेकी भूमिपर धारण कर रही थी। जिनपर सारस पक्षी कतार बांधकर मनोहर शब्द कर रहे हैं ऐसे अपने बड़े बड़े सुन्दर किनारोंसे जो देवांगनाओंके करधनी सहित नितम्बोंकी हँसी करती हुई सी जान पड़ती थी। जिन्होंने आलिंगन करनेके लिये तरंगरूपी भुजाएं ऊपरकी ओर उठा रखी हैं ऐसी सखियोंके समान जो चौदह हजार सहायक नदियोंसे सहित है। इस प्रकार जिसकी शोभा प्रकट दिखाई दे रही है और जो हिमवान् पर्वतके द्वारा समुद्रके लिये भेजी हुई कण्ठमालाके समान जान पड़ती है ऐसी गङ्गा नदी महाराज भरतने देखी ॥१२९-१४७।।
*”Upon reaching the banks of the Ganga, King Bharata beheld the river, which was adorned just like his own fame. Just as his glory was supported by the great Himalayan mountains, the Ganga too was sustained by the very same mountains. His fame was revered and supreme, and likewise, the Ganga was both revered and supreme. His fame would reach the oceans, and similarly, the Ganga flowed all the way to the sea. Just as his fame was pure and sacred, the river’s flow was equally pure. As his fame was eternal, so too was the Ganga, destined to endure through the eons.
The Ganga seemed to resemble a woman, with fish for her eyes, the rising waves dancing like her eyebrows, and the banks on either side resembling her flowing garments. The river’s shores, decorated with lush greenery, appeared as beautiful as the waist of a woman, and the melodious sounds of swans formed her ornaments, while the waves were her clothes. The river seemed to converse with the trees along her banks, as if she were communicating with them. The Ganga’s waves, glistening and rolling, seemed to cover the scars made by wild elephants along the shore, as though veiled by the sea’s fearsome embrace.
With the whirlpools, the Ganga appeared to show her navel and abdomen, as if revealing them to her ocean-like husband. The playful waves, as if with hands, carried flocks of birds, whose delightful sounds seemed to indicate the river was celebrating her conquest of other rivers, wearing a victory flag. The river’s flow was like the deep, resonant sounds of an excellent cow, whose milk was plentiful, and whose powerful sound filled the air. Like a revered cow, the Ganga purified the world with her waters, which were just as pure as the cow’s milk.
The Ganga appeared like the speech of the Jinas, flowing from the teachings of the great spiritual masters, bringing blessings to those who seek pilgrimage and cleansing. Just as the speech of the Jinas is free from malice and disturbance, so too was the Ganga’s flow, pure and clear. The river was like the goddess of victory, revered by kings and rulers, with no one daring to dishonor her. Just as the goddess of victory was destined to reach the future, so too was the Ganga’s course clear and enduring.
The Ganga resembled the wealth of King Bharata, as the river emerged from a sacred lotus pond, just as his wealth had sprung from the lotus of glory. Both the river and his wealth brought joy to the people and were a source of enjoyment for all. The river, just like Bharata’s kingdom, extended in its greatness, and both would endure in their radiance.
The Ganga resembled the army of King Bharata, for just as his army had conquered the mighty peaks of mountains, the river too had conquered the lands, her waves strong and unstoppable, her beauty unparalleled. The river, like the great army, surged forth with unstoppable force, her flow as swift as the advance of Bharata’s warriors.
The river, touched by the waves and filled with sprouting energies, seemed like a woman standing with her friends, her beauty highlighted by the lush trees and the sounds of birds. The Ganga flowed across the earth like a divine melody sung by the kinnars and accompanied by the sound of veena, shining at the shores where the gods and celestial beings gathered in harmony. The deer, sitting gracefully on the riverbanks, seemed to rest at the call of the Ganga, while the herons added their voices to the chorus, as if celebrating the Ganga’s arrival with her golden shores and radiant, powerful waves.”**ll129 -147 ll
श्लोक 148 से 150
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 |
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128