गवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 श्रीमती का केवलज्ञान दर्शन
श्रीमती माता-पिता को आनंदित करती थी। एक दिन राजभवन में सोते हुए उसे केवलज्ञानी यशोधर गुरु के दर्शन का शोर सुनाई दिया। स्वर्ग से आए देवों की पुष्पवर्षा, मंदार की केशर, और दुंदुभि से कोलाहल हुआ। वह भयभीत होकर उठी, ललितांगदेव का स्मरण कर मूर्छित हो गई।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
लक्ष्मी चलां विनिर्माय यदागो वेधसार्जितम् । तन्निर्माणन तन्नूनं तेन प्रक्षालितं तदा ॥८२॥
ऐसा मालूम पड़ता था कि ब्रह्मा ने लक्ष्मी को चंचल बनाकर जो पाप उपार्जन किया था वह उसने श्रीमती को बनाकर धो डाला था ।।82।।
It seemed as though the sin Brahma had committed by making Lakshmi fickle had been washed away by his creation of Shrimati. 82
श्लोक ( Shlok ) 83
पितरौ तां प्रपश्यन्तौ नितरां प्रीतिमापतुः । कलामिव सुधासूते जनतानन्दकारिणीम् ॥८३॥
चंद्रमा की कला के समान जनसमूह को आनंद देने वाली उस श्रीमती को देख-देखकर उसके माता-पिता अत्यंत प्रीति को प्राप्त होते थे ।।83।।
ike the phases of the moon that bring joy to the masses, her parents experienced immense delight again and again upon seeing that Shrimati. 83
श्लोक ( Shlok ) 84
अथान्येद्युरसौ सुप्ता हम्यें हंसांशुनिर्मले । परार्ध्यरत्नरतसंशोभे स्वर्विमानापहासिनि ॥८४॥
तदनंतर किसी एक दिन वह श्रीमती सूर्य की किरणों के समान निर्मल, महामूल्य रत्नों से शोभायमान और स्वर्ग विमान को भी लज्जित करने वाले राजभवन में सो रही थी ।।84।।
hereafter, one day, that Shrimati, radiant like the rays of the sun, adorned with priceless, lustrous gems, and lying in a royal palace that could put even the celestial chariots of heaven to shame, was asleep. 84
श्लोक ( Shlok ) 85 – 86
तदैतदभवतस्याः संविधानकमीदृशम् । यशोधरगुरोस्तस्मिन् पुरे कैवल्यसंभवे ॥८५॥
मनोहराख्यमुद्यानमध्यासीनं तमचितुम् । देवाः संप्रापुरारूढविमानाः सह संपदा ॥८६॥
उसी दिन उससे संबंध रखने वाली यह विचित्र घटना हुई कि उसी नगर के मनोहर नामक उद्यान में श्रीयशोधर गुरु विराजमान थे उन्हें उसी दिन केवलज्ञान प्राप्त हुआ इसलिए स्वर्ग के देव अपनी विभूति के साथ विमानों पर आरूढ़ होकर उनकी पूजा करने के लिए आये थे ।।85-86।।
On that very day, a remarkable event related to her took place. In the enchanting garden of that city, called Manohar, the revered Shriyashodhar Guru was present. On the same day, he attained Kevalgyan (omniscience). Consequently, the celestial gods, adorned in all their splendor, descended in their heavenly chariots to worship him. 85-86
श्लोक ( Shlok ) 87
पुष्पवृष्टिर्दिशो रुद्ध्वा तदापप्तत् सहालिभिः । स्वर्गलक्ष्म्येव तं दृष्टुं प्रहिता नयनावली ॥८७॥
उस समय भ्रमरों के साथ-साथ, दिशाओं को व्याप्त करने वाली जो पुष्पवर्षा हो रही थी वह ऐसी सुशोभित होती थी मानो यशोधर महाराज के दर्शन करने के लिए स्वर्ग लक्ष्मी द्वारा भेजी हुई नेत्रों की परंपरा ही हो ।।87।।
At that moment, the shower of flowers spreading across the skies, accompanied by buzzing bees, appeared so magnificent as if it were a succession of eyes sent by the goddess of heaven herself to behold the divine presence of King Yashodhar. 87
श्लोक ( Shlok ) 88
मन्दमाधूतमन्दारसान्द्र किञ्जल्कपिञ्जरः । पुञ्जितालिरुता मञ्जुरा गुञ्जन् मरुदाववौ ॥८८॥
उस समय मंद-मंद हिलते हुए मंदारवृक्षों की सघन केशर से कुछ पीला हुआ तथा इकट्ठे हुए भ्रमरों की गुंजार से मनोहर वायु शब्द करता हुआ बह रहा था ।।88।।
At that moment, the gently swaying Mandar trees, tinged slightly yellow by their dense pollen, spread a delightful fragrance. The enchanting breeze, resonating with the hum of gathered bees, flowed melodiously through the air. 88
श्लोक ( Shlok ) 89
दंध्वनदुन्दुभिध्वानै ररुध्यन्त दिशो दश । सुराणां प्रमदोद्भूतो महान् कलकलोऽप्यभूत् ॥८९॥
और बजते हुए दुंदुभि बाजों के शब्दों से दसों दिशा को व्याप्त करता हुआ देवों के हर्ष से उत्पन्न होनेवाला बड़ा भारी कोलाहल हो रहा था ।।89।।
The sound of resonating drums spread across all ten directions, filling the air with a tremendous uproar born of the gods’ joy and celebration. 89
श्लोक ( Shlok ) 90
सा तदा तद्व्वनिं श्रुत्वा निशान्ते सहसोत्थिता । भेजे हंसीव संत्रासं श्रुततपर्जन्यनिःस्वनाः ॥९०॥
वह श्रीमती प्रातःकाल के समय अकस्मात् उस कोलाहल को सुनकर उठी और मेघों की गर्जना सुनकर डरी हुई विमान समान भयभीत हो गयी ।।90।।
That Shrimati, startled by the sudden uproar in the early morning, woke up. Hearing the thunderous sounds resembling the roar of clouds, she became as frightened as a trembling bird. 90
श्लोक ( Shlok ) 91
देवागमे क्षणात्तस्याः प्राग्जन्मस्मृतिराश्वभूत् । सा स्मृत्वा ललिताङ्ग वं मुमुच्छोंत्कण्ठिता मुहुः ॥९१।
उस समय देवों का आगमन देखकर उसे शीघ्र ही अजन्म का स्मरण हो आया, जिससे वह ललितांगदेव का स्मरण कर बार-बार उत्कंठित होती हुई मूर्च्छित हो गयी ।।91।।
At that moment, upon witnessing the arrival of the gods, she was suddenly reminded of her past life. This memory made her yearn repeatedly for Lalitangadev, and overwhelmed by emotion, she fainted. 91
श्लोक 92 से 101
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
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