भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 |
श्लोक 176 से 181 मेरु की शोभा
स्वयंबुद्ध ने मेरु की शोभा देखी। इसके शिखर आकाश को घेरते हैं। देव-देवियाँ यहाँ निवास करते हैं। प्रत्यंत पर्वत निषध-नील तक फैले हैं, गजदंत पर्वत भक्ति से फैले हैं। सीता-सीतोदा नदियाँ दो कोस दूर समुद्र की ओर जाती हैं।0
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 176 to 181
श्लोक ( Shlok ) 176
“तमद्भुतश्रियं पश्यन् अगमत् स परां मुदम् । न्यरूपयच्च पर्यन्तदेशानस्येति विस्मयात् ॥१७६॥
अद्भुत शोभायुक्त उस मेरु पर्वत को देखता हुआ वह मंत्री अत्यंत आनंद को प्राप्त हुआ और बड़े आश्चर्य से उसके समीपवर्ती प्रदेशों का नीचे लिखे अनुसार निरूपण करने लगा ।।176।।
The minister, beholding the magnificently radiant Mount Meru, was filled with immense joy and great wonder. With deep admiration, he began describing the surrounding regions as follows: ||176||
श्लोक ( Shlok ) 177
गिरीन्द्रोऽयं स्वश्रङ्गागै समाक्रान्तनमोऽङ्गणः । लोकनाडीगतायाम मिमान इव राजते ॥१७७॥
इस गिरिराज ने अपने शिखरों के अग्रभाग से समस्त आकाशरूपी आंगन को घेर लिया है जिससे ऐसा शोभायमान होता है मानो लोकनाड़ी की लंबाई ही नाप रहा हो ।।177।।
This king of mountains, with the tips of its peaks, has encompassed the entire sky-like courtyard, appearing as if it is measuring the very length of the cosmic artery (Lokanadi). ||177||
श्लोक ( Shlok ) 178
अस्य सानूनिमे रम्यच्छायानोकहशोभिनः । सार्द्ध वधूजनैः शश्वदावसन्ति दिवौकसः ॥१७८॥
मनोहर तथा घनी छाया वाले वृक्षों से शोभायमान इस पर्वत के शिखरों पर वे देव लोग अपनी-अपनी देवियों के साथ सदा निवास करते हैं ।।178।
The peaks of this mountain, adorned with enchanting and dense shadow-casting trees, are forever inhabited by celestial beings along with their divine consorts. ||178||
श्लोक ( Shlok ) 179
अस्य पादाद्रयोऽप्यस्मा दानीलनिषधं गताः । महतां पादसंसेवी को वा नायतिमाप्नुयात्।॥ १७९॥
इस पर्वत के प्रत्यंत पर्वत (समीपवर्ती छोटी-छोटी पर्वत श्रेणियाँ) यहाँ से लेकर निषध और नील पर्वत तक चले गये हैं सो ठीक ही है क्योंकि बड़ों की चरण सेवा करने वाला कौन पुरुष बड़प्पन को प्राप्त नहीं होता ।।179।।।
The adjoining mountain ranges of this great mountain extend from here all the way to the Nishadha and Neela mountains. This is only fitting, for who does not attain greatness by serving the feet of the mighty? ||179||
श्लोक ( Shlok ) 180
गजदन्ताङ्गयोऽस्यैते ‘लक्ष्यन्ते पादसंश्रिताः । भक्त्या निषधनीकाभ्यामिव इस्ताः प्रसारिता ॥१८०॥
इसके चरणों (प्रत्यंत पर्वतों) के आश्रित रहने वाले ये गजदंत पर्वत ऐसे जान पड़ते हैं मानो निषध और नील पर्वत ने भक्तिपूर्वक सेवा के लिए अपने हाथ ही फैलाये हों ।।180।।
The mountains dependent on its base (the adjoining ranges) appear like outstretched arms of the Nishadha and Neela mountains, extended in devotion to serve this great mountain. ||180||
श्लोक ( Shlok ) 181
इमे चैनं महानद्यौ सीतासीवोदकाइये । क्रोषाद्वयादनास्पृश्य यातोऽम्भोर्धिभयादिव ॥१८१॥
ये सीता, सीतोदा नाम की महानदियों मानो भय से ही इसके पास नहीं आकर दो कोश की दूरी से समुद्र की ओर जा रही हैं ।।181।।
The great rivers Sita and Sitoda seem to avoid coming near this mountain, as if out of fear, and instead flow toward the ocean while keeping a distance of two kos. ||181||
श्लोक 182 से 191
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 |
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