भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 |
श्लोक 92 से 101 अरविंद की कथा
स्वयंबुद्ध ने अरविंद नामक विद्याधर राजा की कथा शुरू की। वह अलकापुरी का शासक था, जिसने रौद्रध्यान से नरक आयु बाँधी। मृत्यु निकट आने पर दाहज्वर से संतप्त हुआ। कोई उपाय काम न आया। उसने पुत्र हरिचंद्र से उत्तरकुरु के शीतल वनों में भेजने को कहा, पर पुण्यक्षय से विद्या विफल रही। हरिचंद्र समझ गया कि पिता की बीमारी असाध्य है।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
स बद्धारम्भसंर म्भरौद्रध्यानाभिसंधिना । बबन्ध नरकायुष्यं तीव्रासातफलोदयम् ॥९२॥
उस अरविंद राजा ने बहुत आरंभ को बढ़ाने वाले रौद्रध्यान के चिंतन से तीव्र दुःख देने वाली नरकआयु का बंध कर लिया था ।।92।।
King Aravind had bound himself to a harsh and painful hellish existence due to his intense meditation on the wrathful contemplation that promotes the beginning of destruction. ||92||
श्लोक ( Shlok ) 93
प्रत्यासनमृतेस्तस्य दाहज्वरविजुम्मितः । ववृधे तनुसंतापः कदाचिदतिदुःसहः ॥९३॥
जब उसके मरने के दिन निकट आये तब उसके दाहज्वर उत्पन्न हो गया जिससे दिनों-दिन शरीर का अत्यंत दुःसह संताप बढ़ने लगा ।।93।।
As the day of his death approached, he developed a Daahjwar fever, which caused his body to experience increasing and unbearable torment day by day. ||93||
श्लोक ( Shlok ) 94
‘कहार वारिभिर्भूतशीतशीतलि कानिलैः । न निर्वृतिमसौ लेभे हारैश्व हरिचन्दनैः ।॥९४॥
वह राजा न तो लाल कमलों से सुवासित जल के द्वारा, न पंखों की शीतल हवा के द्वारा, न मणियों के हार के द्वारा और न चंदन के लेप के द्वारा ही सुख-शांति को पा सका था ।।94।।
That king could not find peace or comfort through the fragrant water of red lotuses, the cool breeze of feathers, the necklaces of gems, or the sandalwood ointments. ||94||
श्लोक ( Shlok ) 95
विद्यासु विमुखीभावं स्वासु यातासु दुर्मदी । पुण्यक्षयात् परिक्षीणमदशक्तिरिवेभराट् ॥९५॥
उस समय पुण्य क्षय होने से उसकी समस्त विद्याएँ उसे छोड़कर चली गयी थीं इसलिए वह उस गजराज के समान अशक्त हो गया था जिसकी कि मदशक्ति सर्वथा क्षीण हो गयी हो ।।95।।
At that time, due to the depletion of his merits, all his knowledge abandoned him, and he became as powerless as an elephant whose strength has completely waned. ||95||
श्लोक ( Shlok ) 96
दाहज्वरपरीताङ्गः संतापं सोढुमक्षमः । हरिचन्द्रमथाहूय सुतमित्यादिशद् वचः ॥९६॥
जब वह दाहज्वर से समस्त शरीर में बेचैनी पैदा करने वाले संताप को नहीं सह सका तब उसने एक दिन अपने हरिचंद्र पुत्र को बुलाकर कहा ।।96।।
When he could not endure the unbearable torment caused by the Daahjwar fever throughout his body, he called his son Harichandra one day and said: ||96||
श्लोक ( Shlok ) 97
अङ्ग पुत्र ममाङ्गेषु संतापो वर्द्धतेतराम् । पश्य कहारहाराणां परिम्लानिं तदर्पणात् ॥९७॥
हे पुत्र, मेरे शरीर में यह संताप बढ़ता ही जाता है । देखो तो, लाल कमलों की जो मालाएँ संताप दूर करने के लिए शरीर पर रखी गयी थीं वे कैसी मुरझा गयी हैं ।।97।।
O son, the torment in my body keeps increasing. See how the garlands of red lotuses, which were placed on my body to alleviate the pain, have withered. ||97||
श्लोक ( Shlok ) 98
तन्मामुदक्कुरून् पुत्र प्रापमाशु स्वविद्यया । सांइच शीतान् वनोद्देशान् सीतानद्यास्तटाश्रितान् ॥९८॥
इसलिए हे पुत्र, तुम मुझे अपनी विद्या के द्वारा शीघ्र ही उत्तरकुरु देश में भेज दो और उत्तरकुरु में भी उन वनों में भेजना जो कि सीतोदा नदी के तट पर स्थित हैं तथा अत्यंत शीतल हैं ।।98।।
Therefore, O son, use your knowledge to quickly send me to the land of Uttarakuru, and within Uttarakuru, send me to those forests that are located on the banks of the Sitauda River and are extremely cool. ||98||
श्लोक ( Shlok ) 99
तन्त्र कल्पतरून् धुन्वन् सीतावीचिचयोत्थितः । दाहान्मां मातरिश्वास्मादुपशान्ति स नेष्यति ॥९९॥
कल्पवृक्षों को हिलाने वाली तथा सीता नदी की तरंगों से उठी हुई वहाँ की शीतल वायु मेरे इस संताप को अवश्य ही शांत कर देगी ।।99।।
The cool breeze from there, stirred by the waves of the Sita River and capable of shaking the wish-fulfilling trees, will surely relieve my torment. ||99||
श्लोक ( Shlok ) 100
इति तद्वचनाद् विद्यां प्रैषिषद् व्योमगामिनीम् । स सूनुः साप्यपुण्यस्य नाभूतस्योपकारिणी ॥१००।
पिता के ऐसे वचन सुनकर राजपुत्र हरिचंद्र ने अपनी आकाशगामिनी विद्या भेजी परंतु राजा अरविंद का पुण्य क्षीण हो चुका था इसलिए वह विद्या भी उसका उपकार नहीं कर सकी अर्थात् उसे उत्तरकुरु देश नहीं भेज सकी ।।100।।
Hearing these words from his father, the prince Harichandra sent his sky-traveling knowledge. However, since King Aravind’s merits had been exhausted, that knowledge could not help him—it was unable to send him to the land of Uttarakuru. ||100||
श्लोक ( Shlok ) 101
विद्याबैमुख्यतो शात्वा पितुर्व्याघेरसाध्यताम् । सुतः कर्तव्यतामहः सोऽभूदुद्विग्नमानसः ॥१०१॥
जब आकाशगामिनी विद्या भी अपने कार्य से विमुख हो गयी तब पुत्र ने समझ लिया कि पिता की बीमारी असाध्य है । इससे वह बहुत उदास हुआ और किंकर्त्तव्यविमूढ़-सा हो गया ।।101।।
When the sky-traveling knowledge also failed in its task, the son realized that his father’s illness was incurable. He became deeply saddened and was left in a state of confusion, unsure of what to do. ||101||
श्लोक 102 से 111
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 |
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