चंद्रकीर्ति और जयकीर्ति का पुनर्जन्म
माहेंद्र स्वर्ग में वे और जयकीर्ति सामानिक देव बने। वहाँ से च्युत होकर पुष्कर द्वीप के रत्नसंचय नगर में श्रीधर के पुत्र श्रीवर्मा (बलभद्र) और विभीषण (नारायण) बने। श्रीधर ने दीक्षा ली और सिद्ध हुए। माता मनोहरा ने व्रत कर स्वर्ग में ललितांगदेव बनी। विभीषण की मृत्यु पर ललितांगदेव ने श्रीवर्मा को शोक छोड़ने का उपदेश दिया।
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena – श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन – पर्व 7 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 21 चंद्रकीर्ति और जयकीर्ति का पुनर्जन्म
माहेंद्र स्वर्ग में वे और जयकीर्ति सामानिक देव बने। वहाँ से च्युत होकर पुष्कर द्वीप के रत्नसंचय नगर में श्रीधर के पुत्र श्रीवर्मा (बलभद्र) और विभीषण (नारायण) बने। श्रीधर ने दीक्षा ली और सिद्ध हुए। माता मनोहरा ने व्रत कर स्वर्ग में ललितांगदेव बनी। विभीषण की मृत्यु पर ललितांगदेव ने श्रीवर्मा को शोक छोड़ने का उपदेश दिया।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
सप्तसागरकालायुःस्थितिः सामानिकः सुरः । जयकीरिणव तत्रैव जातो मत्सदृशद्धिकः ॥१२॥
वहाँ मैं सात सागर की आयु का धारक सामानिक जाति का देव हुआ । मेरा मित्र जयकीर्ति भी वहीं उत्पन्न हुआ । वह भी मेरे ही समान ऋद्धियों का धारक हुआ था ।।12।।
There, I became a deity of the same class as the Samānik, holding the age of seven seas. My friend Jayakirti was also born there and, like me, became a possessor of divine powers.
श्लोक ( Shlok ) 13 –15
ततः प्रच्युत्य कालान्ते द्वीपे पुष्करसंज्ञके । पूर्वमन्दरपौ रस्त्यविदेहे प्राजनिष्यहि ॥१३॥
विषये मङ्गलावत्यां नगरे रत्नसञ्चये । श्रीधरस्य महीभर्तुः तनया बलकेशवौ แ१४
मनोहरातयोः श्रीवर्मा च विभीषणः । ततो राज्यपदं प्राप्य दीर्घ तत्रारमावहे [हि] ॥१५॥
आयु के अंत में वहां से च्युत होकर हम दोनों पुष्कर नामक द्वीप में पूर्वमेरुसंबंधी पूर्वविदेह क्षेत्र में मंगलावती देश के रत्नसंचय नगर में श्रीधर राजा के पुत्र हुए । मैं बलभद्र हुआ और जयकीर्ति का जीव नारायण हुआ । मेरा जन्म श्रीधर महाराज की मनोहरा नाम की रानी से हुआ था और श्रीवर्मा मेरा नाम था तथा जयकीर्ति का जन्म उसी राजा की दूसरी रानी मनोरमा से हुआ था और उसका नाम विभीषण था । हम दोनों भाई राज्य पाकर वहाँ दीर्घकाल तक क्रीड़ा करते रहे ।।13-15।।
At the end of our lives there, we were both cast down to the island of Pushkara, in the region of former Videha, near Mount Meru. We were born in the city of Ratnasanchaya, in the land of Mangalavati, as the sons of King Shridhar. I was born as Balabhadra, and Jayakirti’s soul was Narayana. I was born to Queen Manohara, the wife of King Shridhar, and my name was Shrivarma. Jayakirti was born to the second queen, Manorama, and his name was Vibhishana. As brothers, we both inherited the kingdom and played there for a long time.
श्लोक ( Shlok ) 16
पिता तु मयि निक्षिप्तराज्यमारः सुधर्मतः । दीक्षित्वोपोष्य सिद्धोऽभूतउपवास विधीन यहून ॥१६।।
हमारे पिता श्रीधर महाराज ने मुझे राज्यभार सौंपकर सुधर्माचार्य से दीक्षा ले ली और अनेक प्रकार के उपवास करके सिद्ध पद प्राप्त कर लिया ।।16।।
Our father, King Shridhar, entrusted me with the kingdom and took initiation from Sudharmacharya. After observing various types of fasting, he attained the state of perfection.
श्लोक ( Shlok ) 17
मनोइरा मयि स्नेहात् स्थितागारे शुचिव्रता । सुधर्मगुरुनिर्दिष्टमाचरन्ती चिरं तपः ॥१७॥
मेरी माता मनोहरा मुझ पर बहुत स्नेह रखती थी इसलिए पवित्र व्रतों का पालन करती हुई और सुधर्माचार्य के द्वारा बताये हुए तपों का आचरण करती हुई वह चिरकाल तक घर में ही रही ।।17।।
My mother, Manohara, loved me dearly. Therefore, she remained at home for a long time, observing sacred vows and practicing the austerities prescribed by Sudharmacharya.
श्लोक ( Shlok ) 18
उपोष्य विधिवत्कर्मक्षपणं विधिमुत्तमम् । जीवितान्ते समाराध्य ललिताङ्गसुरोऽभवत् ॥१८॥
उसने विधिपूर्वक कर्मक्षपण नामक व्रत के उपवास किये थे और आयु के अंत में समाधिपूर्वक शरीर छोड़ा था जिससे मरकर स्वर्ग में ललितांगदेव हुई ।।18।।
She had observed the fasting vow of Karmakshapan with due diligence, and at the end of her life, she peacefully left her body in a state of meditation. After her death, she ascended to heaven and became Lalitangadevi.
श्लोक ( Shlok ) 19
लललिताङ्गस्वतोऽसौ मां विभीषणवियोगतः । शुचमापन्नमासाद्य सोपायं प्रत्यबोधयत् ।।१९॥
तदनंतर कुछ समय बाद मेरे भाई विभीषण की मृत्यु हो गयी और उसके वियोग से मैं जब बहुत शोक कर रहा था तब ललितांगदेव ने आकर अनेक उपायों से मुझे समझाया था ।।19।।
After some time, my brother Vibhishana passed away. Overcome with sorrow from his loss, I was grieving deeply when Lalitangadevi came and, through various means, consoled me.
श्लोक ( Shlok 20
अङ्ग पुत्र त्वरं भागाः शुचमज्ञो यथा जनः । जननादिमियोऽ वश्यंभावुका विद्धि संसृतौ ॥२०॥
कि हे पुत्र, तू अज्ञानी पुरुष के समान शोक मत कर और यह निश्चय समझ कि इस संसार में जन्म-मरण आदि के भय अवश्य ही हुआ करते हैं ।।20।।
O son, do not grieve like an ignorant person. Understand with certainty that in this world, the fears of birth, death, and other challenges are inevitable.
श्लोक ( Shlok 21
इति मातृचरस्यास्य ललिताङ्गस्य बोधनात् । शुचमुत्सृज्य धमैकरसो ऽभूवं प्रसन्नधीः 21.
इस प्रकार जो पहले मेरी माता थी उस ललितांगदेव के समझाने से मैंने शोक छोड़ा और प्रसन्नचित्त होकर धर्म में मन लगाया ।।21।।
“In this way, the sorrow I had earlier was abandoned by the advice of Lalitāngadeva, who was like a mother to me. I then became joyful and focused my mind on the path of righteousness.” (21)
श्लोक 22 से 32
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 |
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