भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51 वज्रजंघ का रूप और गुण (भाग 2)
वज्रजंघ के चरण लक्ष्मी-आश्रित कमलों समान थे। उसकी रूपसंपत्ति शरद् चंद्रमा समान थी। बुद्धि शास्त्रों में दीपिका समान, वह कलाओं का ज्ञाता, विनयी, जितेंद्रिय, और राज्यलक्ष्मी का पात्र था। उसके गुण और प्रेम योग्यता को बढ़ाते थे। वह सरस्वती, कीर्ति, और राज्य में अनुरक्त था, पर स्वयंप्रभा के प्रति निस्पृह था। स्वयंप्रभा का वर्णन शुरू हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
चरणद्वितयं सोऽधादारक्तं मृदिमान्वितम् । श्रितं श्रियानपायिन्या “संचारीव स्थलाम्बुजम् ।।४२।
उस वज्रजंघ के कुछ लाल और कोमल दोनों चरण ऐसे जान पड़ते थे मानो अविनाशिनी लक्ष्मी से आश्रित चलते-फिरते दो स्थल कमल ही हों ।।42।।
“His feet, both red and tender, appeared as though they were two moving lotus flowers, nourished by the imperishable Lakshmi herself.”
श्लोक ( Shlok ) 43
रूपसंपदमुप्यैषा भूषिता श्रुतसंपदा । शरचन्द्रिकयेवेन्दोः मूर्तिरानन्दिनी दृशाम् ।।४३।।
शास्त्रज्ञान से भूषित उसकी यह रूपसंपत्ति नेत्रों को उतना ही आनंद देती थी जितना कि शरद् ऋतु की चाँदनी से भूषित चंद्रमा की मूर्ति देती है ।।43।।
“His beauty, adorned with the knowledge of scriptures, provided as much delight to the eyes as the moon, clothed in autumn’s moonlight, gives to a statue of the moon.”
श्लोक ( Shlok ) 44
“पदवाक्यप्रमाणेषु परं प्रावीण्यमागता । तस्य धीः सर्वशास्त्रेषु दीपिकेव व्यदीप्यत ॥४४॥
पद वाक्य और प्रमाण आदि के विषय में अतिशय प्रवीणता को प्राप्त हुई उसकी बुद्धि सब शाखों में दीपिका के समान दैदीप्यमान रहती थी ।।44।।
“His intellect, having attained great proficiency in topics such as grammar, sentence structure, and evidence, shone brilliantly in all branches, like a lamp illuminating the darkness.”
श्लोक ( Shlok ) 45
स कलाः सकला विद्वान् विनीतात्मा जितेन्द्रियः । राज्यलक्ष्मीकटाक्षाणां लक्ष्यतामगमत् कृती ।।४५
वह समस्त कलाओं का ज्ञाता विनयी जितेंद्रिय और कुशल था इसलिए राज्यलक्ष्मी के कटाक्षों का भी आश्रय हुआ था, वह उसे प्राप्त करना चाहती थी ।।45।।
“He was knowledgeable in all arts, humble, self-controlled, and skilled, which is why he had the favor of Rajyalakshmi’s glances; she desired to bestow her blessings upon him.”
श्लोक ( Shlok ) 46
निसर्गजा गुणास्तस्य विश्वं जनमरञ्जयन् । जनानुरागः सोऽपुष्णात् महतीमस्य योग्यताम् ॥४६॥
उसके स्वाभाविक गुण सब लोगों को प्रसन्न करते थे तथा उसका स्वाभाविक मनुष्य प्रेम उसकी बड़ी भारी योग्यता को पुष्ट करता था ।।46।।
“His natural qualities delighted everyone, and his inherent love for humanity strengthened his great abilities.”
श्लोक ( Shlok ) 47
अनुरागं सरस्वत्यां कीर्त्यां प्रणयनिघ्नताम्। लक्ष्म्यां वाल्लभ्यमातम्वन् विदुषां मूर्ध्नि सोऽभवत्।४७
वह वज्रजंघ सरस्वती में अनुराग, कीर्ति में स्नेह और राज्यलक्ष्मी पर भोग करने का अधिकार (स्वामित्व) रखता था इसलिए विद्वानों में सिरमौर समझा जाता था ।।47।।
“Vajrajangha, with his devotion to Saraswati, affection for fame, and rightful ownership of enjoying the blessings of Rajyalakshmi, was regarded as the foremost among scholars.”
श्लोक ( Shlok ) 48
स तथापि कृत्रप्रज्ञो यौवनं परिमापिवान् । स्वयंप्रभानुरागेण प्रायोऽभूत् स्त्रीषु निःस्पृहः ॥४८॥
यद्यपि वह बुद्धिमान वज्रजंघ उत्कृष्ट यौवन को प्राप्त हो गया था तथापि स्वयंप्रभा के अनुराग से वह प्राय: अन्य स्त्रियों में निस्पृह ही रहता था ।।48।।
“Although the wise Vajrajangha had attained exceptional youth, he often remained indifferent to other women, being absorbed in his own radiance.”
श्लोक ( Shlok ) 49
तस्येति परमानन्दात् काले गच्छति धीमतः । स्वयंप्रभा दिवश्च्युत्वा क्योत्पन्नेत्यधुनोच्यते ॥४९॥
इस प्रकार उस बुद्धिमान वज्रजंघ का समय बड़े आनंद से व्यतीत हो रहा था । अब स्वयंप्रभा महादेवी स्वर्ग से च्युत होकर कहाँ उत्पन्न हुई इस बात का वर्णन किया जाता है ।।49।।
“Thus, the wise Vajrajangha’s time was passing in great joy. Now, the story of where Svayampraha Mahadevi, having fallen from heaven, was born is about to be narrated.”
श्लोक ( Shlok ) 50
अय स्वयंप्रभादेवी तस्मिन् प्रच्युतिमीयुषि । सद्धियोगाच्चिरं खिन्नाचक्राव्हेव विभर्तृका॥५०॥
ललितांगदेव के स्वर्ग से च्युत होने पर वह स्वयंप्रभा देवी उसके वियोग से चकवा के बिना चकवी की तरह बहुत ही खेदखिन्न हुई ।।50।।
“After Lalitangadeva fell from heaven, the goddess Svayampraha, grieving deeply due to his separation, was filled with sorrow, like a male crane without its mate.”
श्लोक ( Shlok ) 51
सुचाविव च संतापधारिणी भूरभूदभाः । समुज्झितकलालापा कोकिलेव घनागमे ॥५१॥
अथवा ग्रीष्मऋतु में जिस प्रकार पृथ्वी प्रभारहित होकर संताप धारण करने लगती है उसी प्रकार वह स्वयंप्रभा भी पति के विरह में प्रभारहित होकर संताप धारण करने लगी और जिस प्रकार वर्षा ऋतु में कोयल अपना मनोहर आलाप छोड़ देती है उसी प्रकार उसने भी अपना मनोहर आलाप छोड़ दिया था―वह पति के विरह में चुपचाप बैठी रहती थी ।।51।।
“Just as the earth, in the summer season, becomes burdened and begins to suffer, in the same way, Svayampraha, without her husband, became burdened with sorrow. And just as the cuckoo abandons its beautiful song during the rainy season, she too abandoned her sweet melody and sat in silence, grieving for her husband.”
श्लोक 52 से 61
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
Download PDF