भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण एकादशं पर्व Ādi purāṇa parv 11 by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 11 में अच्युतेंद्र का पुनर्जन्म, वज्रनाभि का जीवन, तपोमार्ग, वज्रनाभि का अहमिंद्रत्व, सर्वार्थसिद्धि, और सुख की प्रकृति, विषय सुख की आलोचना, सच्चे सुख की व्याख्या, और जिन मार्ग की महिमा शामिल हैं।
This parv 11 narrates the transition of Achyutendra to earth as Vajranabhi, his life as a chakravarti, his father Vajrasen’s asceticism, and Vajranabhi’s eventual renunciation and spiritual ascent , Vajranabhi Muni’s spiritual practices, his ascent to Sarvarthasiddhi as an Ahamindra, his divine existence, and a philosophical discourse on the nature of true happiness versus sensory pleasures, critiques worldly attachments, and concludes with an exhortation to follow the path of Jain dharma for ultimate liberation.
मतिवर सुबाहु, आनंद महाबाहु, अकंपन पीठ, धनमित्र महापीठ बने। केशव धनदेव हुआ। वज्रनाभि का यौवन सुवर्ण समान चमका। उसका शिर बादलों से ढके पर्वत, मुख कमल, नाक सीमा रेखा समान था।
वक्ष लक्ष्मी-आलिंगित, कंधे क्रीड़ा-पर्वत, भुजाएँ तोरण-खंभे, नाभि में वज्र चिह्न था। कटि सरोवर, ऊरु अर्गलदंड, जंघाएँ संधि-प्रतीक, चरण कमल समान थे। उसका रूप देवांगनाओं को मोहित करता था।
वज्रनाभि ने शास्त्र और राजविद्या सीखी। लक्ष्मी-सरस्वती उस पर प्रेम करती थीं। वज्रसेन ने उसे राज्य सौंपा। पट्टबंध में वह सिंहासन पर बैठा, चमर ढुलते थे।
राज्यलक्ष्मी वज्रनाभि से बंधी। वज्रसेन ने मुकुट उसे सौंपा। लौकांतिक देवों ने वज्रसेन को दीक्षा के लिए प्रेरित किया। वज्रसेन और 1,000 राजाओं ने दीक्षा ली। वज्रनाभि राज्य और वज्रसेन तप में संतुष्ट थे।
वज्रनाभि ने चक्ररत्न से पृथ्वी जीती, वज्रसेन ने कर्म जीते। धनदेव तेजस्वी रत्न बना। वज्रनाभि ने वज्रसेन से रत्नत्रय जाना, राज्य त्यागकर पुत्र वज्रदंत को राज्य देकर दीक्षा ली।
अन्य राजा भी तप को गए। वज्रनाभि ने पांच महाव्रत, समिति, गुप्तियाँ धारी एकाकी विहार किया। वज्रसेन के समीप सोलह भावनाओं का चिंतन किया—शुद्ध सम्यग्दर्शन, विनय, तप आदि।
वज्रनाभि ने वैयावृत्य, भक्ति, समता, छह आवश्यकों का पालन किया। सोलह भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति बंधी। उसे चार बुद्धि ऋद्धियाँ प्राप्त हुईं, जिनसे परभव जाना।
वज्रनाभि ने दीप्त, तप्त, उग्र, घोर ऋद्धियाँ पाईं। अणिमा, रस, बल, अक्षीण ऋद्धियाँ भी मिलीं। वह उपशम श्रेणी पर चढ़ा, 10वें-11वें गुणस्थान तक पहुँचा, फिर 7वें में लौटा।
वज्रनाभि ने श्रीप्रभ पर्वत पर प्रायोपवेशन संन्यास लिया। शरीर त्यागकर निश्चल बैठे। 22 परिषह (क्षुधा, शीत आदि) सहन किये।
वज्रनाभि ने दस धर्म (क्षमा, मार्दव आदि) और बारह अनुप्रेक्षाएँ (अनित्यता, अशरण आदि) धारण कीं। वह द्वितीय बार उपशम श्रेणी पर चढ़े, शुक्लध्यान पूर्ण कर 11वें गुणस्थान में पहुँचे, और वहाँ से सर्वार्थसिद्धि में अहमिंद्र बने।
सर्वार्थसिद्धि विमान लोक के अंत से 12 योजन नीचे, जंबूद्वीप के आकार का है। यहाँ मनोरथ सिद्ध होते हैं। नीलमणि भूमि, रत्न दीवारें, इंद्रधनुष कोट, सुगंधित मालाएँ इसे शोभायमान करती हैं। वज्रनाभि यहाँ उपपाद शय्या पर प्रकट हुए।
वज्रनाभि का दोषरहित, यौवनयुक्त शरीर क्षण में प्रकट हुआ। यह शुभ परमाणुओं से बना, चाँदनी से घिरा, हंस समान शोभायमान था। वह सिंहासन पर बैठा, पुण्य से अभिषिक्त, फूलमाला और लक्ष्मी से सुशोभित था।
अहमिंद्र का स्फटिक समान शरीर, मुकुट, आभूषण, मालाएँ, वस्त्र इसे कल्पवृक्ष समान बनाते थे। वह वैक्रियक शरीर से जिन प्रतिमाओं की पूजा करता, तत्त्वचर्चा और सरोवर किनारे विहार करता था। परक्षेत्र में उनकी क्रीड़ा नहीं होती।
अहमिंद्र असूया, निंदा, ईर्ष्या से मुक्त, सुखी रहते थे। वज्रनाभि का अहमिंद्र 33 सागर आयु, समचतुरस्र, हंस समान श्वेत शरीर, दिव्य वस्त्रों से युक्त था। उसकी वेषभूषा शांत, ललित, उदात्त थी।
वह 33,000 वर्ष में आहार, 16 माह 15 दिन में श्वास लेता था। अवधिज्ञान से त्रसनाडी के द्रव्यों को जानता था। उसका मुख कमल, नेत्र नीलकमल, गाल चंद्रमा समान थे। उनके आठ भाई और धनदेव भी अहमिंद्र बने।
अहमिंद्रों का निर्बाध सुख प्रवीचारहित था। संसार में स्त्री-संभोग सुख नहीं, आकुलता है। यह मोह, शिथिलता, तृष्णा बढ़ाता है। रोगी जैसे औषधि लेता है, वैसे कामज्वर से संतप्त जीव संभोग करता है। सच्चा सुख संतोष से मिलता है।
विषय सुख पराधीन, बाधायुक्त, कर्मबंधक है। यह विष समान, खाज खुजलाने जैसा है। चंदन लेप से अस्थायी राहत मिलती है, पर स्थायी सुख नहीं। कुत्ते, कीड़े आदि का प्रेम सुख नहीं। यह केवल रोग प्रतिकार है।
विषयी जीव को विषय निंद्य सुख प्रतीत होते हैं। संभोग से शरीर काँपता, श्वास तीव्र होती, पसीना आता है—यह सुख नहीं। कुत्ता हड्डी चबाकर, विषयी परिश्रम को सुख मानते हैं। स्वाभाविक आह्लाद ही सुख है। स्वर्गीय सुख भी सामग्री के उपभोग से नहीं, केवल सत्ता से नहीं मिलता। यह आर्तध्यान का कारण है।
विषय संग्रह, रक्षा, नाश से दुःख होता है। ये अतृप्तिकर, विनाशी हैं। ईंधन अग्नि, नदियाँ समुद्र, खारा जल प्यास नहीं मिटाते—विषय भी तृष्णा बढ़ाते हैं। हाथी, मछली, भौंरा, पतंग विषय लालसा से दुःख पाते हैं।
हरिणी भी गीतों से मरती है। पाँचों इंद्रियों के विषय दुःख देते हैं। यह जीव धन की लालसा से क्लेश, शोक, असंतोष, राग-द्वेष, कर्मबंध, नरक दुःख भोगता है। विषय चक्र से दुःख बढ़ता है। इनका त्याग करना चाहिए।
तीनों वेद (स्त्री, पुरुष, नपुंसक) संताप हैं, सुख नहीं। अहमिंद्र का प्रवीचाररहित सुख श्रेष्ठ है। सिद्धों का आत्मज सुख बाधारहित, अनुपम है। पुण्य से सर्वार्थसिद्धि, पाप से नरक मिलता है। वज्रनाभि ने शम, दम, यम से तीर्थंकरत्व पाया। श्रेणिक को भी जिन आज्ञा का चिंतन करने की सलाह दी।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 1 to 11
अच्युतेंद्र का स्वर्ग से च्युत होना
जिनेंद्र की स्तुति से रत्नत्रय प्राप्त होता है। अच्युतेंद्र की आयु समाप्ति पर उसकी माला मुरझाई। छह माह शेष रहने पर उसने अर्हंत पूजा की और पंचपरमेष्ठियों का चिंतन कर स्वर्ग छोड़ा। वह पुंडरीकिणी नगरी में वज्रनाभि बना। वरदत्त आदि भाई और मतिवर आदि भी पुत्र बने।
श्लोक ( Shlok ) 1
स्फुरन्ति यस्य वाक्पूजा प्राप्युपायगुणांशवः । स वः पुनातु भव्याब्जवन बोधी जिनांशुमान् ॥१॥
स्तोत्रों द्वारा की हुई पूजा ही जिनकी प्राप्ति का उपाय है ऐसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र आदि अनेक गुणरूपी जिसकी किरणें प्रकाशमान हो रही हैं और जो भव्य जीवरूपी कमलों के वन को विकसित करने वाला है ऐसा वह जिनेंद्ररूपी सूर्य तुम सब श्रोताओं को पवित्र करे ।।1।।
“May the Jinéndra Sun, whose rays manifest as numerous virtues like Samyagdarśana (right faith), Samyagjñāna (right knowledge), and Samyakchāritra (right conduct), and who causes the blooming of the lotus forest of devout souls, sanctify all you listeners—He who is attained through worship by hymns.”
श्लोक ( Shlok ) 2
अथ तस्मिन् दिवं मुक्त्वा भुवमेष्यति ततनौ । म्लानिमायात् किलाम्लानपूर्वी मन्दारमालिका ॥२
अनंतर जब वह अच्युतेंद्र स्वर्ग छोड़कर पृथ्वी पर आने के सम्मुख हुआ तब उसके शरीर पर पड़ी हुई कल्पवृक्ष के पुष्पों की माला अचानक मुरझा गयी । वह माला इससे पहले कभी नहीं मुरझायी थी ।।2।।
“Thereafter, when that Achyutendra was about to leave heaven and descend to Earth, the garland of Kalpavriksha flowers adorning his body suddenly withered. That garland had never withered before.”
श्लोक ( Shlok ) 3
स्वर्गप्रच्युतिलिङ्गानि यथान्येषां सुधाशिनाम् । स्पष्टानि न तथेन्द्राणां किं तु लेशेन केनचित् ॥३॥
स्वर्ग से च्युत होने के चिह्न जैसे अन्य साधारण देवों के स्पष्ट प्रकट होते हैं वैसे इंद्रों के नहीं होते किंतु कुछ-कुछ ही प्रकट होते हैं ।।3।।
“The signs of falling from heaven appear clearly in ordinary gods, but in Indras, they do not manifest as prominently—only partially.”
श्लोक ( Shlok ) 4
ततोऽबोधि सुरेन्द्रोऽसौ स्वर्गप्रच्युतिमात्मनः । तथापि न व्यसीदत् स तद्धि धैर्य महात्मनाम् ॥४॥
माला मुरझाने से यद्यपि इंद्र को मालूम हो गया था कि अब मैं स्वर्ग से च्युत होने वाला हूँ तथापि वह कुछ भी दुःखी नहीं हुआ सो ठीक है । वास्तव में महापुरुषों का ऐसा ही धैर्य होता है ।।4।।
“Although Indra realized that he was about to fall from heaven when his garland withered, he did not feel any sorrow. This is natural, for great souls possess such steadfast patience.”
श्लोक ( Shlok ) 5
षण्मासशेषमात्रायुः सपर्यामर्हंतामसौ । प्रारेभे पुण्यधीः कर्तु प्रायः श्रेयोऽर्थिनो बुधाः ॥५॥
जब उसकी आयु मात्र छह माह की बाकी रह गयी तब उस पवित्र बुद्धि के धारक अच्युतेंद्र ने अर्हंतदेव की पूजा करना प्रारंभ कर दिया सो ठीक ही है, प्राय: पंडितजन आत्मकल्याण के अभिलाषी हुआ ही करते हैं ।।5।।
“When only six months of his life remained, the noble-minded Achyutendra began worshiping the Arhant Deva. This is indeed appropriate, as wise individuals are generally inclined toward self-liberation.”
श्लोक ( Shlok ) 6
स मनः प्रणिधायान्ते पदेषु परमेष्ठिनाम् । निष्ठितायु रभूत् पुण्यैः परिशिष्टैरधिष्ठितः ॥ ६।।
आयु के अंत समय में उसने अपना चित्त पंचपरमेष्ठियों के चरणों में लगाया और उपभोग करने से बाकी बचे हुए पुण्यकर्म से अधिष्ठित होकर वहाँ की आयु समाप्त की ।।6।।
“At the end of his lifespan, he focused his mind on the feet of the Five Supreme Beings and, sustained by the remaining meritorious karma from his enjoyments, completed his time in that realm.”
श्लोक ( Shlok ) 7
तथापि सुखसाद्भूता महाधैर्या महर्द्धयः । प्रच्यवन्ते दिवो देवा ‘धिगेनां संसृतिस्थितिम् ॥७॥
यद्यपि स्वर्गों के देव सदा सुख के अधीन रहते हैं, महाधैर्यवान् और बड़ी-बड़ी ऋद्धियों के धारक होते हैं तथापि वे स्वर्ग से च्युत हो जाते हैं इसलिए संसार की इस स्थिति को धिक्कार हो ।।7।।
“Although the gods of the heavens always remain immersed in pleasure, possess great fortitude, and hold immense supernatural powers, they still fall from their heavenly abodes. Therefore, let this transient nature of the world be condemned!”
श्लोक ( Shlok ) 8 – 9
ततोऽच्युतेन्द्रः प्रच्युत्य जम्बूद्वीपे महाद्युतौ । प्राग्विदेहाश्रिते देशे पुष्कलावत्य भिष्टवे ॥८॥
नगर्या पुण्डरीकिण्यां वज्रसेनस्य भूभुजः । श्रीकान्तायाश्च पुत्रोऽभूद् वज्रनाभिरिति प्रभुः ॥९॥
तत्पश्चात् वह अच्युतेंद्र स्वर्ग से च्युत होकर महाकांतिमां जंबूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में स्थित पुष्कलावती देश की पुंडरीकिणी नगरी में वज्रसेन राजा और श्रीकांता रानी के वज्रनाभि नाम का समर्थ पुत्र उत्पन्न हुआ ।।8-9।।
“After that, Achyutendra, having fallen from heaven, was reborn as a powerful son named Vajranabhi to King Vajrasena and Queen Shrikantha in the city of Pundarikini, located in the Puskalavati region of the eastern Videha area of the radiant Jambudvipa.”
श्लोक ( Shlok ) 10
तयोरेव सुता जाता वरदत्तादयः क्रमात् । विजयो वैजयन्तश्च जयन्तोऽप्यपराजितः ॥१०॥
पहले कहे हुए व्याघ्र आदि के जीव वरदत्त आदि भी क्रम से उन्हीं राजा-रानी के विजय, वैजयंत, जयंत और अपराजित नाम के पुत्र हुए ।।10।।
“The previously mentioned souls of Vyaghra and others were also sequentially reborn as the sons of the same King and Queen, named Vijaya, Vaijayanta, Jayanta, and Aparajita.”
श्लोक ( Shlok ) 11
तदाभूवंस्तयोरेव प्रियाः पुत्रा महोदयाः । पूर्वोद्दिष्टाहमिन्द्रास्तेऽप्य धोग्रैवेयकाच्युताः ॥११॥
जिनका वर्णन पहले किया जा चुका है ऐसे मतिवर मंत्री आदिक जीव जो अधोग्रैवेयक में अहमिंद्र हुए थे वहाँ से च्युत होकर उन्हीं राजा रानी के संपत्तिशाली पुत्र हुए ।।11।।
“The previously described souls, such as the wise minister and others, who had become Ahindra in the lower Graiveyaka heaven, were reborn as prosperous sons of the same King and Queen after falling from there.”
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena