आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 102 उत्सव और इंद्र का नृत्य
पुरवासी गीत-नृत्य में व्यस्त। कोई दीन-निर्धन नहीं। मेरु सा उत्सव अयोध्या में। इंद्र ने नृत्य शुरू किया, गंधर्वों ने संगीत। नाट्यशास्त्र अनुसार नृत्य, महात्माओं के देखने योग्य। बाजे, पृथ्वी रंगभूमि, इंद्र नर्तक, भगवान आराध्य, पुरुषार्थ सिद्धि फल।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 92 to 102
श्लोक ( Shlok ) 92
ततो गीतैश्च नृत्तेश्च वादित्रेश्च समङ्गलैः । व्यग्रः पौरजनः सर्वोऽप्यासीदानन्दनिर्भरः ॥९२॥
इस प्रकार आनंद से भरे हुए समस्त पुरवासी जन गीत, नृत्य, वादित्र तथा अन्य अनेक मंगल-कार्यों में व्यग्र हो रहे थे ।।92।।
“Thus, all the joyous citizens were engrossed in singing, dancing, playing musical instruments, and engaging in various auspicious festivities.”
श्लोक ( Shlok ) 93
न तदा कोऽप्यभूद् दीनों न तदा कोऽपि दुर्विधः । न तदा कोऽप्यपूर्णेच्छों न तदा कोऽप्य कौतुकः ॥९३
उस समय उस नगर में न तो कोई दीन रहा था, न निर्धन रहा था, न कोई ऐसा ही रहा था जिसकी इच्छाएँ पूर्ण नहीं हुई हों और न कोई ऐसा ही था जिसे आनंद उत्पन्न नहीं हुआ हो ।।93।।
“At that time, there was neither anyone destitute nor impoverished in the city, nor was there anyone whose desires remained unfulfilled or who was not filled with joy.”
श्लोक ( Shlok ) 94
सप्रमोदमयं विश्वमित्यातन्वन्महोत्सवः । यथा मेरौ तथैवास्मिन् पुरे सान्तःपुरेऽवृतत् ॥९४॥
इस तरह सारे संसार को आनंदित करने वाला वह महोत्सव जैसा मेरु पर्वत पर हुआ था वैसा ही अंतःपुरसहित इस अयोध्यानगर में हुआ ।।94।।
“Thus, the grand festival that brought joy to the entire world took place in Ayodhya, along with the royal palace, just as it had on Mount Meru.”
श्लोक ( Shlok ) 95
दृष्ट्वा प्रमुदितं तेषां स्वं प्रमोदं प्रकाशयन् । संक्रन्दनो मनोवृत्तिमानन्दानन्दनाटके ॥९५॥
उन नगरवासियों का आनंद देखकर अपने आनंद को प्रकाशित करते हुए इंद्र ने आनंद नामक नाटक करने में अपना मन लगाया ।।95।।
“Seeing the joy of the citizens, Indra, radiating his own happiness, immersed himself in performing a play called ‘Ananda’ (Joy).”
श्लोक ( Shlok ) 96
नृत्तारम्भे महेन्द्रस्य सज्जः संगीतविस्तरः । गन्धर्वैस्तद्विधानज्ञै र्भाण्डोपवहनादिभि ॥९६॥
ज्यों ही इंद्र ने नृत्य करना प्रारंभ किया त्यों ही संगीतविद्या के जानने वाले गंधर्वों ने अपने बाजे वगैरह ठीक कर विस्तार के साथ संगीत करना प्रारंभ कर दिया ।।96।।
“As soon as Indra began to dance, the Gandharvas, masters of musical arts, tuned their instruments and started playing music in full harmony.”
श्लोक ( Shlok ) 97
कृतानुकरणं नाट्यं तत्प्रयोज्यं यथागमम् । स चागमो महेन्द्राद्यैर्यथाम्नाय ‘मनुस्मृतः ॥९७
पहले किसी के द्वारा किये हुए कार्य का अनुकरण करना नाट्य कहलाता है, वह नाट्य, नाट्यशास्त्र के अनुसार ही करने के योग्य है और उस नाट्यशास्त्र को इंद्रादि देव ही अच्छी तरह जानते हैं ।।97।।
“The imitation of actions performed by others is called drama (Nāṭya). Such drama should be performed in accordance with the principles of Nāṭyaśāstra, which is well understood by Indra and other celestial deities.”
श्लोक ( Shlok ) 98
वक्तणां तत्प्रयोक्तृत्वे “लालित्यं किमु वर्ण्यते । पात्रान्तरेऽपि संक्रान्तं यत् सहां चित्तरञ्जनम् ।।९८
जो नाट्य या नृत्य शिष्य-प्रतिशिष्यरूप अन्य पात्रों में संक्रांत होकर भी सज्जनों का मनोरंजन करता रहता है यदि उसे स्वयं उसका निरूपण करने वाला ही करे तो फिर उसकी मनोहरता का क्या वर्णन करना है ।।98।।
“When a drama or dance, even when performed by disciples and their successors, continues to delight noble souls, then if it is enacted by its very originator, what limit can there be to its enchantment?”
श्लोक ( Shlok ) 99
ततः श्रवेयं दृश्यं च तत्प्रयुक्तः महात्मनाम् । पाठ्यैर्नानाविधैश्चित्रै राङ्गिकाभिनयैरपि ॥ ९९
तत्पश्चात् अनेक प्रकार के पाठ और चित्र-विचित्र शरीर की चेष्टाओं से इंद्र के द्वारा किया हुआ वह नृत्य महात्मा पुरुषों के देखने और सुनने योग्य था ।।99।।
“Then, with various recitations and intricate bodily gestures, the dance performed by Indra became a spectacle worthy of being seen and heard by noble souls.”
श्लोक ( Shlok ) 100 – 102
विकृष्टः कुतपन्यासों मही सकुलभूधरा । रङ्गस्त्रिभुवनाभोगः सहस्त्राक्षो महानटः ॥१००॥
प्रेक्षका नाभिराजाद समाराध्यो’ जगद्गुरुः । फलं त्रिवर्गसंभूतिः परमानन्द एव च ॥१०१॥
इत्येकक्षोऽपि संप्रीत्यै वस्तुजातमिदं सताम् । किमु तत्सर्वसंदोहः पुण्यैरेकत्र संगतः ॥१०२॥
उस समय अनेक प्रकार के बाजे बज रहे थे, तीनों लोकों में फैली हुई कुलाचलोंसहित पृथ्वी ही उसकी रंगभूमि थी, स्वयं इंद्र प्रधान नृत्य करने वाला था, नाभिराज आदि उत्तम-उत्तम पुरुष उस नृत्य के दर्शक थे, जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव उसके आराध्य (प्रसन्न करने योग्य) देव थे, और धर्म, अर्थ, काम इन तीन पुरुषार्थों की सिद्धि तथा परमानंदरूप मोक्ष की प्राप्ति होना ही उसका फल था । इन ऊपर कही हुई वस्तुओं में से एक-एक वस्तु भी सज्जन पुरुषों को प्रीति उत्पन्न करने वाली है फिर पुण्योदय से पूर्वोक्त सभी वस्तुओं का समुदाय किसी एक जगह आ मिले तो कहना ही क्या है ? ।।100-102।।
“At that time, various musical instruments were playing, and the entire earth, along with its mighty mountain ranges, became the grand stage. Indra himself was the lead dancer, while King Nabhiraja and other noble men were the spectators. Lord Rishabhadeva, the world’s spiritual guide, was the revered deity of the performance. The dance aimed to fulfill the three pursuits of life—Dharma (righteousness), Artha (prosperity), and Kama (desires)—and ultimately lead to the supreme bliss of Moksha (liberation).
Even a single one of these elements is enough to bring joy to noble souls. But when, by the grace of great merit, all these divine elements come together in one place, what more can be said of its magnificence?”
श्लोक 103 से 111
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91