आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41
प्रकृति और भरत की शोभा
मेघों के नष्ट होने से दिशाएं प्रसन्न थीं और हंसों से अलंकृत थीं। मयूरों ने कलहंसों के मधुर शब्दों से पराजित होकर अपनी वाणी छोड़ दी। शरद् ऋतु चांदनी और नक्षत्रों से सुशोभित थी। चंद्रमा कीर्ति फैलाता हुआ राजा के समान था। शरद् ऋतु नवोढ़ा स्त्री की तरह बंधूक फूलों से लालिमा धारण किए थी। आकाश, नदियां और दिशाएं स्वच्छ और निर्मल थीं। वन-पंक्तियां सुगंधित फूलों और भौंरों से आकर्षक थीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 26 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
अनुद्धता गभीरत्वं भेजुः स्वच्छजलांशुकाः। सरित्स्त्रियो घनापायाद् वैधव्यमिव संश्रिताः ॥३२॥
वर्षाकालके नष्ट हो जानेसे नदीरूप स्त्रियां मानों वैधव्य अवस्थाको ही प्राप्त हो गई थीं, क्योंकि जिस प्रकार विधवाएं उद्धतता छोड़ देती हैं उसी प्रकार नदियोंने भी उद्धतता छोड़ दी थी, विधवाएं जिस प्रकार स्वच्छ (सफेद) बस्त्र धारण करती हैं उसी प्रकार नदियां भी स्वच्छ वस्त्ररूपी जल धारण कर रही थीं, और विधवाएं जिस प्रकार अगम्भीर वृत्तिको धारण करती हैं उसी प्रकार नदियां भी अगम्भीर अर्थात् उथली वृत्तिको धारण कर रही थीं ॥३२॥
With the passing of the rainy season, the rivers, in the form of women, seemed to have entered a state of widowhood. Just as widows give up their boldness, the rivers too had abandoned their arrogance. Just as widows wear clean (white) garments, the rivers were adorned with the pure water of clean clothes. And just as widows take on a simple, modest demeanor, the rivers too were now shallow, reflecting a similar simplicity. ||32||
श्लोक ( Shlok ) 33
दिगङ्गना धनापायप्रकाशीभूतमूर्तयः । “व्यावहासीमिवातेनुः प्रसन्ना हंसमण्डलैः ॥३३।।
मेघोंके नष्ट हो जानेसे जिनकी मूर्ति आकृति प्रकाशित हो रही है ऐसी दिशारूपी स्त्रियां अत्यन्त प्रसन्न हो रही थीं और हंसरूप आभरणोंके छलसे मानो एक दूसरेके प्रति हँस ही रही थीं ॥३३॥
With the passing of the clouds, the forms and figures of the directional women were becoming clear, and they were exceedingly joyful. As if adorned with swan-like ornaments, they seemed to be laughing with one another, filled with playful joy. ||33||
श्लोक ( Shlok ) 34
कूजितैः कलहंसानां निर्जिता इव तत्त्यजुः। केकायितानि शिखिनः सर्वः कालबलाद् बली ।।३४।।
उस समय मयूरोंने अपनी केका वाणी छोड़ दी थी, मानो कलहंस पक्षियोंके मधुर शब्दोंसे पराजित होकर ही छोड़ दी हो, सो ठीक ही है क्योंकि समयके बलसे सभी बलवान् हो जाते हैं ।॥३४॥
t that time, the peacocks had stopped their keka call, as if defeated by the sweet sounds of the kalahan (Indian cuckoo) birds. This is indeed fitting, as with the passage of time, all powerful beings become subdued. ||34||
श्लोक ( Shlok ) 35
ज्योत्स्नादुकूलवसना लसन्नक्षत्रमालिका। बन्धुजीवाधरा रेजे निर्मला शरदङ्गना ॥३५॥
चांदनीरूपी रेशमी वस्त्र पहने हुए, देदीप्यमान नक्षत्रोंकी माला (पक्ष में सत्ताईस मणियोंवाला नक्षत्रमाल नामका हार) धारण किये हुए और दुपहरियाके फूल रूप अधरोंसे सहित वह निर्मल शरद्ॠतुरूपी स्त्री अतिशय सुशोभित हो रही थी ॥३५॥
Wearing a moonlight-like silk garment, adorned with a radiant necklace of stars (a necklace of twenty-seven jewels representing the constellation), and with lips resembling midday flowers, that pure autumn season, in the form of a woman, appeared extraordinarily beautiful. ||35||
श्लोक ( Shlok ) 36
ज्योत्स्ना कीर्तिमिवातन्वन् विधुर्गंगनमण्डले । शरल्लक्ष्मी समासाद्य सुराजेवाद्युतत्तराम् ॥३६॥
शरद्ऋतुकी शोभा पाकर आकाशमण्डलमें चांदनीरूपी कीतिको फैलाता हुआ चन्द्रमा किसी उत्तम राजाके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ।॥३६॥
The moon, spreading a moonlight-like glow across the sky, adorned the celestial sphere with the beauty of the autumn season. It appeared as splendid as an exalted king. ||36||
श्लोक ( Shlok ) 37
बन्धुजीवेषु विन्यस्तरागा “बाणकृतद्युतिः। हंसी सखीवृत्ता रेजे नवोढेव शरद्वधूः ॥३७॥
वह शरद्ऋतु नवोढ़ा स्त्रीके समान सुशोभित हो रही थी क्योंकि जिस प्रकार नवोढ़ा स्त्री बन्धुजीव अर्थात् भाईबन्धुओंपर राग अर्थात् प्रेम रखती है उसी प्रकार वह शरद्ऋतु भी बन्धुजीव अर्थात् दुपहरियाके फूलोंपर राग अर्थात् लालिमा धारण कर रही थी, नवोढा स्त्री जिस प्रकार देदीप्यमान होती है उसी प्रकार शरद्ऋतु भी बाण जातिके फूलोंसे देदीप्यमान हो रही थी और नवोढा स्त्री जिस प्रकार सखियोंसे घिरी रहती है उसी प्रकार वह शरद्ऋतु भी हंसीरूपी सखियोंसे घिरी रहती थी ॥३७।।
That autumn season was shining like a newlywed woman, because just as a newlywed woman holds affection and love for her family members, especially her brothers, in the same way, the autumn season too was embracing its loved ones, the duphariya flowers, with warmth and radiance. Just as a newlywed woman shines brightly, the autumn season too was radiant with flowers resembling arrows. And just as a newlywed woman is surrounded by her friends, the autumn season was surrounded by the laughter of its companions. ||37||
श्लोक ( Shlok ) 38
स्वयं धौतमभाद व्योम स्वयं प्रच्छालितः शशी। स्वयं प्रसादिता नद्यः स्वयं सम्माजिता दिशः ॥ ३८॥
उस समय आकाश अपने आप साफ किये हुएके समान जान पड़ता था, चन्द्रमा अपने आप धोये हुएके समान मालूम होता था, नदियां अपने आप स्वच्छ हुई सी जान पड़ती थीं और दिशाएं अपने आप झाड़ ब्रहार कर साफ की हुईंके समान मालूम होती थीं ॥३८॥
At that time, the sky appeared as if it had cleansed itself; the moon looked as though it had been freshly washed; the rivers seemed to have become pure on their own; and the directions looked as if they had been swept and cleaned by themselves. ||38||
श्लोक ( Shlok ) 39
शरल्लक्ष्मीमुखालोकदर्पणे शशिमण्डले । प्रजादृशो धृतिं भेजुः रसंमृष्टसमुज्ज्वले ॥३९॥
जो शरद् ऋतुरूपी लक्ष्मीके मुख देखने के लिये दर्पणके समान है और जो बिना साफ किये ही अत्यन्त उज्ज्वल है ऐसे चन्द्रमण्डलमें प्रजाके नेत्र बड़ा भारी संतोष प्राप्त करते थे ॥३९॥
The moon, which was like a mirror for beholding the face of the goddess of autumn, and which shone brilliantly without needing any polishing, brought immense satisfaction to the eyes of the people. ||39||
श्लोक ( Shlok ) 40
वनराजीस्ततामोदाः कुसुमाभरणोज्ज्वलाः । मधुव्रता भजन्ति स्म कृतकोलाहलस्वनाः ॥४०॥
जिनकी सुगन्धि चारों ओर फैल रही है और जो फूलरूप आभरणोंसे उज्ज्वल हो रही हैं ऐसी वन-पंक्तियोंको भूमर कोलाहल शब्द करते हुए सेवन कर रहे थे ।।४०।।
The rows of forests, filled with fragrance spreading in all directions and glowing with flower-like ornaments, were being enjoyed by the bumblebees, who buzzed around them with joyful humming sounds. ||40||
श्लोक ( Shlok ) 41
तन्व्यो वनलता रेजुः र्विकासिकुसुमस्मिताः। सालका इव गन्धान्ध विलोलालिकुलाकुलाः ॥४१॥
जो फूले हुए पुष्परूपी मन्द हास्यसे सहित थीं तथा गन्धसे अंधे हुए भुमरोंके समूहसे व्याप्त होने के कारण जो सुन्दर केशोंसे सुशोभित थीं ऐसी बनकी लताएं उस समय कृश शरीरवाली स्त्रियोंके समान शोभा पा रही थीं ॥४१॥
The forest creepers, adorned with gentle smiles in the form of blooming flowers, and beautifully decorated with bumblebees—blinded by fragrance and resembling lovely hair—appeared, at that time, like delicate, slender-bodied women, radiating charm. ||41||
श्लोक 42 से 51
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31


