आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 मरुदेवी का ऊपरी शरीर
उसके स्तन क्रीडाचल, हार से शोभित, कंठ सूक्ष्म रेखाओं वाला, भुजाएँ कल्पवृक्ष शाखा, हस्त अशोक किसलय, कंधे हंसिनी पंख समान थे। वह विधाता की सुंदर रचना थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
तनुमध्यं बभारासौ वलिभं निम्ननाभिकम् । शरन्नदीव सावर्त स्रोतः प्रतनुवीचिकम् ॥३२॥
जिस प्रकार शरद्ऋतु की नदी भँवर से युक्त और पतली-पतली लहरों से सुशोभित प्रवाह को धारण करती है उसी प्रकार वह मरुदेवी की भी त्रिवलि से युक्त और गंभीर नाभि से शोभायमान, अपने शरीर के मध्यभाग को धारण करती थी ।।32।।
Just as an autumn river bears a current adorned with whirling eddies and delicate waves, in the same way, Marudevi’s midsection was graced with three graceful folds (Trivali) and a deep, captivating navel, enhancing her beauty. ( 32)
श्लोक ( Shlok ) 33
स्तनावस्याः समुत्तुङ्गौ रेजतुः परिणाहिनौ । यौवनश्रीविलासाय क्लृप्तौ क्रीडाचलाविव ॥३३॥
उसके अतिशय ऊँचे और विशाल स्तन ऐसे शोभायमान होते थे मानो तारुण्य-लक्ष्मी की क्रीड़ा के लिए बनाये हुए दो क्रीडाचल ही हों ।।33।।
Her exceedingly high and full breasts appeared so magnificent, as if they were two playful mountains created for the divine sport of the goddess of youth and beauty. ( 33)
श्लोक ( Shlok ) 34
धृतांशुकमसौ दध्रे कुङ्कुमाङ्क कुचद्वयम् । । वीचिरुद्धमित्रानोङ्गमिथुनं सुरनिम्नगा ॥३४॥
जिस प्रकार आकाशगंगा लहरों में रुके हुए दो चक्रवाक पक्षियों को धारण करती है उसी प्रकार वह मरुदेवी जिन पर केशर लगी हुई है और जो वस्त्र से ढके हुए हैं ऐसे दोनों स्तनों को धारण कर रही थी ।।34।।
Just as the Milky Way holds two Chakravaka birds resting on its waves, in the same way, Marudevi bore her two saffron-anointed breasts, gracefully covered with fine garments. (34)
श्लोक ( Shlok ) 35
स्तनावलग्न संलग्नहाररोचिरसौ बभौ । सरोज कुड्मलाभ्यर्णस्थितफेना यथाब्जिनी ॥३५॥
जिसके स्तनों के मध्य भाग में हार की सफेद-सफेद किरणें लग रही थीं ऐसी वह मरुदेवी उस कमलिनी की तरह सुशोभित हो रही थी जिसके कि कमलों की बोड़ियों के समीप सफेद-सफेद फेन लग रहा है ।।35।।
Marudevi, whose chest was adorned with the radiant white rays of her necklace, appeared as enchanting as a lotus plant, whose buds are surrounded by delicate white foam. ( 35)
श्लोक ( Shlok ) 36
व्यराजि कन्धरेणास्यास्तनुराजीविराजिना’ । उल्लिख्य’ घटितेनेव धात्रा निर्माणकौशलात् ॥३६॥
सूक्ष्म रेखाओं से उसका शोभायमान कंठ बहुत ही सुशोभित हो रहा था और ऐसा जान पड़ता था मानो विधाता ने अपना निर्माण संबंधी कौशल दिखाने के लिए ही सूक्ष्म रेखाएं उकेरकर उसकी रचना की हो ।।36।।
Her radiant neck, adorned with delicate lines, appeared exceedingly beautiful, as if the Creator had carved those fine markings to showcase His artistic mastery. ( 36)
श्लोक ( Shlok ) 37
अधिकन्धरमाबद्ध हारयष्टिर्व्यभादसौ । पतद् गिरिसरित्स्रोताः सानुलेखेव शृङ्गिणः ।॥३७॥
जिसके गले में रत्नमय हार लटक रहा है ऐसी वह मरुदेवी पर्वत की उस शिखर के समान शोभायमान होती थी जिस पर कि ऊपर से पहाड़ी नदी के जल का प्रवाह पड़ रहा हो ।।37।।
Marudevi, with a bejeweled necklace adorning her neck, appeared as magnificent as a mountain peak over which a cascading stream of water from a highland river gracefully flows. (37)
श्लोक ( Shlok ) 38
शिरीषसुकुमाराङ्गास्तस्या बाहू विरेजतुः । कल्पवल्ल्या इवावाग्रौ विटपौ मणिभूषणौ ॥३८॥
शिरीष के फूल के समान अतिशय कोमल अंगों वाली उस मरुदेवी की मणियों के आभूषणों से सुशोभित दोनों भुजाएं, ऐसी भली जान पड़ती थीं मानो मणियों के आभूषणों से सहित कल्पवृक्ष की दो मुख्य शाखाएं ही हों ।।38।।
Marudevi, whose limbs were as soft as Shirisha flowers, had both arms adorned with radiant gemstone ornaments. They appeared as if they were the two principal branches of the divine Kalpavriksha, embellished with sparkling jewels. ( 38)
श्लोक ( Shlok ) 39
मृदुबाहुलते तस्याः करपल्लवसंश्रिताम् । नखांशूल्लसितव्याजाद् दधतुः पुष्पमञ्जरीम् ॥३९॥
उसकी दोनों कोमल भुजाएँ लताओं के समान थीं और वे नखों की शोभायमान किरणों के बहाने हस्तरूपी पल्लवों के पास लगी हुई पुष्पमंजरियाँ धारण कर रही थी ।।39।।
Her two delicate arms resembled graceful vines, and with the radiant glow of her shining nails, they appeared as if they bore clusters of blossoms near their leaf-like hands. ( 39)
श्लोक ( Shlok ) 40
अशोकपल्लवच्छायं बिभ्रती करपल्लवम् । पाणौ कृतमिवाशेषं मनोरागमुवाह सा ॥४०॥
अशोक वृक्ष के किसलय के समान लाल-लाल हस्तरूपी पल्लवों को धारण करती हुई वह मरुदेवी ऐसी जान पड़ती थी मानो हाथों में इकट्ठे हुए अपने मन के समस्त अनुराग को ही धारण कर रही हो ।।40।।
Marudevi, with her hand-like buds as red as the fresh sprouts of an Ashoka tree, appeared as if she were holding all the love and passion of her heart gathered within her hands. ( 40)
श्लोक ( Shlok ) 41
सा दधे किमपि स्रस्तावंसौ हंसीव पक्षती । आस्त्रस्तकबरोभार वाहिकाखेदिताविव ॥४१॥
जिस प्रकार हंसिनी कुछ नीचे की ओर ढले हुए पंखों के मूल भाग को धारण करती है उसी प्रकार वह मरुदेवी कुछ नीचे की ओर झुके हुए दोनों कंधों को धारण कर रही थी, उसके वे झुके हुए कंधे ऐसे मालूम होते थे मानो लटकते हुए केशों का भार धारण करने के कारण खेद-खिन्न होकर ही नीचे की ओर झुक गये हों ।।41।।
Just as a swan carries the slightly drooping base of its wings, in the same way, Marudevi bore her gently sloping shoulders. Her lowered shoulders appeared as if they had bowed down in weariness under the weight of her cascading tresses. ( 41)
श्लोक 42 से 51
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31