आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251
श्लोक 252 से 261 रत्नवर्षा और गर्भ शोभा
रत्नधारा से आंगन शोभित, स्वर्ग लक्ष्मी सा। पुत्र तेजस्वी, मरुदेवी संतुष्ट। गर्भ तेज से पूर्व दिशा सा, रत्न खान सा। ऋषभदेव कष्ट न देते, त्रिवलियाँ यथावत।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 252 to 261
श्लोक ( Shlok ) 252
वसुधा राजते तन्वि परितस्त्वद्गृहाङ्गणम् । वसुधारानिपातेन दधतीव महानिधिम् ॥२५२॥
हे तन्वि ! रत्नों की वर्षा से आपके घर के आंगन के चारों ओर की भूमि ऐसी शोभायमान हो रही है मानो किसी बड़े खजाने को ही धारण कर रही हो ।।252।।
“O slender one! The ground around your home’s courtyard is shining so brilliantly from the shower of jewels, as if it is carrying a great treasure itself.”||252||
श्लोक ( Shlok ) 253
वसुधा रानिभे नारात् स्वर्गश्रीस्त्वामुपासितुम् । सेयमायाति पश्यैनां नानारत्नांशुचित्रिताम् ॥ २५३॥
हे देवि इधर अनेक प्रकार के रत्नों की किरणों से चित्र-विचित्र पड़ती हुई यह रत्नधारा देखिए । इसे देखकर मुझे तो ऐसा जान पड़ता है मानो रत्नधारा के छल से यह स्वर्ग की लक्ष्मी ही आपकी उपासना करने के लिए आपके समीप आ रही है ।।253।।
“O Devi, behold the stream of jewels, their rays scattered in various patterns. Looking at this, it seems to me as though the goddess of wealth from heaven, by the enchantment of these jewels, is coming near you to worship you.”||253||
श्लोक ( Shlok ) 254
मुदेऽस्तु वसुधारा ते देवताशीस्तताम्बरा । स्तुतादेशे नमाताधा वशीशे स्वस्वनस्तसु ॥२५४॥
जिसकी आज्ञा अत्यंत प्रशंसनीय है और जो जितेंद्रिय पुरुषों में अतिशय श्रेष्ठ है ऐसी हे माता ! देवताओं के आशीर्वाद से आकाश को व्याप्त करने वाली अत्यंत सुशोभित, जीवों की दरिद्रता को नष्ट करने वाली और नम्र होकर आकाश से पड़ती हुई यह रत्नों की वर्षा तुम्हारे आनंद के लिए हो [यह अर्धभ्रम श्लोक है―इस श्लोक के तृतीय और चतुर्थ चरण के अक्षर प्रथम तथा द्वितीय चरण में ही आ गये हैं ।] ।।254।।
“O Mother, who is highly praiseworthy and is exceedingly superior among the masters of self-control! By the blessing of the gods, this shower of jewels, which spreads throughout the sky, is exceedingly beautiful, destroys the poverty of living beings, and falls from the sky humbly, is for your joy.”
[This is an Ardhabhrama Shloka (a verse with a form of poetic repetition—where the letters of the third and fourth parts appear in the first and second parts of the verse).]||254||
श्लोक ( Shlok ) 255
इति ताभिः प्रयुक्तानि दुष्कराणि विशेषतः । जानाना सुचिरं भेजे सान्तर्वत्नी सुखासिकाम्॥२५५
इस प्रकार उन देवियों के द्वारा पूछे हुए कठिन-कठिन प्रश्नों को विशेष रूप से जानती हुई वह गर्भवती मरुदेवी चिरकाल तक सुखपूर्वक निवास करती रही ।।255।।
“Thus, the pregnant Marudevi, who particularly understood the difficult and complex questions asked by the goddesses, lived happily for a long time.”||255||
श्लोक ( Shlok ) 256
निसर्गाच्च धृतिस्तस्याः परिज्ञनेऽभवत् परा । प्रज्ञामयं परं ज्योतिरुद्वहन्त्या निजोदरे l२५६l
वह मरुदेवी स्वभाव से ही संतुष्ट रहती थी और जब उसे इस बात का परिज्ञान हो गया कि मैं अपने उदर में ज्ञानमय तथा उत्कृष्ट ज्योतिस्वरूप तीर्थंकर पुत्र को धारण कर रही हूँ तब उसे और भी अधिक संतोष हुआ था ।।256।।
“The Marudevi was naturally content, and when she realized that she was carrying in her womb the knowledgeable and supreme radiant Tirthankara son, her satisfaction increased even more.”||256||
श्लोक ( Shlok ) 257
सा तदात्मीयगर्भान्तर्गतं तेजोऽतिभासुरम् । दधानार्काशुगर्भेव प्राची प्राप परां रुचिम्॥२५७l
वह मरुदेवी उस समय अपने गर्भ के अंतर्गत अतिशय दैदीप्यमान तेज को धारण कर रही थी इसलिए सूर्य की किरणों को धारण करने वाली पूर्व दिशा के समान अतिशय शोभा को प्राप्त हुई थी ।।257।।
“At that time, the Marudevi, who was carrying an extraordinarily radiant light in her womb, became as resplendent as the eastern direction, which holds the rays of the sun.”||257||
श्लोक ( Shlok ) 258
सूचिता वसुधारोरुदीपेनाधः कृतार्चिषा । निधिगर्भस्थलीवासौ रेजे राजीवलोचना ॥२५८॥
अन्य सब कांतियों को तिरस्कृत करने वाली रत्नों की धारारूपी विशाल दीपक से जिसका पूर्ण प्रभाव जान लिया गया है ऐसी वह कमलनयनी मरुदेवी किसी दीपक विशेष से जानी हुई खजाने की मध्यभूमि के समान सुशोभित हो रही थी ।।258।।
“The lotus-eyed Marudevi, who radiated a brilliance that overshadowed all other glories, shone like the central part of a treasure, illuminated by a vast stream of jewels that rendered all other lamps insignificant.”||258||
श्लोक ( Shlok ) 259
महासत्त्वेन तेनासौ गर्भस्थेन परां श्रियम् । बभार रत्नगर्भेव भूमिराकरगोचरा ॥ २५९॥
जिसके भीतर अनेक रत्न भरे हुए हैं ऐसी रत्नों की खान की भूमि जिस प्रकार अतिशय शोभा को धारण करती है उसी प्रकार वह मरुदेवी भी गर्भ में स्थित महाबलशाली पुत्र से अतिशय शोभा धारण कर रही थी ।।259।।
“Just as the land of a mine filled with numerous jewels bears extraordinary beauty, in the same way, Marudevi, with the mighty son in her womb, was radiating immense beauty.”||259||
श्लोक ( Shlok ) 260
स मातुरुदरस्थोऽपि नास्याः पीडामजीजनत् । दर्पणस्थोऽपि किं वह्निर्दहेतं प्रतिबिम्बितः ॥२६०।।
वे भगवान् ऋषभदेव माता के उदर में स्थित होकर भी उसे किसी प्रकार का कष्ट उत्पन्न नहीं करते थे सो ठीक ही है दर्पण में प्रतिबिंबित हुई अग्नि क्या कभी दर्पण को जला सकती है अर्थात् नहीं जला सकती ।।260।।
“Though Lord Rishabhdev was present in the mother’s womb, he did not cause her any discomfort. Indeed, just as the fire reflected in a mirror cannot burn the mirror, he could not cause any harm.”||260||
श्लोक ( Shlok ) 261
त्रिवलीमङ्गुरं तस्यास्तथैवास्थात्तनूदरम् । तथापि ववृधे गर्भस्तेजसः प्राभवं हि तत् ॥ २६१॥
यद्यपि माता मरुदेवी का कृश उदर पहले के समान ही त्रिवलियों से सुशोभित बना रहा तथापि गर्भ वृद्धि को प्राप्त होता गया सो यह भगवान् के तेज का प्रभाव ही था ।।261।।
“Although the slender abdomen of Mother Marudevi remained adorned with the three folds as before, it continued to grow due to the influence of the divine radiance of the Lord.”||261||
श्लोक 262 से 273
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251