आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 शरीर की दिव्यता और समवसरण का माहात्म्य
भगवान का शरीर पसीना, मलमूत्र से रहित, सुगंधित और वज्र की तरह स्थिर है। उनकी सुंदरता, सौभाग्य और मधुर वाणी अद्वितीय हैं। उनका अपरिमित वीर्य अल्प शरीर में समाया है। समवसरण के चारों ओर सौ योजन तक अन्न-पान सुलभ होता है और यह आकाश में स्थिर रहता है। उनके उपदेश से हिंसक जीव भी अहिंसक हो जाते हैं। मोहनीय कर्म के क्षय से वे कवलाहार से मुक्त हैं। मूर्ख जो उनके कवलाहार की कल्पना करते हैं, उन्हें मोह दूर करने के लिए अनुभवी स्नेह की आवश्यकता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 25 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
चित्रं वाचां विचित्राणामक्रमः प्रभवः प्रभो। अथवा तीर्थकृत्वस्य देव वैभवमीदृशम् ॥३२॥
हे देव, यह भी एक आश्चर्य को बात है कि आप से अनेक प्रकार की भाषाओं की एक साथ उत्पत्ति होती है अथवा आपके तीर्थंकरपने का माहात्म्य ही ऐसा है ।।32।।
O Lord, it is truly astonishing that various languages emerge simultaneously from You, or perhaps this is the extraordinary glory of Your Tirthankarahood. —32.
श्लोक ( Shlok ) 33
अस्वेदमलमाभाति सुगन्धि शुभलक्षणम् । सुसंस्थानमरक्ता सृग्वपुर्वज्रस्थिरं तव ॥३३॥
हे भगवन्, जो पसीना और मलमूत्र से रहित है, सुगंधित है, शुभ लक्षणों से सहित है, समचतुरस्र संस्थान है, जिसमें लाल रक्त नहीं हैं और जो वज्र के समान स्थिर हे ऐसा यह आपका शरीर अतिशय सुशोभित हो रहा है ।।33।।
O Lord, Your body, free from sweat and impurities, fragrant, adorned with auspicious marks, perfectly proportioned, devoid of red blood, and as firm as a diamond, shines with exceptional brilliance. — 33.
श्लोक ( Shlok ) 34
सौरूप्यं नयनाह्लादि सौभाग्यं चित्तरञ्जनम् । सुवाक्त्वं जगदानन्दि तवासाधारणा गुणांः ॥३४॥
हे देव, नेत्रों को आनंदित करने वाली सुंदरता, मन को प्रसन्न करने वाला सौभाग्य और जगत् को हर्षित करने वाली मीठी वाणी ये आपके असाधारण गुण है अर्थात् आपको छोड़कर संसार के अन्य किसी प्राणी में नहीं रहते ।।34।।
O Lord, captivating beauty that delights the eyes, good fortune that pleases the mind, and sweet speech that brings joy to the world—these extraordinary qualities belong to You alone and are found in no other being. — 34.
श्लोक ( Shlok ) 35
अमेयमपि ते वीर्य मितं देहे प्रभान्विते। स्वल्पेऽपि दर्पणे बिम्बं माति स्ताम्बेरमं ननु ॥३५॥
हे भगवन यद्यपि आपका वीर्य अपरिमित है तथापि वह आपके परिमित अल्प परिमाण वाले शरीर में समाया हुआ है सो ठीक ही है क्योंकि हाथी का प्रतिबिंब छोटे से दर्पण में भी समा जाता है ।।35।।
O Lord, though Your spiritual power is infinite, it resides within Your finite and compact body. This is only natural, just as the reflection of an elephant can fit within a small mirror. —35.
श्लोक ( Shlok ) 36
त्वदास्थानस्थितोदेशं परितः शतयोजनम् । सुलभाशनपानादि त्वन्महिम्नोपजायते ॥३६॥
हे नाथ, जहाँ आपका समवसरण होता है उसके चारों ओर सौ-सौ योजन तक आपके माहात्म्य से अन्न-पान आदि सब सुलभ हो जाते हैं ।।36।।
O Lord, wherever Your Samavasarana (divine assembly) is established, by the power of Your greatness, food, water, and all necessities become abundantly available for a hundred yojanas in every direction. — 36.
श्लोक ( Shlok ) 37
गगनानुगतं यानं तवासीद् भुवमस्पृशत् । दैवासुरं भरं सोढुमक्षमा धरणीति नु ॥३७॥
हे देव, यह पृथिवी समस्त सुर और असुरों का भार धारण करने में असमर्थ है इसलिए ही क्या आपका समवसरणरूपी विमान पृथिवी का स्पर्श नहीं करता हुआ सदा आकाश में ही विद्यमान रहता है ।।37।।
O Lord, is it because the earth is unable to bear the weight of all the celestial and demonic beings gathered that Your Samavasarana remains suspended in the sky, never touching the ground? —37.
श्लोक ( Shlok ) 38
क्रूरैरपि मृगेर्हिंस्त्रैर्हन्यन्ते जातु नाङ्गिनः । सद्धर्मदेशनोद्युक्ते त्वयि संजीवनौषधे ॥३८॥
हे भगवन्, संजीवनी ओषधि के समान आपके समीचीन धर्म का उपदेश देने में तत्पर रहते हुए सिंह, व्याघ्र, आदि क्रूर हिंसक जीव भी दूसरे प्राणियों की कभी हिंसा नहीं करते हैं ।।38।।
O Lord, like the life-giving Sanjeevani herb, Your preaching of the true Dharma is so powerful that even ferocious creatures like lions and tigers refrain from harming other beings. — 38.
श्लोक ( Shlok ) 39
न भुक्तिः क्षीणमोहस्य तवानन्तसुखोदयात् । क्षुत्क्लेशबाधितो जन्तुः कवलाहारभुग्भवेत् ॥३९॥
हे प्रभो, आपके मोहनीय कर्म का क्षय हो जाने से अत्यंत सुख की उत्पत्ति हुई है इसलिए आपके कवलाहार नहीं है सो ठीक ही है, क्योंकि क्षुधा के क्लेश से दु:खी हुए जीव ही कवलाहार भोजन करते हैं ।।39।।
O Lord, since the destruction of Your deluding karma has led to supreme bliss, it is natural that You do not partake in food. For only those afflicted by the suffering of hunger consume physical nourishment. — 39.
श्लोक ( Shlok ) 40
असद्वेद्योदयाद् भुक्ति त्वयि यो योजयेदधीः । मोहानिलप्रतीकारे तस्यान्वेष्यं जरद्घृतम् ॥४०॥
हे जिनेंद्र, जो मूर्ख असातावेदनीय कर्म का उदय होने से आपके भी कवलाहार की योजना करते हैं अर्थात् यह कहते हैं कि आप भी कवलाहार करते हैं क्योंकि आपके असातावेदनीय कर्म का उदय है उन्हें मोहरूपी वायुरोग को दूर करने के लिए पुराने घी की खोज करनी चाहिए । अर्थात् पुराने घी के लगाने से जैसे सन्निपात―वातज्वर शांत हो जाता है उसी तरह अपने मोह को दूर करने के लिए किसी पुराने अनुभवी पुरुष का स्नेह प्राप्त करना होगा ।।40।।
O Jinendra, those ignorant ones who, due to the rise of Asata-vedaniya karma, claim that You also partake in physical food, are afflicted by the disease of delusion. To cure this ailment of ignorance, they should seek the remedy of aged ghee—meaning, they must obtain the guidance and affection of an experienced and wise teacher, just as aged ghee cures ailments caused by imbalance. — 40.
श्लोक ( Shlok ) 41
असद्वेद्यविषं घाति विध्वंसध्वस्तशक्तिकम् । त्वय्यकिंचित्करं मन्त्रशक्रयेवापबलं विषम् ॥४१॥
हे देव, मंत्र की शक्ति से जिसका बल नष्ट हो गया है ऐसा विष जिस प्रकार कुछ भी नहीं कर सकता है उसी प्रकार घातियाकर्मों के नष्ट हो जाने से जिसकी शक्ति नष्ट हो गयी है ऐसा असातावेदनीयरूपी विष आपके विषय में कुछ भी नहीं कर सकता ।।41।।
O Lord, just as poison rendered powerless by the potency of a mantra becomes harmless, likewise, the poison of Asata-vedaniya karma, whose strength has been destroyed by the annihilation of Ghatiya karmas, can do nothing to You. — 41.
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31