आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 62 मेरु यात्रा
बादल-पताकाएँ बगुला सा। मेघ विमानों से चूर, भौंरे मद से आकृष्ट। इंद्र कांति से सूर्य फीका। ऐरावत दाँतों पर अप्सराएँ नृत्य करतीं। किन्नर संगीत, देव नेत्र-कर्ण सफल। इंद्र ने छत्र-चमर सेवा की। सौधर्मेंद्र गोद में, ऐशानेंद्र छत्र, अन्य चमर ढोते।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 52 to 62
श्लोक ( Shlok ) 52
सिताः पयोधरा नीलैः करीन्द्रैः सितकेतनैः । सबलाकैर्विनीलाभ्रैः संगता इव रेजिरे ॥५२॥
उस समय सफेद बादल सफेद पताकाओंसहित काले हाथियों से मिलकर ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो बगुला पक्षियोंसहित काले-काले बादलों से मिल रहे हों ।।52।।
At that time, the white clouds, along with the white flags, appeared so splendid as if they were merging with the black elephants, just like white herons merging with dark clouds. ||52||
श्लोक ( Shlok ) 53
महाविमानसंघट्टै क्षुण्णां जलधराः कचित् । प्रणेशुर्मंहतां रोधान्नश्यन्त्येव जलात्मकाः ॥५३॥
कहीं-कहीं पर अनेक मेघ देवों के बड़े-बड़े विमानों की टक्कर से चूर-चूर होकर नष्ट हो गये थे सो ठीक ही है; क्योंकि जो जड़ (जल और मूर्ख) रूप होकर भी बड़ों से बैर रखते हैं वे नष्ट होते ही हैं ।।53।।
In some places, many clouds were completely shattered and destroyed by the collision with the great celestial chariots of the gods. This is only natural because those who, despite being insensible (like water or fools), oppose the great are bound to perish. ||53||
श्लोक ( Shlok ) 54
सुरे भकटदानाम्बुगन्धाकृष्टमधुव्रताः । वनाभोगान् जहुर्लोकः सत्यमेव नवप्रियः ॥५४॥
देवों के हाथियों के गंडस्थल से झरने वाले मद की सुगंध से आकृष्ट हुए भौंरों ने वन के प्रदेशों को छोड़ दिया था सो ठीक है क्योंकि यह कहावत सत्य है कि लोग नवप्रिय होते हैं―उन्हें नयी-नयी वस्तु अच्छी लगती है ।।54।।
The bees, attracted by the fragrance of the intoxicating liquid dripping from the temples of the celestial elephants, abandoned the forest regions. This is only natural because the saying is true: people are drawn to the new—they always find new things appealing. ||54||
श्लोक ( Shlok ) 55
अङ्गनाभिः सुरेन्द्राणां तेजोऽर्कस्य पराहतम्’ । “विलिल्ये काप्यविज्ञातं लज्जामिव परां गतम् ॥५५॥
उस समय इंद्रों के शरीर की प्रभा से सूर्य का तेज पराहत हो गया था―फीका पड़ गया था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो लज्जा को प्राप्त होकर चुपचाप कहीं पर जा छिपा हो ।।55।।
At that time, the radiance of the Indras’ bodies had diminished the brilliance of the sun—making it fade. It seemed as if the sun, overcome with shame, had silently hidden away somewhere. ||55||
श्लोक ( Shlok ) 56
दिवाकरकराश्लेषं विघटय्य” सुरेशिनाम् । देहोद्योता दिशो भेजुर्भोग्या हि बलिनां स्त्रियः ॥५६॥
पहले सूर्य अपने किरणरूपी हाथों के द्वारा दिशारूपी अंगनाओं का आलिंगन किया करता था, किंतु उस समय इंद्रों के शरीरों का उद्योग सूर्य के उस आलिंगन को छुड़ाकर स्वयं दिशारूपी अंगनाओं के समीप जा पहुँचा था, सो ठीक ही है स्त्रियां बलवान् पुरुषों के ही भोग्य होती है । भावार्थ―इंद्रों के शरीर की कांति सूर्य की कांति को फीका कर समस्त दिशाओं में फैल गयी थीं ।।56।।
Earlier, the sun used to embrace the directions, likened to maidens, with its ray-like hands. However, at that time, the radiance of the Indras’ bodies overpowered that embrace and reached the maidens of the directions itself. This is only natural, for women are enjoyed by powerful men.
(Meaning: The brilliance of the Indras’ bodies outshone the sun’s radiance and spread across all directions.) ||56||
श्लोक ( Shlok ) 57
सुरेभरदनोद्भूतसरोम्बुजदलाश्रितम् । नृत्तमप्सरसां देवानकरोद् रसिकान् भृशम् ॥५७॥
ऐरावत हाथी के दाँतों पर बने हुए सरोवरों में कमलदल पर जो अप्सराओं का नृत्य हो रहा था वह देवों को भी अतिशय रसिक बना रहा था ।।57।।
The dance of the Apsaras on the lotus petals in the ponds formed on Airavata’s tusks was so enchanting that it made even the gods exceedingly passionate. ||57||
श्लोक ( Shlok ) 58
शृण्वन्तः कलगीतानि किन्नराणां जिनेशिनः । गुणैर्विरचितान्यापुरमराः कर्णयोः फलम् ॥५८॥
उस समय जिनेंद्रदेव के गुणों से रचे हुए किन्नर देवों के मधुर संगीत सुनकर देव लोग अपने कानों का फल प्राप्त कर रहे थे―उन्हें सफल बना रहे थे ।।58।।
At that time, upon hearing the sweet music of the Kinnaras, composed in praise of Lord Jinendra’s virtues, the gods felt that their ears had truly fulfilled their purpose—they had been blessed. ||58||
श्लोक ( Shlok ) 59
वपुर्भगवतो दिव्यं पश्यन्तोऽनिमिषेक्षणाः । नेत्रयोरनिमेषाप्तौ फलं प्रापुस्तदामराः ॥५९॥
उस समय टिमकाररहित नेत्रों से भगवान का दिव्य शरीर देखने वाले देवों ने अपने नेत्रों के टिमकाररहित होने का फल प्राप्त किया था । भावार्थ―देवों की आंखों के कभी पलक नहीं झपते । इसलिए देवों ने बिना पलक झपाये ही भगवान् के सुंदर शरीर के दर्शन किये थे । देव भगवान् के सुंदर शरीर को पलक झपाये बिना ही देख सके थे यही मानो उनके वैसे नेत्रों का फल था―भगवान् का सुंदर शरीर देखने के लिए ही मानो विधाता ने उनके नेत्रों की पलक स्पंद-टिमकाररहित बनाया था ।।59।।
At that time, the gods, who beheld the divine body of the Lord with their unblinking eyes, truly attained the purpose of having such eyes.
(Meaning: The gods’ eyes never blink. Thus, they could gaze upon the Lord’s beautiful form without interruption. It was as if their unblinking nature had been designed by fate solely for the purpose of admiring the Lord’s divine beauty.) ||59||
श्लोक ( Shlok ) 60
स्वाङ्कारोपं सितच्छत्रधृतिं चामरधूननम् । कुर्वन्तः स्वयमेवेन्द्राः प्राहुरस्य स्म बैभवम् ॥६०॥
जिन बालक को गोद में लेना, उन पर सफेद छत्र धारण करना और चमर ढोलना आदि सभी कार्य स्वयं अपने हाथ से करते हुए इंद्र लोग भगवान् के अलौकिक ऐश्वर्य को प्रकट कर रहे थे ।।60।।
The Indras, personally carrying the divine child in their arms, holding a white umbrella over him, waving chamars, and performing other rituals, were manifesting the Lord’s extraordinary majesty. ||60||
श्लोक ( Shlok ) 61 – 62
सौधर्माधिपतेरङ्कमध्यासीनमधीशिनम् । भेजे सितातपत्रेण तदैशानसुरेश्वरः ॥६१
सनत्कुमारमाहेन्द्रनायकौ धर्मनायकम् । चामरैस्तं व्यधुन्वातां बहुक्षीराब्धि वीचिभिः ॥६२॥
उस समय भगवान्, सौधर्म इंद्र की गोद में बैठे हुए थे, ऐशान इंद्र सफेद छत्र लगाकर उनकी सेवा कर रहा था और सनत्कुमार तथा माहेंद्र स्वर्ग के इंद्र उनकी दोनों ओर क्षीरसागर की लहरों के समान सफेद चमर ढोर रहे थे ।।61-62।।
At that time, Lord Jinendra was seated in the lap of Saudharma Indra, while Ishana Indra served him by holding a white umbrella. Meanwhile, the Indras of Sanatkumar and Mahendra heavens stood on either side, gracefully waving white chamars, resembling the waves of the Kshira Sagar (Ocean of Milk). ||61-62||
श्लोक 63 से 71
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51