भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 201 अच्युतेंद्र का परिवार
चार लोकपाल, आठ महादेवियाँ, 63 वल्लभिकाएँ, कुल 2,071 देवियाँ थीं। प्रत्येक देवी 10,24,000 रूप बना सकती थी। सात कक्षाओं वाली सेना थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
चत्वारो लोकपालाश्च तल्लोकान्तप्रपालकाः । प्रत्येकं व तथैतेषां देव्यो द्वात्रिंशदेव हि ॥ १९२॥
उस अच्युत स्वर्ग के अंतभाग की रक्षा करने वाले चारों दिशाओं संबंधी चार लोकपाल थे और प्रत्येक लोकपाल की बत्तीस-बत्तीस देवियाँ थीं ।।192।।
“In Achyuta heaven, the four Lokapalas (guardians of the directions) protected its boundaries, and each Lokapala was accompanied by thirty-two celestial maidens.”
श्लोक ( Shlok ) 193
अष्टावस्य महादेव्यो रूपसौन्दर्यसंपदा । तन्मनोलोहमाक्रष्टुं क्लृप्तायस्कान्तपुत्रिकाः ॥ १९३॥
उस अच्युतेंद्र की आठ महादेवियाँ थीं जो कि अपने वर्ण और सौंदर्यरूपी संपत्ति के द्वारा इंद्र के मनरूपी लोहे को खींचने के लिए बनी हुई पुतलियों के समान शोभायमान होती थीं ।।193।।
श्लोक ( Shlok ) 194
अन्या वल्लभिकास्तस्य त्रिषष्टिः परिकीर्तिताः । एकशोऽग्रमहिष्यतृतीयत्रिशतैर्वृता ॥ १९४॥
इन आठ महादेवियों के सिवाय उसके तिरसठ वल्लभिका देवियाँ और थीं तथा एक-एक महादेवी अढ़ाईसौ-अढ़ाईसौ अन्य देवियों से घिरी रहती थी ।।194।।
“Apart from these eight Mahadevis, he also had sixty-three Vallabhika celestial maidens. Additionally, each Mahadevi was surrounded by 250 other divine maidens.”
श्लोक ( Shlok ) 195
द्वे सहस्त्रे तथैकाग्रा सप्ततिश्च समुच्चिताः । सर्वा देव्योऽस्य याः स्मृत्वा याति चेतोऽस्य निर्वृतिम् ॥ १९५॥
इस प्रकार सब मिलाकर उसकी दो हजार इकहत्तर देवियाँ थीं । इन देवियों का स्मरण करने मात्र से ही उसका चित्त संतुष्ट हो जाता था―उसकी कामव्यथा नष्ट हो जाती थी ।।195।।
“Thus, in total, he had 2,071 celestial maidens. Merely remembering these divine consorts would satisfy his mind and dispel any longing or desire.”
श्लोक ( Shlok ) 196
तासां मृदुकरस्पर्शेस्तद् वक्त्राब्जनिरीक्षणैः । स लेभेऽभ्यधिकां तृप्तिं संभोगैरपि मानसैः ॥१९६॥
वह इंद्र उन देवियों के कोमल हाथों के स्पर्श से, मुखकमल के देखने से और मानसिक संभोग से अत्यंत तृप्ति को प्राप्त होता था ।।196 ।।
“That Indra experienced immense satisfaction through the gentle touch of those celestial maidens’ soft hands, the sight of their lotus-like faces, and the bliss of mental union.”
श्लोक ( Shlok ) 197
‘षट्चतुष्कं सहस्त्राणि नियुतानि दशैव च । विकरोत्येकशो देवी दिव्यरूपाणि योषिताम् ॥१९७॥
इस इंद्र की प्रत्येक देवी अपनी विक्रिया शक्ति के द्वारा सुंदर स्त्रियों के दस लाख चौबीस हजार सुंदर रूप बना सकती थी ।।197।।
“Each of Indra’s celestial maidens, through her divine transformative power (Vikriya Shakti), could manifest 1,024,000 enchanting forms of beautiful women.”
श्लोक ( Shlok ) 198
चमूनां सप्तकक्षाः स्युराद्यात्रायुतयोर्द्वयम् । द्विद्विः शेषनिकायेषु महाब्धेरिव वीचयः ॥१९८॥
हस्त्यश्वरथपादात वृषगन्धर्वनर्तकी। सप्तानीकान्युशन्त्यस्य प्रत्येकं च महत्तरम् ।।१९९॥
हाथी, घोड़े, रथ, पियादे, बैल, गंधर्व और नृत्यकारिणी के भेद से उसकी सेना की सात कक्षाएँ थीं । उनमें से पहली कक्षा में बीस हजार हाथी थे, फिर आगे की कक्षाओं में दूनी-दूनी संख्या थी । उसकी यह विशाल सेना किसी बड़े समुद्र की लहरों के समान जान पड़ती थी । यह सातों ही प्रकार की सेना अपने-अपने महत्तर (सर्वश्रेष्ठ) के अधीन रहती थी ।।198-199।।
“Indra’s army was divided into seven divisions based on elephants, horses, chariots, foot soldiers, bulls, Gandharvas (celestial musicians), and Nrityakarinis (celestial dancers). The first division consisted of 20,000 elephants, with each successive division having twice the number of the previous one. This vast army appeared like the waves of a great ocean. Each of these seven divisions operated under its respective supreme commander.”
“That Achyutendra had eight Mahadevis (great celestial queens), who, with their radiant beauty and divine charm, appeared like enchanted figurines crafted to irresistibly draw Indra’s iron-like heart toward them.”
श्लोक ( Shlok ) 200
एकैकस्याश्च देव्याः स्यादप्सरःपरिषत्त्रयम् । पन्चवर्गश्त्र पन्चाशच्छतं चैव यथाक्रमम् ॥ २००॥
उस इंद्र की एक-एक देवी की तीन-तीन सभाएँ थीं । उनमें से पहली सभा में 25 अप्सराएँ थीं, दूसरी सभा में 50 अप्सराएँ थीं, और तीसरी सभा में सौ अप्सराएँ थीं ।।200।।
“Each of Indra’s celestial maidens had three assemblies. The first assembly consisted of 25 Apsaras (celestial dancers), the second had 50 Apsaras, and the third was composed of 100 Apsaras.”
श्लोक ( Shlok ) 201
इत्युक्तपरिवारेण सार्द्धमच्युतकल्पजाम् । लक्ष्मी निर्विंशतस्तस्य “व्यावर्ण्यालं परां श्रियम् ॥२०१॥
इस प्रकार ऊपर कहे हुए परिवार के साथ अच्युत स्वर्ग में उत्पन्न हुई लक्ष्मी का उपभोग करने वाले उस अच्युतेंद्र की उत्कृष्ट विभूति का वर्णन करना कठिन है―जितना वर्णन किया जा चुका है उतना ही पर्याप्त है ।।201।।
“Thus, with the magnificent celestial entourage described above, the grandeur of Achyutendra, who enjoyed the divine wealth of Achyut Heaven, is beyond complete description. Whatever has been narrated so far is sufficient.”
श्लोक 202 से 208
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191