आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 सूर्योदय और मंगल कामना
सूर्य अंधकार नष्ट करता, संध्या प्रकट होती, कमलिनी प्रस्फुरित, कुमुदिनी म्लान होती। सूर्य पूर्व से उदित, जगत प्रकाशित। बंदीजन कहते हैं: शय्या छोड़ो, मंगलमय प्रभात हो, पुत्र तीन लोक को प्रकाशित करे।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
दुनोति कृकवाकूणां ध्वनिरेष समुच्चरन । कान्तासन्नवियोगार्त्तिपिशुनः कामिनां मनः ॥१३२॥
इधर बहुत जल्दी होनेवाले स्त्रियों के वियोग से उत्पन्न हुए दुःख की सूचना करने वाली मुर्गों की तेज आवाज कामी पुरुषों के मन को संताप पहुंचा रही है ।।132।।
Here, the sharp cries of the roosters, announcing the imminent separation of lovers, are bringing sorrow to the hearts of passionate men. ||132||
श्लोक ( Shlok ) 133
यदिन्दोः प्राप्तमान्द्यस्य नोदस्तं मृदुभिः करैः । तत्प्रलीनं तमो नैशंखरांशानुदयोन्मुखे ॥१३३।।
शांतस्वभावी चंद्रमा की कोमल किरणों से रात्रि का जो अंधकार नष्ट नहीं हो सका था वह अब तेज किरण वाले सूर्य के उदय के सम्मुख होते ही नष्ट हो गया है ।।133।।
The darkness of the night, which could not be dispelled by the gentle rays of the calm-natured moon, has now vanished with the rise of the radiant sun. ||133||
श्लोक ( Shlok ) 134
तमः शार्वरमुद्भय करैर्मानोरुदेष्यतः । सेनेवाग्रेसरी सन्ध्या स्फुरत्येषानुरागिणी ॥१३४॥
अपनी किरणों के द्वारा रात्रि संबंधी अंधकार को नष्ट करने वाला सूर्य आगे चलकर उदित होगा परंतु उससे अनुराग (प्रेम और लाली) करने वाली संध्या पहले से ही प्रकट हो गयी है और ऐसी जान पड़ती है मानों सूर्यरूपी सेनापति की आगे चलने वाली सेना ही हो ।।134।।
The sun, which will soon rise and dispel the darkness of the night with its rays, is yet to appear. However, the twilight, which adores the sun with its love and crimson glow, has already emerged, appearing like the vanguard of the sun, the great commander. ||134||
श्लोक ( Shlok ) 135
मित्रमण्डलमुद्रच्छदिदमातनुते द्वयम् । विकासमन्जिनोषण्डे’ ग्लानिं च कुमुदाकरे ॥१३५॥
यह उदित होता हुआ सूर्यमंडल एक साथ दो काम करता है―एक तो कमलिनियों के समूह में विकास को विस्तृत करता है और दूसरा कुमुदिनियों के समूह में म्लानता का विस्तार करना है ।।135।।
This rising sun performs two tasks simultaneously—on one hand, it causes the blooming of lotuses, and on the other, it brings wilting to the water lilies. ||135||
श्लोक ( Shlok ) 136
“विकस्वरं समालोक्य पद्मिन्याः पङ्कजाननम् । सासूयेव परिम्लानिं प्रयात्येष कुमुद्वती ॥१३६
अथवा कमलिनी के कमलरूपी मुख को प्रफुल्लित हुआ देखकर यह कुमुदिनी मानो ईर्ष्या से म्लानता को प्राप्त हो रही है ।।136 ।।
Or perhaps, seeing the lotus flowers of the water lily bloom with joy, the night-blooming lily (Kumudini) seems to wither away in jealousy. ||136||
श्लोक ( Shlok ) 137
पुरः प्रसारयन्नु च्चैः करानुधाति भानुमान् । प्राचीदिगङ्गागर्भात् तेजोगर्भ इवार्मकः ॥ १३७॥
यह सूर्य अपने ऊँचे कर अर्थात् किरणों को (पक्ष में हाथों को) सामने फैलाता हुआ उदित हो रहा है जिससे ऐसा मालूम होता है मानो पूर्व दिशारूपी स्त्री के गर्भ से कोई तेजस्वी बालक ही पैदा हो रहा हो ।।137।।
The sun rises, spreading its lofty rays (like outstretched hands) before it, appearing as if a radiant child is being born from the womb of the eastern direction, personified as a woman. ||137||
श्लोक ( Shlok ) 138
लक्ष्यते निषधोत्संग मानुरारक्तमण्डलः । पुञ्जीकृत इबैकत्र सान्ध्यो रागः सुरेश्वरः ॥१३८॥
निषध पर्वत के समीप आरक्त (लाल) मंडल का धारक यह सूर्य ऐसा जान पड़ता है मानो इन्हीं के द्वारा इकट्ठा किया हुआ सब संध्याओं का राग (लालिमा) ही हो ।।138।।
Near the Nishadha Mountain, the sun, bearing a crimson-hued disk, appears as if it has gathered and absorbed the redness of all the twilights. ||138||
श्लोक ( Shlok ) 139
तमो विधूतमुद्भूतः चक्रवाकपरिक्लमः । प्रबोधिताग्जिनी मानो जन्मनोन्मीलितं जगत् ॥१३९
सूर्य का उदय होते ही समस्त अंधकार नष्ट हो गया, चकवा-चकवियों का क्लेश दूर हो गया, कमलिनी विकसित हो गयी और सारा जगत् प्रकाशमान हो गया ।।139।।
With the rise of the sun, all darkness vanished, the suffering of the chakva birds disappeared, the lotus flowers bloomed, and the entire world became radiant with light. ||139||
श्लोक ( Shlok ) 140
समन्तादापतत्येष प्रभाते शिशिरो मरुत् । कमलामोदमाकर्षन् प्रफुल्लादब्जि जनीवनात् ॥१४०
अब प्रभात के समय फूले हुए कमलिनियों के वन से कमलों की सुगंध ग्रहण करता हुआ यह शीतल पवन सब ओर बह रहा है ।।140।।
Now, in the morning, the cool breeze is blowing in all directions, carrying the fragrance of lotuses from the blooming lotus groves. ||140||
श्लोक ( Shlok ) 141
इति प्रस्पष्ट एवायं प्रबोधसमयस्तव । देवि मुञ्चाधुना तल्पं शुचि हंसीव सैकतम् ॥१४१॥
इसलिए हे देवी, स्पष्ट ही यह तेरे जागने का समय आ गया है । अतएव जिस प्रकार हंसिनी बालू के टीले को छोड़ देती है उसी प्रकार तू भी अब अपनी निर्मल शय्या छोड़ ।।141।।
Therefore, O Devi, it is clearly time for you to wake up. Just as a swan leaves the sandy shore, you too should now rise from your pure and serene bed. ||141||
श्लोक 142 से 153
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131