आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 |
श्लोक 192 से 201 चैत्यवृक्ष का वैभव
चैत्यवृक्ष घंटों से घोषणा करता था। ध्वजाएँ पाप पोंछती थीं। तीन छत्र ऐश्वर्य दिखाते थे। चार प्रतिमाएँ थीं। देव पूजा करते थे। ये निर्मल थीं। अन्य वनों में भी चैत्यवृक्ष थे। ये इंद्र पूजित और शोभायमान थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
रणदालम्बिवण्टाभिर्व धिरीकृत विश्वभूः । भूर्भुवः स्वर्जयं भर्तुः प्रतोषादिव घोषयन् ॥१९२॥
उस पर जो शब्द करते हुए घंटे लटक रहे थे उनसे उसने समस्त दिशा बहिरी कर दी थी और उनसे वह ऐसा जान-पड़ता था कि भगवान् ने अधोलोक, मध्यलोक और स्वर्गलोक में जो विजय प्राप्त की है संतोष से मानो वह उसकी घोषणा ही कर रहा हो ।।192।।
The words hanging on him like bells had deafened all directions, and he appeared as if he were proclaiming with satisfaction the victories that God had achieved in the underworld, the middle world, and the heavens. ॥192॥
श्लोक ( Shlok ) 193
ध्वजांशुकपरा मृष्टनिर्में घघनपद्धतिः। जगज्जनाङ्गसंलग्नमार्गः परिमृजन्निव ॥ १९३॥
वह वृक्ष ऊपर लगी हुई ध्वजाओं के वस्त्रों से पोंछ-पोंछकर आकाश को मेघरहित कर रहा था और उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो संसारी जीवों की देह में लगे हुए पापों को ही पोंछ रहा हो ।।193।।
That tree, by wiping the sky with the cloth of the flags hanging above, was clearing it of clouds, and it seemed as if it were wiping away the sins attached to the bodies of worldly beings. ॥193॥
श्लोक ( Shlok ) 194
मूर्ध्ना छत्रत्रयं विभ्रन्मुक्तालम्बनभूषितम् । विभोस्त्रिभुवनेश्वर्य विना वाचेव दर्शयन् ॥१९४॥
वह वृक्ष मोतियों की झालर से सुशोभित तीन छत्रों को अपने सिर पर धारण कर रहा था और उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो भगवान् के तीनों लोकों के ऐश्वर्य को बिना वचनों के ही दिखला रहा हो ।।194।।
That tree, adorned with pearl garlands, was bearing three umbrellas on its head, and it seemed as if it were silently displaying the divine majesty of the three worlds of the Lord. ॥194॥
श्लोक ( Shlok ) 195
भ्रेजिरे बुध्नभागेऽस्य प्रतिमा दिक्चतुष्टये। जिनेश्वराणामिन्द्राद्यै समवाप्ताभिषेचनाः ॥ १९५॥
उस चैत्यवृक्ष के मूलभाग में चारों दिशाओं में जिनेंद्रदेव की चार प्रतिमाएँ थीं जिनका इंद्र स्वयं अभिषेक करते थे ।।195।।
At the base of that Chaitya tree, in all four directions, there were four idols of Lord Jinedra, which were being anointed by Indra himself. ॥195॥
श्लोक ( Shlok ) 196
गन्धस्रग्धूपदीपार्ध्यैः फलैरपि सहाक्षतैः । तत्र नित्यार्चनं देवा जिनार्चानां वितेनिरे ॥१९६॥
देव लोग वहाँ पर विराजमान उन जिनप्रतिमाओं की गंध, पुष्पों की माला, धूप, दीप, फल और अक्षत आदि से निरंतर पूजा किया करते थे ।।196।।
The celestial beings continuously worshiped the Jin idols enshrined there with fragrance, flower garlands, incense, lamps, fruits, and sacred rice grains. ॥196॥
श्लोक ( Shlok ) 197
क्षीरोदोदकधौताङ्गी रमलास्ता हिरण्मयीः। प्रणिपत्याईतामर्चाः प्रानर्चुर्नृसुरासुराः ॥१९७॥
क्षीरसागर के जल से जिनके अंगों का प्रक्षालन हुआ है और जो अतिशय निर्मल हैं ऐसी सुवर्णमयी अरहंत की उन प्रतिमाओं को नमस्कार कर मनुष्य, सुर और असुर सभी उनकी पूजा करते थे ।।197।।
The golden idols of the Arhats, whose bodies had been bathed with the waters of the Kshira Sagar and who were supremely pure, were bowed to and worshiped by humans, celestial beings, and demons alike. ॥197॥
श्लोक ( Shlok ) 198
स्तुवन्ति स्तुतिभिः केचिदर्थ्याभिः प्रणमन्ति च। स्मृत्वावधार्य गायन्ति केचित्स्म सुरसत्तमाः ॥१९८॥
कितने ही उत्तम देव अर्थ से भरी हुई स्तुतियों से उन प्रतिमा की स्तुति करते थे, कितने ही उन्हें नमस्कार करते थे और कितने ही उनके गुणों का स्मरण कर तथा चिंतवन कर गान करते थे ।।198।।
Many exalted celestial beings praised those idols with meaningful hymns, some bowed in reverence, while others sang in contemplation and remembrance of their virtues. ॥198॥
श्लोक ( Shlok ) 199
यथाशोकस्तथान्येऽपि विज्ञेयाश्चैत्यभूरुहाः। वने स्वे स्वे सजातीया जिनबिम्बेद्धबुध्नकाः ॥१९९॥
जिस प्रकार अशोकवन में अशोक नाम का चैत्यवृक्ष है उसी प्रकार अन्य तीन वनों में भी अपनी-अपनी जाति का एक-एक चैत्यवृक्ष था और उन सभी के मूलभाग जिनेंद्र भगवान् की प्रतिमाओं से दैदीप्यमान थे ।।199।।
Just as the Ashoka tree stands as the Chaitya tree in the Ashoka forest, similarly, in the other three forests, there was one Chaitya tree of their respective species, and the bases of all these trees shone brilliantly with the idols of Lord Jinedra. ॥199॥
श्लोक ( Shlok ) 200
अशोकः सप्तपर्णश्च चम्पकश्चूत एव च। चत्वारोऽमी वनेष्वासन् प्रोतुङ्गाश्चैत्यपादपाः ॥२००॥
इस प्रकार ऊपर कहे हुए चारों वनों में क्रम से अशोक, सप्तपर्ण, चंपक और आम्र नाम के चार बहुत ही ऊँचे चैत्यवृक्ष थे ।।200।।
Thus, in the four aforementioned forests, there stood four very tall Chaitya trees in sequence: Ashoka, Saptaparna, Champaka, and Amra. ॥200॥
श्लोक ( Shlok ) 201
चैत्याधिष्ठितबुध्नत्वादुढत न्नामरूढयः । शाखिनोऽमी विभान्ति स्म सुरेन्द्रैः प्राप्तपूजनाः ॥२०१॥
मूलभाग में जिनेंद्र भगवान् की प्रतिमा विराजमान होने से जो ‘चैत्यवृक्ष’ इस सार्थक नाम को धारण कर रहे हैं और इंद्र जिनकी पूजा किया करते हैं ऐसे वे चैत्यवृक्ष बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहे थे ।।201।।
The Chaitya trees, bearing their meaningful name because of the presence of Lord Jinedra’s idols at their base, and being worshiped by Indra, appeared exceptionally magnificent. ॥201॥
श्लोक 202 से 211
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
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आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 |