भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण दशमं पर्व Ādi purāṇa parv 10 by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 में श्रीधर का प्रश्न, मंत्रियों की दुर्गति, और नरक का विस्तृत वर्णन , उद्धार, सुविधि का जीवन, और अच्युतेंद्र की महिमा शामिल हैं।
This section narrates Shri Dhar Dev’s inquiry about his past ministers, Pritinkar Muni’s revelation of their fates, and a detailed exposition on the nature of hell (naraka) , the torments of hell, Shri Dhar Dev’s efforts to redeem Shatbuddhi, the subsequent lives of key characters, and the grandeur of Achyutendra’s heavenly existence.
श्लोक 12 से 21 शतमति की दुर्गति और धर्म-अधर्म
शतमति दूसरी नरक में दुःख भोग रहा है। पाप से अधर्म और धर्म से सुख मिलता है। विषयासक्ति से पाप बढ़ता है, जो अधोगति का कारण बनता है। नरक का दुःख और कारण जानने के लिए श्रीधर को सुनने को कहा।
श्लोक 22 से 31 नरक के कारण और पृथ्वियाँ
हिंसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार, मिथ्यात्व आदि पापों से जीव नरक जाते हैं। जलचर, सर्प, पक्षी, सिंह, स्त्रियाँ, और मनुष्य क्रमशः सात पृथ्वियों (रत्नप्रभा आदि) तक जाते हैं।
श्लोक 32 से 41 नरक में जन्म और पीड़ा
सात पृथ्वियों के नाम घर्मा आदि हैं। नारकी छत्ते जैसे स्थानों में जन्मते हैं, तीक्ष्ण हथियारों पर गिरते हैं, गरमी से उछलते हैं। क्रोधी नारकी उनके टुकड़े करते हैं, जो फिर जुड़ जाते हैं। असुरकुमार बैर बढ़ाते हैं।
श्लोक 42 से 51 नरक की यातनाएँ
गीध और कुत्ते शरीर चीरते हैं। खौलती धातुएँ पिलाई जाती हैं, कोल्हू में पेलते हैं। मांसभक्षियों को उनका मांस खिलाया जाता है। परस्त्रीगामियों को तप्त लोहे की पुतलियों से आलिंगन कराया जाता है।
श्लोक 52 से 61 नरक की और यातनाएँ
नारकियों को काँटेदार सेमर वृक्षों पर चढ़ाया जाता है, भिलावे की नदी में डुबोया जाता है, अग्नि शय्या पर सुलाया जाता है। असिपत्र वन में पत्तों से शरीर छिन्न-भिन्न होता है। शूल पर चढ़ाकर घुमाते हैं।
श्लोक 62 से 71 क्रूर यातनाएँ और चिंतन
नारकियों को चोटी से पटककर मुट्ठियों से पीटा जाता है, मुद्गरों से मस्तक फोड़ा जाता है। असुरकुमार लड़ाते हैं। नारकी सोचते हैं कि यह भूमि दुरासद, अग्नि वायु असह्य, और दिशाएँ जलती हैं।
श्लोक 72 से 81 नरक का भयंकर वातावरण
ऊँट, गधे निगलने दौड़ते हैं। भयंकर पुरुष तर्जना करते हैं। गीध, कुत्ते, कौवे, और शृगाल भय बढ़ाते हैं। असिपत्र वन और वैतरणी नदी संताप देते हैं। बिल जलते हैं।
श्लोक 82 से 92 असह्य दुःख और आयु
नारकी कहाँ जाएँ, यहाँ वेदना असह्य, आयु लंबी है। मानसिक संताप मृत्यु का संशय देता है। चार पृथ्वियों में उष्ण, पाँचवीं में उष्ण-शीत, छठी-सातवीं में शीत वेदना है। बिलों की संख्या और आयु क्रमशः बढ़ती है।
श्लोक 93 से 101 नारकियों का स्वरूप
आयु एक से 33 सागर तक। शरीर की ऊँचाई सात धनुष से 500 धनुष तक। नारकी विकलांग, काले, दुर्गंधयुक्त, कठोर स्पर्श वाले हैं। भावलेश्या कापोती से कृष्ण तक होती है।
श्लोक 102 से 111 नारकियों की स्थिति और धर्म की महिमा
नारकियों की विक्रिया विकृत और एकरूप होती है। पर्याप्तक पर उन्हें विभंगावधि ज्ञान मिलता है, जिससे पूर्व बैर स्मृत होते हैं। शतबुद्धि द्वितीय नरक में दुःख भोगता है। प्रीतिंकर ने कहा कि जैन धर्म दुःखों से बचाता, सुख और मोक्ष देता है। श्रीधरदेव धर्मप्रेम से प्रेरित हुआ।
श्लोक 112 से 122 शतबुद्धि का उद्धार और पुनर्जन्म
श्रीधरदेव ने शतबुद्धि को नरक में समझाया। शतबुद्धि ने सम्यग्दर्शन ग्रहण किया, नरक से मुक्त होकर जयसेन बना, दीक्षा ली, और ब्रह्मस्वर्ग में इंद्र हुआ। श्रीधरदेव स्वर्ग से च्युत होकर सुविधि राजा बना।
श्लोक 123 से 131 सुविधि का रूप वर्णन (भाग 1)
सुविधि बाल्य से धर्मज्ञ था। उसका मुख सूर्य-चंद्र-तारों या कमल समान था। नाक लंबी, गला हार से शोभित, वक्ष रत्नों से चमकता था।
श्लोक 132 से 141 सुविधि का रूप वर्णन (भाग 2)
सुविधि दिग्गज समान था। भुजाएँ वज्र अर्गल, हथेलियाँ तारा-चिह्न युक्त, मध्य कृश, ऊरुएँ तोरण-स्तंभ, चरण लक्ष्मी-सेवित थे। यौवन में छह शत्रुओं पर विजय पाई।
श्लोक 142 से 151 सुविधि का विवाह और पुत्र
सुविधि ने मनोरमा से विवाह किया। स्वयंप्रभ (श्रीमती) उनका पुत्र केशव बना। सुविधि को पुत्र पर प्रेम था। सिंह आदि चार जीव राजपुत्र बने।
श्लोक 152 से 161 राजपुत्र और दीक्षा
चार राजपुत्र—वरदत्त, वरसेन, चित्रांगद, प्रशांतमदन—समान संपत्ति के साथ भोग भोगे। सभी ने अभयघोष संग विमलवाह जिन की वंदना कर दीक्षा ली। सुविधि श्रावक बना।
श्लोक 162 से 171 सुविधि के व्रत और स्वर्ग
गृहस्थों के बारह व्रत—पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, चार शिक्षाव्रत—वर्णित। सुविधि ने उद्दिष्टत्याग प्रतिमा धारी हो दीक्षा ली, अच्युत स्वर्ग में इंद्र बना। केशव प्रतींद्र हुआ।
श्लोक 172 से 181 अच्युतेंद्र का रूप (भाग 1)
वरदत्त आदि सामानिक देव बने। अच्युतेंद्र का शरीर सुंदर, निर्मल था। मस्तक पुष्प-सेहरा, वक्ष हार, नितंब वस्त्र से शोभित था।
श्लोक 182 से 191 अच्युतेंद्र का रूप और स्वर्ग (भाग 2)
ऊरु कदली-स्तंभ, चरण तालाब समान थे। वह 159 विमानों, 33 त्रायस्त्रिंश, 10,000 सामानिक, 40,000 आत्मरक्षक देवों से युक्त था। तीन परिषदें थीं।
श्लोक 192 से 201 अच्युतेंद्र का परिवार
चार लोकपाल, आठ महादेवियाँ, 63 वल्लभिकाएँ, कुल 2,071 देवियाँ थीं। प्रत्येक देवी 10,24,000 रूप बना सकती थी। सात कक्षाओं वाली सेना थी।
श्लोक 202 से 208 अच्युतेंद्र के भोग
अच्युतेंद्र का मैथुन और आहार मानसिक, श्वास 11 माह में एक बार था। देवांगनाएँ उसे कटाक्ष, हास्य, स्पर्श से संतुष्ट करती थीं। वह विमान में भोग भोगता, जिन पूजा करता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 10- Shlok 1 to 11
श्रीधरदेव का गुरु दर्शन और प्रश्न
श्रीधरदेव को अवधिज्ञान से पता चला कि गुरु प्रीतिंकर को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। वह श्रीप्रभ पर्वत पर उनकी पूजा करने गया, नमस्कार किया, और पूछा कि महाबल भव के तीन मिथ्यादृष्टि मंत्री कहाँ हैं। प्रीतिंकर ने बताया कि श्रीधर के स्वर्ग जाने और उनकी दीक्षा के बाद, तीनों दुर्गति को प्राप्त हुए—महामति और संभिन्नमति निगोद में, शतमति नरक में।
श्लोक ( Shlok ) 1
अथान्ये द्युरबुद्धासौ प्रयुक्तावधिरञ्जसा। स्व गुरुं प्राप्तकैवल्यं श्रीप्रभाद्रिमधिष्टितम् ॥१॥
अथानंतर किसी एक दिन श्रीधरदेव को अवधिज्ञान का प्रयोग करने पर यथार्थ रूप से मालूम हुआ कि हमारे गुरु श्रीप्रभ पर्वत पर विराजमान हैं और उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ है ।।1।।
One day, through the application of Avadhijnana (clairvoyant knowledge), Shridhara Deva realized the true fact that his revered Guru was residing on Mount Shriprabha and had attained Kevalajnana (absolute knowledge). (1)
श्लोक ( Shlok ) 2
जगत्प्रीतिंकरो योऽस्य गुरुः प्रीतिंकराह्वय ।तमर्चितुमभीयाय वर्यया ससपर्यया ॥२॥
संसार के समस्त प्राणियों के साथ प्रीति करने वाले जो प्रीतिंकर मुनिराज थे वे ही इसके गुरु थे । इन्हीं की पूजा करने के लिए अच्छी-अच्छी सामग्री लेकर श्रीधरदेव उनके सम्मुख गया ।।2।।
The compassionate Muniraj, who nurtured love for all living beings in the world, was his revered Guru. To worship him, Shridhara Deva took exquisite offerings and approached him with devotion. (2)
श्लोक ( Shlok ) 3
श्रीप्रभाद्रो तमभ्यर्च्य सर्वज्ञमभिवन्द्य च ।श्रुत्वा धर्म ततोऽपृच्छदित्यसौ स्वमनीषितम्॥३॥
जाते ही उसने श्रीप्रभ पर्वत पर विद्यमान सर्वज्ञ प्रीतिंकर महाराज की पूजा की, उन्हें नमस्कार किया, धर्म का स्वरूप सुना और फिर नीचे लिखे अनुसार अपने मन की बात पूछी ।।3।।
Upon reaching Mount Shriprabha, he worshiped the omniscient Preetinkar Maharaj, offered his salutations, and listened to the essence of Dharma. Then, as follows, he expressed what was on his mind. (3)
श्लोक ( Shlok ) 4
महाबलभवे येऽस्मन्मन्त्रिणो दुर्दृशस्त्रयः । क्वाद्य ते लब्धजन्मानः कीशींदृ वा गतिंश्रिताः ॥४॥
हे प्रभो, मेरे महाबल भव में जो मेरे तीन मिथ्यादृष्टि मंत्री थे वे इस समय कहाँ उत्पन्न हुए हैं, वे कौन-सी गति को प्राप्त हुए हैं ।।4।।
“O Lord, in my previous life as Mahabala, I had three ministers with false beliefs. Where have they been born now, and what destiny have they attained?” (4)
श्लोक ( Shlok ) 5
इति पृष्टवते तस्मै सोऽवोचत् सर्वभाववित् । तन्मनोध्वान्त संतानमपाकुर्वन् वचोंऽशुभी ॥५॥
इस प्रकार पूछने वाले श्रीधरदेव से सर्वज्ञदेव, अपने वचनरूपी किरणों के द्वारा उसके हृदयगत समस्त अज्ञानांधकार को नष्ट करते हुए कहने लगे ।।5।।
In response to Shridhara Deva’s inquiry, the omniscient Lord, with his words like radiant beams, dispelling all the darkness of ignorance from his heart, began to speak. (5)
श्लोक ( Shlok ) 6
त्वयि स्वर्गगतेऽस्मासु लब्धबोधिषु ते तदा । प्रपद्य दुर्भृतिं याता वियाता वत दुर्गतिम् ॥6॥
कि हे भव्य, जब तू महाबल का शरीर छोड़कर स्वर्ग चला गया और मैंने रत्नत्रय को प्राप्त कर दीक्षा धारण कर ली तब खेद है कि वे तीनों ढीठ मंत्री कुमरण से मरकर दुर्गति को प्राप्त हुए थे ।।6।।
“O noble soul, after you left your Mahabala form and ascended to heaven, I attained the three jewels (right faith, knowledge, and conduct) and accepted renunciation. Unfortunately, those three stubborn ministers died due to wrongful actions and were reborn in a miserable state.” (6)
श्लोक ( Shlok ) 7
द्वौ निगोतास्पदं यातौ तमोऽन्धं यत्र केवलम् ।तप्ताधिश्रयणोद्वर्तभूयिष्ठैर्जन्ममृत्युभिः ॥7॥
उन तीनों में से महामति और संभिन्नमति ये दो तो उस निगोद स्थान को प्राप्त हुए हैं जहाँ मात्र सघन अज्ञानांधकार का ही अधिकार है और जहाँ अत्यंत तप्त खौलते हुए जल में उठने वाली खलबलाहट के समान अनेक बार जन्म-मरण होते रहते हैं ।।7।।
“Out of the three, Mahamati and Sambhinnamati have been reborn in the Nigoda realm, a place dominated entirely by dense ignorance and suffering. There, countless cycles of birth and death occur repeatedly, akin to the constant bubbling of boiling water.” (7)
श्लोक ( Shlok ) 8
गतं [तः] शतमतिः श्वभ्रं मिथ्यात्वपरिपाकतः । विपाकक्षेत्रमाम्नातं” तद्धि दुष्कृतकर्मणाम् ॥८॥
तथा शतमति मंत्री अपने मिथ्यात्व के कारण नरक गति गया है । यथार्थ में खोटे कर्मों का फल भोगने के लिए नरक ही मुख्य क्षेत्र है ।।8।।
“Additionally, the minister Shatamati, due to his false beliefs, has been reborn in the hellish realms. Truly, hell is the primary domain for experiencing the consequences of sinful actions.” (8)
श्लोक ( Shlok ) 9
मिथ्यात्वविषसंसुप्ता ये मार्गपरिपन्थिनः। ते यान्ति दीर्घमध्वानं कुयोन्यावर्तंसंकुलम् ॥९॥
जो जीव मिथ्यात्वरूपी विष से मूर्च्छित होकर समीचीन जैन मार्ग का विरोध करते हैं वे कुयोनिरूपी भँवरों से व्याप्त इस संसाररूपी मार्ग में दीर्घकाल तक घूमते रहते हैं ।।9।।
“Beings who, deluded by the poison of false beliefs, oppose the righteous Jain path wander for a long time in the world, which is like a treacherous path filled with whirlpools of miserable rebirths.” (9)
श्लोक ( Shlok ) 10
तमस्यन्धे निमञ्जन्ति सज्ज्ञानद्वेषिणो नराः । आप्तोपज्ञमतो” ज्ञानं बुधोऽभ्यस्येदनारतम् ॥१०॥
चूँकि सम्यग्ज्ञान के विरोधी जीव अवश्य ही नरकरूपी गाढ़ अंधकार में निमग्न होते हैं इसलिए विद्वान् पुरुषों को आप्त प्रणीत सम्यग्ज्ञान का ही निरंतर अभ्यास करना चाहिए ।।10।।
“Since beings who oppose true knowledge inevitably sink into the dense darkness of hell, wise individuals should constantly practice and uphold the true knowledge prescribed by enlightened beings.” (10)
श्लोक ( Shlok ) 11
धर्मेणात्मा ब्रजत्यूर्ध्वमधर्मेण पतत्यधः । मिश्रस्तु याति मानुष्यमित्याप्तोक्तिं विनिश्चिनु॥११॥
यह आत्मा धर्म के प्रभाव से स्वर्ग-मोक्ष रूप उच्च स्थानों को प्राप्त होता है । अधर्म के प्रभाव से अधोगति अर्थात् नरक को प्राप्त होता है । और धर्म-अधर्म दोनों के संयोग से मनुष्य पर्याय को प्राप्त होता है । हे भद्र, तू उपर्युक्त अर्हंतदेव के वचनों का निश्चय कर ।।11।।
“This soul attains the higher realms, such as heaven and liberation, through the influence of Dharma. Through the influence of Adharma, it falls into lower states, such as hell. With the combination of both Dharma and Adharma, it attains the human form. O noble one, firmly contemplate the words of the revered Arhant Deva.” (11)
श्लोक 12 से 21
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171