भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 20 वर्षा और भोग का वर्णन
ग्रीष्म में श्रीमती को शिरीष फूलों से सजाया। वर्षा में बिजली से भयभीत श्रीमती ने आलिंगन किया। मेघ, वीरबहूटी, और मयूरों ने मन मोहा। कदंब सुगंध और महल में रमण किया। नदियों के पूर से संतोष मिला।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 12 to 20
श्लोक ( Shlok ) 12
शरीषकुसुमैः कान्तामलंकुर्वन् वतंसितैः । रूपिणीमिव नैदाघीं श्रियं तो बह्वमंस्त सः ॥१२॥
वह कभी शिरीष के फूलों के आभरणों से श्रीमती को सजाता था और फिर उसे साक्षात् शरीर धारण करने वाली ग्रीष्मऋतु की शोभा समझता हुआ बहुत कुछ मानता था ।।12।।
Sometimes, he adorned Shrimati with ornaments made of Sirisha flowers. Seeing her in this enchanting form, he revered her as the very embodiment of the splendor of the summer season.
श्लोक ( Shlok ) 13
घनागमे घनोपान्तस्फुरतडिति साध्वसात् । कान्तयाश्लेषि विश्लेषभीतया घनमेव सः ॥१३॥
वर्षाऋतु में जब मेघों के किनारे पर बिजली चमकती थी उस समय वियोग के भय से अत्यंत भयभीत हुई श्रीमती बिजली के डर से वज्रजंघ का स्वयं गाढ़ आलिंगन करने लगती थी ।।13।।
During the rainy season, when lightning flashed along the edges of the clouds, the frightened Shrimati, overwhelmed by the fear of separation, clung tightly to Vajrajangha in a firm embrace out of fear of the lightning.
श्लोक ( Shlok ) 14
इन्द्रगोपचिता भूमिरामन्द्रस्तनिता घनाः । ऐन्द्रचापं व पान्थानां चक्रुरुत्कण्ठितं मनः ॥१४॥
उस समय वीरबहूटी नाम के लाल-लाल कीड़ों से व्याप्त पृथ्वी, गंभीर गर्जना करते हुए मेघ और इंद्रधनुष ये सब पथिकों के मन को बहुत ही उत्कंठित बना रहे थे ।।14।
At that time, the earth was covered with red-colored insects called Veerbahuti, while thunderous clouds and the rainbow filled the hearts of travelers with great excitement and longing.
श्लोक ( Shlok ) 15
नभः स्थगितमस्माभिः सुरगोपैस्तता महीं। क्व याथेति न्यषेधन् नु पथिकान् गर्जितैर्घनाः ll15ll
उस समय गरजते हुए बादल मानो यह कहकर ही पथिकों को गमन करने से रोक रहे थे कि आकाश तो हम लोगों ने घेर लिया है और पृथ्वी वीरबहूटी कीड़ों से भरी हुई है अब तुम कहाँ जाओगे ? ।।15।।
At that moment, the thunderous clouds seemed to be stopping the travelers, as if saying, “We have enveloped the sky, and the earth is covered with Veerbahuti insects — where will you go now?”
श्लोक ( Shlok ) 16
विकासिकुटजच्छन्ना भूधराणामुपत्यकाः । मनोऽस्य निन्युरौत्सुक्यं स्वनैरुन्मदके किनाम् ॥१६॥
उस समय खिले हुए कुटज जाति के वृक्षों से व्याप्त पर्वत के समीप की भूमि उन्मत्त हुए मयूरों के शब्दों से राजा वज्रजंघ का मन उत्कंठित कर रही थी ।।16।।
At that time, the land near the mountains, adorned with blooming Kutaja trees and resonating with the calls of exuberant peacocks, filled King Vajrajangha’s heart with excitement and longing.
श्लोक ( Shlok ) 17
कदम्बानिलसंवास सुरभीकृतसानवः । गिरयोऽस्य मनो जहुः काले नृत्यच्छिखावले ॥17॥
जिस समय मयूर नृत्य कर रहे थे ऐसे उस वर्षा के समय में कदंब पुष्पों की वायु के संपर्क से सुगंधित शिखरों वाले पर्वत राजा वज्रजंघ का मन हरण कर रहे थे ।।17।।
During that rainy season, when peacocks were dancing, the mountains with their peaks scented by the breeze carrying the fragrance of Kadamba flowers captivated King Vajrajangha’s heart.
श्लोक ( Shlok ) 18
अनेहसि लसदविद्युदुद्योतितविहायसि । स रेमे रम्यहर्म्याग्रम धिशय्य प्रियासखः ॥१८॥
जिस समय चमकती हुई बिजली से आकाश प्रकाशमान रहता है ऐसे उस वर्षाकाल में राजा वज्रजंघ अपने सुंदर महल के अग्रभाग में प्रिया श्रीमती के साथ शयन करता हुआ रमण करता था ।।18।।
During the rainy season, when the sky was illuminated by flashing lightning, King Vajrajangha delighted in resting and enjoying blissful moments with his beloved Shrimati in the front chambers of his magnificent palace.
श्लोक ( Shlok ) 19
सरितामुद्धताम्भोभिः प्रियामानप्रधाविभिः । प्रवाहैर्धृतिरस्यासीद् वर्षर्तोः समुपागमे ॥१९॥
वर्षाऋतु आने पर स्त्रियों का मान दूर करने वाले और उछलते हुए जल से शोभायमान नदियों के पूर से उसे बहुत ही संतोष होता था ।।19।।
With the arrival of the rainy season, King Vajrajangha felt immense satisfaction watching the rivers adorned with leaping waters and overflowing banks, which seemed to dispel the pride of women.
श्लोक ( Shlok ) 20
भोगान् षड् ऋतुजानित्थं भुञ्जानोऽसौ सहाङ्गनः । साक्षात्कृत्येव मूढानां तपः फलमदर्शयन् ॥२०॥
इस प्रकार वह राजा वज्रजंघ अपनी प्रिया श्रीमती के साथ-साथ छहों ऋतुओं के भोगों का अनुभव करता हुआ मानो मूर्ख लोगों को पूर्वभव में किये हुए अपने तप का साक्षात् फल ही दिखला रहा था ।।20।।
Thus, King Vajrajangha, experiencing the pleasures of all six seasons alongside his beloved Shrimati, seemed to present a living testament to the tangible rewards of penance performed in a previous life, as if to enlighten the ignorant.
श्लोक 21 से 31
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11