आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102
श्लोक 103 से 111 बावड़ियों की शोभा
मानस्तंभों के पास कमलयुक्त बावड़ियाँ थीं। ये भव्य जीवों की शुद्धता-सी लगती थीं। नीले-सफेद कमलों से ढकी थीं। चार-चार बावड़ियाँ दिशाओं में थीं। मणियों की सीढ़ियाँ और स्फटिक किनारे वाली थीं। ये भगवान के गुण गाती और नृत्य करती प्रतीत होती थीं। आगे परिखा कमलों से घिरी थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 103 to 111
श्लोक ( Shlok ) 103
स्तम्भ पर्यन्तभूमागमलंचक्रुः सहोत्पलाः। प्रसन्नसलिला वाप्यो भव्यानामिव शुद्धयः ॥१०३॥
जो अनेक प्रकार के कमलों से सहित थीं, जिनमें स्वच्छ जल भरा हुआ था और जो भव्य जीवों की विशुद्धता के समान जान पड़ती थीं ऐसी बावड़ियांं उन मानस्तंभों के समीपवर्ती भूभाग को अलंकृत कर रही थीं ।।103।।
The area surrounding the Mānastambhas was adorned with beautiful stepwells, filled with clear water and adorned with various types of lotuses. These stepwells appeared as pure and serene as the inner purity of noble souls. ||103||
श्लोक ( Shlok ) 104
वाप्यस्ता रेजिरे फुल्लकमलोत्पलसंपद । भक्त्या जैनीं श्रियं द्रष्टुं भुत्रेवोद्घाटिता दृशः ॥१०४॥
जो फूले हुए सफेद और नीले कमलरूपी संपदा से सहित थीं ऐसी वे बावड़ियाँ इस प्रकार सुशोभित हो रही थीं मानो भक्तिपूर्वक जिनेंद्रदेव की लक्ष्मी को देखने के लिए पृथ्वी ने अपने नेत्र ही उघाड़े हों ।।104।।
Those stepwells, adorned with blooming white and blue lotuses, appeared so magnificent as if the Earth itself had opened its eyes in devotion to behold the divine splendor of Jinendra Bhagwan’s grace. ||104||
श्लोक ( Shlok ) 105
निळीनालिकुलै रेजुरुत्पलैस्ता विकस्वरैः। महोत्पलेश्च संछन्नाः साञ्जनैरिव लोचनैः ॥१०५॥
जिन पर भ्रमरों का समूह बैठा हुआ है ऐसे फूले हुए नीले और सफेद कमलों से ढँकी हुई वे बावड़ियाँ ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो अंजनसहित काले और सफेद नेत्रों से ही ढँक रही हों ।।105।।
Covered with blooming blue and white lotuses, upon which swarms of bees had settled, those stepwells appeared so enchanting as if they were adorned with black and white eyes lined with collyrium. ||105||
श्लोक ( Shlok ) 106
दिशं प्रति चतस्त्रस्ता स्त्रस्ताः काञ्चीरिवाकुलाः । दधति स्म शकुन्तानां सन्ततीः स्वतटाश्रिताः ।१०६
वे बावड़ियों एक-एक दिशा में चार-चार थीं और उनके किनारे पर पक्षियों की शब्द करती हुई पंक्तियां बैठी हुई थीं जिनसे वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो उन्होंने शब्द करती हुई ढीली करधनी ही धारण की हो ।।106।।
There were four stepwells in each direction, and along their edges sat rows of chirping birds. This made them appear as if they were adorned with a loosely tied, melodiously jingling girdle. ||106||
श्लोक ( Shlok ) 107
बभुस्ता मणिसोपानाः स्फटिकोच्चतटीभुवः । भुवः प्रसृतलावण्यरसाः कुल्या इव श्रुताः ॥१०७॥
उन बावड़ियों में मणियों की सीढ़ियाँ लगी हुई थीं, उनके किनारे की ऊँची उठी हुई जमीन स्फटिकमणि की बनी हुई थी और उनमें पृथिवी से निकलता हुआ लावण्यरूपी जल भरा हुआ था, इस प्रकार वे प्रसिद्ध बावड़ियां कृत्रिम नदी के समान सुशोभित हो रही थीं ।।107।।
The stepwells had staircases made of precious gems, their elevated edges were crafted from crystal-clear Sphatika gems, and they were filled with sparkling water that seemed to emerge naturally from the earth. In this way, these renowned stepwells shone beautifully, resembling artificial rivers. ||107||
श्लोक ( Shlok ) 108 – 110
द्विरेफगुञ्जनैर्मंजु गायन्त्यो वार्हतो गुणान् । नृत्यन्त इव जैनेशजयतोषान्महोर्मिभिः ॥१०८॥
कुर्वन्त्यो वा जिनस्तोत्रं चक्रवाकविकूजितैः । संतोषं दर्शयन्त्यो वा प्रसन्नोदकधारणात् ॥१०९॥
नन्दोतरादिनामानः सरस्यस्तास्तटश्रितैः । पादप्रक्षा लनाकुण्डैः बभुः सप्रसवा इव ॥११०॥
वे बावड़ियाँ भ्रमरों की गुंजार से ऐसी जान पड़ती थीं मानो अच्छी तरह से अरहंत भगवान् के गुण ही गा रही हो, उठती हुई बड़ी-बड़ी लहरों से ऐसी जान पड़ती थीं मानो जिनेंद्र भगवान् की विजय से संतुष्ट होकर नृत्य ही कर रही हों, चकवा-चकवियों के शब्दों से ऐसी जान पड़ती थीं मानो जिनेंद्रदेव का स्तवन ही कर रही हों, स्वच्छ जल धारण करने से ऐसी जान पड़ती थीं मानो संतोष ही प्रकट कर रही हों, और किनारे पर बने हुए पाँव धोने के कुंडों से ऐसी जान पड़ती थीं मानो अपने-अपने पुत्रों से सहित ही हों, इस प्रकार नंदोत्तरा आदि नामों को धारण करने वाली बावड़ियाँ बहुत ही अधिक सुशोभित हो रही थीं ।।108-110।।
The stepwells seemed as if they were melodiously singing the virtues of Arihant Bhagwan through the humming of bees. With their rising and rippling waves, they appeared to be dancing in joy, celebrating the victory of Jinendra Bhagwan.
Through the calls of Chakva-Chakvi birds, they seemed to be offering praises to the Lord. Their crystal-clear water reflected a sense of deep contentment. The small foot-washing pools at their edges made them appear as if they were lovingly embracing their own children.
Thus, the stepwells, bearing names like Nandottarā, shone with extraordinary beauty, radiating divine splendor. ||108-110||
श्लोक ( Shlok ) 111
स्तोकान्तरं ततोऽतीत्य तां महीमम्बुजैश्चिता । परिवव्रेऽन्तरा वीथीं वीथीं च जलखातिका ॥१११॥
उन बावड़ियों से थोड़ी ही दूर आगे जाने पर प्रत्येक वीथी (गली) को छोड़कर जल से भरी हुई एक परिखा थी जो कि कमलों से व्याप्त थी और समवसरण की भूमि को चारों ओर से घेरे हुए थी ।।111।।
A little further from those stepwells, beyond each pathway, there was a water-filled moat, adorned with blooming lotuses. This moat encircled the Samavasarana land from all sides, enhancing its divine beauty. ||111||
श्लोक 112 से 121
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102