भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |
श्लोक 112 से 121 सम्यग्दर्शन का उपदेश
मुनि ने कहा कि वज्रजंघ पात्रदान से यहाँ जन्मा, पर सम्यग्दर्शन नहीं पाया। अब उसे देने आए हैं। समय उपयुक्त है। मिथ्यात्व दूर कर सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है। यह ज्ञान-चारित्र का मूल है।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
‘विदाङ्करु कुरुष्वार्य पात्रदानविशेषतः । समुत्पन्नमिहात्मानं विशुद्धाद् दर्शनाद् विना ॥११२॥
हे आर्य, तू निर्मल सम्यग्दर्शन के बिना केवल पात्रदान की विशेषता से ही यहाँ उत्पन्न हुआ है यह निश्चय समझ ।।112।।
“O Arya, understand this with certainty — you were born here solely due to the merit of offering charity to worthy recipients, despite lacking pure right faith.”
श्लोक ( Shlok ) 113
महाबलभवेऽस्मतो बुद्ध्वा त्यक्ततनुस्थितिः । नालब्ध दर्शने शुद्धि भोगकाङ्क्षानुबन्धतः ॥११३॥
महाबल के भव में तूने हमसे ही तत्त्वज्ञान प्राप्त कर शरीर छोड़ा था परंतु उस समय भोगों की आकांक्षा के वश से तू सम्यग्दर्शन की विशुद्धता को प्राप्त नहीं कर सका था ।।113।।
“In your existence as Mahabal, you attained knowledge of the truth from us and renounced your body. However, due to your desire for worldly pleasures, you were unable to attain the purity of right faith.”
श्लोक ( Shlok ) 114
तस्मात्ते दर्शनं सम्यग्विशेषणमनुत्तरम् । आायातौ दातुकामौ स्वः स्वमर्मोक्षसुखसाधनम् ॥११४॥
अब हम दोनों, सर्वश्रेष्ठ तथा स्वर्ग और मोक्ष संबंधी सुख के प्रधान कारणरूप सम्यग्दर्शन को देने की इच्छा से यहाँ आये हैं ।।114।।
“Now, both of us have come here with the intention of bestowing upon you the supreme right faith, which is the foremost cause of attaining the ultimate happiness of heaven and liberation.”
श्लोक ( Shlok ) 115
तद्गृहाणाद्य सम्यक्स्वं तल्लाभे काल एष ते । काललब्ध्या विना नार्य तदुत्पत्तिरिहाङ्गिनाम् ॥११५॥
इसलिए हे आर्य, आज सम्यग्दर्शन ग्रहण कर । उसके ग्रहण करने का यह समय है क्योंकि काललब्धि के बिना इस संसार में जीवों को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति नहीं होती है ।।115।।
“Therefore, O Arya, accept right faith today. This is the opportune moment for its acceptance, as in this world, right faith does not arise without the favorable convergence of time and circumstances.”
श्लोक ( Shlok ) 116
देशनाकाललब्ध्यादिबाह्यकारणसंपदि । अन्तः करणसामग्रयां भव्यात्मा स्याद् विशुद्धकृत्” [दृक] ॥११६॥
जब देशनालब्धि और काललब्धि आदि बहिरंग कारण तथा करणलब्धिरूप अंतरंग कारण सामग्री की प्राप्ति होती है तभी यह भव्य प्राणी विशुद्ध सम्यग्दर्शन का धारक हो सकता है ।।116।।
“Only when external factors such as the availability of teachings (Deshana Labdhi) and favorable time (Kala Labdhi), along with the internal cause of Karan Labdhi (spiritual readiness), come together, can a worthy soul attain pure right faith.”
श्लोक ( Shlok ) 117
शमाद् दर्शनमोहस्य सम्यक्त्वादानमादितः । जन्तोरनादिमिथ्यात्वकलङ्क कलि लात्मनः ॥११७॥
जिस जीव का आत्मा अनादिकाल से लगे हुए मिथ्यात्वरूपी कलंक से दूषित हो रहा है, उस जीव को सबसे पहले दर्शनमोहनीय कर्म का उपशम होने से औपशमिक सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है ।।117।।
“A soul, tainted by the delusion of false belief since beginningless time, first attains Aupashmika Samyaktva (subsidential right faith) when the deluding karmas obscuring true perception are pacified.”
श्लोक ( Shlok ) 118
यथा पित्तोदयोद् भ्रांतस्वान्तवृत्तेस्तदत्ययात् । यथार्थदर्शनं तद्वन्तर्मोहोपशान्तितः ॥११८॥
जिस प्रकार पित्त के उदय से उद्भ्रांत हुई चित्तवृत्ति का अभाव होनेपर क्षीर आदि पदार्थों के यथार्थस्वरूप का परिज्ञान होने लगता है उसी प्रकार अंतरंग कारणरूप मोहनीय कर्म का उपशम होने पर जीव आदि पदार्थों के यथार्थस्वरूप का परिज्ञान होने लगता है ।।118।।
“Just as the mind, disturbed by the rise of bile, begins to recognize the true nature of substances like milk when the disturbance subsides, similarly, when the internal deluding karmas are pacified, one starts to perceive the true nature of the soul and other realities.”
श्लोक ( Shlok ) 119
अनिर्द्धूव तमो नैशं तथा नोददयतेंऽशुमान् । तथानुभ्दिय मिथ्यात्वतमो नोदेति दर्शनम् ॥११९॥
जिस प्रकार सूर्य रात्रि संबंधी अंधकार को दूर किये बिना उदित नहीं होता उसी प्रकार सम्यग्दर्शन मिथ्यात्वरूपी अंधकार को दूर किये बिना उदित नहीं होता―प्राप्त नहीं होता ।।119।।
“Just as the sun does not rise without dispelling the darkness of night, right faith does not arise without eliminating the darkness of false belief.”
श्लोक ( Shlok ) 120
विधा विपाठ्य मिध्यात्वप्रकृतिं करणैस्त्रिभिः । भव्यात्मा ह्रासयन् कर्मस्थितिं सम्यक्त्वभाग भवेत् ।।१२०॥
यह भव्य जीव, अधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन तीन करणों द्वारा मिथ्यात्वप्रकृति के मिथ्यात्व, सम्यङ्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृतिरूप तीन खंड कर के कर्मों की स्थिति कम करता हुआ सम्यग्दृष्टि होता है ।।120।।
“A worthy soul attains right faith by progressively reducing the bondage of karmas through the three stages of spiritual transformation: Adhah-karan, Apurva-karan, and Anivritti-karan. These stages break down the three forms of delusion — Mithyatva (false belief), Samyagmithyatva (mixed belief), and Samyaktva (right belief).”
श्लोक ( Shlok ) 121
आप्तागमपदार्थानां श्रद्धानं परया मुदा । सम्यग्दर्शनमाम्नातं तन्मूले” ज्ञानचेष्टिते ।।१२१।।
वीतराग सर्वज्ञ देव, आप्तोपज्ञ आगम और जीवादि पदार्थों का बड़ी निष्ठा से श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन माना गया है । यह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र का मूल कारण है । इसके बिना वे दोनों नहीं हो सकते ।।121।
“Having unwavering faith in the passionless, omniscient divine beings, the scriptures revealed by them, and the true nature of substances such as the soul is regarded as Samyagdarshan (right faith). This right faith is the fundamental cause of Samyagjnana (right knowledge) and Samyakcharitra (right conduct). Without it, the other two cannot exist.”
श्लोक 122 से 132
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |