भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 सेना का ठहराव और मुनियों का आगमन
घोड़े और हाथी शोभायमान हुए। वज्रजंघ डेरे में पहुँचे। दमधर और सागरसेन मुनि वहाँ आए। वज्रजंघ ने उनकी कांति देखकर पादप्रणाम किया और श्रीमती के साथ भोजनशाला में उनकी सेवा की।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
निपत्य भुवि भूयोऽपि प्रोत्थाय कृतवल्गनाः । रेजिरे वाजिनः स्नेहैः पुष्टा मल्ला इवोद्धताः ॥१६२।
जमीन में लोटने के बाद खड़े होकर हींसते हुए घोड़े ऐसे मालूम होते थे मानो तेल लगाकर पुष्ट हुए उद्धत मल्ल ही हों ।।162।।
After rolling on the ground, the horses stood up laughing, appearing as if they were defiant wrestlers strengthened by applying oil.
श्लोक ( Shlok ) 163
मधुपानादिव कुद्धा बद्धाः शाखिषु दन्तिनः । सुवंशा जगतां पूज्या बलादाधोरणे स्तदा ॥१६३
पीठ की उत्तम रीढ़ वाले हाथी भी भ्रमरों के द्वारा मदपान करने के कारण कुपित होने पर ही मानो महावतों द्वारा बाँध दिये गये थे जैसे कि जगत्पूज्य और कुलीन भी पुरुष मद्यपान के कारण बाँधे जाते हैं ।।163।।
Even elephants with excellent spines appeared as though restrained by their mahouts when angered due to bees drinking their ichor, just as noble and respectable men seem bound by the effects of alcohol.
श्लोक ( Shlok ) 164
यथास्वं सन्निविष्टेषु सैन्येषु स ततो नृपः । शिविरं प्रापदध्वन्यै र्हंयैरविदितान्तरम् ॥ १६४॥
तदनंतर जब समस्त सेना अपने-अपने स्थान पर ठहर गयी तब राजा वज्रजंध मार्ग तय करने में चतुर-शीघ्रगामी घोड़े पर बैठकर शीघ्र ही अपने डेरे में जा पहुँचे ।।164।।
Thereafter, when the entire army settled in their respective positions, King Vajrajandha mounted a swift and agile horse adept at covering distances and quickly reached his camp.
श्लोक ( Shlok ) 165
तुरङ्गमखुरोदधूरेणुरूषित मूर्तयः । स्विद्यन्तः सादिनः प्राप्तास्ते ललाटन्तपे रवौ ॥१६५॥
घोड़ों के खुरों से उठी हुई धूलि से जिसके शरीर रूक्ष हो रहे हैं ऐसे घुड़सवार लोग पसीने से युक्त होकर उस समय डेरों में पहुँचे थे जिस समय कि सूर्य उनके ललाट को तपा रहा था ।।165।।
The horsemen, whose bodies had become rough from the dust raised by the horses’ hooves, arrived at the camps covered in sweat, just as the sun was scorching their foreheads.
श्लोक ( Shlok ) 166
“कायमाने महामाने राजा तत्रावसत् सुखम् । सरोजलतरङ्गोरथसुकुमारुतशीतले ॥ १६६॥
जहाँ सरोवर के जल की तरंगों से उठती हुई मंद वायु के द्वारा भारी शीतलता विद्यमान थी ऐसे तालाब के किनारे पर बहुत ऊँचे तंबू में राजा वज्रजंघ ने सुखपूर्वक निवास किया ।।166।।
By the shore of a lake, where a gentle breeze stirred by the water’s ripples brought a deep sense of coolness, King Vajrajangha resided comfortably in a tall and grand tent.
श्लोक ( Shlok ) 167
ततो दमधरामिख्यः श्रीमानम्बरचारणः । सर्म सागरसेनेन तनिवेशमुपाययौ ॥ १६७॥
तदनंतर आकाश में गमन करने वाले श्रीमान् दमधर नामक मुनिराज, सागरसेन नामक मुनिराज के साथ-साथ वज्रजंघ के पड़ाव में पधारे ।।167।।
Thereafter, the venerable sage named Damdhara, who traveled through the skies, arrived at King Vajrajangha’s camp along with Sage Sagarsena.
श्लोक ( Shlok ) 168
कान्तारवर्याँ संगीर्य पर्यटन्तौ यदृच्छया । वज्रजड़्घ महीभर्तुरावासं तावुपेयतुः ॥१६८॥
उन दोनों मुनियों ने वन में ही आहार लेने की प्रतिज्ञा की थी इसलिए इच्छानुसार विहार करते हुए वज्रजंघ के डेरे के समीप आये ।।168।।
Both sages had vowed to take their meals only in the forest. Therefore, wandering at will, they arrived near King Vajrajangha’s camp.
श्लोक ( Shlok ) 169
दूरादेव मुनीन्द्रौ तौ राजापश्यन्महाद्युती । स्वर्गापवर्गयोर्मार्गाविव प्रक्षीणकल्मषौ ॥१६९
वे मुनिराज अतिशय कांति के धारक थे, और पापकर्मों से रहित थे इसलिए ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो स्वर्ग और मोक्ष के साक्षात् मार्ग ही हों ऐसे दोनों मुनियों को राजा वज्रजंघ ने दूर से ही देखा ।।169।।
The sages radiated immense brilliance and were free from sinful deeds, appearing as though they embodied the very paths to heaven and liberation. King Vajrajangha saw these two venerable sages from afar.
श्लोक ( Shlok ) 170
स्वाङ्गदीदीप्तिविनिद् र्धूततमसौ तौ ततो मुनी । ससंभ्रमं समुत्थाय प्रतिजग्राह भूमिपः ॥१७०॥
जिन्होंने अपने शरीर की दीप्ति से वन का अंधकार नष्ट कर दिया है ऐसे दोनों मुनियों को राजा वज्रजंघ ने संभ्रम के साथ उठकर पड़गाहन किया ।।170।।
King Vajrajangha, rising with reverence, welcomed the two sages, who had dispelled the darkness of the forest with the radiance of their bodies.
श्लोक ( Shlok ) 171
कृताःञ्जलिपुटो मक्त्या दत्तार्ध्य प्रणिपत्य तौ । गृहं प्रवेशयामास श्रीमत्या सह पुण्यभाक् ॥ 171॥
पुण्यात्मा वज्रजंघ ने रानी श्रीमती के साथ बड़ी भक्ति से उन दोनों मुनियों को हाथ जोड़ अर्घ दिया और फिर नमस्कार कर भोजनशाला में प्रवेश कराया ।।171।।
The virtuous King Vajrajangha, along with Queen Shrimati, offered respectful oblations with folded hands to the two sages with great devotion. After bowing to them, he escorted them to the dining hall.
श्लोक 172 से 184
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161