वज्रजंघ और श्रीमती का उत्पलखेटक में प्रवेश
नगर में उत्सव हुए। पुरसुंदरियों ने फूल बरसाए, प्रजाजन आशीर्वाद देते थे। वज्रजंघ राजभवन में श्रीमती के साथ सुख से रहा। पंडिता सखी उसे विनोद से प्रसन्न रखती थी। उनके 98 पुत्र हुए।
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | | श्लोक 32 से 41
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
पराद्धर्यरचनोपेतं सोत्सवं प्रविशन् पुरम् । पुरन्दर इवाभासीद् वज्रजकोऽमितद्युतिः ॥४२॥
उस समय उस नगरी में अनेक उत्तम-उत्तम रचनाएँ हो गयी थीं, कई प्रकार के उत्सव मनाये जा रहे थे । उस नगर में प्रवेश करता हुआ अतिशय दैदीप्यमान् वज्रजंघ इंद्र के समान शोभायमान हो रहा था ।।42।।
At that time, the city was adorned with numerous magnificent structures, and various celebrations were taking place. As Vajrajangha entered the city, radiantly splendid, he appeared as majestic as Lord Indra himself.
श्लोक ( Shlok ) 43
पौराङ्गना महावीथीविंशन्तं तं प्रियान्वितम् । सुमनोःञ्जलिभिः प्रोत्या “चकरुः सौधसंश्रिताः ॥४३॥
जब वज्रजंघ ने अपनी प्रिया श्रीमती के साथ नगर की प्रधान-प्रधान गलियों में प्रवेश किया तब पुरसुंदरियों ने महलों की छतों पर चढ़कर उन दोनों पर बड़े प्रेम के साथ अंजलि भर-भरकर फूल बरसाये थे ।।43।।
As Vajrajangha entered the main streets of the city with his beloved Shrimati, the women of the town climbed onto the palace terraces and lovingly showered them with handfuls of flowers.
श्लोक ( Shlok ) 44
पुष्पाक्षतयुतां पुण्यां शेषां पुण्याशिषा समम् । प्रजाः समन्ततोऽभ्येत्य दम्पती तावलम्भयन् ॥४४॥
उस समय सभी ओर से प्रजाजन आते थे और शुभ आशीर्वाद के साथ-साथ पुष्प तथा अक्षत से मिला हुआ पवित्र प्रसाद उन दोनों दंपतियों के समीप पहुँचाते थे ।।44।।
At that time, people from all directions gathered, offering sacred blessings along with flowers and rice grains mixed with holy offerings, which they presented to the couple.
श्लोक ( Shlok ) 45
ततः प्रहतगम्भीरपटहध्वानसंकुलम् । पुरमुत्तोरणं पश्यन् स विवेश नृपालयम् ॥४५॥
तदनंतर बजती हुई भेरियों के गंभीर शब्द से व्याप्त तथा अनेक तोरणों से अलंकृत नगर की शोभा देखते हुए वज्रजंघ ने राजभवन में प्रवेश किया ।।45।।
Thereafter, amidst the resonant sound of beating drums and admiring the city’s splendor adorned with numerous arches, Vajrajangha entered the royal palace.
श्लोक ( Shlok ) 46
तत्र श्रीभवने रम्ये सर्वर्तुसुखदायिनि । श्रीमत्या सह संप्रीत्या वज्रजङ्गोऽवसत् सुखम् ॥४६॥
वह राजभवन अनेक प्रकार की लक्ष्मी से शोभित था, महा मनोहर था और सर्व ऋतुओं में सुख देने वाली सामग्री से सहित था । ऐसे ही राजमहल में वज्रजंघ श्रीमती के साथ बड़े प्रेम और सुख से निवास करता था ।।46।।
The royal palace was adorned with various forms of prosperity, exceptionally magnificent, and equipped with comforts suited for all seasons. In such a splendid palace, Vajrajangha resided with Shrimati in great love and bliss.
श्लोक ( Shlok ) 47
स राजसदनं रम्यं प्रीत्यामुष्यै प्रदर्शयन् । तत्र तां रमयामास खिन्नां गुरुवियोगतः ॥४७॥
यद्यपि माता-पिता आदि गुरुजनों के वियोग से श्रीमती खिन्न रहती थी परंतु वज्रजंघ बड़े प्रेम से अत्यंत सुंदर राजमहल दिखलाकर उसका चित्त बहलाता रहता था ।।47।।
Although Shrimati felt sorrowful due to separation from her parents and other elders, Vajrajangha lovingly consoled her by showing her the magnificent and beautiful royal palace, lifting her spirits.
श्लोक ( Shlok ) 48
पण्डिता सममायाता सखीनामग्रणीः सती । तामसौ रञ्जयामास विनोदैर्नंर्त्तनादिभिः ॥४८॥
शीलव्रत धारण करने वाली तथा सब सखियों में श्रेष्ठ पंडिता नाम की सखी भी उसके साथ आयी थी । वह भी नृत्य आदि अनेक प्रकार के विनोदों से उसे प्रसन्न रखती थी ।।48।।
A companion named Pandita, known for her virtuous conduct and being the most distinguished among all friends, had also accompanied her. She kept Shrimati delighted through various entertainments, including dance and other amusements.
श्लोक ( Shlok ) 49
भोगैरनारतैरेवं काले गच्छत्यनुक्रमात् । श्रीमती सुषुवे पुत्रान् व्येकंपञ्चाशतं यमान् ॥४९॥
इस प्रकार निरंतर भोगोपभोगों के द्वारा समय व्यतीत करते हुए उसके क्रमश: उनचास युगल अर्थात् अट्ठानवे पुत्र उत्पन्न हुए ।।49।।
In this way, as time passed amidst constant pleasures and enjoyment, Shrimati gradually gave birth to forty-nine pairs of sons, totaling ninety-eight children.
श्लोक ( Shlok ) 50
अथान्येद्युर्महारा वज्रबाहुर्महाद्युतिः । शरदम्बुधरोत्थानं सौधाग्रस्थो निरूपयन् ॥ ५०॥
तदनंतर किसी एक दिन महाकांतिमां महाराजो वज्रबाहु महल की छत पर बैठे हुए शरद् ऋतु के बादलों का उठाव देख रहे थे ।।50।।
One day, the radiant King Vajrabahu was seated on the palace terrace, watching the rise of post-monsoon clouds in the autumn sky.
श्लोक ( Shlok ) 51
दृष्ट्रवा तद्विलयं सद्यो निर्वेदं परमागतः । विरक्तस्यास्य चित्तेऽभूदिति चिन्ता गरीयसी ॥५१॥
उन्होंने पहले जिस बादल को उठता हुआ देखा था उसे तत्काल में विलीन हुआ देखकर उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया । वे उसी समय संसार के सब भोगों से विरक्त हो गये और मन में इस प्रकार गंभीर विचार करने लगे ।।51।।
Seeing the cloud, which he had first observed rising, suddenly dissolve into nothingness, King Vajrabahu was overcome with a sense of detachment. At that very moment, he became disillusioned with all worldly pleasures and began contemplating deeply in his mind.
श्लोक 52 से 61
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 |
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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