भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 वज्रजंघ का चित्रपट विश्लेषण
वज्रजंघ ने चित्र की प्रशंसा की—यह मनोहर, रेखाओं से सुसंगत, और उसके पूर्वभव (ललितांग और स्वयंप्रभा) को दर्शाता है। उसने ऐशान स्वर्ग, श्रीप्रभविमान, कल्पवृक्ष, सरोवर, और स्वयंप्रभा के साथ क्रीड़ा देखी। स्वयंप्रभा का प्रणय-कोप, ताड़न, और नम्रता चित्रित थी, साथ ही अच्युत इंद्र से भेंट और पिहितास्रव की पूजा भी।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
अहो स्त्रीरूपमत्रेदं नितरामभिरोचते । स्वयंप्रभाङ्गसंवादि” विचित्राभरणोज्ज्वलम् ॥१२२॥
अहा, यहाँ यह स्त्री का रूप अत्यंत शोभायमान हो रहा है । यह अनेक प्रकार के आभरणों से उज्ज्वल है और ऐसा जान पड़ता है मानो स्वयंप्रभा का ही रूप हो ।।122।।
Ah! Here, the form of this woman is exceedingly radiant. She is adorned with various kinds of ornaments, appearing as if she is the very embodiment of brilliance itself.।।122।।
श्लोक ( Shlok ) 123
किंत्वत्र कतिचित् कस्माद् गुढानि प्रकृतानि भोः ।मन्ये संमोहनायेदं जनानामिति चिन्नितम् ॥१२3
किंतु इस चित्र में कितने ही गूढ़ विषय क्यों दिखलाये गये हैं मालूम होता है कि अन्य लोगों को मोहित करने के लिए ही यह चित्र बनाया गया है ।।123।।
However, why have so many profound subjects been depicted in this painting? It seems that this artwork has been created solely to captivate others.।।123।।
श्लोक ( Shlok ) 124
ऐशानो लिखितः कल्प श्रीप्रभं च प्रभास्वरम् । श्रीप्रभाधिपतेः पार्श्वे दर्शितेयं स्वयंप्रभा॥१२4
यह ऐशान स्वर्ग लिखा गया है । यह दैदीप्यमान श्रीप्रभविमान चित्रित किया गया है और यह श्रीप्रभविमान के अधिपति ललितांगदेव के समीप स्वयंप्रभा देवी दिखलायी गयी है ।।124।।
This is written as “Aishan Heaven.” The radiant Shri Prabha Vimana has been depicted, and near it, the goddess Swayamprabha is shown beside its lord, Lalitangadeva.।।124।।
श्लोक ( Shlok ) 125
कल्पानोकहवीथीयमिदमुत्पङ्कजं सरः । दोलागृहमिदं रम्यं रम्योऽयं कृतकाचलः ॥१२५॥
यह कल्पवृक्षों की पंक्ति है, यह फूले हुए कमलों से शोभायमान सरोवर है, यह मनोहर दोलागृह है और यह अत्यंत सुंदर कृत्रिम पर्वत है ।।125।।
This is a row of Kalpavriksha trees, this is a lake adorned with blooming lotuses, this is a charming swing pavilion, and this is a remarkably beautiful artificial mountain.।।125।।
श्लोक ( Shlok ) 126
कृतप्रणयकोपेयं दर्शितात्र पराङ्मुखी । मन्दारवनवीध्यन्ते लतेव पवनाहता ॥१२६॥
इधर यह प्रणय-कोप कर पराङ्मुख बैठी हुई स्वयंप्रभा दिखलायी गयी है जो कल्पवृक्षों के समीप वायु से झकोर हुई लता के समान शोभायमान हो रही है ।।126।।
Here, Swayamprabha is depicted turning away in playful anger, appearing as radiant as a vine swayed by the breeze near the Kalpavriksha trees.।।126।।
श्लोक ( Shlok ) 127
कनकाद्रितटे क्रीडा ललिता दर्शितावयोः । इतो मणितटोत्सर्पत्प्रभाकाण्डपटरावृते ॥१२७॥
इधर तट भाग पर लगे हुए मणियों की फैलती हुई प्रभारूपी परदा से तिरोहित मेरुपर्वत के तट पर हम दोनों की मनोहर क्रीड़ा दिखलायी गयी है ।।127।।
Here, on the shores of Mount Meru, concealed by the shimmering veil-like radiance of jewels embedded along the banks, our delightful play is depicted.।।127।।
श्लोक ( Shlok ) 128
निगूढ प्रेमसद्भावकैतवापादितेर्ष्यया । शय्योत्सङ्गे मदुत्सङ्गात् बलात् पात्रोऽर्पितोऽनया ॥ १२८॥
इधर, अंतःकरण में छिपे हुए प्रेम के साथ कपट से कुछ ईर्ष्या करती हुई स्वयंप्रभा ने यह अपना पैर हठपूर्वक मेरी गोदी से हटाकर शय्या के मध्यभाग पर रखा है ।।128।।
Here, Swayamprabha, harboring hidden love in her heart while feigning a bit of jealousy, stubbornly moved her foot from my lap and placed it firmly in the middle of the bed.।।128।।
श्लोक ( Shlok ) 129
मणिनुपुरझङ्कारचारुणा चरणेन माम् । ताडयन्तीह संरुद्धा काञ्च्या सख्येव गौरवात् ॥१२9॥
इधर, यह स्वयंप्रभा मणिमय नुपूरों की झंकार से मनोहर अपने चरणकमल के द्वारा मेरा ताड़न करना चाहती है परंतु गौरव के कारण ही मानो सखी के समान इस करधनी ने उसे रोक दिया है ।।129।।
Here, Swayamprabha, with her charming lotus-like feet adorned with tinkling jewel anklets, seems intent on playfully striking me. However, it appears as though her girdle, like a loyal friend, has restrained her out of dignity.।।129।।
श्लोक ( Shlok ) 130
कृतव्यलीककोपं मां प्रसादयितुमानता । स्वोत्तमाङ्गेन पादौ मे घटयन्तीह दर्शिता ॥१३०॥
इधर दिखाया गया है कि मैं बनावटी कोप किये हुए बैठा हूँ और मुझे प्रसन्न करने के लिए अति नम्रीभूत हुई स्वयंप्रभा अपना मस्तक मेरे चरणों पर रख रही है ।।130।।
Here, it is depicted that I am sitting with feigned anger, and to appease me, the exceedingly humble Swayamprabha is placing her head at my feet.।।130।।
श्लोक ( Shlok ) 131
अच्युतेन्द्र समायोगगुरु पूजादिविस्तरः । दर्शितोऽत्र निगूढस्तु भावः प्रणयजो मिथः ॥१३१॥
इधर यह अच्युत स्वर्ग के इंद्र के साथ हुई भेंट तथा पिहितास्रव गुरु की पूजा आदि का विस्तार दिखलाया गया है और इस स्थान पर परस्पर के प्रेमभाव से उत्पन्न हुआ रति आदि भाव दिखलाया गया है ।।131।।
Here, the meeting with the Indra of Achyuta Heaven and the detailed depiction of the worship of the revered Guru with concealed tears are shown. In this place, emotions such as love and passion, born from mutual affection, are depicted.।।131।।
श्लोक 132 से 141
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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