भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311
श्लोक 312 से 318 स्तुति समापन और राज्य
वज्रजंघ ने जिन को तीनों लोकों का स्वामी, गुरु, और तीर्थंकर कहा। भक्ति की याचना की। मुनियों की पूजा कर, श्रीमती के साथ पुंडरीकिणी नगरी में प्रविष्ट हुआ। 32,000 राजाओं ने उसका राज्याभिषेक किया। वह भोग भोगता रहा।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 312 to 318
श्लोक ( Shlok ) 312
इति “विघ्नितविघ्नौघं भक्तिनिघ्नेन चेतसा । पर्युपासे जिनेन्द्र त्वां विघ्नवर्गोंपशान्तये ॥३१२॥
हे जिनेंद्रदेव, आपने विघ्नों के समूह को भी विघ्नित किया हैं―उन्हें नष्ट किया है इसलिए अपने विघ्नों के समूह को नष्ट करने के लिए मैं भक्तिपूर्ण हृदय से आपकी उपासना करता हूँ ।।312।।
O Lord Jinendra, You have destroyed even the group of obstacles, eliminating them entirely. Therefore, with a heart full of devotion, I worship You to remove the obstacles in my path as well.
श्लोक ( Shlok ) 313
त्वमेको जगतां ज्योतिस्त्वमेको जगतां पतिः । स्वमेको जगतां बन्धुस्त्वमेको जगतां गुरुः ॥३१३॥
हे देव, एकमात्र आप ही तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाली ज्योति हैं, आप ही समस्त जगत् के एकमात्र स्वामी हैं, आप ही समस्त संसार के एकमात्र बंधु हैं और आप ही समस्त लोक के एकमात्र गुरु हैं ।।313।।
O Lord, You alone are the light that illuminates the three worlds, You are the sole ruler of the entire universe, You are the only friend of all beings, and You are the one true teacher of all realms.
श्लोक ( Shlok ) 314
त्वमादिः सर्वविद्यानां त्वमादिःसर्वयोगिनाम्। त्वमादि र्धर्मतीर्थस्य त्वमादिर्गुरुरङ्गिनाम् ॥३१४॥
आप ही धर्मरूपी विद्याओं के आदि स्थान हैं, आप ही समस्त योगियों में प्रथम योगी हैं, आप ही धर्मरूपी तीर्थ के प्रथम प्रवर्तक हैं, और आप ही प्राणियों के प्रथम गुरु हैं ।।314।।
You are the origin of all the teachings of righteousness, You are the foremost yogi among all yogis, You are the first establisher of the sacred pilgrimage of righteousness, and You are the first teacher of all living beings.
श्लोक ( Shlok ) 315
त्वं सार्वः सर्वविद्येशः सर्वलोकानलोकथाः । स्तुतिवादस्तबैतावानलमास्तां सविस्तरः ॥३१५॥
आप ही सबका हित करने वाले हैं, आप ही सब विद्याओं के स्वामी है और आप ही समस्त लोक को देखने वाले हैं । हे देव, आपकी स्तुति का विस्तार कहाँ तक किया जाये । अबतक जितनी स्तुति कर चुका हूँ मुझ-जैसे अल्पज्ञ के लिए उतनी ही बहुत है ।।315।।
You are the well-wisher of all, You are the master of all knowledge, and You are the observer of all worlds. O Lord, how far can Your praise be extended? The praise I have offered so far is more than enough for someone like me, who is of limited understanding.
श्लोक ( Shlok ) 316
त्वां देवमित्थमभिवन्ध कृतप्रणामो नान्यत् फलं परिमितं परिमार्गयामि ।
त्वय्येव भक्तिमचलां जिन मे दिश त्वं सा सर्वमभ्युदयमुक्तिफलं प्रसूते ॥३१६॥
हे देव, इस प्रकार आपकी वंदना कर मैं आपको प्रणाम करता हूँ और उसके फलस्वरूप आपसे किसी सीमित अन्य फल की याचना नहीं करता हूँ । किंतु हे जिन, आप में ही मेरी भक्ति सदा अचल रहे यही प्रदान कीजिए क्योंकि वह भक्ति ही स्वर्ग तथा मोक्ष के उत्तम फल उत्पन्न कर देती है ।।316।।
O Lord, having praised You in this way, I bow before You, and as a result, I do not ask for any limited worldly rewards. But, O Jin, please grant that my devotion to You remains steadfast forever, for such devotion brings the highest fruits of both heaven and liberation.
श्लोक ( Shlok ) 317
इत्युच्चैः प्रणिपत्य तं जिनपतिं स्तुत्वा कृताभ्यर्चनः, स श्रीमान मुनिवृन्दमप्यनुगमात संपूज्य निष्कल्मषम श्रीमत्या सह वज्रजंघनृपतिस्तामुत्तमद्धिं पुरीम्, प्राविक्षत् प्रमदोदयाज्जिनगुणान् भूयः स्मरन् भूतये ll317ll
इस प्रकार श्रीमान् वज्रजंघ राजा ने जिनेंद्र देव को उत्तम रीति से नमस्कार किया, उनकी स्तुति और पूजा की । फिर रागद्वेष से रहित मुनिसमूह की भी क्रम से पूजा की । तदनंतर श्रीजिनेंद्रदेव के गुणों का बार-बार स्मरण करता हुआ वह वज्रजंघ राज्यादि की विभूति प्राप्त करने के लिए हर्ष से श्रीमती के साथ-साथ अनेक ऋद्धियों से शोभायमान पुंडरीकिणी नगरी में प्रविष्ट हुआ ।।317।।
Thus, King Vajrajangha properly bowed to Lord Jinendra, offering praise and worship. He then reverently worshiped the group of monks, free from attachment and aversion, in due course. Afterward, with joy, he entered the city of Pundarikini, adorned with numerous divine powers, alongside his consort, constantly remembering the virtues of Lord Jinendra and seeking the blessings of royal prosperity and more.
श्लोक ( Shlok ) 318
लक्ष्मीमानभिषेकपूर्वकमसौ श्रीवज्रजङ्घो भुवि द्वात्रिंशन्मुकुटप्रबद्धमहित क्ष्माभृत्सहस्त्रे र्मुहुः ।
तां कल्याणपरम्परा मनुभवन् भोगान् परान्निर्विशन्, श्रीमत्या सह दीर्घकालमवसत्तस्मिन् पुरेऽर्चन् जिनान् ।।318
वहाँ भरतभूमि के बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजाओं ने उस लक्ष्मीवान् वज्रजंघ का राज्याभिषेकपूर्वक भारी सम्मान किया था । इस प्रकार जिनेंद्र भगवान् की पूजा करते हुए हजारों राजाओं के द्वारा बार-बार प्राप्त हुई कल्याण परंपरा का अनुभव करते हुए और श्रीमती के साथ उत्तमोत्तम भोग भोगते हुए वज्रजंघ ने दीर्घकाल तक उसी पुंडरीकिणी नगरी में निवास किया था ।।318।।
There, the thirty-two thousand crown-wearing kings of Bharatavarsha gave King Vajrajangha, the wealthy one, a grand coronation and great honor. In this way, while worshiping Lord Jinendra, experiencing the succession of blessings received repeatedly from thousands of kings, and enjoying the finest pleasures with his consort, Vajrajangha resided for a long time in the city of Pundarikini.
इत्यार्षे भगवजिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे श्रीमतीवज्रज समागमवर्णनं नाम सप्तमं पर्व ॥७॥
इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रह में
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन करने वाला सातवाँ पर्व पूर्व हुआ ।।7।।
Thus, in the Trishashtilakshana Mahapurana collection, composed by the revered Acharya Jin Sena, the seventh chapter describes the union of Shri Mati and Vajrajangha. This chapter is part of the ancient work, renowned by the name Arsha.
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन श्लोक 1 से 12
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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