भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
श्लोक 222 से 231 सिंह और सूकर के पूर्वभव
मुनि ने बताया कि सिंह हस्तिनापुर में उग्रसेन था, क्रोधी, राजा के भंडार लूटा, मार खाकर व्याघ्र हुआ। सूकर विजय नगर में हरिवाहन था, मान से माता-पिता का अनादर किया, खंभे से टकराकर सूकर बना।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222 – 223
इति राज्ञानुयुक्तोऽसौ चारणर्षिरवोचत ।शार्दूलोऽयं भवेऽन्यस्मिन् देशेऽस्मिन्नेव विश्रुते ॥२२२॥
हास्तिनाक्यपुरे ख्याते वैश्यात् सागरदत्ततः । धनवस्यामभूत् सुनुरुग्रसेनसमाह्वयः ॥२२३॥
इस प्रकार राजा के पूछने पर चारण ऋद्धि के धारक ऋषिराज बोले,हे राजन्, यह सिंह पूर्वभव में इसी देश के प्रसिद्ध हस्तिनापुर नामक नगर में सागरदत्त वैश्य से उसकी धनवती नामक स्त्री में उग्रसेन नाम का पुत्र हुआ था ।।222-223।।
“In response to the king’s inquiry, the sage endowed with Charan Riddhi said:’O King, this lion was, in his past life, born as Ugrasena, the son of the wealthy merchant Sagardatta and his wife Dhanavati, in the famous city of Hastinapur of this very region.'” ( 222-223)
श्लोक ( Shlok ) 224
सोऽप्रत्याख्यानतः क्रोधात् पृथिवीभेदसन्निभात् ।तिर्यगायर्बबन्धाऽज्ञो निसर्गादतिरोषणः॥२२४॥
वह उग्रसेन स्वभाव से ही अत्यंत क्रोधी था इसलिए उस अज्ञानी ने पृथिवी भेद के समान अप्रत्याख्यानावरण क्रोध के निमित्त से तिर्यंच आयु का बंध कर लिया था ।।224।।
“Ugrasena was naturally extremely wrathful. Due to his ignorance and unrestrained anger, which was as destructive as splitting the earth, he bound himself to a lifespan in the tiryanch (animal) realm.” (224)
श्लोक ( Shlok ) 225
कोष्ठागार नियुक्तांश्च निर्भर्त्स्यं घृततण्डुलम् । बलादादाय वेश्याभिः संप्रायच्छत दुर्भ दी ॥२२५॥
एक दिन उस दुष्ट ने राजा के भंडार की रक्षा करने वाले लोगों को घुड़ककर वहाँ से बलपूर्वक बहुत-सा घी और चावल निकालकर वेश्याओं को दे दिया ।।225।।
“One day, that wicked man scolded the guards of the royal treasury and forcefully took a large quantity of ghee and rice, which he gave to courtesans.” ( 225)
श्लोक ( Shlok ) 226
तद्वार्ताकर्णनाद् राज्ञा बन्धितस्तीव्रवेदनः । चपेटाचरणाघातैः मृत्या व्याघ्र इहाभवत् ॥२२६।।
जब राजा ने यह समाचार सुना तब उसने उसे बँधवा कर थप्पड़, लात, हंसा आदि की बहुत ही मार दिलायी जिससे वह तीव्र वेदना सहकर मरा और यहाँ यह व्याघ्र हुआ है ।।226।।
“When the king heard this news, he had Ugrasena captured and severely punished with slaps, kicks, and other forms of torment. Enduring intense suffering, he died and was reborn here as this tiger.” ( 226)
श्लोक ( Shlok ) 227 – 228
वराहोऽयं भवेऽतीते पुरे विजयनामनि । सूनुर्वसन्तसेनायां महानन्दनृपादभूत् ॥ २२७॥
हरिवाहननामासौ अप्रत्याख्यानमानतः । मानमस्थिसमं बिभ्रत् पित्रोरप्यविनीतकः ॥२२८॥
हे राजन् यह सूकर पूर्वभव में विजय नामक नगर में राजा महानंद से उसकी रानी वसंतसेना में हरिवाहन नाम का पुत्र हुआ था । वह अप्रत्याख्यानावरण मान के उदय से हड्डी के समान मान को धारण करता था इसलिए माता-पिता का भी विनय नहीं करता था ।।227-228।।
“O King, this boar was, in its past life, born as Harivahana, the son of King Mahananda and Queen Vasantasena in the city of Vijaya. Due to the rise of unrestrained arrogance (Apratyakhyanavarana Mana), which was as rigid as bone, he became highly egoistic and showed no respect even to his parents.” ( 227-228)
श्लोक ( Shlok ) 229
तिर्यंगायुरतो बद्ध्वा नैच्छत्नुपित्रनु शासनम् । धावमानः शिलास्तम्भजर्जरीकृतमस्तकः ॥२२९॥
और इसीलिए उसे तिर्यंच आयु का बंध हो गया था । एक दिन यह माता-पिता का अनुशासन नहीं मानकर दौड़ा जा रहा था कि पत्थर के खंभे से टकराकर उसका शिर फूट गया और इसी वेदना में आर्तध्यान से मरकर यह सूकर हुआ है ।।229।।
“As a result, he bound himself to a lifespan in the tiryanch (animal) realm. One day, disobeying his parents’ instructions, he ran recklessly and collided with a stone pillar, causing his head to split open. In that agony, filled with distressful thoughts (Artadhyana), he died and was reborn as this boar.” ( 229)
श्लोक ( Shlok ) 230 – 231
आर्त्तों मृत्वा वराहोऽभूद् वानरोऽयं पुरा भवे । पुरे धान्याह्वेये जातः कुबेराख्यवणिक्सुतः ॥२३०॥
सुदत्तागर्भसंभूतो नागदत्तसमाह्वयः । अप्रत्याख्यानमायां तां मेषश्वङ्गसमां श्रितः ॥२३१॥
हे राजन्, यह वानर पूर्वभव में धन्यपुर नाम के नगर में कुबेर नामक वणिक के घर उसकी सुदत्ता नाम को स्त्री के गर्भ से नागदत्त नाम का पुत्र हुआ था वह मेंड़ें के सींग के समान अप्रत्याख्यानावरण माया को धारण करता था ।।230-231।।
“O King, this monkey was, in its past life, born as Nagadatta, the son of the merchant Kubera and his wife Sudatta in the city of Dhanyapur. He harbored deceitfulness (Apratyakhyanavarana Maya) as twisted and sharp as a ram’s horns.” (Verses 230-231)
श्लोक 232 से 241
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221