भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91
श्लोक 92 से 104 लक्ष्मीमती का संदेश
लक्ष्मीमती ने राज्य की रक्षा के लिए वज्रजंघ को संदेश भेजा। उन्होंने चिंतागति और मनोगति को बुलाकर कहा कि वज्रदंत दीक्षित हो गए, पुंडरीक बालक है, राज्य संकट में है। दोनों विद्याधर आकाशमार्ग से उत्पलखेटक पहुँचे।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 92 to 104
श्लोक ( Shlok ) 92 – 93
निश्चित्येति समाहृय सुतौ मन्दरमालिनः । सुन्दर्याश्च खगाधीशों गन्धर्वपुरपालिनः ॥९२॥
चिन्तामनोगती स्निग्धौ शुची दक्षौ महान्वयौ । अनुरक्तौ श्रुताशेषशास्त्रार्थों कार्यकोविदौ ॥९३॥
ऐसा निश्चय कर लक्ष्मीमती ने गंधर्वपुर के राजा मंदरमाली और रानी सुंदरी के चिंतागति और मनोगति नामक दो विद्याधर पुत्र बुलाये । वे दोनों ही पुत्र चक्रवर्ती से भारी स्नेह रखते थे पवित्र हृदय वाले, चतुर, उच्चकुल में उत्पन्न, परस्पर में अनुरक्त, समस्त शास्त्रों के जानकार और कार्य करने में बड़े ही कुशल थे ।।92-93।।
“Having made this decision, Lakshmimati called for two sons of the Vidyadhara king Manderamali and queen Sundari of Gandharvapur, named Chintagati and Manogati. Both sons were deeply attached to the emperor, pure-hearted, clever, born into noble families, deeply devoted to each other, knowledgeable in all the scriptures, and highly skilled in carrying out tasks.”
श्लोक ( Shlok ) 94
करण्डस्थिततत्कार्यपत्रौ सोपायनौतदा । प्रहिणोद् वज्रजङ्गस्य पाश्र्वे सन्देशपूर्वकम् ॥९४॥
इन दोनों को एक पिटारे में रखकर समाचारपत्र दिया तथा दामाद और पुत्री को देने के लिए अनेक प्रकार की भेंट दी और नीचे लिखा हुआ संदेश कहकर दोनों को वज्रजंघ के पास भेज दिया ।।94।।
“She placed both of them in a chest, gave them a letter, and sent them along with various gifts for her son-in-law and daughter. She also instructed them to deliver the message written below to Vajrajangh.”
श्लोक ( Shlok ) 95 – 98
चक्रवतीं वनं यातः सपुत्रपरिवारकः । पुण्डरीकस्तु राज्येऽस्मिन् पुण्डरीकाननः स्थितः ॥९५॥
स्व चक्रवर्तिनो राज्यं क्वायं बालोऽतिदुर्बलः । तदयं पुङ्गवैर्धायें भरें दम्यो नियोजितः ॥९६॥
बाकोऽयमवले चार्या राज्यं चेदमनायकम् । विशीर्णप्रायमेतस्य पाकनं त्वयि तिष्ठते ॥९७॥
“अकाकहरणं तस्मादागन्तव्यं महाधिया । त्वया त्वत्सश्चिभाजेन भूयाद राज्यमविप्तवम् ॥९८
वज्रदंत चक्रवर्ती अपने पुत्र और परिवार के साथ वन को चले गये हैं―वन में जाकर दीक्षित हो गये हैं । उनके राज्य पर कमल के समान मुख वाला पुंडरीक बैठाया गया है । परंतु कहाँ तो चक्रवर्ती का राज्य और कहाँ यह दुर्बल बालक ? सचमुच एक बड़े भारी बैल के द्वारा उठाने योग्य भार के लिए एक छोटा-सा बछड़ा नियुक्त किया गया । यह पुंडरीक बालक है और हम दोनों सास बहू स्त्री हैं इसलिए यह बिना स्वामी का राज्य प्राय: नष्ट हो रहा है । अब इसकी रक्षा आप पर ही अवलंबित है । अतएव अविलंब आइए । आप अत्यंत बुद्धिमान् हैं । इसलिए आपके सन्निधान से यह राज्य निरुपद्रव हो जायेगा ।।95-98।।
“Emperor Vajradant has gone to the forest with his son and family, where he has taken initiation. A young boy, Pundarik, with a face like a lotus, has been placed on the throne. But how can this fragile child bear such a responsibility? Truly, it’s like a small calf being assigned the burden of a mighty ox. This Pundarik is just a child, and we, the mother-in-law and daughter-in-law, are women, so this kingdom, without a ruler, is on the verge of destruction. Its protection now rests upon you. Therefore, please come immediately. You are extremely wise, and with your presence, this kingdom will surely be free from harm.”
श्लोक ( Shlok ) 99
इति वाचिकमादाय तौ तदोत्पेततुर्नमः । पयोदांस्त्वरया दूरमाकर्षन्तौ समीपगान् ॥९९॥
ऐसा संदेश लेकर वे दोनों उसी समय आकाशमार्ग से चलने लगे । उस समय वे समीप में स्थित मेघों को अपने वेग से दूर तक खींचकर ले जाते थे ।।99।।
“With such a message in hand, they both immediately set out through the sky. At that time, they would pull the clouds near them far away with their speed.”
श्लोक ( Shlok ) 100 – 104
क्वचिजलधरांस्तुङ्गान् स्वमार्गस्य निरोधिनः । विभिन्दन्तौ पयोबिन्दून क्षरतोऽश्रुल वानिव ॥१००॥
तौ पश्यन्तौ नदीर्दुरात् तन्वीरत्यन्तपाण्डुराः । घनागमस्य कान्तस्य विरहेणेव कर्शिताः ॥ १०१ ॥
मम्वानौ दूरभावेन पारिमाण्डल्यमागतान् । भूमाविव निमग्नाङ्गानर्कतापभयाद् गिरीन् ॥102
दोर्घिकाम्भो भुवो न्यस्तमिवैकमतिवर्त्तुलम् । तिलकं दूरताहेतोः प्रेक्षमाणावनुक्षणम् ॥१०३॥
क्रमादापततामेतौ पुरमुत्पलखेटकम् । मन्द्रसंगीत निर्घोषबधिरीकृतदिङ्मुखम् ॥ १०४॥
वे कहीं पर अपने मार्ग में रुकावट डालने वाले ऊंचे-ऊंचे मेघों को चीरते हुए जाते थे । उस समय उन मेघों से जो पानी की बूँदें पड़ रही थीं उनसे ऐसे मालूम होते थे मानो आँसू ही बहा रहे हों । कहीं नदियों को देखते जाते थे, वे नदियाँ दूर होने के कारण ऊपर से अत्यंत कृश और श्वेतवर्ण दिखाई पड़ती थीं जिससे ऐसा मालूम होता था मानो वर्षाकालरूपी पति के विरह से कृश और पांडुरवर्ण हो गयी हों । वे पर्वत भी देखते जाते थे उन्हें दूरी के कारण वे पर्वत गोल-गोल दिखाई पड़ते थे जिससे ऐसे मालूम होते थे मानो सूर्य के संताप से डरकर जमीन में ही छिपे जा रहे हों । वे बावड़ियों का जल भी देखते जाते थे । दूरी के कारण वह जल उन्हें अत्यंत गोल मालूम होता था जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो पृथ्वीरूप स्त्री ने चंदन का सफेद तिलक ही लगाया हो । इस प्रकार प्रत्येक क्षण मार्ग की शोभा देखते हुए वे दोनों अनुक्रम से उत्पलखेटक नगर जा पहुँचे । वह नगर संगीत काल में होने वाले गंभीर शब्दों से दिशाओं को बधिर (बहरा) कर रहा था ।।100-104।।
“As they journeyed, they tore through the high clouds that obstructed their path. The raindrops falling from those clouds seemed like tears, as if they were shedding sorrow. They passed by rivers, which appeared thin and pale from a distance, making it seem as though they had grown frail and colorless due to the separation from their monsoon-like husbands. They also saw mountains, which, due to their distance, appeared round and distorted, as if hiding from the sun’s scorching heat. They observed the water of the stepwells, which appeared to be perfectly round from afar, giving the impression that the earth, like a woman, had applied a white sandalwood mark. In this way, admiring the beauty of the journey at every step, they finally reached the city of Upalaketaka. The city was filled with deep sounds from musical performances, making the very directions seem deaf.”
श्लोक 105 से 118
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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