भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
श्लोक 212 से 221 विवाह मंडप का वर्णन और पूजा
मंडप में स्फटिक दीवारें, नील रत्न भूमि, मोती मालाएँ, पद्मराग वेदी, और सफेद शिखर थे। गोपुर-द्वार और भीतरी दरवाजा रत्नों से बना था। वज्रदंत ने महापूत चैत्यालय में कल्पवृक्ष पूजा की। शुभ मुहूर्त में नगर सजा, चंदन-पुष्प बिखरे, और वधू-वर का अभिषेक हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 212 to 221
श्लोक ( Shlok ) 212
स्फाटिक्यो मित्तयस्तस्मिन् जनानां प्रतिबिम्बकैः । चित्रिता इव संरेजुः प्रेक्षिणां चित्तरञ्जिकाः ॥२१२॥
उस मंडप में स्फटिक की दीवालों पर अनेक मनुष्य के प्रतिबिंब पड़ते थे जिनसे वे चित्रित हुई-सा जान पड़ती थी और इसीलिए दर्शकों का मन अनुरक्षित कर रही थीं ।।212।।
In that pavilion, the walls made of crystal reflected the images of many people, making them appear as if they were painted, and for this reason, they were captivating the hearts of the onlookers. ||212||
श्लोक ( Shlok ) 213
मणिकुट्टिमभूरस्मिन् नीलरत्नैर्विनिर्मिता । पुष्पोपहारैर्व्यरुचद् द्यौरिवातततारकाः ।।२१३।।
उस मंडप की भूमि नील रत्नों से बनी हुई थी, उस पर जहां-तहां फूल बिखेरे गये थे । उन फूलों से वह ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो ताराओं से व्याप्त नीला आकाश ही हो ।।213।।
The floor of that pavilion was made of sapphire gems, and flowers were scattered all over it. These flowers adorned it in such a way that it seemed as though the blue sky, filled with stars, was reflected on the ground. ||213||
श्लोक ( Shlok ) 214
मुक्तादामानि लम्बानि तद्गर्भे व्यद्यतंस्तराम् । सफेनानि मृणालानि लम्बितानीव कौतुकात् ॥२१४
उस मंडप के भीतर जो मोतियों की मालाएँ लटकती थी वे ऐसी भली मालूम होती थीं मानो किसी ने कौतुकवश फेनसहित मृणाल ही लटका दिये हैं ।।214।।
The pearl necklaces hanging inside the pavilion appeared so beautiful that it seemed as though someone had whimsically hung lotus stalks adorned with foam. ||214||
श्लोक ( Shlok ) 215
पद्मरागमयस्तस्मिन् वेदिबन्धोऽभवत् पृथुः । जनानामिव चित्तस्थो रागस्तन्मयतां गतः ॥२१५॥
उस मंडप के मध्य में पद्मराग मणियों की एक बड़ी वेदी बनी थी जो ऐसी जान पड़ती थी मानो मनुष्यों के हृदय का अनुराग ही वेदी के आकार में परिणत हो गया हो ।।215।।
In the center of the pavilion, there was a large altar made of ruby-like gemstones, which seemed as though the very affection of human hearts had transformed into the shape of the altar. ||215||
श्लोक ( Shlok ) 216
सुधोज्ज्वलानि कूटानि पर्यन्तेष्वर्य रेजिरे । तोषात् सुरविमानानि हसन्तीवात्मशोभया ।।२१६।।
उस मंडप के पर्यंत भाग में चूना से पुते हुए सफेद शिखर ऐसे शोभायमान होते थे मानो अपनी शोभा से संतुष्ट होकर देवों के विमानों की हँसी ही उड़ा रहे हों ।।216।।
At the outer edges of the pavilion, the white peaks coated with lime were so radiant that they seemed to mock the laughter of the gods’ chariots, content with their own beauty. ||216||
श्लोक ( Shlok ) 217
वेदिका कटिसूत्रेण पर्यन्ते स परिष्कृतः । रामणीयकसीम्नेव रुद्धदिक्केन विश्वतः ।।२१७।।
उस मंडप के सब ओर एक छोटी-सी वेदिका बनी हुई थी, वह वेदिका उसके कटिसूत्र के समान जान पड़ती थी । उस वेदिकारूप कटिसूत्र से घिरा हुआ मंडप ऐसा मालूम होता था मानो सब ओर से दिशा को रोकने वाली सौंदर्य की सीमा से ही घिरा हो ।।217।।
All around the pavilion, there was a small altar that seemed to resemble a waistband. The pavilion, surrounded by this altar-like waistband, appeared as though it was enclosed on all sides by the boundaries of beauty that held back the directions themselves. ||217||
श्लोक ( Shlok ) 218
रत्नैविरचितं तस्य वभौ गोपुरमुच्चकैः । प्रोत्सर्पद्रत्न भाजालरचितेन्द्रशरासनम् ॥२१८।।
अनेक प्रकार के रत्नों से बहुत ऊँचा बना हुआ उसका गोपुर-द्वार ऐसा मालूम होता था मानो रत्नों की फैलती हुई कांति के समूह से इंद्रधनुष ही बना रहा हो ।।218।।
The gopura (gate tower) of the pavilion, made of various kinds of gems and rising high, seemed as though a rainbow was being formed from the spreading brilliance of the gems. ||218||
श्लोक ( Shlok ) 219
सर्वरत्नमयस्तस्य द्वारबन्धो निवेशितः । लक्ष्म्याः प्रवेशनायेव पर्यन्तार्पितमङ्गलः ॥२१९॥
उस मंडप का भीतरी दरवाजा सब प्रकार के रत्नों से बनाया गया था और उसके दोनों ओर मंगल-द्रव्य रखे गये थे, जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो लक्ष्मी के प्रवेश के लिए ही बनाया गया हो ।।219।।
The inner door of that pavilion was made of all kinds of gems, and on both sides of it, auspicious items were placed, making it seem as though the door had been created specifically for the entry of Goddess Lakshmi. ||219||
श्लोक ( Shlok ) 220
स तदाष्टाह्निकी पूजां चक्रे चक्रधरः पराम् । कल्पवृक्षमहारूढिं महापूतजिनालये ।।२२०॥
उसी समय वज्रदंत चक्रवर्ती ने महापूत चैत्यालय में आठ दिन तक कल्पवृक्ष नामक महापूजा की थी ।।220।।
At that time, Emperor Vajradanta performed the grand ritual of the Kalpavriksha, a significant worship, in the Mahaputra Chaityalaya for eight days. ||220||
श्लोक ( Shlok ) 221
ततः शुभदिने सौम्ये लग्ने शुभमुहूर्तके । चन्द्रताराबलोपेते तज्ज्ञेः सम्यग्निरूपिते ॥२२१॥
तदनंतर ज्योतिषियों के द्वारा बताया हुआ शुभ दिन शुभ लग्न और चंद्रमा तथा ताराओं के बल से सहित शुभ मुहूर्त आया ।
After that, the auspicious day, favorable timing, and the propitious moment, guided by astrologers and supported by the strength of the moon and stars, arrived.
श्लोक 222 से 231
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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