आचार्य पूज्यपादस्वामी विरचित इष्टोपदेश का आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-फिर भावना करने वाला सोचता है। देहादिक के सम्बन्ध से प्राणियों को क्या होता है? इससे उसे क्या फल मिलता है? उसी समय वह स्वयं ही समाधान भी करता है कि-
दु:खसंदोहभागित्वं, संयोगादिह देहिनाम् त्यजाम्येनं तत: सर्वं, मनोवाक्कायकर्मभि: ॥28॥
अन्वयार्थ (इह) इस संसार में (देहिनाम्) जीवों के (संयोगात्) संयोग से (संदोहभागित्वं) दुःख समूह का भागीदार बनना पड़ता है (ततः) इस कारण (एनं सर्वं) इन सभी [शरीर और कर्म के] संयोग को (मनोवाक्काय-कर्मभिः) मन, वचन, काय की क्रिया/चेष्टा से (त्यजामि) छोड़ता हूँ।
पद्यानुवाद
असहनीय दुःखों का फल है, यह संसारी बना हुआ,
संयोगज भावों का फल है, रागादिक में सना हुआ।
इसी बात को जान मानकर उपकृत हूँ गुरुवचनों से,
रागादिक को पूर्ण त्यागता, तन से, मन से, वचनों से ॥२८॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 28
विवेचना
आज का युग विज्ञान से प्रभावित है, शरीर विज्ञान से भी प्रभावित है। आज न्यूज को सुनते नहीं हैं किन्तु टी० व्ही पर देखते हैं। आज लोग लिपि बदलने लगे, हिन्दी की जगह इंग्लिश और इंग्लिश की जगह हिन्दी का उपयोग करने लगे हैं। आप कहेंगे ज्ञान ही तो बढ़ रहा है। हाँ… हाँ, ज्ञान तो है लेकिन यदि यही ज्ञान अध्यात्म के क्षेत्र में हो तो वह आत्मज्ञान या ध्यान के क्षेत्र में हो तो केवलज्ञान हो सकता है। लेकिन संसारी प्राणी जितना विज्ञान से प्रभावित है उतना अध्यात्म से प्रभावित नहीं है। विज्ञान या शरीर विज्ञान सम्बन्धी जो भी ज्ञान, यंत्र या मशीनरी ज्ञान विकास को प्राप्त हो रहा है वह सब भी एकाग्रता के बिना नहीं होता। यदि यही एकाग्रता सम्यक् भूमिका में हो तो केवलज्ञान या सिद्धि की प्राप्ति हो सकती है।
कोई प्रश्न करता है कि इस वैज्ञानिक युग में जो ज्ञान विकसित हो रहा है उससे अभिप्राय की सिद्धि नहीं होती क्या ? इस प्रश्न का समाधान देते हुए आचार्य महाराज कहते हैं कि पहले यह देखो कि अभिप्राय क्या है? अध्यात्म की दृष्टि से अभिप्राय का अर्थ होता है, राग और द्वेष से बचना। विज्ञान के क्षेत्र में क्या राग-द्वेष से बचा जा रहा है? या राग-द्वेष से बचने का एक भी प्रयास किया जा रहा है क्या? सही-सही बताओ। यदि राग-द्वेष से नहीं बचा जा रहा है तो अभिप्राय की सिद्धि कभी भी संभव नहीं हो सकती।
यह निश्चित बात है कि एकाग्रता के बिना कोई भी वस्तु का अविष्कार नहीं हो सकता लेकिन प्रयोजन का ध्यान तो रखना ही चाहिए। किसी भी आविष्कार का उद्देश्य क्या है? यह तो ख्याल में होना ही चाहिए। उद्देश्य के आधार से ही अभिप्राय की सिद्धि होती है। अभिप्राय की सिद्धि नहीं होने पर यह जीव दुःखी होता है।
संसारी प्राणी शरीरादिक के संयोग के अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करता है। शारीरिक दुःख भी होते हैं, मानसिक दुःख भी होते हैं, वाचनिक दुःख भी होते हैं। इन समस्त दुःखों का मूल कारण पर पदार्थों का संयोग है और संयोग का मूल कारण मोह है, अज्ञान है। मोह के कारण ही संसारी प्राणी इस संयोग को, जो दुःख का कारण है, छोड़ना नहीं चाहता। शरीर का संयोग दुःख का परिणाम है यदि वह छूटने लग जाता है तो आपको दुःख होता है, उसका छूटना आपको इष्ट नहीं लगता। जब तक शरीर का छूटना हमें इष्ट नहीं होगा तब तक शरीर का संयोग तीन काल में कभी भी छूट नहीं सकता।
संसार का अर्थ ही है आत्मा और शरीर का गठबन्धन। चौदहवें गुणस्थान तक यह गठबन्धन रहता है। आत्म-परिणामों के विकास के सोपानों का नाम गुणस्थान माना जाता है, जो कि मोह और योग के निमित्त से होते हैं। चौदहवाँ गुणस्थान विकास का अंतिम सोपान है, फिर भी वह संसार के अन्तर्गत आता है, क्योंकि गुणस्थान में रहना स्वभाव नहीं है। स्वभाव तो गुणस्थान तथा मार्गणाओं से अतीत होता है। वहाँ पूर्वबद्ध कर्म सत्ता में हैं, उदय में भी हैं। लेकिन नवीन आस्त्रव और बन्ध वहाँ नहीं होता। नवीन बन्ध नहीं है यह तो ठीक है, लेकिन पूर्व का कर्म तथा नोकर्म के साथ जो गठबन्धन है वह तो है, उससे जब तक नहीं छूटता तब तक मुक्त नहीं हो सकता।
अतः संसारी प्राणी को समझ लेना चाहिए कि शरीर का संयोग मेरे लिए दुःख का मूल कारण है फिर भी यदि वह शरीर के माध्यम से सुख चाहता है या शरीर के संयोग से सुख का अनुभव करता है या शरीर को सुख का कारण मानता है तो इसका मतलब है कि वह आत्म-सुख के परिचय से वंचित है। उसे शरीर से छूटना इष्ट नहीं है। वह शरीर के छूटने को अपना मरण समझता है। जबकि आचार्य महाराज समझा रहे हैं कि शरीर के छूटने को अपनी मृत्यु मत समझो, किन्तु शरीर की मृत्यु से मेरी मृत्यु नहीं है, ऐसा समझो तो अभिप्राय सिद्ध हो सकता है। आज तक यह धारणा बनी हुई है कि शरीर के बिना सुख का अनुभव नहीं हो सकता, तो उसके लिए यहाँ आगे की कारिका में कहा जा रहा है।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 28
इष्टोपदेश गाथा 28 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (इह) इस संसार में (देहिनाम्) जीवों को (संयोगात्) संयोग से (दुःखसंदोहभागित्वं) दुःख समूह का भागीदार बनना पड़ता है (ततः) इस कारण (एनं सर्वं) इन सभी [शरीर और कर्म के] संयोग को (मनोवाक्कायकर्मभिः) मन, वचन, काय की क्रिया से (त्यजामि) छोड़ता हूँ।
भावार्थ – संसार के सभी तरह के दुःख शरीर के कारण आत्मा को होते हैं। यदि शरीर का संयोग आत्मा से न हो तो आत्मा को भूख, प्यास, जन्म, मरण, रोग, पीड़ा, शोक, चिन्ता आदि किसी भी तरह का कोई दुःख न हो। जैसे आग में तपा हुआ लोहा आग के संयोग से घन (भारी हथौड़ा) की मार सहता है, उसी प्रकार यह आत्मा भी शरीर के संयोग से सब तरह के दुःख उठाता है। इस कारण दुःखों से छूटने के लिए आत्मा का अनुभवी सम्यग्दृष्टि जीव अपने मन से, वचन से और शरीर से इस शारीरिक संयोग को छुड़ाने का प्रयत्न करता है। अर्थात् मन, वचन और काय की गुप्ति द्वारा अपने शुद्ध आत्मा का ध्यान करता है।
उत्थानिका फिर भावना करने वाला सोचता है कि पुद्गल (शरीरादिक) रूपी मूर्तद्रव्य के साथ जैसा कि आगम में सुना जाता है जीव का सम्बन्ध है। उस सम्बन्ध के कारण ही जीव का मरण व रोगादिक होते हैं तथा मरणादि सम्बन्धी बाधाएँ भी होती हैं। तब इन्हें कैसे व किस भावना से हटाया जावे ? वह भावना करने वाला स्वयं ही समाधान कर लेता है –
स्वाध्याय गाथा सं 26 to 29
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