भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण द्वितीयं पर्व Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्लोक 1 से 10 गौतम से प्रश्न और उनकी महिमा
ग्रंथकर्ता वृषभदेव को नमस्कार कर पुराण का विस्तार करता है। श्रेणिक ने गौतम से धर्म का स्वरूप पूछा। वे महावीर से सुना पुराण ग्रंथरूप में सुनना चाहते हैं। गौतम अकारण बंधु और वैद्य हैं। उनकी किरणें अभिषेक-सी हैं। वे सूर्य-से जगत को प्रबोधित करते हैं। उनकी वचन-किरणें अज्ञान नष्ट करती हैं। उनकी बुद्धि अग्नि-शिखाओं-सी है। समवसरण तपोवन-सा पवित्र है।
श्लोक 11 से 20 समवसरण की शोभा
समवसरण में पशु धन्य और पुष्ट हैं। हरिण अमृत-सा जल पीते हैं। हथिनियाँ सिंह के बच्चों को दूध पिलाती हैं। हरिण मुनियों-से चरणों का आश्रय लेते हैं। वृक्ष फल-पुष्पों से शोभित हैं। लताएँ कर-बाधा से मुक्त हैं। तपोवन दयावन-सा आनंदित करता है। दिगंबर तपस्वी मोक्षमार्ग की उपासना करते हैं। गौतम का माहात्म्य प्रकट है। वे तीनों लोकों को जानते हैं।
श्लोक 21 से 30 श्रेणिक की प्रार्थना
श्रेणिक ने अज्ञानवश पाप किए। उन्होंने हिंसा, झूठ आदि से घोर पाप संचित किए। मुनि-वध में आनंद लिया। वे पुराण सुनकर पाप-निराकरण चाहते हैं। दांतों की कांति से स्तुति कर चुप हुए। मुनियों ने श्रेणिक की प्रशंसा की। वे प्रश्न में श्रेष्ठ हैं। उन्होंने चित्त हर्षित किया। वे वही पुराण पूछते हैं जो मुनि चाहते थे। श्रेणिक का प्रश्न पुराण पूछने वालों से मेल खाता। धर्म स्वरूप जानने से संसार स्वरूप की इच्छा प्रकट की।
श्लोक 31 से 40 धर्म का माहात्म्य
श्रेणिक ने धर्म जानकर संसार जानना चाहा। धर्म वृक्ष है, अर्थ फल और काम रस है। धर्म से अर्थ, काम, स्वर्ग मिलते हैं। धर्म कामधेनु और कल्पवृक्ष है। यह संकटों से बचाता है। विचार, ज्ञान से इसका माहात्म्य जाना जाता है। यह नरक से रक्षा कर मोक्ष देता है। पुराण ही धर्म है। इसमें क्षेत्र, काल, तीर्थ, सत्पुरुष, और चेष्टाएँ हैं। श्रेणिक ने प्रश्न में पुराण का अर्थ समाविष्ट किया।
श्लोक 41 से 50 प्रश्न की महत्ता
श्रेणिक का प्रश्न सरल पर गंभीर और तत्त्वपूर्ण है। भरत और सगर ने भी यही पूछा था। श्रेणिक ने परंपरा सुशोभित की। वे प्रश्नकर्ता, महावीर उत्तरदाता, और मुनि श्रोता हैं। गौतम पुराण कहें। मुनि गौतम की स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति आश्चर्यकारी है। वे चौदह पूर्वों के पारगामी हैं। उनकी कीर्ति चंद्र-सी है।
श्लोक 51 से 60 गौतम की स्तुति
गौतम महायोगी और संघाधिपति हैं। वे उत्कृष्ट वाणी जानते हैं। नाम “गौतम” सार्थक (उत्कृष्ट वाणी जानने वाला)। इंद्रभूति (विभूति प्राप्त), और बुद्ध कहलाते हैं। उनकी ज्ञान-ज्योति अनोखी है। उनकी दीपिका संसार प्रकाशित करती है। उनके वचन मिथ्यात्व नष्ट करते हैं। उनकी प्रज्ञा नदी-सी है, द्वादशांग जहाज। उन्होंने श्रुतज्ञान अवतरित किया। वे दो ज्ञानों से श्रुतकेवली हैं।
श्लोक 61 से 70 गौतम के गुण
गौतम से मोक्ष द्वार की प्रार्थना। वे ब्रह्मसुत, सिद्ध पद अधीन। मुनि सम्यग्दर्शन आदि की उपासना करते। गौतम को बार-बार नमस्कार (महायोगी, बुद्धिमान, रक्षक, ऋद्धि धारक)। अवधिज्ञान, कोष्ठबुद्धि, बीजबुद्धि, पदानुसारी, संभिन्नश्रोतृ ऋद्धियाँ धारक। ऋजुमति, विपुलमति, प्रत्येक बुद्ध। दश पूर्व धारक, तपस्वी, ब्रह्मचारी, तेजस्वी।
श्लोक 71 से 80 गौतम की ऋद्धियाँ
गौतम आठ विक्रिया ऋद्धियों से युक्त हैं। वे आमर्ष, क्ष्वेल आदि ऋद्धियों से सुशोभित हैं। वे रस और बल ऋद्धियों से संपन्न हैं। वे चारण और अक्षीण ऋद्धियों के धारक हैं। वे परम हितकारी और गुरु हैं। उनकी सेवा से ज्ञान मिलता है। वे धर्मशास्त्र वर्णन करते हैं। उनकी स्तुति से गुप्तियाँ भंग होती हैं। वे शलाकापुरुषों का पुराण सुनाएँ।
श्लोक 81 से 95 गौतम का संबोधन
मुनियों की स्तुति से कोलाहल हुआ। गौतम प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रार्थना पर ध्यान दिया। श्रोता चुपचाप बैठे। गौतम गंभीर वाणी से बोले। उनकी किरणें सरस्वती-सी थीं। वे भक्ति से रत्न दिखाते थे। तप माहात्म्य से शोभित। बिना परिश्रम सरस्वती प्रकट।वे वैराग्य और विनय प्रकट करते थे।
श्लोक 96 से 105 पुराण का प्रारंभ और अनुयोग
गौतम स्वामी ने भव्यजनों से पुराण सुनने को कहा। उन्होंने वृषभदेव द्वारा भरत को कहा पुराण श्रेणिक के लिए कहा। श्रुतस्कंध के चार अनुयोग हैं। प्रथमानुयोग में सत्पुरुषों का चरित्र है। करणानुयोग में लोकों का वर्णन है। चरणानुयोग में चारित्र-शुद्धि है। द्रव्यानुयोग में द्रव्यों का निर्णय है। उपक्रम के पाँच भेद हैं। प्रथमानुयोग पहला और अंतिम दोनों हो सकता है।
श्लोक 106 से 115 ग्रंथ का प्रमाण
नाम उपक्रम प्रथमानुयोग का पहला भाग है। ग्रंथ-विस्तार के भय से प्रमाण बताया गया। प्रथमानुयोग शब्दों से परिमेय है। इसमें 2554423107500 अनुष्टुप् श्लोक हैं। पदों की संख्या 5000 और अक्षर 16348307888 हैं। यह द्रव्यश्रुत का प्रमाण है। द्वादशांग इसका अभिधेय है।
श्लोक 116 से 125 पुराण का अभिधेय
पुराण से सुभाषित रत्न उत्पन्न होते हैं। इसमें तीर्थंकरों और मुनियों की संपदा का वर्णन है। जीव, बंध, मोक्ष, द्रव्य, और पदार्थ इसमें हैं। तीनों लोक और काल का संग्रह है। सत्यदर्शन, मोक्ष, और पुरुषार्थ इसमें हैं। यह समस्त धर्म-सृष्टि को वर्णित करता है। यह कसौटी-सा पदार्थों की परीक्षा करता है। इसमें 63 अधिकार हैं।
श्लोक 126 से 135 अधिकारों का विस्तार
पुराण के 63 अधिकार हैं। अवांतर अधिकार अमर्यादित हैं। कुछ आचार्य 24 तीर्थंकरों के पुराण मानते हैं। ये वृषभनाथ से महावीर तक हैं। यह समूह महापुराण है। अवसर्पिणी युग के अंत में यह अल्प होगा।
श्लोक 136 से 145 पुराण का प्रकाश
दुःषम काल में बुद्धि और पुराण घटेंगे। सुधर्माचार्य और जंबूस्वामी इसे पूर्ण प्रकाशित करेंगे। तीन श्रुतकेवली 62 वर्ष तक रहेंगे। इसके बाद 100 वर्ष में पाँच आचार्य ग्यारह अंग और चौदह पूर्व धारण करेंगे। फिर 183 वर्ष तक ग्यारह आचार्य दश पूर्व धारक होंगे।
श्लोक 146 से 155 पुराण का ह्रास
220 वर्ष तक पाँच मुनि ग्यारह अंग धारक होंगे। पुराण तीन चतुर्थांश रहेगा। फिर चार आचार्य एक चौथाई धारण करेंगे। 683 वर्ष बाद पुराण घटेगा। जिनसेन जैसे कवि इसे स्मरण करेंगे। वर्धमान का पुराण ही प्रामाणिक है। पंचपरमेष्ठियों का नाम पवित्र करता है।
श्लोक 156 से 162 कथा की शुरुआत
भव्यजनों को पुराण में अवगाहन करना चाहिए। वृषभनाथ का पुराण पहले कहा जाएगा। इसमें काल, कुलकर, वंश, और निर्वाण हैं। यह उपोद्धात है। सभा श्रेणिक के साथ सुनने को सावधान हुई। यह पुराण पाप धोकर शुद्धि देता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 2 Shlok 1 to 10
भगवान वृषभदेव को नमस्कार कर उनके महापुराण के उपोद्धात का विस्तार शुरू। श्रेणिक महाराज ने गौतम स्वामी से धर्म का स्वरूप पूछा। वे महावीर स्वामी से सुने पुराण को ग्रंथरूप में सुनना चाहते हैं। गौतम को अकारण बंधु और संसार के वैद्य कहा। उनके चरणों की किरणें अभिषेक समान, तप से उनकी आभा सूर्य जैसी। वे अज्ञान निद्रा से जगत को जागृत करते हैं और वचन किरणों से अंधकार नष्ट करते हैं। उनकी बुद्धि सात ऋद्धियों से अग्नि शिखा समान है। समवसरण पुण्य आश्रम और तप लक्ष्मी का रक्षावन है।
श्लोक ( Shlok ) 1
तमादिदेवं देवानामधिदेवं स्वयंभुवम् । प्रणम्य तत्पुराणस्य बच्च्युपोद्घात विस्तरम् ॥ १ ॥
अब मैं देवाधिदेव स्वयंभू भगवान् वृषभदेव को नमस्कार कर उनके इस महापुराण-संबंधी उपोद्धात-प्रारंभ का विस्तार के साथ कथन करता हूँ ।।1।।
Now, I offer my salutations to Lord Rishabhadeva, the self-existent and supreme among gods, and begin narrating the introduction to this great Purana in detail. ||1||
श्लोक ( Shlok ) 2
अथातो धर्मजिज्ञासासमाहित मतिः कृती । श्रेणिकः परिपप्रच्छ गौतमं गणभृत्प्रभुम् ॥ २ ॥
अथानंतर धर्म का स्वरूप जानने में जिसकी बुद्धि लग रही है, ऐसे बुद्धिमान् श्रेणिक महाराज ने गणनायक गौतम स्वामी से पूछा ।।2।।
Thereafter, the wise King Shrenik, who was intent on understanding the nature of Dharma, asked Gananayaka Gautama Swami. ||2||
श्लोक ( Shlok ) 3
भगवन्नर्थतः कृत्स्नं श्रुतं स्वायंभुवान्मुखात् । ग्रन्थतः श्रोतुमिच्छामि पुराणं त्वदनुग्रहात् ।। ३ ।।
हे भगवत् श्रीवर्द्धमान स्वामी के मुख से यह संपूर्ण पुराण अर्थरूप से मैंने सुना है अब आपके अनुग्रह से उसे ग्रंथरूप से सुनना चाहता हूँ ।।3।।
O Lord! I have heard the complete Purana in its essence from the divine words of Shri Vardhamana Swami. Now, by your grace, I wish to listen to it in its textual form. ||3||
श्लोक ( Shlok ) 4
स्वमकारणबन्धुर्नस्स्वमकारणवत्सलः । त्वमकारणवैद्योऽसि दुःखातङ्कार्तितात्मनाम् ॥ ४ ॥
हे स्वामिन् आप हमारे अकारण बंधु है, हम पर बिना कारण के ही प्रेम करने वाले हैं तथा जन्म-मरण आदि दु:खदायी रोगों से पीड़ित संसारी प्राणियों के लिए अकारण-स्वार्थरहित वैद्य हैं ।।4।।
O Lord, you are our unconditional benefactor, loving us without any reason. You are the selfless healer for worldly beings afflicted by the painful ailments of birth, death, and other sufferings. ||4||
श्लोक ( Shlok ) 5
पुण्याभिषेकमभितः कुर्वन्तीव शिरस्सु नः । व्योमगङ्गाम्बुसच्छाया युष्मत्पादनखांशवः ॥ ५ ॥
हे देव, आकाशगंगा के जल के समान स्वच्छ, आपके चरणों के नखों की किरणें जो हमारे शिर पर पड़ रही हैं वे ऐसी मालूम होती हैं मानो मेरा सब ओर से अभिषेक ही कर रही हों ।
O Lord, the rays from the nails of your feet, as pure and clear as the waters of the Milky Way, fall upon my head, appearing as though they are performing my consecration from all directions.
श्लोक ( Shlok ) 6
तव दीसतपोलब्धें रङ्गलक्ष्मीः ‘प्रतायिनी । अकालेऽप्यनुसंधत्ते सान्द्रबालातपश्रियम् ॥ ६ ॥
हे स्वामिन्, उग्र तपस्या की लब्धि से सब ओर फैलने वाली आपके शरीर की आभा असमय में ही प्रातःकालीन सूर्य की सांद्र-सघन शोभा को धारण कर रही है ।।6।।
O Lord, through the attainment of intense penance, the radiance of your body, spreading in all directions, embodies the dense and profound brilliance of the morning sun, even before its usual time. ||6||
श्लोक ( Shlok ) 7
स्वया जगदिदं कृत्स्नम विद्यामीलितेक्षणम् । सद्यः प्रबोधमानीतं भास्वतेवाग्जिनीवनम् ॥ ७
हे भगवन् जिस प्रकार सूर्य रात में निमीलित हुए कमलों को शीघ्र ही प्रबोधित-विकसित कर देता है उसी प्रकार आपने अज्ञान रूपी निद्रा में निमीलित-सोये हुए इस समस्त जगत को प्रबोधित-जागृत कर दिया है ।।7।।
O Lord, just as the sun quickly awakens and blossoms the closed lotuses during the night, in the same way, you have awakened this entire world, which was immersed in the slumber of ignorance. ||7||
श्लोक ( Shlok ) 8
यश्चेम्युकिरणैः स्पृष्टमनालीढं रवेः करैः । तत्रया हेलयोद स्तमन्तर्ध्वान्तं वचोऽशुभिः ॥ ८॥
हे देव, हृदय के जिस अज्ञानरूपी अंधकार को चंद्रमा अपनी किरणों से छू नहीं सकता तथा सूर्य भी अपनी रश्मियों से जिसका स्पर्श नहीं कर सकता उसे आप अपने वचनरूपी किरणों से अनायास ही नष्ट कर देते हैं ।।8।।।
O Lord, the darkness of ignorance in the heart, which neither the moon can touch with its rays nor the sun with its beams, is effortlessly dispelled by your words, which shine like radiant rays. ||8||
श्लोक ( Shlok ) 9
तवोच्छिखाः स्फुरन्येता योगिन् सप्त महर्द्धयः । कर्मेन्धनदहोहीप्ताः सप्तार्चिष इवार्चिषः ॥ ९
हे योगिन्, उत्तरोत्तर बढ़ती हुई आपकी यह बुद्धि आदि सात ऋद्धियों ऐसी मालूम होती हैं मानो कर्मरूपी ईंधन के जलाने से उद्दीप्त हुई अग्नि की सात शिखाएँ ही हों ।।9।।
O Yogi, your progressively increasing seven perfections, such as intellect, appear as though they are the seven flames of a blazing fire, ignited by burning the fuel of karma. ||9||
श्लोक ( Shlok ) 10
इदं पुण्याश्रमस्थानं पवित्रं त्वत्प्रतिश्रयात् । रक्षारण्यमिवाभाति तपोख्क्ष्क्ष्या निराकुलम् ॥१०॥
हे भगवन् आपके आश्रय से ही यह समवसरण पुण्य का आश्रम स्थान तथा पवित्र हो रहा है अथवा ऐसा मालूम होता है मानो तपरूपी लक्ष्मी का उपद्रवरहित रक्षावन ही हो ।।10।।
O Lord, it is through your refuge that this Samavasaran becomes a place of virtuous sanctity, or it seems as though it is the protective forest, free from disturbances, of the goddess of penance, Lakshmi. ||10||
श्लोक 11 से 20
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155 | श्लोक 156 से 162
पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71
Download PDF
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
Front Desk Jainism Forum (FDJF)
FAIR USE DECLARATION
This information is provided by the Front Desk Jainism Forum (FDJF) under Fair Use guidelines for educational and research purposes. To the best of our knowledge, it is in the public domain, and our goal is to make it more accessible.
If you are the intellectual property owner and have concerns, please contact us, and we will address the matter promptly. Users are advised to verify legal use in their jurisdiction before accessing this material. For more details, visit our website.