आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-आचार्य आगे के श्लोक में शत्रुओं के प्रति होने वाले भावों को “ये हमारे शत्रु हैं”,’ अहितकर्ता हैं’ आदि अज्ञानपूर्ण बतलाते हुए उसे दृष्टान्त द्वारा समझाते हैं। साथ ही ऐसे भावों को दूर करने के लिए प्रेरणा भी करते हैं-
विराधकः कथं हन्त्रे जनाय परिकुप्यति । त्र्यङ्गुलं पातयन् पद्भ्यां स्वयं दण्डेन पात्यते ॥१०॥
अन्वयार्थ – (विराधकः) अपकार करने वाला मनुष्य (हन्त्रे जनाय) मारने वाले मनुष्य के लिए (कथं परिकुप्यति) क्यों क्रोध करता है (त्र्यङ्गुलं) तीन अँगुली वाले उपकरण को (पद्भ्यां) पैरों के द्वारा (पातयन्) गिराता हुआ मनुष्य (स्वयं दण्डेन) स्वयं लकड़ी के बेंट (डंडे) द्वारा (पात्यते) गिराया (झुकाया) जाता है।
हत्यारा यदि हत्या करता, तुम क्यों? उस पर क्रोध करो,
हत्यारे तो तुम भी हो फिर, कुछ तो मन में बोध धरो।
त्र्यंगुल को निज पैरों से जो, कोई मानव गिरा रहा,
उसी समय पर उसी दण्ड से, स्वयं धरा पर गिरा अहा ॥१०॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 10
विवेचना
उक्त कारिका में यह कहा जा रहा है कि तुम अपने आवेग को दूसरों के ऊपर थोपना चाहते हो, यह तुम्हारा कितना अज्ञान है? दूसरा कोई मारने के लिए आता है उसे देखकर तुम उसे मारने के लिए आवेश में आ जाते हो, यह कितना विस्मयकारी दृश्य है, या कितना अज्ञानपूर्ण दृश्य है? क्यों तैयार हो जाते हो उसे मारने के लिए? आचार्य कहते हैं कि संसारी प्राणी कषाय के आवेग में मात्र उपरिल शरीरगत चेष्टा देखकर ऐसा करने को तैयार हो जाता है। उसकी आत्मा के साथ उसका कोई परिचय नहीं होता है। शारीरिक चेष्टा को देखकर उसे वैरी के रूप में समझकर सभी एक दूसरे को मरने मारने को तैयार हो जाते हैं। जबकि निश्चय से देखा जाये तो मूलतः कोई किसी का वैरी नहीं है, यह तो मोह के कारण ऐसा होता है। उदाहरण के तौर पर जैसे-मान लो कोई रोगी है वह अस्पताल में भरती हो गया, पेट की पीड़ा उसे सता रही है, डॉक्टर अभी तक आया नहीं है, प्रतीक्षा में है, समय होने पर जब डॉ० आता है, हाथ पकड़ता है, तो हाथ दे देता है, पैर पकड़ता है तो पैर दे देता है, कभी कभी पीड़ा के कारण हाथ से या लात से मार भी देता है, तो भी डॉ० या वैद्य उस पर गुस्सा नहीं करते। क्यों नहीं करते ? क्योंकि वे समझते हैं कि व्यक्ति रोगी है। रोग के कारण प्रहार कर रहा है। लेकिन जब वैद्य की औषधि सेवन करने से स्वस्थ हो जाता है, तब उसे अपनी गलती का भान होता है तो वैद्य के चरणों में गिरता है, क्षमा मांगता है और कहता है कि डॉ. साहब आपने बड़ा उपकार किया, हमने तो आपको हाथ भी मारा, लात भी मारी थी। डॉ० साहब कहते हैं कि- तुमने नहीं, रोग ने लात मारी थी मुझको भी गुस्सा आ गया तो मैंने भी लात पकड़ी और चिकित्सा चालू कर दी। चिकित्सा करके रोग निकाल दिया। वह रोगी कहता है कि- डॉ० साहब, आपने बहुत अच्छा किया। आपने दोनों अच्छे काम कर दिए। हमारे दोनों काम हो गये। कौन से काम हो गये ? एक तो शरीर की चिकित्सा हो गई और क्रोध को जीतने की कला भी मुझको प्राप्त हो गई। “एक पंथ दो काज” हो गये। डॉ० कभी मरीज को लात नहीं मारता, वह तो शान्त भाव से चिकित्सा करता है। कोई-कोई रोगी हाथ-पांव तो नहीं मारते, लेकिन डॉ० साहब को गाली देते हैं। कोई-कोई मरीज डॉ० साहब के बारे में गलत सोचता है, दुर्व्यवहार करता है तो उस समय भी डॉ० साहब यह सोचते हैं कि इसकी कोई गलती नहीं है, यह तो इसका रोग बोल रहा है अथवा दुर्व्यवहार कर रहा है। इसी प्रकार अपने साथ यदि कोई गलत चेष्टा करता है, गाली देता है, गलत सोचता है तो अपने को यह विचार करना चाहिए कि इसमें इनकी कोई गलती नहीं है, यह तो हमारे कर्म का उदय है। “विराधकः कथं हंत्रे जनाय परिकुप्यति” अतः कोई अपने ऊपर प्रहार करने आ रहा हो, मारने के लिए भी आया हो तो उसके ऊपर क्रोध करना ठीक नहीं है। ठीक क्यों नहीं है? इसलिए ठीक नहीं है कि क्रोध के कारण वह स्वयं अपने को पुनः कर्म में फंसा रहा है। “अपने ऊपर स्वयं अपने हाथ से कुल्हाड़ी मार रहा है” कहते भी हैं कि “अपने भावों के द्वारा जीव स्वयं अपना ही अहित और हित करता है”। ऐसा उदाहरण देकर संसारी प्राणी को आचार्य पूज्यपाद स्वामी ने सचेत अथवा सावधान किया है।
‘त्र्यंगुलं पातयन् पद्भ्यां’ त्र्यंगुल खलिहान में होता है। किसान धान को साफ करता है उस समय इसका प्रयोग करता है। जिस प्रकार त्र्यंगुल नामक यंत्र को यदि कोई स्वयं अपने पैरों से जमीन पर गिराता है तो वह बिना किसी की प्रेरणा के, हाथ में पकड़े हुए डण्डे से गिरा दिया जाता है। उसी प्रकार जिसने पहले दूसरे को सताया, कष्ट दिया, तकलीफ पहुँचाई, ऐसा सताये गये उस पुरुष और वर्तमान में अपने को मारने वाले के प्रति क्यों गुस्सा करता है? अतः अहित करने वाले व्यक्ति के प्रति, अपना हित चाहने वाले बुद्धिमानों को द्वेष या अप्रीति नहीं करना चाहिए क्योंकि द्वेष करने से सामने वाले पर कोई प्रभाव पड़े या नहीं, किन्तु द्वेष करने वाले पर तो प्रभाव पड़ता ही है। आप इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे आप रिक्शा चलाते हैं जो तीन पैर का होता है, उसमें से यदि एक पैर निकल जाता है तो आप क्या करोगे? क्या स्थिति होगी आपकी ? लुढ़क जाओगे, नीचे गिर जाओगे। और यदि स्वयं अपने द्वारा पैर को निकालोगे तो स्वयं गिरने में स्वयं ही कारण बनोगे। उसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति क्रोध करता हुआ अपने पास आये और हम भी उस पर क्रोध करें तो यह समझना कि मेरे क्रोध करने से उसको कोई हानि होगी या नहीं। हो सकता है उसे कोई हानि न हो, लेकिन हम क्रोध के प्रभाव से स्वयं कर्मों का बन्ध कर लें आये और हम भी उस पर क्रोध करें तो यह समझना कि मेरे क्रोध करने से उसको कोई हानि होगी या नहीं। हो सकता है उसे कोई हानि न हो, लेकिन हम क्रोध के प्रभाव से स्वयं कर्मों का बन्ध कर लेंगे जिसका फल भोगने के लिए दुर्गति का पात्र बनना पड़ेगा। दूसरे के भाव करने से सामने वाले का मरण हो, न भी हो, उसका कुछ बिगड़े या नहीं लेकिन भाव करने वाले को इस प्रकार के कर्मबन्ध हो जाते हैं कि जिनका फल भोगते समय आँखों से पानी आता है। कितना भी रोओ कर्मों के सामने, कर्म कुछ भी दया नहीं करता। अशुभ विचारों के समय यदि आयुकर्म बन्ध गया तो और मुश्किल क्योंकि अन्य कर्मों का तो संक्रमण किया जा सकता है। असाता को साता में परिवर्तित कर सकते हैं लेकिन “आयुकर्म ऐसा कर्म है कि आप जैसे हैं वैसा आपको दिखा देता है, उसे चाहकर भी, पश्चाताप करने पर भी बदला नहीं जा सकता। कहने का मतलब यह है कि जो जीवन पर्यन्त अच्छे भाव करेगा तो उसके खाते में शुभ/पुण्य कर्म आयेंगे और जो हमेशा बुरे विचार करेगा तो उसके खाते में अशुभ/पाप कर्म आयेंगे। यह निश्चित बात है।
आगे इसी को दूसरे उदाहरण के द्वारा समझने का प्रयास करें। जैसे कोई व्यक्ति अपना फोटो/ चित्र निकलवाना चाहता है तो फोटोग्राफर को बुलाता है, फोटोग्राफर उस व्यक्ति का सुन्दर चित्र निकालने के लिए संकेत करता है कि भाई साहब! ऐसे बैठ जाओ, ऐसे आसन लगाओ, गर्दन नीचे करो, हाथ इधर रखो, ऐसा करो, वैसा करो, १०-१५ मिनट या आधा घंटे भी लगा दे सावधान करते-करते और जिस समय बटन दबाता है, वन, टू, श्री कह देता है उसी समय वह मुख पर (यूँ- यूँ) खुजा लेता है या जमाई आ जाती है या छींक आ जाये, या गहरी श्वास ले ले या और कुछ हो जाये और उसी समय फोटो निकल जाये तो कैसा चित्र निकलेगा ? उस समय जैसी स्थिति रहती है, वैसा ही निकलता है। फोटो निकलने के बाद उसे देखने का भाव रहता है कि जल्दी-जल्दी धोकर दिखा दो। तैयार करके जब दिखाया जाता है, तो देखकर वह कहता है कि यह मेरा चित्र ऐसा है। नहीं-नहीं! यह अच्छा नहीं निकाला। उस चित्र को देकर फोटोग्राफर उससे ५० रुपये मांगता है। तब वह कहता है कि इसके तो पचास क्या, मैं तो पचास पाई भी नहीं दूँगा। फोटोग्राफर कहता है पैसे तो तुम्हें इतने ही देना पड़ेंगे। तुम्हें अपना चित्र लेना है तो ले लो अन्यथा मैं अपने पास रख लेता हूँ लेकिन पैसे तो देना ही पड़ेंगे। वह व्यक्ति कहता है कि तुमने इतना बुरा चित्र क्यों निकाला ? फोटोग्राफर कहता है कि हमने तो वार्निंग दी थी, आपको सचेत भी किया था। बटन दबाते समय तुम्हें अपनी स्थिति सम्हालना थी। हम कहाँ तक सम्हालते ?
आचार्य कहते हैं कि फोटो के समान ही कर्मों की स्थिति भी ऐसी ही होती है। फोटो निकलने के बाद उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है, वैसे ही जैसा कर्मबन्ध हो चुका उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। जिस समय परिणामों के अनुसार जैसी आयु बंध गई, उसके उदय में उसी गति में निश्चित जाना पड़ेगा। जैसे-तिर्यञ्च आयु का बन्ध हो गया तो तिर्यञ्च गति में जाना पड़ेगा। नरकायु बन्धेगी तो नरक गति में जाना पड़ेगा, मनुष्यायु बन्धेगी तो मनुष्य, देवायु का बन्ध हो तो देव बनना ही पड़ेगा। आयु कर्म में किसी भी प्रकार कुछ भी परिवर्तन संभव नहीं होता। स्थिति कम या अधिक हो सकती है। कोई यदि यह पूछे कि महाराज! हमको आयु कर्म का बन्ध कब होगा ? आप यह तो बता दीजिए ताकि हम सावधान रहें, होशियार रहें। इस विषय में तो आपको “जीवन के आदि से अन्त तक होशियार रहना पड़ेगा” आपने पूछा, मैंने बता दिया, अब आप मान लीजिये अर्थात् हमेशा सावधान रहिये।
इसे एक उदाहरण के द्वारा समझाता हूँ। मान लीजिये किसी की ८१ वर्ष की उम्र है, तो ५४ वर्ष तक तो आयु कर्म का बन्ध होगा ही नहीं। फिर कब होगा? ऐसा जानने के लिए यदि वह कोई यंत्र पर खड़ा हो जाये, तो मालूम पड़ जाये। जैसे वजन नापना हो तो मशीन पर खड़े होने से पता चल जाता है। इसी प्रकार आयु किस समय बंधती है यह जानकारी लेने के लिए कोई यंत्र या मशीन सफल नहीं हो सकती। किसी भी व्यक्ति की आयु कितनी है? यह जानने के लिए अथवा आयु बन्ध कब होता है? यह जानने के लिए आज तक कोई यंत्र नहीं बना है और न ही बन सकेगा। इसे तो अवधिज्ञानी ही जान सकते हैं। परन्तु आज तो कोई अवधिज्ञानी मुनिराज भी नहीं हैं जिनसे यह ज्ञात किया जा सके। आयु कर्मबन्ध का काल इतना सूक्ष्म है कि हमें वह समझ में नहीं आ सकता। ५४ वर्ष आयु व्यतीत होने पर आयु बन्ध के ८ त्रिभाग पड़ेंगे। इनमें से किसी भी त्रिभाग में बन्ध हो सकता है। इनमें भी यदि बन्ध नहीं हुआ तो मरण के अंतिम अन्तर्मुहूर्त जिसे ‘असंक्षेपाद्धा काल’ कहते हैं उसमें बन्ध निश्चित ही होता है, क्योंकि आयु कर्मबन्ध के बिना जीव कहाँ जायेगा ? पेट्रोल के बिना गाड़ी कैसे आगे बढ़ेगी? गाड़ी को फिर भी धक्के से थोड़ा आगे बढ़ाया जा सकता है लेकिन आयुबन्ध के बिना जीव किसी भी गति में नहीं जा सकता। इसलिए यदि आयु के त्रिभाग में आयु नहीं भी बँधेगी तो अंतिम अन्तर्मुहूर्तकाल में तो आयु बँधेगी ही बँधेगी।
भरत चक्रवर्ती और बाहुबली दोनों को अवधिज्ञान था लेकिन दोनों का ही ज्ञान काम में नहीं आया। चक्र चलने के उपरान्त उसका परिणाम क्या निकलेगा, यह भी नहीं जान पाये। सोचने की बात है कि वृषभनाथ भगवान् भी एक वर्ष तक बिना आहार के घूमते रहे फिर भी चक्रवर्ती ने अवधिज्ञान नहीं लगाया कि ये क्यों आते हैं? क्यों घूमकर चले जाते हैं? सोचिये, विचार करिये कि चक्रवर्ती को भी यह ज्ञान नहीं था कि महाराज को किस प्रकार पड़गाहन किया जाता है? आप लोग भरत चक्रवर्ती से भी ज्यादा होशियार हैं कि आपके यहाँ से महाराज लौटने भी लग जायें तो आप लोग उन्हें बिठा लेते हैं लेकिन वृषभनाथ भगवान् को कौन इस प्रकार बिठा सकता था। भरत चक्रवर्ती ने अनुमान तक नहीं लगाया कि महाराज क्यों लौट रहे हैं? क्या चाहते हैं?
महापुराणकार ‘आचार्य जिनसेन स्वामी’ ने तो इतना अधिक सर्वांगीण वर्णन किया है कि आप पढ़ेंगे तो आपकी आँखों में पानी आ जाये। क्या स्थिति है? ३७३ दिन तक आहार नहीं हुआ। ६ माह तक तो उठे नहीं तदुपरान्त श्रावक के घर की ओर आये भी तो पड़गाहन करने की विधि से कोई परिचित नहीं था। सब सोचते रह जाते कि आखिर अपनी क्या गलती हो रही है जो भगवान् के आहार नहीं हो पा रहे हैं, प्रतिदिन गलती हो रही है। वृषभनाथ भगवान् की ही कोई गलती थी क्या ? अगर थी तो क्या गलती थी ? पूर्व जीवन में जब खलिहान में बैलों के मुखों को बन्द करा दिया था जिससे कि बैल खेत से ज्वार, मक्का आदि अनाज न खा सकें। अनाज को बचाने के लिए मुँह बन्द करा दिया। मात्र ५-६ घड़ी (२४ मिनट की एक घड़ी) के लिए मुँह को बन्द किया था उसका प्रतिफल रहा कि उन्हें ६ महीने तक आहार की अनुकूलता नहीं बनी।
भरत चक्रवर्ती, बाहुबली सबके पास अवधिज्ञान था। किसी ने भी, यहाँ तक कि सौधर्मइन्द्र ने भी अवधिज्ञान नहीं लगाया कि भगवान् वृषभनाथ के आहार में अन्तराय आने का कारण क्या है? जब तक साता का उदय नहीं होता तो देव भी आकर सहयोगी नहीं बन पाते। सीता जी जा रही हैं दण्डकारण्य में, सब लोग देखते रह गये, कोई कुछ भी नहीं कर पाया, देव भी तब तक कुछ नहीं करते जब तक सामने वाले का पुण्योदय न हो। लेकिन जब पुण्योदय हुआ तो अग्निकुण्ड भी जलकुण्ड रूप में परिवर्तित हो गया। बाजे बजने लगे। पहले सहयोग क्यों नहीं किया ? उस समय देव ही आ जाते, भले बाजे न बजाते। देव तो केवल साक्षी हैं हमारे पाप और पुण्योदय के। पुण्योदय होता है तो शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और पापोदय होता है तो मित्र भी शत्रु बन जाते हैं।
“शापानुग्रहशक्तिः प्रभावः ॥ स० सि०४/२०/१८९ ॥” देवों के पास शाप और अनुग्रह करने की क्षमता होती है, किन्तु वह व्यक्ति के पुण्य और पाप के साथ प्रभावकारी होती है। यदि प्रत्येक देव प्रत्येक प्राणी को शाप देने लग जाये तो मुश्किल हो जायेगी और प्रत्येक देव प्रत्येक प्राणी पर अनुग्रह करे तो सभी हमेशा मालामाल हो जायेंगे लेकिन ऐसा कभी नहीं देखा गया। इतने मालामाल हो जायेंगे कि चक्रवर्ती भी हम सबसे पीछे हो जायेगा। लेकिन ऐसा भी कभी नहीं हुआ। कर्म के संयोग में शाप और अनुग्रह रूप प्रभाव होता है अन्यथा नहीं। इसलिए कोई अपने ऊपर क्रोध करे तो उसके प्रति क्रोध करना स्वयं की कमी है। ऐसा कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करना स्वयं को घातक सिद्ध होता है, स्वयं को अधिक पाप बन्ध होता है।
वस्तुतः संसारी प्राणी निमित्त को लेकर स्वयं रागद्वेष करता है। निमित्त के ऊपर भी राग-द्वेष करता है और स्वयं दुःखित होता है। यह इस कारिका का तात्पर्य है, क्योंकि रागद्वेष करने से आत्मा स्वयं क्षुब्ध होता है। अपने स्वभाव से च्युत होता है। जब स्वभाव से च्युत हो जाता है तो तृप्त होने के स्थान पर तप्त हो जाता है। शान्ति भंग हो जाती है फिर निश्चित है कि वह दुःखी हो जाता है। दुःखी प्राणी पुनः निमित्त को देखकर उस पर टूट पड़ता है। वह इसके ऊपर टूट पड़ता है इस प्रकार दोनों का अवसान भी हो सकता है। दोनों दुःखी तो हो ही जाते हैं। इसमें विस्मय की बात नहीं है कि जो रागद्वेष करता है उसे तत्काल दुःख मिलना प्रारम्भ हो जाता है। कषाय करना आकुलता का प्रतीक है। कषाय नहीं करना आनन्द शान्ति का प्रतीक है। अतः सुख चाहने वाले व्यक्तियों को हमेशा ” अपने-अपने परिणामों को राग-द्वेष से, कषायों से दूर रखने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से सम्भव है सामने वाला व्यक्ति भी अपनी कलुषताओं को शान्त कर ले।” अज्ञानी प्राणी कषाय कर रहा है यह तो ठीक है, यह उसका अज्ञान है लेकिन यदि ज्ञानी भी कषाय करता है तो ज्ञान विकृत होने से वह भी अज्ञानी की कोटि में आ जाता है। उस समय दोनों कषाय करने वाले माने जाते हैं, कौन ज्ञानी? कौन अज्ञानी ? इसकी पहचान समाप्त हो जाती है। ज्ञानी अगर कषाय करता है तो उसे सम्बोधित किया गया है कि तुम्हारा ज्ञान कहाँ चला गया ? ज्ञान इसलिए प्राप्त हुआ था क्या ? ज्ञान प्राप्ति की सार्थकता तो तब मानी जाती है जबकि रागद्वेष के प्रसंग आने पर भी अपने परिणामों को शान्त रख सकें। उन्हें उत्तेजित न होने दें। सब कुछ शान्ति के साथ सहन कर सकें। अतः ज्ञानी तो तभी है जब ज्ञान को विकृत न होने दे। ज्ञानी की पहचान उसी में है, अन्यथा ज्ञानी- अज्ञानी की पहचान नहीं हो सकती। इसी बात को आगे की कारिका में बताते हैं।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 10
इष्टोपदेश गाथा 10 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (विराधकः) अपकार करने वाला मनुष्य (हन्त्रे जनाय) मारने वाले मनुष्य के लिए (कथं परिकुप्यति) क्यों क्रोध करता है (त्र्यङ्गुलं) तीन अँगुले (फावड़े आदि) का भूमि पर (पद्भ्यां पातयन्) पैरों के द्वारा गिराने वाला (स्वयं दण्डेन) स्वयं लकड़ी के बेंत द्वारा (पात्यते) गिराया (झुकाया) जाता है।
भावार्थ – जैसे तीन अंगुले (घास आदि उठाने के लिए तीन अंगुलियों के समान बने हुए लकड़ी के या लौहे के औजार) से या फावड़े के जमीन पर कूड़ा कचरा उठाते, धरते या पृथ्वी को खोदते समय मनुष्य को खुद झुकना पड़ता है, इसी तरह अपना घात या हानि करने वाले को स्वयं अपने बुरे कर्म का दण्ड मिला करता है, जो दूसरों की हानि करता है उनकी हानि कर्म के उदय से अवश्य होती है, जो जैसा करता है वैसा ही सुख-दुःख भरता है। फिर बुद्धिमान् मनुष्य तू अपने अपकार (बुरा) करने वाले पर क्यों व्यर्थ क्रोध करता है, तेरा अपकार करने वाले मनुष्य को उस अपकार का दण्ड स्वयं अवश्य मिलेगा। तू रागद्वेष मत कर।
उत्थानिका – यहाँ पर शिष्य प्रश्न करता है कि स्त्री आदि में राग और शत्रुओं में द्वेष करने वाला पुरुष अपना क्या अहित (बिगाड़) करता है ? जिससे उन रागद्वेष को अकरणीय बतलाया है ? गाथा 11
स्वाध्याय गाथा सं 9 & 10
इष्टोपदेश स्वाध्याय
गाथा 1 (Gatha 1) | गाथा 2 ( Gatha 2 )| गाथा 3 ( Gatha 3)| गाथा 4 ( Gatha 4) | गाथा 5 ( Gatha 5) | गाथा 6 ( Gatha 6 )| गाथा 7 | गाथा 8 | गाथा 9 | गाथा 10 | गाथा 11 | गाथा 12 | गाथा 13 | गाथा 14 | गाथा 15
English Translation of Ishtopadesh Gatha 10 Deliberation (vivechana) and Poetic Translation by Acharya shri Vidyasagarji maharaj
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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