आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 उपनीति क्रिया और व्रतचर्या
शिष्य सिद्ध भगवान और आचार्य की पूजा करता है। वह अपनी जाति या कुटुंब के घरों में भिक्षा मांगता है और प्राप्त लाभ को उपाध्याय को सौंपता है। विद्या अध्ययन तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए। यज्ञोपवीत धारण करने वाले बालक के लिए चार चिह्न हैं: मुंडन (शिर), यज्ञोपवीत (वक्ष), मूंज रस्सी (कमर), और सफेद धोती (जांघ)। सदृष्टि द्विज, जो शस्त्र, लेखन, खेती, या व्यापार से आजीविका कमाते हैं, यज्ञोपवीत धारण करें। दोषयुक्त कुल को राजा की अनुमति से शुद्ध कर पुत्र-पौत्रों को यज्ञोपवीत दिया जा सकता है। नाच-गायन आदि से आजीविका कमाने वालों को यज्ञोपवीत की अनुमति नहीं, पर वे व्रत धारण कर एक धोती पहन सकते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
ततोऽयं कृतसंस्कारः सिद्धार्चनपुरःसरम् । यथाविधानमाचार्यपूजां कुर्यादतः परम् ।।१६२॥
इसके बाद जिसका संस्कार किया जा चुका है ऐसा वह पुत्र सिद्ध भगवान् की पूजा कर फिर विधिके अनुसार अपने आचार्यकी पूजा करे ।। १६२।।
Thereafter, the son who has thus been consecrated should devoutly worship the Blessed Lord Siddha in due form, and then, in accordance with scriptural injunctions, render reverent homage unto his own Āchārya. 162
श्लोक ( Shlok ) 163
तस्मिन्दिने प्रविष्टस्य भिक्षार्थ जातिवेश्मसु । योऽर्थलाभः स देयः स्यादु पाध्यायाय सादरम् ॥ १६३॥
उस दिन उस पुत्रको अपनी जाति या कुटुम्बके लोगोंके घरमें प्रवेश कर भिक्षा माँगना चाहिये और उस भिक्षामें जो कुछ अर्थका लाभ हो उसे आदर सहित उपाध्यायके लिये सौंप देना चाहिये ॥ १६३॥
On that day, the son should enter the houses of his own caste or family and seek alms; whatever wealth he thus obtains, he ought to respectfully present to the Upādhyāya (the teacher).163
श्लोक ( Shlok ) 164
शेषो विधिस्तु प्राक्प्रोक्तः तमनूनं समाचरेत् । यावत्सोऽधीतविद्यः सन् भजेत् सब्रह्मचारिताम् ॥१६४॥
बाकीकी सब विधि पहले कही जा चुकी है। उसे पूर्णरूपसे करना चाहिये। इसके सिवाय वह जबतक विद्या पढ़ता रहे तब तक उसे ब्रह्मचर्यव्रत पालन करना चाहिये ।।१६४।।
All other rites having been previously described, they must be performed in their entirety. Moreover, so long as he pursues his studies, he ought steadfastly to observe the vow of Brahmacharya.164
श्लोक ( Shlok ) 165
अथातोऽस्य प्रवक्ष्यामि व्रतचर्यामनुक्रमात् । स्याद्यत्रोपासकाध्यायः समासेनानु संहृतः ॥१६५।।
अथानन्तर जिसमें उपासकाध्ययनका संक्षेपसे संग्रह किया है ऐसी इसकी व्रतचर्या-को अनुक्रमसे कहता हूँ ॥ १६५॥
Henceforth, I shall sequentially declare the concise compilation of the observances and conduct pertaining to the study of the Upasaka (devotee).165
श्लोक ( Shlok ) 166
शिरोलिङ्गमुरोलिङ्गं लिङ्गकट्युरुसंश्रितम् । लिङ्गमस्योपनीतस्य प्राग निर्णीतं चतुर्विधम् ॥१६६॥
जिसका यज्ञोपवीत हो चुका है ऐसे बालकके लिये शिरका चिह्न (मुण्डन), वक्षःस्थलका चिह्न-यज्ञोपवीत, कमरका चिन्ह-मूंजकी रस्सी और जाँघका चिह्न-सफेद धोती ये चार प्रकारके चिह्न धारण करना चाहिये । इनका निर्णय पहले हो चुका है ।।१६६॥
For the child who has received the sacred thread (Yajñopavīta), four marks should be borne with solemnity:the head-mark (the ritual tonsure),the chest-mark (the sacred thread itself),
the waist-mark (the munja grass cord),and the thigh-mark (the pristine white dhoti).This injunction has been previously declared. 166
श्लोक ( Shlok ) 167
तत्तु स्यादसिवृत्त्या वा मष्या कृष्या वणिज्यया । यथास्वं वर्तमानानां सदृष्टीनां द्विजन्मनाम् ॥ १६७॥
जो लोग अपनी योग्यताके अनुसार तलवार आदि शस्त्रोंके द्वारा, स्याही अर्थात् लेखनकला के द्वारा, खेती और व्यापारके द्वारा अपनी आजीविका करते हैं ऐसे सदृष्टि, द्विजों को वह यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये ।। १६७।।
Those who earn their livelihood according to their aptitude—be it through the mastery of weapons like the sword,the art of writing with ink,or through agriculture and trade—such venerable twice-born souls ought to don the sacred thread (Yajñopavīta).167
श्लोक ( Shlok ) 168–169
कुतश्चित् कारणाद् यस्य कुलं सम्प्राप्तदूषणम् । सोऽपि राजादिसम्मत्या शोधयेत् स्वं यदा कुलम् ॥१६८॥तदास्योपनयार्हत्वं पुत्रपौत्रादिसन्तती । न निषिद्धं हि दीक्षाहें कुले चेदस्य पूर्वजाः ॥१६९ ॥
जिसके कुलमें किसी कारणसे दोष लग गया हो ऐसा पुरुष भी जब राजा आदिकी संमतिसे अपने कुलको शुद्ध कर लेता है तब यदि उसके पूर्वज दीक्षा धारण करनेके योग्य कुलमें उत्पन्न हुए हों तो उसके पुत्र पौत्र आदि संततिके लिये यज्ञोपवीत धारण करने की योग्यताका कहीं निषेध नहीं है। भावार्थ-यदि दीक्षा धारण करने योग्य कुलमें किसी कारणसे दोष लग जावे तो राजा आदिकी संमतिसे उसकी शुद्धि हो सकती है और उस कुलके पुरुषको यज्ञोपवीत भी दिया जा सकता है। न केवल उसी पुरुषको किन्तु उसके पुत्र पौत्र आदि संतानके लिये भी यज्ञोपवीत देनेका कहीं निषेध नहीं है ।।१६८-१६९॥
Should any blemish or defect arise in a lineage by some cause,
yet when, by the sanction of a sovereign or the like, that lineage is purified anew,and if the forebears were born in a lineage fit to receive the sacred initiation,then there exists no prohibition whatsoever against bestowing the sacred thread upon the sons, grandsons, and descendants thereof.Thus, if a lineage capable of initiation suffers defilement,it may be purified by royal or authoritative decree,and thereafter the males of that lineage—not only the one purified but also his progeny—are fully entitled to don the Yajñopavīta.168–169
श्लोक ( Shlok ) 170
अदीक्षार्हे कुले जाता विद्याशिल्पोपजीविनः । एतेषामुपनीत्यादिसंस्कारो नाभिसम्मतः ॥१७०॥
जो दीक्षाके अयोग्य कुलमें उत्पन्न हुए हैं तथा नाचना गाना आदि विद्या और शिल्पसे अपनी आजीविका करते हैं ऐसे पुरुषोंको यज्ञोपवीत आदि संस्कारोंकी आज्ञा नहीं है ।॥ १७०।।
hose born in lineages unfit for initiation,who earn their livelihood by arts such as dancing, singing, or craft,are not to be granted the sacred thread nor any of the associated rites.Thus, men engaged in such vocations and born of ineligible stockare prohibited from receiving the sacraments of Yajñopavīta and other sacred observances.170
श्लोक ( Shlok ) 171
तेषां स्यादुचितं लिङ्गं स्वयोग्यव्रतधारिणाम् । एकशाटकधारित्वं संन्यासमरणावधि ॥१७१॥
किन्तु ऐसे लोग यदि अपनी योग्यतानुसार व्रत धारण करें तो उनके योग्य यह चिह्न हो सकता है कि वे संन्यासमरण पर्यन्त एक धोती पहनें ॥ १७१।।
Yet if such men, born in ineligible lineages,observe vows befitting their station with earnestness,then it is deemed proper for them to don a single cloth—a simple dhoti—for life, until the hour of renunciation and death.Thus, their rightful emblem of virtue is the humble garment worn steadfastly,marking their dedication even amidst worldly limitations. 171
श्लोक 172 से 181
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161
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