आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 182 से 191 तप की महिमा
मुनि नगाड़े, उद्यान, धन, घर, और क्षेत्र का त्याग कर तप करता है, जिससे स्वर्गीय दुंदुभि, अशोक वृक्ष, निधियां, मंडप शोभा, और अवगाहन शक्ति प्राप्त होती है। वह आज्ञा, सभा, और इच्छाओं का त्याग कर मौन धारण करता है, जिससे उसकी आज्ञा सुर-असुर मानते हैं और वह समवसरण में विराजमान होता है। तप से वह प्रशंसनीय और वंदनीय बनता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
विविधव्यजन त्यागादनुष्ठिततपोविधिः । चामराणां चतुःषष्ट्या वीज्यते जिनपर्यये ॥१८२॥
अनेक प्रकारके पंखाओंके त्यागसे जिसने तपश्चरणकी विधिका पालन किया है ऐसा मुनि जिनेन्द्रपर्यायमें चौंसठ चमरोंसे वीजित होता है अर्थात् उसपर चौंसठ चमर ढुलाये जाते हैं ॥१८२॥
The sage who, by renouncing various kinds of fans, faithfully observes the path of austerity—he, in his Jina-state, is fanned with sixty-four yak-tail whisks,his glory attended by the sacred waving of chāmara fans. 182
श्लोक ( Shlok ) 183
उज्झितानक सङ्गीतघोषः कृत्वा तपोविधिम् । स्याद् द्युदुन्दुभिनिर्घोषै र्घुष्यमाणजयोदयः ॥१८३॥
जो मुनि नगाड़े तथा संगीत आदिकी घोषणाका त्याग कर तपश्चरण करता है उसके विजयका उदय स्वर्गके दुन्दुभियोंके गम्भीर शब्दोंसे घोषित किया जाता है ॥१८३॥
The sage who renounces the sound of drums and musical fanfare,and pursues austere penance,his triumph is proclaimed with profound resonance by the celestial kettledrums of heaven.183
श्लोक ( Shlok ) 184
उद्यानादिकृतां छायामपास्य स्वां तपो व्यधात् । यतोऽयमत एवास्य स्यादशोकमहाद्रुमः ॥१८४।।
चूँकि पहले उसने अपने उद्यान आदिके द्वारा की हुई छायाका परित्याग कर तपश्चरण किया था इसलिये ही अब उसे (अरहन्तअवस्थामें) महाअशोक वृक्षकी प्राप्ति होती है ॥ १८४॥
Since he first renounced the shade once offered by his garden and undertook austere penance,therefore, in the Arhat state, he is granted the exalted Ashoka tree.
श्लोक ( Shlok ) 185
स्वं ‘स्वापतेयमुचितं त्यक्त्वा निर्ममतामितः । स्वयं निधिभिरभ्येत्य सेव्यते द्वारि दूरतः ॥१८५॥
जो अपना योग्य धन छोड़कर निर्ममत्वभावको प्राप्त होता है वह स्वयं आकर दूर दरवाजेपर खड़ी हुई निधियोंसे सेवित होता है अर्थात् समवसरण भूमिमें निधियाँ दरवाजेपर खड़े रहकर उसकी सेवा करती हैं ।॥ १८५॥
He who relinquishes his rightful wealth and attains a state of utter detachment,is himself served by treasures that stand steadfast at the gates—for in the Samavasarana grounds, these treasures wait at the threshold to minister unto him.185
श्लोक ( Shlok ) 186
गृहशोभां कृतारक्षां दूरीकृत्य तपस्यतः । श्रीमण्डपादिशोभास्य स्वतोऽभ्येति पुरोगताम् ॥१८६॥
जिसकी रक्षा सब ओरसे की गई थी ऐसी घरकी शोभाको छोड़कर इसने तपश्चरण किया था इसीलिये श्रीमण्डपकी शोभा अपने आप इसके सामने आती है ।।१८६।।
Having forsaken the splendor of a home guarded on all sides,he undertook austere penance;thus, the grandeur of the glorious pavilion manifests itself before him of its own accord.186
श्लोक ( Shlok ) 187
तपोऽ वगाहनादस्य गहनान्यधितिष्ठतः । त्रिजगज्जनतास्थानसहं स्यादवगाहनम् ॥१८७॥
जो तप करनेके लिये सघन वनमें निवास करता है उसे तीनों जगत्के जीवोंके लिये स्थान दे सकनेवाली अवगाहन शक्ति प्राप्त हो जाती है अर्थात् उसका ऐसा समवसरण रचा जाता है जिसमें तीनों लोकोंके समस्त जीव सुखसे स्थान पा सकते हैं ।। १८७।।
He who dwells in the dense forest to perform his austeritiesis endowed with the power to create a sanctuary vast enough to shelter all beings of the three worlds—thus is fashioned his Samavasarana, where creatures of all realms find refuge in peace.187
श्लोक ( Shlok ) 188
क्षेत्रवास्तुसमुत्सर्गात् क्षेत्रज्ञत्वमुपेयुषः । स्वाधीनत्रिजगत्क्षेत्रमैश्यमस्योपजायते ॥१८८॥
जो क्षेत्र मकान आदिका परित्याग कर शुद्ध आत्माको प्राप्त होता है उसे तीनों जगत्के क्षेत्रको अपने आधीन रखनेवाला ऐश्वर्य प्राप्त होता है ॥ १८८॥
He who relinquishes lands, houses, and such, and attains the pure Self,is bestowed with sovereignty over the realms of all three worlds,wielding lordship supreme. 188
श्लोक ( Shlok ) 189
आज्ञाभिमानमुत्सृज्य मौनमास्थितवानयम् । प्राप्तोति परमामाज्ञां सुरासुरशिरोधृताम् ॥१८९॥
जो मुनि आज्ञा देनेका अभिमान छोड़कर मौन धारण करता है उसे सुर और असुरोंके द्वारा शिरपर धारण की हुई उत्कृष्ट आज्ञा प्राप्त होती है अर्थात् उसकी आज्ञा सब जीव मानते हैं ।। १८९।।
The sage who relinquishes pride in commanding and embraces silence,is bestowed with a noble mandate, crowned upon his head by gods and demons alike—so that his command is heeded by all living beings.189
श्लोक ( Shlok ) 190
स्वामिष्टभृत्यबन्ध्वा दिसभामुत्सृष्टवानयम् । परमाप्तपदप्राप्तावध्यास्ते त्रिजगत्सभाम् ॥१९०॥
जो यह मुनि अपने इष्ट सेवक तथा भाई आदिकी सभाका परित्याग करता है इसलिये उत्कृष्ट अरहन्त पदकी प्राप्ति होनेपर वह तीनों लोकोंकी सभा अर्थात् समवसरण भूमिमें विराजमान होता है ।॥ १९०॥
The sage who forsakes assemblies of his favored servants and kin,upon attaining the exalted Arhat state,reigns supreme in the great assembly of all three worlds—that is, in the Samavasarana.190
श्लोक ( Shlok ) 191
स्वगुणोत्कीर्तनं त्यक्त्वा त्यक्तकामो महातपाः । स्तुतिनिन्दासमो भूयः कीर्त्यते भुवनेश्वरैः ॥१९१॥
जो सब प्रकारकी इच्छाओंका परित्याग कर अपने गुणोंकी प्रशंसा करना छोड़ देता है और महा-तपश्चरण करता हुआ स्तुति तथा निन्दामें समान भाव रखता है वह तीनों लोकोंके इन्द्रोंके द्वारा प्रशंसित होता है अर्थात् सब लोग उसकी स्तुति करते हैं ।। १९१।।
He who renounces all desires and ceases to praise his own virtues,enduring great austerities with equal mind in both praise and blame—is revered by the sovereigns of the three worlds,and universally lauded by all beings.191
श्लोक 192 से 201
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कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
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